एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा। आदिवासी मान्यता के अनुसार आज ही के दिन से नूतन वर्ष का शुभारंभ होता है। आज के ही पवित्र दिन में धरती (चाला आयो) तथा सूर्य (धर्मेश) का सुखद संयोग होता है। अपने पुराने तथा सूखे हुए पत्तों का परित्याग करके वृक्षों में मंजर, फूल, फल उग आते हैं और संपूर्ण वातावरण प्रकृति के नूतन शक्ति से अभिसिंचित हो उठता है।
सरहुल का यह त्यौहार एक ओर प्रकृति के संरक्षण, संवर्धन तथा पर्यावरण को शुद्ध रखने का संदेश देता है तो दूसरी तरफ आदिवासी संस्कृति, भाषा, साहित्य, और कला का संरक्षण एवं प्रदर्शन का भी त्यौहार है।
सरहुल का यह पर्व हमें संदेश देता है कि हर स्थिति में हमें उत्साह, उमंग तथा आनंद में रहना है और पूरे समाज में सामाजिक समरसता का वातावरण बनाए रखना है।
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