योगभक्ति के पुरोधा स्वामी निरंजनानंद

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (स्वामी मुक्तरथ)। बगैर शोर-शराबे के योग-संस्कृति को फैलानेवाले स्वामी निरंजनानंद आत्मप्रचार से हमेशा दूर रहे। आज 14 फरवरी को उनका जन्म दिवस है। स्वामीजी ने अपने गुरु स्वामी सत्यानंद द्वारा स्थापित मुंगेर स्थित बिहार योग विद्यालय को श्रेष्ठ संस्थान बना दिया है। साथ ही रिखिया पीठ को उच्च स्थान पर बनाये रखा है। योग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य के लिए पद्मविभूषण अलंकरण से भी सम्मानित किया जा चुका है। बात 1956 की है। जब स्वामी निरंजनानंद के गुरु स्वामी सत्यानंद ऋषिकेश स्थित स्वामी शिवानंद के आश्रम में रह रहे थे। उन्होंने स्वामी सत्यानंद को अपने पास बुलाया और कहा कि तुम्हारा जाने का समय आ गया है, जाओ। दुनिया में परिव्राजक की तरह घूमो। दुनिया को योग सिखाओ। स्वामी सत्यानंद संसार के लिए निकले। 1963 तक परिव्राजक की तरह भ्रमण करते रहे। स्वामी सत्यानंद को बीस साल मिले और इस अवधि में दुनिया को सत्यानंद के जरिये योग मिला। इन्हीं बीस सालों में मुंगेर में बिहार योग विद्यालय की स्थापना हुई, जहां से निकल कर सत्यानंद पूरी दुनिया में जाते थे और पूरी दुनिया से लोग निकल कर बिहार योग विद्यालय पहुंचते थे। एक से एक प्रामाणिक, वैज्ञानिक योग ग्रंथों का प्रकाशन हुआ। बीसवीं सदी में योग का जो पुनर्जागरण होना था, बिहार योग विद्यालय उसका केंद्र बन गया और स्वामी सत्यानंद सूत्रधार। दुनिया का शायद ही कोई ऐसा महाद्वीप होगा, जहां स्वामी सत्यानंद ने योग का बीज न बोया हो। अरब से लेकर अमेरिका तक अफ्रीका से लेकर आॅस्ट्रेलिया तक स्वामी शिवानंद का परिव्राजक संन्यासी पूरी दुनिया में घूम घूमकर योग बीज बो रहा था, जो आगे चलकर पुष्पित और पल्लवित होनेवाला था। लेकिन, एक तरफ जहां वे वर्तमान की सख्त जमीन पर योग बीज रोपित कर रहे थे। वहीं दूसरी तरफ वे भविष्य में इसके रखरखाव की योजना पर भी काम कर रहे थे, ताकि कोई फूल खिलने से पहले न कुम्हला जाये। यह कोई दस-बीस साल का मामला नहीं था। अब तो यह शताब्दियों का मामला है। एक पवित्र परंपरा के पुनर्जागरण काल में सिर्फ वर्तमान नहीं होता। उसका अपना एक भविष्य होता है और उस भविष्य की अपनी एक दैवीय योजना। चार साल के स्वामी निरंजन इसी दैवीय योजना का हिस्सा होकर बिहार स्कूल आॅफ योगा पहुंचे थे। 1964 बिहार स्कूल आॅफ योगा और स्वामी निरंजन दोनों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण साल है। इसी साल मुंगेर में बिहार योग विद्यालय की स्थापना हुई और इसी साल चार साल के निरंजन योग विद्यालय में प्रविष्ट हुए। छतीसगढ़ के राजनांदगांव में 14 फरवरी, 1960 को जन्मे स्वामी निरंजनानंद की जीवनदिशा उनके गुरु स्वामी सत्यांनद द्वारा निर्देशित रही। यहां उन्हें गुरु ने योगनिद्रा के माध्यम से योग और अध्यात्म का प्रशिक्षण दिया। कम उम्र में ही वे इतने योग्य हो चुके थे कि स्वामी सत्यानंद ने उन्हें दशनामी संन्यास परंपरा में दीक्षित करने के बाद काम पर लगा दिया। उन्हें विदेशों में योग केंद्रों की स्थापना करनी थी। जहां योग केंद्र स्थापित हो चुके थे, उनके संचालन को भी सुनिश्चित करना था। उन्हें न सिर्फ योग समझाना था, बल्कि दुनिया की विविध संस्कृतियों को समझना भी था। सांस्कृतिक एकता के यौगिक सूत्रों की खोज करनी थी। अमेरिका से लेकर आॅस्ट्रेलिया तक। वहां उन्होंने विशेष तौर पर घ्यान और प्राणायाम के क्षेत्र में अनुसंधान का काम अल्फा रिसर्च के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित डॉ जो कामिया के साथ काम किया। सैन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया के ग्लैडमैन मेमोरियल सेंटर के जापानी डॉ टॉड मिकुरिया ने उन पर ध्यान संबधी शोध किये। जिस समय स्वामी निरंजनानंद विदेश के लिए निकले, तो उस समय स्वामी सत्यानंद के योग आंदोलन के परिणामस्वरूप केवल फ्रांस में 77 हजार पंजीकृत योग शिक्षक थे। उस समय के लिए यह बहुत बड़ी संख्या थी। उन दिनों वे सिर्फ इन योग शिक्षकों को प्रशिक्षित करते थे, ताकि वे अपने स्कूलों मे लौट कर विद्यार्थियों को प्रशिक्षित कर सकें। बाद में यह आंदोलन रिसर्च आॅन योगा इन एड्यूकेशन के नाम से पूरी दुनिया में फैल गया। यूरोप में इस आंदोलन का सूत्रपात पेरिस की स्वामी योग भक्ति, कनाडा में स्वामी अरुंधती ने आरंभ किया गया। इस आंदोलन का नाम योगा एजुकेशन इन स्कूल रखा गया। परिणामस्वरूप यह उत्तर तथा दक्षिण अमेरिका में काफी लोकप्रिय हुआ। इसके परिणामस्वरूप अनेक देशों की शिक्षा पद्धति में योग को शामिल किया गया। निरंजनानंद सरस्वती ने 1983 तक वह सब किया। 23 साल की उम्र तक जब तक कोई नौजवान काम करने के लिए घर से बाहर कदम रखता है, तब तक स्वामी निरंजन अपने हिस्से का एक बड़ा काम पूरा करके वापस लौट आये थे। अब उनके हिस्से आगे की जिम्मेदारियां आनेवाली थीं। भारत लौटने के बाद उन्होंने बिहार योग विद्यालय को विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा तक ले गये, लेकिन साथ ही वे समूचे विश्व में स्वामी सत्यानंद के बीजारोपण की माली की तरह रखवाली भी करते रहे। वर्ष 1993 के विश्व योग सम्मेलन के बाद गंगा दर्शन में बाल योग मित्र मंडल की स्थापना की गयी। इसका आरंभ मुंगेर के सात छोटे बच्चों से किया गया और आज मुंगेर शहर में ही बाल योग मित्र मंडल 5000 से अधिक प्रशिक्षित बच्चे योग शिक्षक हैं। मुंगेर में यह संख्या 35 हजार और पूरे भारत में 1,50000 हैं। इन बच्चों ने तीन आसनों, दो प्रणायामों, शिथिलीकरण एंव धारणा के एक-एक अभ्यास का चयन किया। दरअसल, स्वामी सत्यानंद सरस्वती का स्पष्ट दृष्टिकोण था कि यदि हम बच्चों तक पहुंच पाते हैं और उनके जीवन की गुणवत्ता और प्रतिभा में सुधार ला पाते हैं, तो वे अपनी रचनात्मकता का अधिकतम उपयोग कर अपने भावी जीवन के तनावों और संघर्षों का सामना बेहतर ढंग से कर पायेंगे। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम दो बार मुंगेर बच्चों के कार्यक्रम में आये। उन्होंने मुंगेर को योगनगरी की संज्ञा दी। (लेखक सत्यानंद योग मिशन से जुड़े हैं।)

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