पर्यावरण संबंधी मंजूरी की व्यवस्था ध्वस्त...

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। रैंकिंग इसलिए प्रदान की जाती हैं ताकि सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कृत किया जा सके। परंतु ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इससे यह संकेत निकलता है कि चीजों को कैसे बेहतर ढंग से अंजाम दिया जाए। इसलिए जब केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय कहता है कि वह राज्यों के पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकार को इस आधार पर रैंकिंग देगा कि वे पर्यावरण संबंधी मंजूरी किस गति से देते हैं तो दरअसल इससे यही पता चलता है कि उसका पूरा ध्यान परियोजनाओं को मंजूरी मिलने पर केंद्रित है, न कि आकलन की गुणवत्ता अथवा यह सुनिश्चित करने पर कि विकास परियोजनाओं के पर्यावरण प्रभाव को कम किया जा सके। आप कह सकते हैं कि इसमें लगने वाला समय निगरानी का संकेतक नहीं है तथा मंत्रालय का नोटिस केवल आकलन समितियों को जवाबदेह बनाने तथा यह सुनिश्चित करने पर आधारित है कि परियोजनाओं में अनावश्यक देरी न हो। परंतु यह इतना आसान नहीं है। तथ्य यह है कि रैंकिंग पर्यावरण आकलन के पहले से तैयार ताबूत में आखिरी कील है। बीते एक दशक या उसके आसपास के समय में एक के बाद एक विभिन्न सरकारों ने व्यवस्थित ढंग से उस निर्णय प्रक्रिया को छिन्नभिन्न किया है जो आकलन या जांच-परख की इजाजत देती थी। यह हास्यास्पद है और मेरी नजर में मंत्रालय के इस निर्देश ने उसकी खुद की बनायी प्रक्रिया व्यवस्था की अवमानना की व्यवस्था कर दी है। पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) की शुरूआत 1994 में हुई थी जब विकास परियोजनाएं कम थीं और प्रक्रिया को किसी तरह की चुनौती नहीं दी जाती थी। सन 2000 के दशक से गड़बड़ी की शुरुआत हुई जब परियोजना निर्माण को जांच पड़ताल की इस व्यवस्था में शामिल किया गया। इसमें दो राय नहीं कि विनिर्माण खासकर बड़े पैमाने पर बनने वाली आवासीय, बुनियादी ढांचा अथवा वाणिज्यिक परियोजनाओं का पर्यावरण पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। उनमें पानी का इस्तेमाल होता है, गंदा पानी उत्पन्न होता है, यातायात बढ़ता है और ठोस कचरा भी निकलता है। दिक्कत यह थी कि पूरी व्यवस्था को कभी उन्नत नहीं बनाया गया ताकि परियोजनाओं के निर्माण के साथ तालमेल बिठाया जा सके। इसकी वजह से परियोजनाओं में देरी होने लगी और लेनदेन की लागत में इजाफा हुआ, दूसरे शब्दों में कहें तो भ्रष्टाचार होने लगा। इसलिए 2006 में मंत्रालय ने काम राज्यों को विकेंद्रीकृत और आउटसोर्स कर दिया। उसने केंद्रीय स्तर की व्यवस्था को राज्य स्तर पर अपनाया तथा राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकार गठित किए। परियोजनाओं के लिए ए, बी, बी1 और बी2 जैसी श्रेणियां बनायी गईं। इस दौरान विवेकाधिकार की पूरी गुंजाइश रखी गई। कुल मिलाकर जांच परख की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ तथा विकास परियोजनाएं भी पर्यावरण के अनुपालन के मामले में ज्यादा बेहतर नहीं हुईं। कुल मिलाकर ईआईए की कवायद अधिक पेचीदा साबित हुई। मैं ऐसा क्यों कह रही हूं? जरा इस बात पर विचार कीजिए कि मौजूदा प्रक्रिया कितनी खामी से भरी हुई है। परियोजना शुरू करने वाले से अपेक्षा की जाती है कि वह ईआईए को अंजाम देने वाले सलाहकार को पैसे चुकाए। यह बात केंद्र अथवा राज्य के पर्यावरण प्रभाव आकल प्राधिकार द्वारा मंजूर संदर्भों पर आधारित होती है। ए श्रेणी की परियोजनाएं केंद्र के पास जाती हैं जबकि बी श्रेणी की परियोजनाएं राज्यों को जाती हैं। अब ऐसी परियोजनाएं बी 1 (विस्तृत आकलन जरूरी) श्रेणी की हैं या बी 2 (विस्तृत आकलन की जरूरत नहीं) श्रेणी की, यह तय करने का काम राज्यों का है। समिति कार्य क्षेत्र का दायरा तय कर सकती है, ज्यादा सूचना मांग सकती है या उसे खारिज कर सकती है। इसके बाद ईआईए किया जाता है। इसके लिए कम से कम 12 सक्रिय क्षेत्र विशेषज्ञों एवं प्रबंधन तथा निगरानी योजनाओं की आवश्यकता होती है। मसौदा ईआईए अंग्रेजी में है और इसका संक्षिप्त रूप क्षेत्रीय भाषाओं में है। इसे सार्वजनिक मशविरे के लिए प्रस्तुत किया जाता है। सार्वजनिक सुनवाई के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया है जो स्थानीय आपत्तियों की सुनवाई के लिए अहम होगी। इसके बाद मामला आकलन समिति के पास जाता है जिसे मसौदे को परखना होता है, और अधिक सूचना जुटानी होती है और इसे सशर्त स्वीकार या अस्वीकार करना होता है। सच यह है कि परियोजनाओं को शायद ही कभी नकारा जाता है। हमने जुलाई 2015 से अगस्त 2020 तक प्रस्तुत 3,100 परियोजनाओं का विश्लेषण किया। केवल तीन फीसदी परियोजनाएं ऐसी थीं जिनकी अनुशंसा नहीं की गई। ये परियोजनाएं भी जरूरी सूचनाओं के साथ वापस आ जाएंगी। परंतु इस प्रक्रिया में परियोजना शुरू करने वालों से कई बार कहा जाता है कि वे और अधिक आंकड़े और स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। आखिर में, समिति परियोजना को मंजूरी प्रदान करती है और ज्यादातर मामलों में वे कुछ ऐसी शर्तों के साथ खुद को बचा लेते हैं जिनकी शायद कभी निगरानी नहीं की जाएगी। मंजूरी के बाद समितियों को परियोजना के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाता है। उनका काम मंजूरी के साथ ही समाप्त हो जाता है। इसके बाद निगरानी का काम मंत्रालय के सीमित कर्मचारियों वाले क्षेत्रीय कार्यालयों के भरोसे छोड़ दिया जाता है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इतने सशक्त नहीं होते हैं कि वे प्रभाव की निगरानी कर सकें क्योंकि यह मंजूरी पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अधीन दी जाती है, न कि हवा या पानी के लिए बने कानूनों के तहत। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दोहराव होता है, जांच की कमी होती है और यह सुनिश्चित करने का कोई इरादा नहीं होता है कि परियोजना क्रियान्वयन के समय पर्यावरण के हितों का ध्यान रखा जाए। ऐसे में जब हम मंजूरियों की इस ध्वस्त व्यवस्था का बचाव करते हैं तो इससे पर्यावरण बनाम विकास की गलत बहस को बढ़ावा मिलता है। हकीकत में पर्यावरण के हित पहले ही हाशिये पर डाले जा चुके हैं और विकास बेलगाम हो चुका है।

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse