एबीएन कैरियर डेस्क (विनय उमरजी)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही भारत में निजी भागीदारी बढ़ाने का आह्वान कर रहे हों ताकि छात्रों को चिकित्सा अध्ययन के लिए विदेश जाने की जरूरत महसूस न हो, लेकिन उद्योग का मानना है कि यह दायित्व सरकार का है। मोदी ने हाल ही में एक वेबिनार में कहा था आज हमारे बच्चे पढ़ने के लिए छोटे देशों में जा रहे हैं, खास तौर पर चिकित्सा शिक्षा में। वहां भाषा की दिक्कत होती है। फिर भी वे जा रहे हैं ... क्या हमारा निजी क्षेत्र इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर प्रवेश नहीं कर सकता है? क्या हमारी राज्य सरकारें इस संबंध में भूमि आवंटन के लिए अच्छी नीतियां नहीं बना सकतीं? हालांकि कई उद्योग पर्यवेक्षकों और हितधारकों का कहना है कि सस्ती जमीन उपलब्ध कराने वाली राज्य सरकारें अकेले ही सरकारी और निजी या स्व-वित्तपोषित मेडिकल कॉलेजों के बीच मौजूदा मूल्य अंतर को पूरा नहीं कर सकती हैं। जहां एक ओर सरकारी कॉलेजों और सरकारी कोटे में 4.5 वर्षीय एमबीबीएस कार्यक्रम के लिए मेडिकल सीटों की लागत 15,000 रुपये सालाना होती है, वहीं दूसरी ओर निजी कॉलेजों में यह लागत सालाना 5-6 लाख रुपये और 15-17 लाख रुपये के बीच रहती है। गुजरात में एक स्व-वित्तपोषित कॉलेज के डीन ने नाम न छापने की शर्त पर कहा यहां तक कि ग्रामीण इलाके में भी किसी निजी कॉलेज की स्थापना के लिए करोड़ों रुपये की जरूरत होती है और यहां जमीन की समस्या सबसे कम होती है। डीन ने कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के अंतर्गत सरकारी मानदंड यह बात विनियमित करते हैं कि कॉलेज की प्रत्येक मेडिकल सीट के लिए उसे 4-5 गुना अधिक संख्या वाले बेड के साथ अस्पताल चलाने की भी जरूरत होती है। इसके अलावा प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय अन्य बुनियादी ढांचा और संकाय का वेतन भी रहता है। उदाहरण के लिए हमारे अपने पुस्तकालय की लागत हमें प्रति वर्ष 80 लाख रुपये से 90 लाख रुपये पड़ती है। चीन तथा यूक्रेन, फिलिपींस और किर्गिस्तान जैसे छोटे देश कहीं ज्यादा किफायती विकल्प प्रदान करते हैं, जबकि भारतीय योग्यता मानकों की जरूरत नहीं होती है। अहमदाबाद में विदेशी शिक्षा सलाहकार समीर यादव ने कहा कि जहां भारत में निजी चिकित्सा शिक्षा की लागत 80 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये के बीच है, वहीं दूसरी ओर चीन और फिलिपींस जैसे देशों में इसकी लागत 25 लाख रुपये है। बेलारूस में यह 30 लाख रुपये और रूस में 40 से 45 लाख रुपये है। यादव ने कहा इसके अलावा इन देशों के चिकित्सा कार्यक्रमों को अमेरिका और ब्रिटेन में मान्यता प्राप्त है और स्नातकों को पश्चिमी देशों में केवल लाइसेंसिंग परीक्षा पास करने की ही आवश्यकता होती है। विदेशी चिकित्सा शिक्षा सलाहकार करियर एक्सपर्ट के संस्थापक गौरव त्यागी का विचार है कि सरकार को किफायती फीस के साथ सरकार द्वारा संचालित कॉलेजों और मेडिकल सीटों की संख्या में विस्तार करने की जरूरत है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय सहित कई सूत्रों का हवाला देते हुए नैशनल मेडिकल जर्नल आॅफ इंडिया में प्रकाशित तथा एनएमसी के अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड की अध्यक्ष अरुणा वाणीकर द्वारा सह-लेखन वाले एक वर्किंग पेपर में कहा गया है कि वर्ष 2020 में हालांकि भारत में 80,312 एमबीबीएस सीटें उपलब्ध थीं (इनमें से करीब 51 प्रतिशत सरकारी कोटे वाली थीं), लेकिन राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में बैठने वाले छात्रों की 14 लाख की विशाल संख्या थी। नवीनतम अनुमानों के अनुसार, जहां वर्ष 2021 में नीट के आवेदनों की संख्या वर्ष 2018 की 13.3 लाख से बढ़कर वर्ष 2021 में करीब 16 लाख हो गई है, वहीं दूसरी ओर एमबीबीएस की उपलब्ध सीटों की संख्या 88,000 से कुछ अधिक है। त्यागी ने कहा कि चिकित्सा शिक्षा के लिए जो छात्र विदेश जाते हैं, वे मुख्य रूप से चीन, रूस, यूक्रेन, फिलिपींस, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और जॉर्जिया जैसे देशों में जाते हैं। इस बात के बावजूद ऐसा है कि इनमें से कई देशों में, जिनमें चीन, रूस और यूक्रेन भी शामिल है, उनकी स्थानीय भाषा सीखने की आवश्यकता होती है, जिसे भारतीय छात्र भारत में पर्याप्त सीटों की कमी और नीट में खराब प्रदर्शन के कारण पांच से छह महीने में पूरा कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि इस बहिर्वाह को रोकने के लिए न केवल सरकारी सीटों की संख्या में वृद्धि करने की जरूरत है, बल्कि मेरिट कट-आॅफ पर फिर से विचार करने के अलावा निजी कॉलेजों द्वारा ली जाने वाली फीस को भी विनियमित करने की आवश्यकता है। वर्ष 2021 में नीट कट-आॅफ पासिंग मार्क्स और पर्सेंटाइल सामान्य वर्ग के लिए क्रमश: 720-138 और 50 वां तथा एससी/एसटी/ओबीसी के लिए 137-18 और 40वां था। एनएमसी जैसे निकायों के जरिये भारत द्वारा आवश्यक मानक के मुकाबले इन देशों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम के मानक में अंतर से छात्रों की परेशानी बढ़ रही है। उदाहरण के लिए वर्किंग पेपर के अनुसार विदेशों में अध्ययन करने वाले 18 से 20 प्रतिशत मेडिकल स्नातक भारत में विदेशी चिकित्सा स्नातक परीक्षा (एफएमजीई) पास कर सकते हैं। एफएमजीई भारत में राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एनबीई) द्वारा आयोजित लाइसेंसधारक परीक्षा होती है। यह उन भारतीय नागरिकों के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं में से एक होती है, जो यहां मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए विदेशों में किसी कॉलेज से मेडिकल डिग्री प्राप्त करते हैं। पेपर में कहा गया है कि एनएमसी एमबीबीएस में प्रवेश के लिए आयु सीमा को हटाकर और सरकारी कोटे में एमबीबीएस के लिए फीस कम करने की सिफारिश करके इस मसले को हल करने की कोशिश कर रहा है। डीन ने कहा कि बोझिल प्रक्रिया और भारी निवेश की आवश्यकता के मद्देनजर सरकार को निजी मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के लिए मानदंडों को आसान करने की भी जरूरत है। डीन ने कहा कि किसी निजी अस्पताल के लिए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के वास्ते आवेदन कई चरणों से गुजरता है।
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