झारखंड की लोकसंस्कृति की झांकी है टुसू पर्व

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (राजाराम महतो)। झारखंड में एक कहावत है बारह मासे, तेरह पर्व यानी बारह महीने में तेरह पर्व। टुसू पर्व तेरह पर्वों में अंतिम पर्व माना जाता है। यह आदिवासी-मूलवासी और कृषक समाज का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। अगहन संक्रांति से पूस संक्रांति तक यह पर्व मनाया जाता है। पूस माह में होने के कारण इसे पूस परब एवं कहीं-कहीं मकर संक्रांति तक चलने के कारण मकर परब भी कहते हैं । टुसू को प्रगति तथा ओजस्विता का पर्व माना गया है। यही वह समय है जब प्रकृति के साथ-साथ समस्त जीव-जगत में नयी ऊर्जा का संचार होता है। वैसे तो झारखंड के सभी पर्व-त्योहार प्रकृति से जुड़े हुए हैं, लेकिन सामाजिक एवं सांस्कृतिक ष्टि से टुसू पर्व का अलग महत्व है। टुसू केवल पर्व ही नहीं बल्कि झारखंड के गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर का नाम है। टुसू के साथ कई सामाजिक परम्पराएं जुड़ी हैं। कृषक खेत-खलिहान का कार्य समाप्त करने के बाद इस पर्व को मनाते हैं। यह पर्व पूरे एक महीने तक सिल्ली, अनगड़ा, मुरी, बुंडू, तमाड़ सहित पूरे पंचरगना क्षेत्र, रामगढ़, हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, गिरिडीह, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसांवा के अलावा पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, मिदनापुर व बांकुड़ा जिलों और ओड़िशा के क्योंझर, मयूरभंज, बारीपदा जिलों में मनाया जाता है। नारी सम्मान का पर्व : टुसू नारी सम्मान का पर्व है। यह टुसूमनी नामक युवती के स्वाभिमान साहस व बहादुरी की गाथा से जुड़ा हुआ है। लोककथा के मुताबिक एक गरीब किसान की तीन बेटियां थीं-सरला, भादू और टुसूमनी। इनमें टुसूमनी बहुत ही रूपवती और गुणवती थी। उस समय भारत में मुगलों का शासन था। मुगल सरदार टुसूमनी की खूबसूरती पर फिदा था और उसको जबरन अपनाना चाहता था। टुसूमनी ने अपनी लाज बचाने के लिए स्वर्णरेखा नदी में कूदकर अपनी जान दे दी थी। उस दिन मकर संक्रांति था। जिस स्थल पर यह घटना हुई, उसे सती घाट के नाम से जाना जाता है। यह सती घाट सोनाहातू में है। जनजातीय समाज इस दिन अपनी उसी बेटी टुसूमनी के बलिदान को याद करता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार कृषक समाज टुसू के रूप में अन्न की देवी की पूजा करता है। इसी समय फसल को पूर्णता प्राप्त होती है। जिस शक्ति के दान से जनजातीय समाज पूर्णता को प्राप्त करते है उसको टुसू शक्ति कहा जाता है। टुसू गीतों में इसकी व्याख्या मिलती है। टुसू की पूजा अगहन संक्रांति के दिन से शुरू होती है। उस दिन किसान अन्न को खेत से खलियान लाते हैं। इसी अन्न को ग्रहण कर पूरा संसार जीवित रहता है। टुसू कृषकों के घरों में संपन्नता का प्रतीक है। टुसू पर्व की शुरुआत अगहन संक्रांति की रात से होती है। उस रात गांव की कुंवारी कन्याएं टुसूमनी की प्रतिमा स्थापित करती हैं। इसे टुसू थापना कहा जाता है। महीने भर प्रत्येक शाम टुसू पर फूल चढ़ाकर दीपक से आरती की जाती है। टुसू गीत गाये जाते हैं। इन गीतों का विषय प्राय: रामायण, महाभारत की कथा और देवी-देवताओं की मनौती से प्रारंभ होता है। ये गीत जनजातीय समाज की सादगी और मासूमियत को दशार्ते हैं। इनमें टुसूमनी के स्वाभिमान, बहादुरी का जिक्र होता है। मकर संक्रांति के एक सप्ताह पहले टुसू और चौड़ल सजाने का काम होता है। चौड़ल या तो बाजार से खरीदा जाता है या घर में बनाया जाता है। चौड़ल असल में टुसू की पालकी है। चौड़ल की आकृति ताजियानुमा होती है। मकर संक्रांति के एक दिन पहले पुरुषों के बीच मुर्गा लड़ाई की प्रतियोगिता होती है, जिसे बाउड़ी कहा जाता है। मकर संक्रांति के दिन पर्व का समापन टुसू विसर्जन के साथ होता है। विसर्जन के दिन टुसू को पालकी में बिठाकर भ्रमण कराया जाता है। नदी पर ले जाने के दौरान स्थानीय लोग टुसू के पारंपरिक गीत गाते और नाचते हुए चलते हैं। मकर संक्रांति के दिन टुसू पर्व मनाया जाता है। इस दौरान घरों में विशेष पकवान, पीठा, भूजा, मटन-चावल सहित अन्य पकवान बनते हैं। मेला होता है खास : टुसू पर्व के अवसर पर जगह-जगह मेला लगता है। इन मेलों में झारखंड की लोक संस्कृति, समाज और उनके कार्य-व्यापार को देखा जा सकता है। पूरे महीने भर गांवों-कस्बों में लगने वाले मेलों में ग्रामीण अपने परिवार के साथ उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरकते हैं। टुसू गीतों से आसपास का क्षेत्र गुंजायमान हो जाता है। मेले में कतार की कतार दुकानें, खेल-तमाशे, नौटंकी, झूले, मुर्गा लड़ाई सब कुछ होता है। विभिन्न गांवों से आकर्षक टुसू लाये जाते हैं। चौड़ल की प्रतियोगिताएं होती हैं। पहले मेला के रूप में सतीघाट मेला को जाना जाता था, अब झारखंड में टुसू पर्व पर सैकड़ों मेले लगते हैं। स्वर्णरेखा, कांची और राढू नदी के तट पर ये मेले लगते हैं। कुछ मेले डैम और झरनों के समीप लगते हैं। सती घाट मेला झारखंड का सबसे बड़ा और पुराना टुसू मेला है। टुसूमनी की स्मृति में सोनाहातू के स्वर्णरेखा नदी के सती घाट पर पहली बार 1740 में मेला लगा था। रांगामाटी-सिल्ली मार्ग पर स्थित बरेंदा गांव में इसी स्थान पर टुसू मनी ने बलिदान दिया था। घाट के निकट मां गंगा का मंदिर है। सोनाहातू का श्रीराम टुसू मेला भी प्रसिद्ध है। सिल्ली के कोंचो गांव के स्वर्णरेखा नदी तट पर ऐतिहासिक हरिहर मेला का लगता है। झारखंड और पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों से लोग इस मेले में आते हैं। श्रद्घालु स्वर्णरेखा नदी में स्नान कर मेला परिसर स्थित मंदिरों में देवी, देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं। सिल्ली के नीलगिरि में भी टुसू मेला लगता है। मेला स्थलों पर विभिन्न प्रकार की दुकानें सजती हैं। टुसू प्रदर्शनी, मुर्गा लड़ाई सहित कई तरह के प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है। अनगड़ा प्रखंड के हुंडरू फॉल में 15 जनवरी को टुसू मेला लगता है। अनगड़ा के ही जोन्हा फॉल में 15 जनवरी व 15 फरवरी दो दिन टुसू मेला लगाया जाता है। कांची नदी के तट पर रंगरोड़ी धाम अवस्थित है। यहां हर साल टुसू मेला लगता है। झारखंड और पश्चिम बंगाल की सीमा पर मुरहलसूदी पंचायत में है सेंवाती घाटी। प्रत्येक साल 15 जनवरी को यहां टुसू मेला लगता है। सीमा पर होने के कारण दोनों राज्यों से महिला-पुरुषों की काफी भीड़ उमड़ती है। टुसू पर्व पर चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के जयदा में पांच दिनों तक चलने वाला प्रसिद्ध मेला लगता है। इसमें पश्चिम बंगाल, ओड़िशा समेत दूरदराज से लोग आते हैं। स्वर्णरेखा नदी में स्नान कर जयदा स्थित प्राचीन बूढ़ाबाबा शिव मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। इसके अलावा तमाड़ के राजबाड़ी, चांडिल डैम, ईचागढ़ के राम मेला, बुटगोड़ा मेला, नीमडीह के छाता पोखर मेला समेत कई स्थानों पर मेला का आयोजन होता है। कोल्हान के झींकपानी, हाटगम्हरिया, राजनगर, हाता, जैंतगढ़, जगन्नाथपुर, मझगांव, सरायकेला सहित विभिन्न गांवों में टुसू मेला का आयोजन किया जाता है। जो हफ्तों तक चलते रहता है। इस तरह टुसू पर्व हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न होता है। इसके अगले दिन पहला माघ आखाइन जातरा के रूप में मनाया जाता है। जनजातीय किसान आखाइन को नव वर्ष के रूप में मनाते हैं। साल की शुरुआत मानकर इस दिन से ही सारे शुभ कार्य शुरू किये जाते हैं। जनजातीय परंपरा में इस दिन से ही खेत में पहला हल चलाकर खेती की शुरुआत की जाती है, जिसे हालपुनहा कहते हैं।

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