नाटक पंचम वेद है : डॉ जेबी पाण्डेय

 

नाटक पंचम वेद है : डॉ जेबी पाण्डेय टीम एबीएन, रांची। केन्द्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली और राजेंद्र विश्वविद्यालय, बलांगीर(उडीसा) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित आठ दिवसीय नव लेखन शिविर में आज पंचम दिवस (19.2.22) नाटक पर विमर्श हुआ।संसाधन सेवी के रूप में बोलते हुए रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा जे बी पाण्डेय ने कहा कि नाटक पंचम वेद है। आचार्य भरत मुनि ने लोकहित का ध्यान रख चारों वेदो से एक एक तत्व को ग्रहण कर नाटक रूपी पंचम वेद की रचना की। ऋग्वेद से कथा सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से रस और अथर्ववेद से अभिनय लेकिन इस नाटक रूपी पंचम वेद की रचना हुई। इस नाटक के निर्माण हेतु देवाधिदेव शंकर ने तांडव और पार्वती ने लास्य दिया।आचार्य भरत मुनि ने नाटक की रचना का उद्देश्य बताते हुए लिखा है कि लोकातार्नां, श्रमातार्नां,दुखातार्नां तपस्विनाम्! विश्राम जननं लोके नाटयमेतद् भविष्यति!! अर्थात् लोक के श्रम परिहारार्थ तथा कल्याणार्थ नाटक का आविर्भाव हुआ। नाटक के 6 तत्व होते हैं-कथावस्तु, चरित्र चित्रण, कथोपकथन, भाषा-शैली, देशकाल, और उद्देश्य या संदेश। कथोपकथन नाटक का प्राण होता है। नाटक एक दृश्य काव्य है, अत: इसमें अभिनय और कथोपकथन का विशेष महत्व है।नाटक को संस्कृत में रूपक कहते हैं। आचार्य धनंजय के दशरुपक के अनुसार इसके 10 भेद हैं- 1. नाटक, 2. प्रकरण, 3. अंक, 4. व्यायोग, 5. भाण, 6. समवकार, 7. वीथी, 8. प्रहसन, 9. डिम, 10. ईहामृग। नाटक में 5 संधियां होती हैं- मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श और निर्वहण। 5 अवस्थाएं हैं : आरंभ, संघर्ष (यत्न) प्राप्त्याशा नियताप्ति और फलागम। 5 प्रकृतियां हैं- बीज, बिंदु, पताका, प्रकरी और उत्कर्ष। डॉ पाण्डेय ने अनेक उदाहरणों से अपनी बातें स्पष्ट की।डा जे के शर्मा ने नाटक के व्यावहारिक पक्ष पर जोरदार वक्तव्य दिया।उन्होंने नुक्कड़ नाटक और अब्सर्ड नाटक पर भी प्रकाश डाला। डा सीमा असीम सक्सेना ने नाटक में अभिनय की कठिनाइयों की ओर प्रतिभागियों का ध्यान आकृष्ट किया और महत्वपूर्ण सुझाव दिए। डा सुजाता दास और डा संजय कुमार सिंह ने भी नाटक के संदर्भ में अपना पक्ष रखा। संजय जी ने दो उडिया नाटकों की चर्चा की। अंत में डॉ जे बी पाण्डेय निर्देशित ह और म की मुठभेड़ शीर्षक प्रहसन का प्रतिभागियों ने मंचन किया। ह की भूमिका में लाल मोहन महतो म की भूमिका में उमाशंकर महतो और गुरुजी की भूमिका में अशोक कुमार प्रमाणिक ने शानदार प्रस्तुति दी और अभिनय किया,जिसकी प्रशंसा सबो ने मुक्त कंठ से की।यह प्रहसन राष्ट्रीय एकता पर केन्द्रित था। आज के अन्य सत्रों में प्रशिक्षुओं ने नाटक पर अपने विचार प्रकट किये, जिनमें अशोक कुमार प्रमाणिक आशिक, दयानंद राय, राम कुमार प्रसाद, लाल मोहन महतो, उमा शंकर महतो, अंगद प्रमाणिक, प्रियंका कुमारी, आरती कुमारी, डॉ सुजाता दास, स्वरूपा सिंह, क्षेत्र मणि बिभार नूतन सत्पथी, अभिषेक कुमार सिंह, भलटी खमारी, डॉ शिखा रानी त्रिपाठी, कुंदन अग्रवाल, स्वरूप सिंह आदि प्रमुख हैं। डॉ शैलेश बिडालिया ने नाटक के स्वरूप और आवश्यकता पर प्रकाश डाला और नवांकुरों को नाटक लेखन के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने मराठी के सुप्रसिद्ध नाटककार गिरीश कर्नाड के नाटकों की चर्चा की। सरस्वती वंदना सुश्री स्वरूपा सिंह ने भजन अशोक कुमार प्रमाणिक ने संचालन और आगत अतिथियों का स्वागत संयोजक डॉ संजय कुमार सिंह ने और धन्यवाद ज्ञापन विनोद शर्मा ने किया। राष्ट्र गान से शिविर का समापन 4 बजे हुआ।

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