नागपुरी के यशस्वी कवि प्रफुल्ल राय

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ कोरनेलियुस मिंज)। झारखंड की रत्नगर्भा भूमि में जन्में प्रफुल्ल कुमार राय नागपुरी भाषा, साहित्य जगत के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र थे, जिनका कार्य हम सभी के लिए अनुकरणीय है। आज प्रफुल्ल कुमार राय को छोड़ कर नागपुरी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा जा सकता है। नागपुरी भाषा साहित्य के विकास के लिए उन्होंने अथक श्रम किया। साहित्यकार के साथ-साथ प्रफुल्ल कुमार राय गायक, कुशल नेतृत्वकर्ता एवं प्रशासक भी थे। नागपुरी भाषा परिषद 1960 की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके वे सचिव भी थे। प्रफुल्ल कुमार राय अपनी मातृ भाषा नागपुरी के उत्थान के लिए वे अजीवन समर्पित रहे। प्रफुल्ल कुमार राय ने 1980 ई में जोहार नामक पत्रिका का संपादन किया। 1957 ई. में आकाशवाणी राँची केन्द्र की स्थापना के साथ ही जुड़े। उन्होंने आकाशवाणी राँची से नागपुरी गायन की परंपरा को आगे बढ़ाया। वे आधुनिक नागपुरी साहित्य के अग्रदूत थे। सोनझइर और रिंगचिंगिया नामक पुस्तक में उनकी कविताएं संकलित हैं। संकर गोटेक जिनगी प्रफुल्ल कुमार राय द्वारा लिखित नागपुरी की पहली उपन्यास है। उन्होंने डहर कविता से नागपुरी साहित्य में आधुनिक कविता को स्थापित किया। डहर उनकी पहली कविता है। इस कविता के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय संकट के समय एकता को बल प्रदान किया है। इस कविता की पृष्ठभूमि भारत-चीन युद्ध एवं भारत पाकिस्तान युद्ध रहा है। प्रफुल्ल कुमार राय ऐसे समय में उत्साह एवं जोश के साथ कह उठते हैं- एक राग दे हमरे एक हइ। एक राग दे हमरे जवान हइ। आउर सउबे जोर से दे- हमरे इंसान ही आउर सेहे तेहें जल्दी झगरा झंझट नई चाही,आउर सेहे तेहें कखनों चुप रइह जाही लेकिन इकर का मतलब हामरे डेरातही आउर अपमान खाय के भी हामरे सेराल हइहर्गिज नहीं कहियो नहीं। डहर नामक इस कविता के माध्यम से कवि प्रफुल्ल कुमार राय दार्शनिक ढंग से आधुनिकता को सामने रखते हैं। उनकी कविताओं में आधुनिक सोच और जोश का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आब नागपुरी चुप नी रही जैसी कविता के माध्यम से उन्होंने नागपुरी भाषियों को अपने हक अधिकार के लिए आगे आने का आह्वान किया। सोनझइर पुस्तक में संकलित लहरा नामक कहानी की कथा मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं को आकर्षक ढंग से व्यक्त करती है। वर्षा ऋतु के समय मानव मन उठने वाली वासनात्मक लहर का अंकन इस कहानी में बड़े ही कलात्मक ढंस से हुआ है। सोनझइर, लहरा, अवसरे नइ मिले बुझू आउर किलकिला, बिन बातक बात, एक चकता रउद, तिरलोचन आउर रिबेनटाप, पुस कर राइत, भाँपल कांदा, दांत, तिरफला, कंचन, सावित्री, बिसाहा, पंच, कांटी जैसी प्रसिद्ध कहानियाँ नागपुरी कहानी साहित्य के रत्न हैं। 2013 में लिखित संकर गोटेक जिनगी उपन्यास प्रफुल्ल कुमार राय की अमर कृति है। इस उपन्यास में उन्होंने 1934 से 1989 ई. तक के छोटानागपुर के परिवेश का चित्रण किया है। मेंजुर पांइख प्रफुल्ल कुमार राय की अप्रकाशित उपन्यास है। वे नागपुरी के युग प्रवर्तक लेखक थे। 1967 में प्रकाशित सोनझइर इनकी पहली प्रकाशित पुस्तक है और चिंगचिंगिया दूसरी पुस्तक है। कांटी, सिलइठ, गरम कोट, टफठेन, चांद आउर सुरूज, सुलेमान, नसीब, बेरा सिरे, तीन बात आदि कहानियाँ आकाशवाणी राँची से प्रसारित हुई है। बरता आउर नागपुरी गीत, बरखा बूँद, नागपुरी भासा कर उदगम उनकी प्रमुख निबंध हैं। ठाकुर विश्वनाथ शाही नागपुरी अनुदित और डोम्बारी पहार उनकी नाटक है। सहजीना, बेतला यात्रा और नगड़ी सम्मेलन उनकी यात्रा संस्मरण रचनाएँ हैं। मुक्त छंद इनकी नागपुरी कविताएँ पद्य साहित्य में मील का पत्थर साबित हुई इैं। बहथी बोहाथी, जनजाइत, तजबीज, गाँधी, अंधार राती, विभोर, फागुन-फागुन, बिसनाथ साही, उनकी प्रसद्धि कविताएँ हैं। शकुन्तला, चकित, पाइलकोट, कसमकस, बिजोग, नागपुर वंदना, छोट परिवार, पंद्रह अगस्त जैसी कुछ फुटकर गीतों की रचना भी उन्होंने की है। प्रफुल्ल कुमार राय को नागपुरी पद्य साहित्य का अनमोल मोती माना जाता है। वे नागपुरी के ऐसे गौरव शिखर हैं, जिसे काल का दीमक भी नहीं खा सकता है और इतिहास हीरे की तरह संजोये रखता है। प्रफुल्ल कुमार राय नागपुरी साहित्य के यशस्वी, लोकप्रिय साहित्य स्रष्टा, महान गायक और कुशल मार्गदर्शक थे। अपनी जिजिविषा से उन्होंने नागपुरी की गरिमा को आकाश मंडल तक विस्तृत किया। वे नागपुरी के यशस्वी कवि और गद्यकार थे। ऐसे महान रचनाकार का जन्म 8 फरवरी 1926 में हुआ था। इनका बचपन गरीबी में व्यतीत हुआ। उसके बावजूद उन्होंने गरीबी को मात देते हुए मैट्रिक की परीक्षा की। तत्पश्चात 12 फरवारी 1945 ई में गुमला के कलेक्टरी में प्रॉवेशनर के रूप में सरकारी नौकरी में योगदान दिया। इस नौकरी में वे 18 फरवरी 1959 तक कार्य किये। 19 फरवरी 1959 ई. को उन्होंने सीसीएल में सहायक के पद पर योगदान दिया और अपने मेहनत, लगन के बदौलत उच्च अधिकारी पद को प्राप्त किया। 1 मार्च 1984 ई. को वे सीसीएल के उच्च अधिकारी पद से सेवानिवृत हुए। नौकरी के क्रम में अपनी सादगी, वाकपटुता, कार्य के प्रति समर्पण व मिलनसार व्यक्तित्व के कारण प्रफुल्ल कुमार राय अपने सह-कर्मियों के बीच लोकप्रिय रहे। उनमें कार्य करने की लगन थी। वे सेवानिवृति के बाद राँची न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्य करते रहे। साथ ही नागपुरी भाषा और साहित्य की समृद्धि के लिए कलम चलाते रहे। 7 फरवरी 1991 ई को प्रफुल्ल कुमार राय भले ही इस संसार को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह गये लेकिन अपनी रचना एवं कर्म के कारण वे नागपुरी और झारखंडी समाज के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे। तुलसीदास के रामचरितमानस की इस पंक्ति से प्रभावित प्रफुल्ल कुमार राय ने इसे अजीवन अमल भी किया- कर्म प्रधान विश्वास करि राखा। जो जस करै तो तस चाखा।। (लेखक नागपुरी विभाग गोस्नर कॉलेज रांची के व्याख्याता हैं।)

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