एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा। सरस्वती चतुर्थी की परम्परा अपेक्षाकृत नयी है, मगर आज अत्यंत सामयिक और सार्थक है। ज्ञान और विद्या की विकास धारा सरस्वती की अविरल यात्रा है। उक्त बातें लोहरदगा बलदेव साहू कॉलेज से सेवानिवृत अंग्रेजी विभागाध्यक्ष रहे डॉ राम भगवान सिंह ने कहीं। वर्तमान में डॉ सिंह पटना के न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी में रहते हैं।
उन्होंने कहा कि सदियों से सर्वमंगलकारी गणेश की पूजा-अर्चना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है, इसे महामना बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी के रुप में धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व का स्वरुप प्रदान किया था। उसी तरह ज्ञान और संस्कार को संवर्धित करने की दिशा में सरस्वती की साधना को धार्मिक अनुष्ठान की तरह प्रतिष्ठित करने की अपेक्षा है।
संभवत: ऐसी ही अंत:प्रेरणा से सन 1988 में मेरे मन में यह विचार आया कि जिस तरह दीपावली के पूर्व धनतेरस के अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है, क्या ही अच्छा हो कि हम वसंत पंचमी के एक दिन पूर्व सरस्वती चतुर्थी की नेक परंपरा का श्रीगणेश करें। इस दिन हर विद्या प्रेमी पुस्तक खरीदें। कोई भी पुस्तक, कहीं से भी अपनी अभिरुचि और आवश्यकता के अनुसार। इससे पुस्तक संस्कृति का विकास होगा। साथ में सरस्वती पूजन में एक नया व सार्थक आयाम जुड़ेगा।
वसंत पंचमी के पूर्व सरस्वती चतुर्थी की अवधारण इसलिए अनुकूल है, क्योंकि वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा मनायी जाती है। स्कूल-कॉलेजों में, शहर-देहात में जगह जगह वीणापाणि ज्ञान देवी सरस्वती की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। उनकी पूजा की जाती है। इस तरह पुस्तक खरीदने की अनुशंसा तो स्वमेव स्पष्ट है; पुस्तकें तो स्वयं सरस्वती स्वरूपा हैं। पुस्तक प्रेम सरस्वती की पूजा है और वंदगी है।
साथ ही, आज कई पुरानी परम्पराएं निर्जीव और बेमानी हो गई हैं, जिन्हें सार्थक और उपयोगी परंपराओं से स्थानापन्न करने की जरूरत है। ऐसे में वसंत पंचमी के एक दिन पूर्व सरस्वती चतुर्थी की नेक परम्परा हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रख सकती है। इसे प्रचारित और प्रसारित करने का आग्रह डॉ राम भगवान सिंह ने आम शिक्षा प्रेमियों और विद्यार्थियों से की है।
फोटो संकेत : सरस्वती चतुर्थी के दिन पुस्तक खरीदने की परंपरा के जनक डॉ राम भगवान सिंह।
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