हिंदू नववर्ष विक्रम संवत परंपरा, आस्था और नवचेतना का प्रतीक : संजय सर्राफ

 

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में नववर्ष केवल तिथि परिवर्तन नहीं, बल्कि नयी ऊर्जा, नयी आशाओं और नए संकल्पों का आरंभ होता है। हिंदू नववर्ष, जिसे विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है, इस वर्ष विक्रम संवत 2083 के रूप में मनाया जायेगा। 

यह पावन पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होता है, इस वर्ष नवसंवत्सर 19 मार्च से प्रारंभ हो रहा है तथा इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का भी शुभारंभ होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार नवसंवत्सर का विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि की रचना भगवान ब्रह्मा द्वारा की गयी थी, इसलिए इसे सृष्टि का प्रथम दिवस भी माना जाता है।

साथ ही, यह भी कहा जाता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त कर विक्रम संवत की स्थापना की थी, जिसके कारण यह कालगणना भारतीय परंपरा में अत्यंत प्रतिष्ठित है। नववर्ष का यह पर्व भारत के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में उगादि, कश्मीर में नवरेह और सिंधी समाज में चेटीचंड के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। 

इन सभी उत्सवों में एक समान भाव है- नयी शुरुआत और सकारात्मकता का स्वागत, नवसंवत्सर का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में अनुशासन,संयम और आत्मचिंतन का संदेश देता है। इस दिन लोग प्रात:काल स्नान कर घरों में ध्वज या पताका लगाते हैं, मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और नए कार्यों की शुरुआत करते हैं। यह दिन यह भी सिखाता है कि बीते वर्ष की गलतियों से सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए। 

इस पर्व की महत्ता सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह लोगों को एकजुट करता है, आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देता है तथा भारतीय संस्कृति और परंपराओं को जीवंत बनाए रखने का कार्य करता है। नववर्ष के अवसर पर लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और समृद्धि, सुख-शांति की कामना करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस अवधि में प्रकृति में परिवर्तन होता है। 

वसंत ऋतु अपने चरम पर होती है, पेड़-पौधों में नई कोंपलें फूटती हैं और वातावरण में नवजीवन का संचार होता है। यह प्रकृति के पुनर्जागरण का प्रतीक है, जो मानव जीवन में भी नयी ऊर्जा भरता है। अत: हिंदू नववर्ष विक्रम संवत केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई, आस्था और जीवन दर्शन का प्रतीक है। यह हमें हर वर्ष नयी शुरुआत करने, सकारात्मक सोच अपनाने और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने की प्रेरणा देता है।

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