एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सूरज शाहदेव)। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध पर दुनियाभर की नजर है।युध्द से पहले एक आशंका थी कि कही यह तीसरा विश्व युद्ध की शुरूआत न कर दे। लेकिन रूस के यूक्रेन में आक्रमण के बाद अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देश यूक्रेन का साथ दे रहे है। तो वही दूसरी तरफ रशियन संगठन के 11 देशों के सेना मिलकर इस युद्ध मे भाग ले रहे है। यूक्रेन के साथ साथ पूरे विश्व को लगता था की अगर रूस यूक्रेन पर हमला करेगा तो नाटो देश की सेना यूक्रेन के साथ मिलकर रूसी सेना के साथ लड़ेंगे लेकिन जो नजारा देखने को मिल रहा है वह सोच से उलट है। ये नाटो के देश सिर्फ बन्दर घुड़की दे रहे थे सैन्य मदद से पूरी तरह से पीछे हट गए है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने तो अपने सेना भेजने से साफ इंकार कर दिया है। रूस ने साफ साफ कहा है कि जो भी देश यूक्रेन के पक्ष में लड़ने आएगा उसे गंभीर अंजाम भुगतने पड़ेंगे। अभी भारत के सामने बड़ी चुनौती है कि आखिर वह इस मसले पर क्या रुख अख्तियार करे। दरअसल रूस भारत का लंबे समय से मित्र देश रहा है और अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक महत्ता का देश है। लिहाजा भारत दोनों में से किसी भी देश के साथ अपने संबंध खराब नहीं करना चाहेगा। भारत शुरू से ही गुटनिरपेक्ष देश रहा है।प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूएसएसआर का गठन किया गया था और यूक्रेन भी इसका हिस्सा था। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने नाटो का गठन किया। और 1945 से लेकर 1991 तक लगातार रूस और अमेरिका के बीच शीत युद्ध चलता रहा। इस युद्ध मे कोई सेना नही कोई हथियार नही बल्कि मीडिया और बयानों के माध्यम से रूस को कमजोर करने की कोशिश होती रही। अमेरिका लगातार रूस को तोड़कर कमजोर करने की कोशिश में रहा। आखिरकार अमेरिका को यह सफलता 1991 में मिल ही गया और रूस से लगभग 15 देश अलग हो गए जिसमे यूक्रेन भी शामिल था। ब्लादिमीर पुतिन जब रूस के प्रधानमंत्री और बाद में राष्ट्रपति बने तब से वे लगातार रूस को मजबूत करने की कोशिश करते रहे जो देश रूसी संगठन से अलग हो गए थे उन्हें फिर से अपने साथ लाने में सफल हो गए। लेकिन 2010 में जब यूक्रेन ने रूस का विरोध करके नाटो में शामिल होने की कवायद शुरू की तो रूस नाराज हो गया। रूस-यूक्रेन के बीच तनाव नवंबर 2013 में तब शुरू हुआ जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच का कीव में विरोध शुरू हुआ. यानुकोविच को रूस का समर्थन हासिल था जबकि प्रदर्शनकारियों को अमेरिका और ब्रिटेन का. बगावत के चलते फरवरी 2014 में यूक्रेन के राष्ट्रपति यानुकोविच को देश छोड़कर रूस में शरण लेनी पड़ी थी। रूस ने 2014 में यूक्रेन के एक आइलैंड क्रीमिया पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया। तब यूक्रेन और रसिया के बीच तनाव और बढ़ गया। वास्तव में रूस नही चाहता है कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो। नाटो एक सैन्य समूह है जिसमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देश शामिल हैं। अब रूस के सामने चुनौती यह है कि उसके कुछ पड़ोसी देश पहले ही नाटो में शामिल हो चुके हैं। इनमें एस्टोनिया और लातविया जैसे देश हैं, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा थे। अब अगर यूक्रेन भी नाटो का हिस्सा बन गया तो रूस हर तरफ से अपने दुश्मन देशों से घिर जाएगा और अमेरिका जैसे देश उस पर हावी हो जाएंगे। अगर यूक्रेन नाटो का सदस्य बन जाता है और रूस भविष्य में उस पर हमला करता है तो समझौते के तहत इस समूह के सभी 30 देश इसे अपने खिलाफ हमला मानेंगे और यूक्रेन की सैन्य सहायता भी करेंगे। रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन ने एक बार कहा था कि यूक्रेन को खोना रूस के लिए एक शरीर से अपना सिर काट देने जैसा होगा। यही कारण है कि रूस नाटो में यूक्रेन के प्रवेश का विरोध कर रहा है। यूक्रेन रूस की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। जब 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस पर हमला किया गया तो यूक्रेन एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जहां से रूस ने अपनी सीमा की रक्षा की थी। अब अगर यूक्रेन नाटो देशों के साथ चला गया तो रूस की राजधानी मास्को, पश्चिम से सिर्फ 640 किलोमीटर दूर होगी। फिलहाल यह दूरी करीब 1600 किलोमीटर है।इसे लेकर ही रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन नही चाहते थे कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो और रूस के लिए खतरा बने। अब इन दोनों देशों के बीच छिड़ी जंग में पूरी दुनिया की नजर भारत के रुख पर है। अमेरिका सहित यूरोपियन देश चाहते है कि भारत रूस की आलोचना करे। लेकिन भारत अपनी सुरक्षा हित को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेगा। भारत का सम्बंध रूस के साथ बहुत ही अच्छा है। भारत की 55 प्रतिशत सैन्य उपकरण रूस से ही आयात होते है। रूस जरूरत के समय खुल कर भारत का साथ देता रहा है। रूस भारत और चीन विवाद के बीच तटस्थ रुख अपनाया है। 1998 का परमाणु परीक्षण हो या फिर कश्मीर का मसला हो रूस हमेशा भारत के पक्ष में रहा है। ऐसे समय मे अगर भारत रूस के खिलाफ जाएगा तो चीन रूस के और नजदीक आएगा जो भारत के लिए खतरनाक हो सकता है।अत: भारत कभी अपने मित्र देश को नाराज नही करना चाहेगा। अभी पिछले 10 सालों से अमेरिका के साथ भी भारत का सम्बंध बहुत ही प्रगाढ़ हुआ है। अमेरिका भारत के साथ मिलकर क्वाड का गठन किया है जिसमे अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया एवम भारत शामिल है। इस क्वाड का गठन एशिया में चीन कि बढ़ती प्रभाव के खिलाफ किया गया है। अमेरिका भी अच्छी तरह से जानता है कि दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत एक बहुत ही अहम देश है अत: अमेरिका भी भारत को नाराज नही करना चाहेगा। जिस प्रकार से चीन और पाकिस्तान रूस के साथ अपना सम्बन्ध को मजबूत बनाने में लगे हुए है इसको लेकर भी भारत सतर्क है। यूक्रेन और रूस के मामले में भारत कोई भी फैसला लेगा तो इस बात पर भी गौर जरूर करेगा। अत: भारत रूस एवम अमेरिका दोनों को ही नाराज नही करना चाहेगा।
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