शिक्षा का असली धर्म : मेरिट, अनुशासन और चरित्र

 

जब विद्यालय नागरिक गढ़ते हैं, तो उनकी पहचान धर्म नहीं, गुणवत्ता से होती है 

शिक्षा की कसौटी—पहचान नहीं, प्रतिभा और प्रदर्शन  

डॉ बृज किशोर पाण्डेय  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा को लेकर देश में अनेक बहसें उभरी हैं। कभी विद्यालयों के ड्रेस कोड और धार्मिक प्रतीकों पर विवाद हुआ, कभी अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता चर्चा का विषय बनी, तो कभी सीखने की गुणवत्ता, शिक्षक उत्तरदायित्व और विद्यालयी अनुशासन पर प्रश्न उठे। आज भारतीय शिक्षा व्यवस्था दो महत्वपूर्ण प्रश्नों के सामने खड़ी है।  

  • पहला : क्या किसी शिक्षण संस्थान का मूल्यांकन उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर होना चाहिए यदि वह उत्कृष्ट शिक्षा दे रहा हो?  
  • दूसरा : क्या अनुशासन के बिना कोई संस्थान वास्तव में श्रेष्ठ कहलाने का अधिकारी है? दोनों प्रश्न का उत्तर एक है- शिक्षा का धर्म ज्ञान है और ज्ञान का मार्ग अनुशासन।  

शिक्षा का काम निष्पक्ष आकलन है, पूर्वाग्रह या पहचान के आधार पर निर्णय नहीं। जब एक संस्थान सच में श्रेष्ठ शिक्षा दे रहा है तो उसको मापने का पैमाना उसकी पढ़ाई होनी चाहिए उसका धर्म नहीं। इसलिए किसी विद्यालय की पहचान उसके नाम या प्रबंधन से नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता, समान अवसर, चरित्र निर्माण और विद्यार्थियों की उपलब्धियों से होनी चाहिए। 

ऐसे समय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि किसी विद्यालय का प्रबंधन किस समुदाय के हाथ में है, बल्कि यह है कि वह अपने विद्यार्थियों को कितना सक्षम, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक बना रहा है। कबीर का कालजयी संदेश- जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान- आज प्रत्येक विद्यालय, गुरुकुल, मदरसा, मिशनरी स्कूल और विश्वविद्यालय पर समान रूप से लागू होता है। 

भारतीय संविधान भी विविधता का सम्मान करते हुए शिक्षा को समान अवसर और उत्कृष्टता का माध्यम मानता है। अनुच्छेद 29और 30 विभिन्न समुदायों को अपनी शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित करने का अधिकार देते हैं। लेकिन यह अधिकार शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर, चरित्र निर्माण और संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय हित से ऊपर नहीं हो सकता है। 

विविधता का सम्मान लोकतंत्र की शक्ति है और शिक्षा की गुणवत्ता पर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मूल्यांकन का आधार परिणाम नहीं पहचान बन जाती है। किसी भी शिक्षण संस्थान का मूल्यांकन उसके नाम, वेश, प्रबंधन  या धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, अनुशासन, समान अवसर और विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण से होनी चाहिए। शिक्षा धर्मनिरपेक्ष है ।स्कूल का काम ज्ञान देना है दीक्षा देना नहीं। शिक्षा में पहचान नहीं, प्रदर्शन और प्रतिभा ही अंतिम कसौटी है। 

शिक्षक, अनुशासन और मेरिट की नयी कसौटी 

विद्यालय वह कार्यशाला है जहां  ज्ञान के साथ व्यक्तित्व भी गढ़ा जाता है। किसी विद्यालय की आत्मा उसकी इमारत नहीं, उसके शिक्षक और उसकी कार्य-संस्कृति होती है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण करना है। यह कार्य पाठ्यपुस्तकों से अधिक शिक्षक के आचरण से पूरा होता है। इसके लिए अनुशासन पहली शर्त है। अनुशासन भय से नहीं, आत्मनियंत्रण से जन्म लेता है, आदेश से नहीं आदर्श से विकसित होता  है। 

समय का सम्मान करने वाला शिक्षक ही समय का सम्मान करने वाले विद्यार्थियों का निर्माण कर सकता है। ऐसा विद्यालय ही सीखने का वातावरण बनाता है जहां जिज्ञासा, परिश्रम और उत्तरदायित्व स्वाभाविक बन जाते हैं। बिना अनुशासन वाला स्कूल  ऐसा दिशाविहीन यात्रा है जहां गति तो होती है पर गंतव्य नहीं। अनुशासन श्रेष्ठ शिक्षा की पहली ईंट है। कोई संस्थान अपनी धार्मिक पहचान से नहीं बल्कि अनुशासन, गुणवत्ता और कार्य संस्कृति से उत्कृष्ट बनता है। सबसे बड़ा संकट तब आता है जब धार्मिक पहचान और शैक्षणिक अनुशासन आमने-सामने खड़े हो जाएं।

ऐसी स्थिति में लक्ष्मण रेखा साफ है- अगर संस्थान शिक्षा की आड़ में नफरत, भेदभाव या अधूरा ज्ञान परोसता है तो वह ज्ञान का मंदिर नहीं है। आज मेरिट की परिभाषा भी बदल चुकी है। 21वीं सदी में मेरिट का अर्थ केवल अंक नहीं बल्कि समस्या -समाधान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नैतिकता, संवाद- कौशल और सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी इसको शिक्षा का अनिवार्य लक्ष्य मानती है।

विभिन्न राष्ट्रीय अधिगम सर्वेक्षणों और असर जैसे अध्ययनों ने भी संकेत दिया है कि विद्यालयों की सबसे बड़ी चुनौती केवल नामांकन नहीं, बल्कि बुनियादी भाषा और गणितीय दक्षता को मजबूत करना है। इसलिए श्रेष्ठ संस्थान वही है जो अंक के साथ व्यक्तित्व भी गढ़े? क्योंकि  श्रेष्ठ शिक्षा की पहचान चरित्र, काबिलियत और उत्तरदायित्व है जिसका आधार अनुशासन है। 

विकसित भारत की राह : विद्यालय से राष्ट्र तक 

विश्व के जिन देशों ने शिक्षा को राष्ट्रीय शक्ति बनाया है, उन्होंने विद्यालयों को वैचारिक संघर्ष का नहीं, गुणवत्ता का केंद्र बनाया। फिनलैंड ने शिक्षक की गुणवत्ता पर, सिंगापुर ने सतत कौशल-विकास पर और जापान ने अनुशासन तथा सामूहिक उत्तरदायित्व पर विशेष बल दिया। इन अनुभवों का संदेश स्पष्ट है- श्रेष्ठ शिक्षा वही है जो ज्ञान के साथ चरित्र का निर्माण करे। 

भारत जब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब प्रत्येक विद्यालय को केवल परीक्षा परिणाम देने वाला संस्थान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और संवेदनशील नागरिक तैयार करने वाला केंद्र बनना होगा। वहां धर्म, भाषा, जाति या आर्थिक पृष्ठभूमि अवसरों की बाधा नहीं, बल्कि विविधता की शक्ति बननी चाहिए। 

विज्ञान और संस्कार, नवाचार और नैतिकता, प्रतिस्पर्धा और करुणा- इन सभी का संतुलन ही विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला है।  देश के अनेक आकांक्षी जिलों में सामुदायिक भागीदारी, शिक्षक नेतृत्व और स्थानीय नवाचारों के माध्यम से विद्यालयों ने सीखने के स्तर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। उत्कृष्ट विद्यालय केवल अधिक बजट से नहीं बल्कि स्पष्ट दृष्टि, जवाबदेही और सतत प्रयास से बनते हैं।

विद्यालयों की पहचान उनके प्रार्थना स्थलों से नहीं उनकी प्रयोगशाला और पुस्तकालयों, कक्षाओं और वहां से निकलने वाले जिम्मेदार नागरिकों से होगी। विकसित भारत का मतलब है हर गांव और शहर में एक ऐसा स्कूल जहां प्रवेश का आधार समान अवसर हो पहचान नहीं, जहां घंटी की आवाज नफरत से ऊंची हो, जहां अनुशासन डंडे से नहीं आदर्श से उपजे। जिस दिन भारत यह कसौटी स्वीकार कर लेगा उसी दिन विश्वगुरु कोई नारा नहीं बल्कि शिक्षा से अर्जित राष्ट्रीय प्रतिष्ठा होगी। 

ज्ञान ही सबसे बड़ा धर्म 

शिक्षा का उद्देश्य किसी पहचान को श्रेष्ठ सिद्ध करना नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की संभावनाओं को विकसित करना है। किसी संस्थान का मूल्यांकन उसके धार्मिक परिचय से नहीं, बल्कि उसकी शैक्षणिक गुणवत्ता, अनुशासन, पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व से होना चाहिए। यही संविधान की भावना है और यही आधुनिक शिक्षा का मूल दर्शन भी। शिक्षा का कोई संप्रदाय नहीं होता। उसका एकमात्र धर्म ज्ञान, एकमात्र साधना अनुशासन और एकमात्र पहचान चरित्र तथा मेरिट होती है। 

विद्यालयों की महानता उनके नाम से नहीं बल्कि उनसे निकलने वाले जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिकों से तय होती है। जिस दिन भारत का प्रत्येक विद्यालय ज्ञान को धर्म, अनुशासन को संस्कृति और चरित्र को सफलता की पहली शर्त मान लेगा उसी दिन विकसित भारत केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बल्कि न्याय, ज्ञान और मानवीय मूल्यों से समृद्ध सभ्यता के रूप में विश्व का मार्गदर्शन करेगा। 

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse