एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अदिति)। 10 मार्च को यूपी विधानसभा के चुनाव परिणाम आने वाले हैं। महिलाओं और मुस्लिमों वोटरों का रूझान किस ओर रहा। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता इस वक्त दुविधा में हैं। अपनी पहचान की रक्षा करने की उनकी पुरजोर ख्वाहिश और प्रदेश के शासन में उनकी भी बात सुनी जाए, उसको देखते हुए उनके सामने आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) को ही वोट देने का विकल्प बचा है जो राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इसके अलावा समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) जैसे परंपरागत राजनीति दलों से ही जुड़े रहने का एक रास्ता बचा है जो शायद अल्पसंख्यकों के हितों का भले ही खुलकर समर्थन नहीं कर पा रहे हों लेकिन वे प्रमुख विरोधी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराने के लिए बेहतर स्थिति में हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर हाल में सपा को लेकर सबसे ज्यादा निराशा इस बात को लेकर बढ़ी है कि पार्टी ने आजम खान की लंबी कैद के मुद्दे को ठीक तरह से नहीं उठाया। अदालत द्वारा जमानत देने से इनकार किए जाने के बाद खान जेल से सपा उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव (रामपुर से) लड़ रहे हैं। उनके और उनके परिवार के खिलाफ 104 अदालती मामले दर्ज हैं जिनमें भूमि अतिक्रमण से लेकर बकरी, भैंस और पुस्तकों की चोरी तक के आरोप शामिल हैं। इस समुदाय में इस बात को लेकर काफी अफसोस है कि सपा ने खान के मामले को पुरजोर तरीके से जनता के सामने नहीं उठाया लेकिन मुलायम सिंह यादव अगर पार्टी प्रमुख रहते तब इस मुद्दे पर पार्टी का रुख कुछ और ही होता। वर्ष 2021 में जब वह पहले से ही कई महीनों तक जेल में थे तब सपा ने उनकी रिहाई के लिए एक अभियान शुरू किया था। उनके बेटे अब्दुल्ला इस चुनाव में सपा उम्मीदवार (स्वार) हैं जो हाल ही जेल से रिहा हुए हैं। उन पर कथित रूप से चुनावी दस्तावेजों में गलत जन्मतिथि बताने के आरोप हैं। चुनाव विशेषज्ञ और नेता योगेंद्र यादव कहते हैं, एआईएमआईएम का उभार यह दर्शाता है कि मुसलमान कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के ब्रांड से थक चुके हैं जिस पर सपा और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) भी अमल करती है। वे वोट बैंक और बंधकों के रूप में अपने समुदाय के इस्तेमाल किए जाने से नाराज हैं। लेकिन अकादमिक जगत से जुड़ी रही और उत्तर प्रदेश की विशेषज्ञ सुधा पई का कहना है कि इस आधार के हिसाब से कम सबूत हैं कि मुसलमान अपने रणनीतिक मतदान के पिछले रुझान से अलग कुछ करेंगे। वह कहती हैं, आम रुझान यही है कि आप पहले प्रत्याशी को देखते हैं और आकलन करते हैं कि वह प्रत्याशी उस विशेष निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा को हराने जा रहा है या नहीं और उस आधार पर उस व्यक्ति को वोट दिया जाएगा। ऐसे में कोई अलग पैटर्न नहीं उभर सकता है बल्कि यह जमीनी वास्तविकता पर आधारित फैसला है। एआईएमआईएम का उदय अपने आप में एक दिलचस्प कहानी है। तेलंगाना के पुराने हैदराबाद क्षेत्र से गहरा ताल्लुक रखने वाली पार्टी ने 2017 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा था। उसने 38 सीट पर चुनाव लड़ा और एक भी सीट नहीं जीती और उसके 37 प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई। लेकिन इन सीट पर पार्टी 2.4 प्रतिशत की वोट हिस्सेदारी पाने में कामयाब रही। अगर यह पार्टी तस्वीर में नहीं होती तब ये वोट सपा या कांग्रेस के खाते में जा सकते थे और इसी वजह से उस पर भाजपा की बी टीम होने का तोहमत लगा। इस बात को तब और बल मिला जब उसने तृणमूल कांग्रेस के साथ सहयोग किए बिना अपने दम पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और उससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस बार भी पार्टी के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने सपा-रालोद गठबंधन का समर्थन करने से इनकार कर दिया है बल्कि 100 सीट पर चुनाव लड़ने की अपनी महत्त्वाकांक्षा भी बढ़ा दी। इस समुदाय के नेताओं ने नाम न बताने की शर्त पर दो रुझानों के बारे में बात की। उनका कहना है, मुस्लिम राजनीति के ओवैसीकरण में मुसलमानों के लिए कट्टरपंथी अधिकारों की बयानबाजी एक मुख्य विषय बन गया है। इसमें कोई शक नहीं कि ओवैसी शानदार वक्ता हैं और उन्होंने संसद में कई बार कहा है कि एक मुस्लिम के रूप में भारतीय संविधान उनका अंतिम हथियार है क्योंकि यह भारत के लिए, भारतीयों के लिए, मुसलमानों के लिए और दलितों के लिए सबसे अच्छा दस्तावेज है। यह सामाजिक न्याय हासिल करने के लिए भी सबसे अच्छा दस्तावेज है। लेकिन ओवैसी चाहते हैं कि संविधान में निहित मुसलमानों के अधिकारों को उनकी वर्तमान परिस्थितियों पर लागू किया जाए। उदाहरण के लिए वह चाहते हैं कि हाल ही में उन पर हुए जानलेवा हमले के दोषियों को भी सख्त गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के हिसाब से दंडित किया जाए जिसके तहत कई मुस्लिम युवाओं को जेल में डाला गया है। हालांकि इस तरह की जोशीली बयानबाजी चुनावी जनसभाओं में काफी पसंद की जाती है लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इसका सीधा मतलब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अधिक ध्रुवीकरण करना है और भाजपा ऐसा ही चाहती है। अगर 403 सदस्यों वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रतिनिधित्व की बात करें तो पहले 63 मुस्लिम विधायक थे। 2017 में यह तादाद घटकर 24 रह गई। हालांकि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का तर्क है कि मुसलमानों को अकेले ही अपने समुदाय के लिए बोलने की जरूरत नहीं है बल्कि दूसरों को भी उनके लिए आवाज उठानी चाहिए। विधानसभा और राज्य के नीति निर्माण में उनकी हिस्सेदारी महज 5.9 प्रतिशत तक सिमट गई है जबकि राज्य की आबादी में इस समुदाय की हिस्सेदारी 20 फीसदी तक है। ऐसे में निश्चित तौर पर इस समुदाय के भीतर सपा और एआईएमआईएम जैसे दलों की भूमिका ही आंतरिक स्तर पर बहस का मुद्दा बनी हुई है।
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