टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में बसंत पंचमी का विशेष स्थान है। यह पर्व प्रत्येक वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यही कारण है कि इसे बसंत पंचमी कहा जाता है। इस वर्ष बसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी दिन शुक्रवार को मनाया जायेगा, इस दिन विद्या, बुद्धि, वाणी, कला और संगीत की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है, इसलिए इसे सरस्वती पूजा के नाम से भी जाना जाता है।
यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और जीवन में नवचेतना के आगमन का संदेश भी देता है। माघ शुक्ल पंचमी से ऋतु परिवर्तन का संकेत मिलता है। शीत ऋतु का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगता है और बसंत ऋतु का आगमन होता है। खेतों में सरसों के पीले फूल लहराने लगते हैं, आम के पेड़ों पर बौर आने लगते हैं और प्रकृति नवजीवन से भर उठती है। इसी उल्लास और सौंदर्य के स्वागत में बसंत पंचमी मनायी जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था। इसलिए यह दिन ज्ञान, शिक्षा और रचनात्मकता के आरंभ के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि की रचना के समय चारों ओर नीरवता थी। भगवान ब्रह्मा ने देखा कि संसार में जीवन तो है, परंतु उसमें वाणी, ज्ञान और चेतना का अभाव है। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ।
मां सरस्वती ने वीणा के मधुर स्वर से संपूर्ण सृष्टि को वाणी, बुद्धि और संगीत प्रदान किया। यह दिव्य घटना माघ शुक्ल पंचमी को घटित हुई, इसलिए यह तिथि मां सरस्वती को समर्पित हो गयी। बसंत पंचमी का सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक महत्व अत्यंत व्यापक है। इस दिन सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
छोटे बच्चों का विद्यारंभ संस्कार भी इसी दिन कराया जाता है, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। पीला रंग इस पर्व का प्रमुख प्रतीक है, जो ऊर्जा, ज्ञान और समृद्धि का संकेत देता है। लोग पीले वस्त्र धारण करते हैं, पीले पुष्प अर्पित करते हैं और केसरिया या पीले रंग के व्यंजन जैसे खीर, हलवा आदि बनाते हैं।बसंत पंचमी भारतीय संस्कृति में रचनात्मकता और सकारात्मक सोच का प्रतीक है।
कवि, लेखक, कलाकार और संगीतज्ञ इस दिन विशेष साधना करते हैं। ऐतिहासिक रूप से भी यह दिन वीरता और प्रेरणा से जुड़ा रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इसी दिन महान क्रांतिकारी लाला लाजपत राय को अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में बलिदान मिला था।
बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, सौंदर्य, संस्कृति और जीवन में आशा के संचार का उत्सव है। यह हमें अज्ञान के अंधकार से निकलकर विद्या के प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। मां सरस्वती की कृपा से जीवन में विवेक, सृजनशीलता और सद्भाव बना रहे-यही बसंत पंचमी का सच्चा संदेश है।
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