एबीएन नॉलेज डेस्क। सर्दियों का मौसम बीत चुका है और गर्मी का प्रवेश हो चुका है। इस बार मार्च के महीने में ही जम कर गर्मी पड़ रही है। अभी अप्रैल, मई और जून बाकी है। मौसम विभाग अभी से ही हीट वेव यानी लू की चेतावनी जारी करने लगा है। गर्मी आते ही हमारा सबसे प्राइमरी फ्रेंड होता है- पंखा। हम कहीं बाहर से घर में एंटर करते ही सबसे पहले पंखे का स्विच दबाते हैं। पिछले कुछ दशकों में भले ही कूलर और एसी आ गए हैं, लेकिन एक लंबे समय तक पंखा ही हमें गर्मी से राहत दिलाने का साधन हुआ करता था। आज भी देश की आबादी का एक बड़ा तबका गर्मियों में पंखे के सहारे ही राहत पाता है। जैसा कि आप जानते ही होंगे कि बिजली और बैट्री से चलने वाले पंखे से सदियों पहले हाथ से चलने वाले पंखे होते थे। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पंखे की शुरुआत कैसे हुई? कैसे यह आधुनिक होता चला गया और वर्तमान स्वरूप में उपलब्ध हुआ? पेड़ के पत्ते के होते थे पंखे : आज भले ही बिजली से चलने वाले पंखे उपलब्ध हैं, लेकिन सदियों पहले पेड़ के पत्तों से पंखे बनाए जाते थे। करीब 4000 ईसा पूर्व इनका जिक्र आता है। ये पंखे, बड़े पेड़ के पत्ते होते थे, जिन्हे राजा-महाराजाओं के सेवक उन्हें हंकने यानी हवा करने के लिए इस्तेमाल किया करते थे। इसका पहला उदाहरण मिस्त्र में देखने को मिलता है। बहुत सारे लोग मानते हैं कि इंसानों द्वारा खुद से चलाए जाने वाले पंखे का आविष्कार चीन में हुआ था। फिर हमारे देश में भी हाथ से हंकने वाले पंखे का आविष्कार हुआ। अभी भी गांवों में ऐसे पंखे दिख जाते हैं, जिन्हें बड़े-बुजुर्ग हाथ से घुमाकर चलाया करते हैं। फिर आए बिजली वाले पंखे : बिजली के आविष्कार में माइकल फैराडे का अहम योगदान रहा है। इसके बाद थॉमस एडिसन और निकोला टेस्ला ने बिजली को आधुनिक और विस्तारित रूप देना शुरू किया। साल 1982 में शूयलर स्काट्स व्हीलर ने इंसान के बिना पंखे को मोड़ने के लिए बिजली का इस्तेमाल किया। तब बिजली के पंखे में सिर्फ दो ब्लेड हुआ करते थे। यह टेबल फैन की तरह हुआ करता था और उसमें किसी तरह की जाली नहीं लगी हुई थी। सीलिंग फैन का आगमन : साल 1889 में सीलिंग फैन यानी छत की सतह से लगने वाले पंखे अस्तित्व में आए। इसे फिलिम एच डाइहली ने पेटेंट करवाया था। इसमें लोहे की एक बड़ी मोटी रॉड हुआ करती थी और इसका वजन काफी ज्यादा हुआ करता था। शुरुआत में कई ऐसे पंखे दिखे, जिनमें 4 ब्लेड हुआ करती थीं। ये पंखे आज की तरह बहुत तेज नहीं चला करते थे। लेकिन धीरे चलने पर भी ये अच्छी हवा देते थे। साल 1902 में पंखे बनाने वाली कंपनियां बाजार में आईं. इसके बाद आम घरों में इस्तेमाल होने वाले पंखे बनाए जाने की शुरुआत हुई। पुराने पंखों की तुलना में ये पंखे कुछ सुगम थे, वजन में हल्के थे लेकिन बहुत आसानी से उपलब्ध नहीं थे। इसी साल AC यानी एयर कंडीशनर की भी खोज हुई थी। करीब 8 साल बाद कंपनियों की प्रतिस्पर्धा के बीच घरों में लगने वाले पंखे बिक्री के लिए बाजार में आसानी से उपलब्ध हो गए और इस तरह पंखे के एक नए युग की शुरुआत हुई। वर्ष 1932 में इमर्सन इलेक्ट्रिक ने मार्केट में पहला फ्लोर फैन उतारा। लोकप्रियता पर असर पर बना रहा बाजार : 1960 के दशक में एसी का मार्केट उभरने लगा था। बेहतर ठंडक के लिए एसी लोगों की पसंद बनने लगा। ऐसे में पंखों की लोकप्रियता पर असर हुआ। कंपनियों ने पंखे को अत्याधुनिक बनाने पर काम शुरू कर दिया। पंखे के डिजाइन, खूबसूरती, सुगमता पर काम करने के बाद कंपनियों ने ग्राहकों के सामने ढेर सारे विकल्प उपलब्ध कराए। एसी की सीमा यह थी और अब भी है कि यह बंद कमरों के लिए है, जबकि खुली जगहों पर आज भी पंखे ही ठंडक पहुंचाने का प्रमुख विकल्प हैं। दूसरी बड़ी बात इसकी प्राइस को लेकर है। पंखे की तुलना में एसी काफी महंगे आते हैं। ऐसे में पंखों का मार्केट बना रहा, जो आज भी बना हुआ है। एसी ने लोगों को मजे तो दिए लेकिन बिजली का बिल आज भी चिंता का विषय बना हुआ है। इसलिए बाजार में पंखों की मांग बनी हुई है। एक बड़े तबके के लिए पंखा ही गर्मी में राहत देता रहा है।
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