टीम एबीएन, रांची। आज दिनांक 20 फरवरी को अशोकनगर स्थित क्लब में जनवादी लेखक रांची का 5वां ज़िला सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता संघ के अध्यक्ष एवं साहित्यकार, फ़िल्म मेकर डॉ विनोद कुमार ने की। मौके पर जलेस के राज्याध्यक्ष गोपाल प्रसाद भी उपस्थित थे। कोरोना काल में जितने भी लेखक दिवंगत हुए उनके प्रति संवेदना व्यक्त की गई तथा उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किया। प्रतिनिधि सभा में जलेस रांची के ज़िला सचिव एमज़ेड खान ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। प्रतिवेदन पर कुमार बृजेन्द्र, वीना श्रीवास्तव, डॉ मसूद जामी, अविनाश कुमार, कलाम खान, रवि कुमार, सैयद उज़ैर अहमद, इफ्तेखार अहमद, जमशेद क़मर, अनिल तन्हा, आदि ने चर्चा में भाग लिया। चर्चा के पश्चात प्रतिवेदन आम सहमति से पारित किया। अविनाश कुमार, कोषाध्यक्ष ने सभा में दिसम्बर 2017 से जनवरी 2022 का संघ का लेखा प्रस्तुत किया जिसे आम सहमति से पारित किया गया। आम सहमति से जिला की नई कमेटी गठित की गई: संरक्षक 1.ओम प्रकाश बरनवाल 2.सैयद गुफरान अशरफ़ी अध्यक्ष: डॉ विनोद कुमार उपाध्यक्ष:1. डॉ जमशेद क़मर 2.अपराजिता मिश्रा 3 .वीना श्रीवास्तव 4.कुमार बृजेन्द्र सचिव : एमज़ेड ख़ान सहायक सचिव:1.डॉ अनिल तन्हा 2.डॉ आलम आरा कोषाध्यक्ष: अविनाश कुमार सहायक कोषाध्यक्ष: अनिल ठाकुर कार्यकारिणी सदस्य: 1.डॉ नजमा नाहिद अंसारी 2.अबू नसर 3.मो शारिब 4.रवि कुमार 5.फ़िरदौस जहां 6.सियाराम झा सरस 7. इंदुमती सोरेंग 8. आयशा ख़ान 9.मोइजुद्दीन मिरदाहा 9. डाॅ. कोरनेलियुस मिंज 10. रामदेव बड़ाइक 11.सुकेशी कर्मकार 12 शालिनी साबू 14 सैयद उज़ैर अहमद खुले सत्र में आयोजित "लोकतंत्र में सांस्कृतिक आंदोलनों की भूमिका और चुनौतियों" विषयक सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए डॉ रविभूषण ने वर्तमान स्थिति की चर्चा करते हुए कहा कि आज की पथ भ्रष्ट राजनीति को साहित्य और संस्कृति की मशाल ही सही दिशा दिखा सकती है। संस्कृति जीवन जुड़ी हुई चीज़ है। भारत में लोकतंत्र धीरे धीरे खत्म किया जा रहा है, इसकी संस्थाएं खत्म की जा रही हैं या उन्हें महत्वहीन बना दिया गया है। आज के लोकतंत्र को कॉरपोरेट करेंसी कहा जा सकता है जो कॉरपोरेट के द्वारा नियंत्रित हो रहा है। आगे कहा कि सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा कर हम समाज को दिग्भर्मित होने से बचा सकते हैं और ये काम लेखक संगठनों के अलावा विचारशील व्यक्ति और लेखक ही कर सकते हैं। तटस्थ रहने का समय अब नहीं है। खुलकर सामने आना होगा। इससे पूर्व जनवादी लेखक संघ का केंद्रीय ख़बरनामा " जलेस ख़बर" जो रांची से पहली बार प्रकाशित किया गया। का लोकार्पण डॉ रविभूषण, जलेस के राज्य सचिव गोपाल प्रसाद, डॉ जमशेद क़मर, वीना श्रीवास्तव, महफूज़ आलम आदि के द्वारा किया गया। पहले ये इंदौर से निकल रहा था। ये द्विभाषीय है। इसका संपादन एमज़ेड ख़ान, डॉ विनोद कुमार, अपराजिता मिश्रा, आलम आरा, वीना श्रीवास्तव, जमशेद क़मर, महफूज़ आलम, उज़ैर अहमद, गुफरान अशरफ़ी ने किया। संचालन करते हुए एमज़ेड ख़ान ने 1936 में शुरू हुए पहले सांस्कृतिक आंदोलन का इतिहास बताते हुए कहा कि इससे राजनीति, सामाजिक जीवन प्रभावित हुआ। इसके आक्रामक प्रहार से अंधविश्वास, धर्मान्धता, सामंती व्यवस्था, सभ्यता-संस्कृति भी प्रभावित हुई। गोपाल प्रसाद ने संबोधित करते हुए कहा कि प्रतिरोध की आवाज़ बुलंद करना आज वक़्त की ज़रूरत है। यदि हम खामोश रहे तो सब कुछ ख़त्म हो जायेगा। लोकतंत्र, संविधान पर ख़तरा मंडला रहा है। लोकतांत्रिक संस्थाएं धीरे धीरे कमज़ोर बनाई जा रही हैं। इनकी स्वायतता स्वतंत्रता ख़तरे में है। इनकी सुरक्षा के लिए हमें बोलना ही होगा। डॉ रिज़वान ने शंकाओं का इज़हार करते हुए कहा कि निजीकरण लाकर आरक्षण को समाप्त करने की साज़िश रची जा रही है। हमें सांस्कृतिक आंदोलन के माध्यम से लोगों को जागरूक कर सकते हैं। इस सत्र की अध्यक्षता डॉ विनोद कुमार ने किया। सभा को डॉ जमशेद क़मर आदि ने संबोधित किया आयशा ख़ान ने फ़ैज़ की नज़्म "मुझ से पहली से मुहब्बत मेरी महबूब न मांग ..." गाकर महफ़िल को रंग ओ नूर में डुबो दिया। तीसरे सत्र मुशायरा और कवि सम्मेलन की अध्यक्षता गुफरान अशरफ़ी ने की और संचालन अबू नसर ने किया। इन लोगों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। गुफरान अशरफ़ी : हो गयी इंतहा,इंतहा हो गयी/शर्म से पानी पानी हया हो गयी कुमार बृजेन्द्र:झूम रहे हैं मस्त पेड़/बह रही है पागल हवा नजमा नाहिद:भरी हवा तक़दीर में यूं/सब कुछ देख गुब्बारे चुप वीना श्रीवास्तव:तुम रोटी का अधिकार क्यों छीनते हो/रोटी छीनो न/हमें फ़र्क नहीं पड़ता उज़ैर अहमद:तारे मेरे नसीब के सब रूठे भी हैं/आंखों के ख़्वाब मेरे अभी टूटे भी हैं क़ुदरतुल्लाह: कुछ लोग ऐसे भी मेरे दरमियान में /झगड़ा कराते रहते हैं दो भाइयों के बीच मसूद जामी:हाथों से तुझे मैं अपने खीर खिलाऊंगा/ये चंद किसी शब को आंगन में उतर जाऊंगा इंदुमती सोरेंग: शमशीर हुई है आज क़लम/तोड़ डालूंगी सारा भरम तबीब अहसन:बेगम कहती हैं के चबा जाऊंगी ककड़ी की तरह/डर कर मैं हो गया लकड़ी की तरह महफूज़ आलम: काले बादल हर जानिब हैं आज कैसा मंज़र है/कैसी फिजायें आज हुई हैं ,सब के हाथ मे खंजर है। अख्तर रांचवी: हया की चिलमन गिरी हुई है नज़र का शोला जगा हुआ है/मेरे दिल में तुम्हारी यादों का एक मेला लगा हुआ है। शुरुआत में आयशा ख़ान ने अपनी खूबसूरत आवाज़ में फ़ैज़ की नज़्म "मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी न मांग..." गाकर महफ़िल में रंग जमाया. मोइजुद्दीन मिरदाहा और साथी ने नागपुरी गीत से लेखकों को यहां की संस्कृति से रूबरू कराया। उक्त जानकारी जलेस के सचिव एमज़ेड ख़ान ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
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