रांची। विश्व हिंदू परिषद के झारखंड प्रांत मंत्री डॉ बिरेन्द्र साहू ने डॉ करमा उरांव के विचार पर आपत्ति प्रकट करते हुए कहा कि हिंदू शब्द देखने में जितना सरल लगता है, व्याख्या तथा अर्थ में उतना ही व्यापक, कठिन तथा गंभीर है। समय-समय पर अनेक ऋषियों, महात्माओं, महापुरुषों ने हिंदू शब्द की व्याख्या करते रहे हैं। सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन ने कहा है। हिंदू वह है, जो हिंदू दिखता है। मदन मोहन मालवीय ने कहा है मैं हिंदू हूं, क्योंकि मुझे जीवन का यही सही मार्ग दिखाता है। वृहत विश्वकोष के अनुसार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष वेदों के विचारों के आधार पर बने अचार, विचार, रीति-नीति, समाज व्यवस्था आदि में किसी न किसी रूप में विश्वास करने और उनपर चलने वाले भारतीय को हिंदू कहा गया है। भिन्न-भिन्न संप्रदायों में कुछ अंतर होते हुए भी हिंदू समाज धार्मिक सिद्धांतों, सम्यक संस्कृति व जीवन पद्धति जातीय नियमों का पालन और एकता से बंधे हुए हैं। स्वाधीनता के पश्चात हिंदू शब्द की व्यापकता को कानूनी परिधि में बांधने का प्रयास किया गया। भारतीय संविधान के 25 में अनुच्छेद में हिंदू किसे माना जाए, इसे समझाने का प्रयास हुआ। इसी तरह 1956 में हिंदू कोड बिल में कहा गया कि मुसलमान, ईसाई, पारसी छोड़कर यहां के सनातनी, आर्य समाज, सिख, जैन और जितने भी अन्य बंधु हैं, वह सब हिंदू हैं। डॉ बिरेन्द्र ने कहा भारतीय संस्कृति अनादिकाल से विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर सर्वे भवंतु सुखिन: की उदात्त विचारधारा को जन-जन में सुप्रतिष्ठित करने का कार्य कर रही है। इसी कारण प्राचीन काल से ही भारत के प्रति विश्व समुदाय का आदर और श्रद्धा का भाव रहा है, इतिहास इस बात का साक्षी है। किंतु ईसाइयत और इस्लाम अपने घोषित लक्ष्य के अनुसार क्रूसेड और जिहाद के माध्यम से समस्त विश्व को पदाक्रांत करते हुए अपने साम्राज्य की स्थापना का अभियान चलाते रहे। करोड़ों हिंदू इस्लाम की बर्बरतापूर्ण अमानवीय अत्याचार के शिकार हुए। ईसाइयों ने सेवा के नाम का कुश्चक्र तथा मुस्लिमों का जिहाद के नाम पर तांडव के कारण आज देश में 15 से 20% हिंदू मुस्लिम बन चुके हैं तथा लगभग 5% हिंदू ईसाई बन चुके हैं। उन्होंने कहा ईसाइयों के चंगुल में आए हुए डॉ करमा उरांव जैसे विद्वान भी अपने मूल संस्कार को भूल कर पद्मभूषण कड़िया मुंडा जैसे बरगद के समान खड़ा व्यक्तित्व पर कुल्हाड़ी चलाने का कार्य कर रहे हैं, जो अति निदंनीय है। उन्होंने कहा, हमें ज्ञात होना चाहिए सनातन अथवा हिंदू का विस्तार जम्बुद्वीप हुआ करता था। जम्बुद्वीप अर्थात आज का यूरेशिया। एक विशाल भूखंड में प्रकृति का पूजा करने वाले तथा प्रकृति पर अपना विश्वास एवं सर्वस्व निछावर करने तथा उसके संरक्षण करने का एक विशाल मन लेकर समाज में चलने वाला व्यक्तित्व ही हिंदू था और आज भी है और आने वाले समय में भी रहेगा। हिंदू का अभिन्न अंग जनजातीय समाज है। जाति व्यवस्था में यदि हम जातिविज्ञान का अध्ययन करने पर जातियों का उद्भव उनके लगातार पैतृक कर्मों के कारण हुआ है। साधारणतया मिट्टी का कार्य करने वाला को कभी भी लोहार अथवा तेली नहीं कहा जाता है उसे कुम्हार ही कहा जाता है। कोई लोहा के काम करने वाला को बढ़ई अथवा चमार नहीं कहा जाता है उसे लोहार ही कहा जाता है। ऐसे एक लंबे कालखंड तक अपने - अपने कार्यों को संपादित करने के लिए जो सामाजिक व्यवस्था बनी तथा कालान्तर में जाति प्रथा का उदय हुआ है। हम जातियों में बंटकर अपने संस्कृति और समाज को छोड़े नहीं क्योंकि हम बंट रहे हैं तो कहीं ना कहीं घट रहे हैं। उन्होंने कहा हिंदू में 16 संस्कार करने की परंपरा है। इन संस्कारों का पालन जनजातीय समाज भी करते आ रहे हैं। हिंदू में गोत्र परंपरा रही है। गोत्र किसी न किसी ऋषि मुनि के नाम पर चलता है। हम उन ऋषि के वंशज है ऐसा मानते हैं। समान गोत्र में विवाह वर्जित है चाहे वह सनातन परंपरा हो या जनजतिय परंपरा। डॉ० करमा उरांव जैसे व्यक्ति को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, वनवासी कल्याण केंद्र जैसे संस्थाओं के लिए अनुचित शब्दों का प्रयोग करना शोभा नहीं देती है क्योंकि ये संस्थाएं समस्त भारतीय रुढ़िवादि विचारधारा व प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखने हेतु निरंतर कार्य कर रहे हैं। उक्त जानकारी विहिप के प्रांत मंत्री डॉ बिरेंद्र साहू ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
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