एबीएन डेस्क ( डाॅ कोरनेलियुस मिंज)। पसंगी के बेसे हीदकाबे हो बूढ़ी जाड़ में बूढ़ा के बचाबे देख तो कनकनी कैसन, कहियो नइ भेलैं तैसन काठी झूरीक तीहा ना भूलाबे हो समय, माहौल, परिस्थिति और अवसर के अनुरूप तत्क्षण रचना करने में पारंगत पांडेय दुर्गानाथ राय नागपुरी के सशक्त हस्ताक्षर हैं। गीत-कविता रचने में उनका कोई शानी नहीं है। वे एक ऐसे पुष्प हैं जिनकी उपस्थिति सबके मन में खुशबू भर देती है। मल्लिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत में ठीक ही लिखा है - “फूल मरै, पै मरै न बासू" यह पंक्ति पांडेय दुर्गानाथ राय पर पूरी तरह सटीक बैठती है। वे आज भी नागपुरी साहित्य जगत में पुष्प सुंगध बिखेर हैं। “मनुष्य-मनुष्य में है अंतर कोई हीरा कोई कंकर। व्यक्ति अपने कार्यों से हीरा या कंकर अर्थात श्रेष्ठ या भ्रष्ट बन जाता है। पांडेय दुर्गानाथ राय नागपुरी साहित्य एवं झारखंडी कला संस्कृति जगत के हीरा हैं। फादर पीटर शांति नवरंगी की पंक्ति पांडेय दुर्गानाथ राय के व्यक्तित्व पर विचार क्रम में सहज ही सामने आ जाती है- ”जग में पाकर नर अवतार, करो शुभ काम विचार । जिससे पाओ सुख अभिराम, जग में रहे तुम्हारा नाम।। वस्तुतः हर व्यक्ति का जन्म किसी न किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए हुआ है। जिसे पांडेय दुर्गानाथ राय ने भलीभांति सिद्ध किया। नागपुरी मधुर साहित्य है। इस अमूल्य धरोहर की रक्षा करने, इसे सजाने, संवारने, विकसित करने, इसके भंडार को भरने एवं प्रकाशित करने में जिन मनीषियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर किया है, उनमें एक अग्रणी पुरूष पांडेय दुर्गानाथ राय भी हैं। वे नागपुरी साहित्य सेवक, साधक और मार्गदर्शक थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी विराट व्यक्तित्व वाले ऐसी शख्सियत बिरले ही मिलते हैं। वे सिर्फ साहित्य साधक और साहित्य सेवी ही नहीं थे, बल्कि समाजसेवी और कला के भी साधक थे। ऐसे वरदान पुरूष का जन्म पांच जनवरी 1910 ई. को मांडर प्रखंड अंतर्गत सकरा गाँव मंे हुआ था। उन्होंने प्राइमरी तक की पढ़ाई पूरी की थी। उसके बाद सकरा गांव एवं आस-पास के बच्चों को पढ़ाने लगे। तत्पश्चात उनकी नियुक्ति गाँव के सरकारी स्कूल में शिक्षक के पद हुई। लगभग 30 वर्षों तक शिक्षण कार्य किये। वे मुखिया भी निर्विरोध चुने जाते थे। उनके विरूद्ध कोई भी नामांकन नहीं करता था। शिक्षक और मुखिया का पद बखूबी संभालते थे। आकाशवाणी राँची में योगदान देने के बाद मुखिया के पद पर कार्य करते रहे। आकाशवाणी में उनकी नियुक्ति 1958 ई. में बतौर वादक के पद पर हुई थी, लेकिन लेखन में पारंगत होने के कारण रेडियो के लिए रचनाएं भी करते थे। वे कुशल वक्ता थे। कार्यक्रम प्रस्तुति का अंदाज बेहद खूबसूरत और आकर्षक था। जिस कारण वे देहाती दुनिया (अभी हमारी दुनिया) कार्यक्रम में सीबू भाई के नाम से भाग लेते थे। आकाशवाणी में काम करते हुए उन्होंने नागपुरी में कई गीत, कविता, हास्य व्यंग्य रचनाएं, कथा आदि लिखा। वे झूमर गीत गाने में उस्ताद थे। उनका लिखा और गाया गया एक लोकप्रिय झूमर गीत इस प्रकार है - हायरे हायरे देहाती गांवे दुख भारी, ए भाई सेहों में गरीबी हय लाचारी, देहाती .... नहीं मिले काम काज, रिन के बढ़त बाज चलय सूद महावारी, ए भाई, बाकी जे पड़े मालगुजारी दूध घी छोड़ू बात भागे जोगे मिले भात।। साग पात तरकारी, ए भाई जखंय नित कलवा बियारी।। वे छऊ नृत्य के कुशल नर्तक थे। अपने गाँव सकरा में मंडा पूजा प्रारंभ कराया था, जिसमें छऊ नृत्य का आयोजन करते थे। घोड़ा नाच में पारंगत थे। बाराती पक्ष हो या सराती पक्ष मुखौटा लगाकर नकली दाढ़ी, मूँछ, बाँह में चाँवर, पैर में घुँघरू बाँधे अपने पारंपरागत लकड़ी बाँध से बनाये गये घोड़े पर सवार होकर आकर्षक घोड़ा नाच करते थे। पहले शादी विवाह में घोड़ा नाच अवश्य होता था। एक बार की बात है। एक जगह शादी में सराती और नेवथरिया आये थे। घोड़ा नाच के लिए तैयारी पूरी की गयी। फिर पांडेय दुर्गानाथ राय की खोज होने लगी, लेकिन वे नहीं मिले। जब मेरघेरइ के सराती पंक्ति में घोड़ा नाच होने लगा तो पांडेय दुर्गानाथ राय अचानक एक छोटे से टटू में बैठ कर उसे नचुवाने लगे। सिर में मेंजूर झालर लगाये, गोगल्स पहनें और नकली दाढ़ी मूँछ लगाकर। उनकी ये अवस्था देखकर लोग हँस-हँस के लोट पोट हो गये। पांडेय दुर्गानाथ राय कहानी लेखन करते थे। रेडियो के लिए कई नागपुरी कहानियां लिखीं। जिनमें संघइत, संगत से गुन होत है संगत से गुन जात है, बीगो बाप, बुइझ गेली, फतींगा पांड़े की चतुराई, बुधू से बुधनागर, चुटकुला बात से, नोन्हा बनिया की कहानी, कंजूस आउर मक्खी चूस आदि शामिल हैं। संघइत कहानी में शराब के दुष्प्रभाव का चित्रण है। इसी तरह बुइझ गेली कहानी बचत योजना पर केंद्रित है। रेडियो में काम करने के कारण कई रेडियो नाटक और रूपक भी लिखे। नाटकों में पहलवान, जय मंगल गौंझू घरे छठी, डहरू डहर देखालक, अकिल से सब कुछ, रेडियो रूपक में गहना नइ पिंधब, कतारी रोपबे करब, पाछे नइ रहब, तिलक दहेज, ग्राम सपराई, जितिया कइसन मनाली, सीबू भाई से भेंट आदि प्रमुख हैं। पहलवान नाटक में स्वच्छता को महत्व दिया गया है। चूहों से नुकसान संगीत रूपक भी बहुत लोकप्रिय हुआ था। परिवार कल्याण पर कई रेडियो नाटक लिखे। बड़े परिवार में अभाव को दर्शाने के लिए एक प्रसंग का गीत भी दिया गया है - छउवे पुता सब मिलके... चैदह झन खवइया... कतनो धान उपजेला... का होइ पांचे छव महीना में... सिराय जायला, तबसे वोहे कीन... के खायक। उनकी कुछ रचनाएं इस प्रकार हैं - रात्रि पाठशाला खुलल सगरे गे सजनी... चलु संगी नांव तो लिखाब... केउ ना रहु ठेपा धारी गे सजनी... चलु संगी नांव लिखाब। परिवार नियोजन से संबंधित गीत - कहू कहू हाल चाल काले इसन हाल... दादा मोतीलाल चेपो काले भेलैं दुइयो गाल... कतना सुंदर काया रहे तो मोटाल... दादा मोतीलाल अब तो भेल खोखोढ़ाल... दुर्गानाथ कहैं आगे करली न ख्याल... बुचू हीरालाल छोटे परिवार खुशहाल। बचत पर गीत - खरच करबैं कम, पान-बीड़ी एकदम छोड़ी देबैं ए भाई, रेडियो से सुनली उपाई। कचे काचा जामा करी, रूपीया जखने पुरी धरी आबैं ए भाई बूंद -बूंदे तालाब भरी जाई। कविता निर्गुण - सुगा हायरे हायरे तोंय तो सुगा उड़ी जाबे रूपू उड़ी जाबे न जानी कखन डेना, फहराबे तोंय तो सुगा। छोंड़ी के हजारों काम, रटीले खूब राम राम तोंय तो सुगा धरम निशान कुछ छोड़ी देबे तोंय तो सुगा पांडेय दुर्गानाथ राय बहुप्रतिभा संपन्न साहित्यकार और कलाकार थे। उन्होंने नागपुरी के अलावे हिंदी, बंगला और संस्कृत में भी रचनाएं कीं। उनकी एक गीत पुस्तक मधुकुंज छपी है। जिसमें उनकी 27 गीत संकलित हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन आकाशवाणी रांची के पूर्व उदघोषक प्रमोद कुमार राय के प्रयास 1984 ई. में हुआ था। अभी उनकी दर्जनों नागपुरी गीत, कविताएं, नाटक, कथा, हास्य व्यंग्य रचनाएं अप्रकाशित हैं। उनकी प्रत्येक रचनाओं को संकलित कर यदि प्रकाशित किया जाये तो यह नगपुरी साहित्य के लिए धरोहर साबित होगा। ऐसे कुशल एवं बेजोड़ कवि, गायक, गीतकार, संगीतकार, कलाकार पांडेय दुर्गानाथ राय 11 नवबंर 1988 को चिर निद्रा में सो गये, लेकिन उनकी रचना नागपुरी साहित्य जगत में आज भी खुशबू बिखेर रही है। (लेखक गोस्सनर काॅलेज रांची में नागपुरी विभाग के प्रोफेसर हैं।)
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