सदैव अटल... जिनके लिए सर्वोपरि था देशहित

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत रत्न भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज 25 दिसंबर को जन्म दिन है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कुल मिलाकर 47 साल तक संसद के सदस्य रहे। वह 10 बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए। एकमात्र बार वह 1984 में लोकसभा चुनाव हारे थे जब कांग्रेस के माधवराव सिंधिया ने ग्वालियर में उन्हें करीब दो लाख वोटों से शिकस्त दी थी। वाजपेयी ने 10वीं, 11वीं, 12वीं, 13वीं और 14वीं लोकसभा में 1991 से 2009 तक लखनऊ का प्रतिनिधित्व किया। दूसरी और चौथी लोकसभा के दौरान उन्होंने बलरामपुर का नेतृत्व किया, पांचवीं लोकसभा के लिए वह ग्वालियर से चुने गए जबकि छठीं और सातवीं लोकसभा में उन्होंने नयी दिल्ली का प्रतिनिधित्व किया। वाजपेयी 1962 और 1986 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। मुंबई में पार्टी की एक सभा में दिसंबर 2005 में वाजपेयी ने चुनावी राजनीति से अपने को अलग करने की घोषणा की। वह करीब 47 सालों तक सांसद रहे। वाजपेयी 1996 से 2004 के बीच तीन बार प्रधानमंत्री भी रहे। आखिरी बार उनकी झलक 2015 में दिखी जब तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। प्रणब मुखर्जी प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए खुद उनके घर सम्मान देने के लिए पहुंचे थे। अगर हिंदी को अंतररष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित और प्रसारित करने में किसी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है तो वह थे अटल बिहारी वाजपेयी। 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी का संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी में दिया भाषण काफी लोकप्रिय हुआ था। यह पहला मौका था जब संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे बड़े अतंराष्ट्रीय मंच पर हिंदी की गूंज सुनने को मिली थी। परमाणु परीक्षण से कर दिया था दुनिया को हैरान वाजपेयी का कवि हृदय कोमल नहीं था। भारत को परमाणु राष्ट्र बनाने वाले वाजपेयी ही थे। 11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में सफल परीक्षण के साथ भारत न्यूक्लियर स्टेट बन गया था। भारत ने शक्ति नामक परमाणु परिक्षण कर पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। वाजपेयी को फिल्मों का भी शौक था। उनके प्रिय गायक लता मंगेशकर, मुकेश और मोहम्मद रफी थे। उनकी पसंदीदा फिल्मे देवदास, बंदिनी और तीसरी कसम थीं। उनका पसंदीदा गाना एसडी बर्मन कृत ओरे मांझी...और मुकेश/लता मंगेशकर द्वारा गाया गया गीत कभी-कभी मेरे दिल में था। आखिर में जाते जाते भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को समर्पित फिल्म बंदिनी से उनका पसंदीदा गाना ओरे मांझी। अटल बिहारी वाजपेयी 1951 में जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने लेकिन लखनऊ में लोकसभा उप चुनाव हार गए, 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया लखनऊ में हारे, मथुरा में जमानत जब्त हुई, लेकिन बलरामपुर से जीतकर दूसरी लोकसभा में पहुंचे, यह उनके अगले पांच दशकों के अटूट संसदीय करियर की शुरूआत थी। अटल जी वे पहले शख्स थे जिन्होने इस मिथक को तोड़ा कि भारतीय राजनीति में नेहरु वंश के सिवा कोई और देश नहीं चला सकता। वे ऐसे अजातशत्रु राजनेता थे जिन्होंने अपनी वाक्पटुता और अद्भुत भाषण कला से ने केवल आम जनता को अपना मुरीद बनाया अपितु उनके कट्टर विरोधी भी उनके कायल रहे। अटल जी में नेहरु ने बहुत पहले ही भावी प्रधानमंत्री देख लिया था। इंदिरा गांधी ने कांगेस में आने को कहा पर अटल नही माने। अटल बिहारी वाजपेयी जीवट के धनी थे उन्होंने सारी दुनिया की परवाह किए बगैर भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाया, विपक्ष में रहकर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में देश का प्रतिनिधित्व किया, वहां पहली बार हिंदी का परचम लहराया। वे लखनऊ में लोकसभा उप चुनाव हार गए, 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया लखनऊ में हारे, मथुरा में जमानत जब्त हुई, लेकिन बलरामपुर से जीतकर दूसरी लोकसभा में पहुंचे, यह उनके अगले पांच दशकों के अटूट संसदीय करियर की शुरुआत थी। 1968 से 1973 तक भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे अटल आपातकाल में जेल में गए व 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बने, इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया। 1980 में वे बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे और 1986 तक अध्यक्ष व बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे। 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को संख्या बल के आगे नतमस्तक होने के वक्तव्य के साथ त्यागपत्र दे दिया। अह्ण२ङ्म फीं ि- राजनाथ सिंह ने राजनेताओं की कथनी और करनी पर दिया बड़ा बयान, पड़ोसी देश से भी पूछा ये सवाल 1999 में एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली इस बार वे पूरे कार्यकाल के प्रधानमंत्री रहे। प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के शासन काल में भारत एक सशक्त परमाणु शक्ति सपन्न राष्ट्र बना और स्वच्छ सुशासन की राजनीति का उद्घोष हुआ। अटलजी महान राजनेता ही नहीं अपितु साहित्यकार, पत्रकार, संपादक व कुशल कवि तथा वक्ता भी थे। उनकी वकतृत्व कला के लिए नेहरु व इंदिरा जैसे विपक्षी नेता भी उन पर फिदा रहे हैं, इसी वजह से विदेशमंत्री के रूप में वें सर्वाधिक लोकप्रिय हुए तथा विदेशों में व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को निखारने में अद्भुत योगदान दिया। यह अटल जी के व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान जैसी भारत विरोधी शक्तियां भारत के प्रति विद्वेष की भावना भरने में नाकामयाब रहीं। अटल राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय व संवैधानिक विषयों के गूढ़ ज्ञाता रहे। 1946 में वकालत की पढ़ाई बीच में ही छोड़ खुद को संघ के प्रति समर्पित कर दिया। अटल कहते थे कि भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता-जागता राष्ट्र पुरूष है। यह जीवन का आदर्श व एक जीवन पद्धति है जहां से ज्ञान की रश्मियां सम्पूर्ण विश्व में फैली हैं। यही वह देश है जिसने सम्पूर्ण विश्व को आध्यात्म का संदेश दिया है और विश्वगुरू कहलाया है। यह सदैव से धर्म, दर्शन, अध्यात्म के उच्चतम सिध्दान्तों का देश रहा है और जिसके वातावरण में मानवता तथा विश्व के बंधुत्व का राग ध्वनित होता रहता है। हमारी विरासत है, हमारी संस्कृति। भारत वन्दन की, अभिनन्दन की भूमि है। प्रधामंत्रीत्व काल में अटल का रणनीतिक कौशल देखकर राजनीतिक समीक्षक दंग रहे। विपरीत रीतियों-नीतियों वाले दलों के गठबंधन को उन्हानें कुशल ढंग से संभाला। परमाणु बम बनाने के बाद भी उन्होंने देश को अमेरिका व दूसरे देशों के दबाव में नही आने दिया। उस समय वे बहुत कम बोले परन्तु जो बोले वह अन्तर को छूने वाला व रणनीतिक कौशल से भरा होता था। एक परिश्रमी भारत व विजयी भारत बनाने का अटल का सदा ही सपना रहा। जब अटल जी ने राजनीति को अलविदा कह रखा है तब उनके धुर विरोधी रहे नेता भी मानते थे कि उनका चिंतन व मनन अद्भुत रहा, एक हिंदुवादी दल में होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में अटल बेमिसाल रहे हैं। अटल की खास बात रही है कि वे वक्त पड़ने पर अपनी बेलाग बातें कहने से कभी नहीं चूके। जब लालकृष्ण अडवाणी की रथ यात्रा के बाद संसद में उन्हें संसदीय दल का नेता बनाया जा रहा था तब उन्होंने कहा था, आड़वाणी जी के इन भालू बंदरों को संभालना मेरे बस की बात नहीं है। पर न केवल संभाला अपितु अगले ही चुनाव में सरकार बनाने में सफल रहे। जब गोधरा कांड हुआ तब वे प्रधानमंत्री थे। जब पत्रकारों ने पूछा अब मुख्यमंत्री को क्या करना चाहिए तब अटल ने बेलाग कहा था उन्हे अपना राजधर्म निभाना होगा। बिना किसी के दबाव में आए अटल ने अपना तीसरा कार्यकाल जिस तरह पूरा किया वह भारत के धर्मरिपेक्ष स्वरूप की छवि का एक स्वर्णकाल कहा जा सकता है। दंगे व पंगे से रहित उस काल ने अटल को बहुत पहले ही भारतरत्न बना दिया था जिस पर भारत सरकार की मोहर तो बहुत बाद नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लगी। अटल 94 साल हमारे बीच रहे अटल 16 अगस्त को इस वर्ष दैहिक से दैविक हो गए पर उनकी छवि, अद्भुत भाषण कला वह रुक-रुककर बोलना और देश के लिए दल को गौण कर देना हमेशा उनकी याद दिलाता रहेगा।

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