टीम एबीएन, रांची। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी का 12 जनवरी को रांची आगमन हुआ। इस अवसर पर सामाजिक सद्भाव बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें समाज के विभिन्न संगठनों, जाति-बिरादरी एवं समुदायों के 600 से अधिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। बैठक का उद्देश्य समाज में व्याप्त समसामयिक समस्याओं पर संवाद स्थापित करना तथा सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने के लिए सामूहिक प्रयासों पर विचार करना था।
बैठक के प्रथम सत्र में समाज के विभिन्न समूहों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में किये जा रहे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं सेवा कार्यों की जानकारी दी। साथ ही उन्होंने अपने कार्यों के दौरान सामने आ रही सामाजिक चुनौतियों को भी साझा किया। इनमें प्रमुख रूप से धर्मांतरण, घुसपैठ, नशाखोरी, अशिक्षा, अंधविश्वास, परस्पर सहयोग की कमी, बाल-विवाह, लव-जिहाद जैसी गंभीर समस्याओं का उल्लेख किया गया।
द्वितीय सत्र में दत्तात्रेय होसबाले जी ने समाज के प्रतिनिधियों द्वारा उठाये गये प्रश्नों एवं विषयों पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किये।
धर्मांतरण विषय पर बोलते हुए उन्होंने तीन प्रमुख क्षेत्रों का उल्लेख किया। झारखंड का छोटानागपुर क्षेत्र, पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातीय क्षेत्र, दक्षिण भारत के केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना आदि राज्य उन्होंने कहा कि इन जनजातीय क्षेत्रों में साजिशन ढंग से चर्च से जुड़े लोगों का प्रवेश कराया गया तथा हिंदू धर्मगुरुओं को रोकने का प्रयास हुआ। गरीबी, अशिक्षा और अंधविश्वास को उन्होंने धर्मांतरण के प्रमुख कारण बताया।
उन्होंने जनजातीय क्षेत्रों में तथाकथित थ्री-डी समस्या का उल्लेख किया, जिसमें धर्मांतरण, डीजे संस्कृति और दारू को शामिल बताया। धर्मांतरण की समस्या को कम करने के उपायों पर बोलते हुए उन्होंने समाज में परस्पर सहयोग, छुआछूत एवं जातिगत भेदभाव से दूरी, ऊंच-नीच की भावना त्यागने तथा हिंदू समाज की जनसंख्या सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने घर-वापसी के प्रयासों की चर्चा करते हुए कहा कि धर्मजागरण समाज का कार्य है, जिसे समाज को स्वयं करना होगा।
जातिगत समस्या पर चर्चा करते हुए माननीय दत्तात्रेय जी ने कहा कि हमारा जन्म किस परिवार या जाति में होगा, यह हमारे हाथ में नहीं होता, फिर हम जातिवाद क्यों करते हैं? किसी भी जाति को नीचा या ऊंचा नहीं समझना चाहिए।
उन्होंने महिलाओं-बहनों के सम्मान पर विशेष जोर देते हुए कहा कि पुरुष-महिला समानता आज की आवश्यकता है। जब पुरुष और महिलाएं साथ-साथ कार्य कर रहे हैं, तो उनके बीच असमानता का कोई औचित्य नहीं है।
दत्तात्रेय जी ने कहा कि आज सोशल मीडिया सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के कंटेंट से भरा हुआ है। बच्चों को इसके नकारात्मक प्रभावों से बचाने के लिए उन्हें भारतीय संस्कृति से जोड़ना आवश्यक है। इसके लिए बच्चों के साथ संवाद की प्रक्रिया अपनाने पर उन्होंने बल दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को मंदिर जाने के लिए प्रेरित करना चाहिए, क्योंकि मंदिर जाने से अहंकार दूर होता है और मन को शांति की प्राप्ति होती है।
उन्होंने विभिन्न पर्वों पर बनाये जाने वाले पंडालों में अत्यधिक खर्च पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे मनोरंजन की प्रवृत्ति से जोड़कर देखने की आवश्यकता बतायी।
इस सत्र में माननीय दत्तात्रेय होसबोले जी ने झारखंड प्रांत के लगभग 78+ संतों के साथ आध्यात्मिक-धार्मिक विषयों पर चर्चा की। इस बैठक में धारा 342 पर चर्चा हुई जिसमें धर्मांतरण के उपरांत जनजाति वर्ग के स्टेटस में कोई बदलाव नहीं आता तथा धर्मांतरण के उपरांत ईसाई या मुस्लिम बनने के बाद भी जनजातियों को प्रदत्त सुविधाओं का लाभ मिलता रहता है। अगर इस धारा को समाप्त कर दिया जाए तो धर्मांतरण बहुत हद तक समाप्त हो जायेगा। इस सत्र में गुरुकुल की स्थापना जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
समाज की सामाजिक, आध्यात्मिक संस्थाओं ने सेवा, साहित्य, कला, धार्मिक आदि क्षेत्रों में कार्य किया है। हजारों वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है। ऐसा एक महान लक्ष्य को ध्यान में रखकर किया गया है। सरकारें भी कई कार्यों में योगदान देती रही हैं। लेकिन बहुत सारे करणीय कार्य परिवार की भी होती हैं, जैसे— अपने बच्चों को संस्कार देना, उन्हें बड़े-बुजुर्गों का आदर करना सिखाना आदि।
समाज की एकता आवश्यक है। जंजीर की प्रत्येक कड़ी स्वयं मजबूत रहें और एक कड़ी दूसरे कड़ी से जुड़े रहे, यह जरूरी है। सरकार के समक्ष याचना की स्थिति में हमारे युवा न रहें, ऐसे समाज निर्माण पर बल देना चाहिए। संस्कृत के उपयोग पर भी जोर दिया गया।
भारत का विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ना जारी है, लेकिन स्लम की समस्या, पर्यावरण की समस्या आदि सामाजिक दृष्टि के अभाव को परिलक्षित करता है।
सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना चाहिए। विदेशों की व्यवस्था से तुलना कर अपने यहां सुधार की बात कर सकते हैं। महिलाओं की दशा में सुधार करना आवश्यक है। अत: भारत को आर्थिक दृष्टि से मजबूत बनाना तो आवश्यक है, लेकिन ऊपर सुझाए विभिन्न सामाजिकझ्रआध्यात्मिक मसलों पर मजबूती की उतनी ही जरूरत है।
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