चाईबासा। सदर प्रखंड के बड़ा लागिया गांव में दो ऐसे वृद्ध सगे भाई हैं। जिनका आगे पीछे कोई नहीं है। इन दोनों सगे भाइयों को पर्याप्त सरकारी सुविधाएं भी नहीं मिल रही है। जिस कारण दोनों जिल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। बड़े भाई 75 वर्षीय किस्टो उर्फ माने सालबुनिया आंख से दिव्यांग है। उसका छोटा भाई विशकिशन सालबुनिया की उम्र 73 वर्ष है। दोनों कुंवारे हैं। लेकिन दोनों भाई एक दूसरे का सहारा बनकर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। छोटा भाई जंगल से लकड़ी चुनकर लाता है और दोनों भाई मिलकर टूटी-फूटी पुरानी साइकिल पर लकड़ी लादकर करीब 15 किलोमीटर दूर चाईबासा से सटे गांव में लकड़ी बेचकर अपना जीविका चला रहे हैं। बड़ा भाई माने सालबुनिया साइकिल चलाने जानता है लेकिन आंख से दिव्यांग होने के कारण वह साइकिल नहीं चला सकता। वहीं उसका छोटा भाई विशकिशन सालबुनिया साइकिल चलाना तो दूर धकेलना भी नहीं जानता। लेकिन दोनों भाई अपने दिमाग का सही इस्तेमाल कर नेत्रहीन माने सालबुनिया लकड़ी लदे साइकिल का हैंडल संभालता और पीछे से साइकिल धकेलते हुए बड़े भाई को डायरेक्शन बताकर साइकिल को 25 किलोमीटर दूर शहर तक ले जाते और लकड़ी बेचकर अपना पेट भर रहे हैं। दोनों भाइयों ने पूछने पर बताया कि बड़े भाई को विकलांग पेंशन मिलता है। लेकिन समय पर पेंशन नहीं मिलने से जीविकोपार्जन में दिक्कत आ रही है। राशन दुकान से उन्हें राशन मिलता है लेकिन एक माह के लिए यह राशन पर्याप्त नहीं होता। उनका आवास भी नहीं है। ठंड में टूटे-फूटे पुराने जर्जर, झोपड़ीनुमा मकान पर ठिठुरन भरी रात गुजारने पर दोनों भाई मजबूर हैं। उन्होंने गांव के एक पंचायत जनप्रतिनिधि के समक्ष प्रधानमंत्री आवास बनवाने की मांग रखी थी। जिसपर जनप्रतिनिधि ने उन दोनों से 5000 रुपये की डिमांड रखी। इसके लिए दोनों भाई मुखिया को देने के लिए लकड़ी बेचकर 5000 रुपये इकट्ठा करने में लगे हैं।
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