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Published / 2022-01-16 13:43:55
कोरोना को लेकर स्कूलों को बंद रखने का कोई औचित्य नहीं...

एबीएन डेस्क। विश्व बैंक के वैश्विक शिक्षा निदेशक जैमे सावेद्रा के अनुसार महामारी को देखते हुए स्कूलों को बंद रखने का अब कोई औचित्य नहीं है और भले ही नयी लहरें आएं स्कूलों को बंद करना अंतिम उपाय ही होना चाहिए। सावेद्रा की टीम शिक्षा क्षेत्र पर कोविड-19 के प्रभाव पर नजर रख रही है। उन्होंने कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि स्कूलों को फिर से खोलने से कोरोना वायरस के मामलों में वृद्धि हुई है और स्कूल सुरक्षित स्थान नहीं हैं। सावेद्रा ने कहा कि लोक नीति के नजरिए से बच्चों के टीकाकरण तक इंतजार करने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इसके पीछे कोई विज्ञान नहीं है। वाशिंगटन से पीटीआई को दिये गए साक्षात्कार में सावेद्रा ने कहा, स्कूल खोलने और कोरोना वायरस के प्रसार के बीच कोई संबंध नहीं है। दोनों को जोड़ने का कोई सबूत नहीं है और अब स्कूलों को बंद रखने का कोई औचित्य नहीं है। भले ही कोविड-19 की नयी लहरें आएं, स्कूलों को बंद करना अंतिम उपाय ही होना चाहिए। उन्होंने कहा, रेस्तरां, बार और शॉपिंग मॉल को खुला रखने और स्कूलों को बंद रखने का कोई मतलब नहीं है। कोई बहाना नहीं हो सकता। विश्व बैंक के विभिन्न अध्ययन के अनुसार, अगर स्कूल खोले जाते हैं तो बच्चों के लिए स्वास्थ्य जोखिम कम होता है और बंद होने की लागत बहुत अधिक होती है। उन्होंने कहा, 2020 के दौरान हम नासमझी में कदम उठा रहे थे। हमें अभी भी यह नहीं पता कि महामारी से निपटने का सबसे अच्छा तरीका क्या है और दुनिया के अधिकतर देशों में तत्काल स्कूलों को बंद करने के कदम उठाए गए। तब से काफी समय बीत चुका है और 2020 और 2021 से कई लहरें आ चुकी हैं और ऐसे कई देश हैं, जिन्होंने स्कूल खोले हैं। सावेद्रा ने कहा, हम यह देखने में सक्षम हैं कि क्या स्कूलों के खुलने से वायरस के प्रसार पर प्रभाव पड़ा है और नए डेटा से पता चलता है कि ऐसा नहीं होता है। कई जगहों पर लहरें तब आई हैं, जब स्कूल बंद थे तो जाहिर है कि संक्रमण के मामलों में वृद्धि के पीछे स्कूलों की कोई भूमिका नहीं रही है। उन्होंने कहा, भले ही बच्चे संक्रमित हो सकते हैं और ओमीक्रोन से यह और भी अधिक हो रहा है लेकिन बच्चों में मृत्यु और गंभीर बीमारी अत्यंत दुर्लभ है।

Published / 2022-01-16 13:20:12
गणतंत्र दिवस : पश्चिम बंगाल की झांकी बाहर होने से "दीदी" हैरान

एबीएन डेस्क। दिल्ली में आगामी गणतंत्र दिवस परेड से स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान पर आधारित पश्चिम बंगाल की झांकी को बाहर करने के केंद्र के फैसले पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हैरानी जताई है। उन्होंने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर इस निर्णय पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया, क्योंकि राज्य के लोगों को इस कदम से पीड़ा होगी। बनर्जी ने यह भी कहा कि झांकी को खारिज करने का कोई कारण नहीं बताया गया। ममता बनर्जी ने मोदी को लिखे दो पन्नों के पत्र में कहा,मैं भारत सरकार के आगामी गणतंत्र दिवस परेड से पश्चिम बंगाल सरकार की प्रस्तावित झांकी को अचानक बाहर करने के निर्णय से स्तब्ध और आहत हूं। यह हमारे लिए और भी चौंकाने वाली बात है कि झांकी को बिना कोई कारण या औचित्य बताए खारिज कर दिया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रस्तावित झांकी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती वर्ष पर उनके और आजाद हिन्द फौज के योगदान की स्मृति में बनाई गई थी। बनर्जी ने पत्र में कहा, मैं आपको सूचित करना चाहती हूं कि पश्चिम बंगाल के लोग केंद्र सरकार के इस रवैये से बहुत आहत हैं। यह जानकर हैरानी होती है कि यहां के बहादुर स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को स्वतंत्रता के 75वें वर्ष पर गणतंत्र दिवस समारोह में इस अवसर को मनाने के लिए कोई जगह नहीं मिली है। बनर्जी ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा, मैं आपसे इस निर्णय पर पुनर्विचार करने और स्वतंत्रता के 75वें वर्ष पर गणतंत्र दिवस परेड में पश्चिम बंगाल के स्वतंत्रता सेनानियों की झांकी को शामिल कराने का आग्रह करती हूं।

Published / 2022-01-16 12:55:05
टीकाकरण अभियान का एक साल पूरा, स्वास्थ्य मंत्री ने जारी किया डाक टिकट

एबीएन डेस्क। कोरोना टीकाकरण अभियान का एक साल पूरा होने के मौके पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने रविवार को एक विशेष डाक टिकट जारी किया और उन लोगों को निशाने पर लिया जिन्होंने इस अभियान पर संदेह व्यक्त किया था। मंडाविया ने एक ट्वीट में लिखा, आज टीकाकरण अभियान के एक साल पूरा होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करते हुए, आईसीएमआर और भारत बायोटेक ने मिलकर जो स्वदेशी कोवाक्सिन टीका विकसित किया है, उस पर डाक टिकट जारी किया गया है। मैं सभी वैज्ञानिकों को इस अवसर पर हार्दिक बधाई व धन्यवाद देता हूं। उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस अवसर पर इस अभियान से जुड़े हर व्यक्ति को धन्यवाद कहा। उन्होंने एक ट्वीट में लिखा, जब यह वैश्विक महामारी पहली बार आई थी, तब वायरस के बारे में ज्यादा नहीं पता था। हालांकि, हमारे वैज्ञानिकों ने टीके विकसित करने के लिए खुद को झोंक दिया। उन्होंने कहा, भारत को इस बात पर गर्व है कि हमारे देश ने टीकों के माध्यम से वैश्विक महामारी के खिलाफ लड़ने में योगदान दिया। मैं टीकाकरण अभियान से जुड़े हर व्यक्ति को सलाम करता हूं। हमारे चिकित्सकों, नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका असाधारण रही है।

Published / 2022-01-16 12:50:31
यूपी चुनाव : 23 से अभियान की शुरुआत करेंगे शाह!

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय जनता पार्टी 23 जनवरी से चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत करेगी। गृह मंत्री अमित शाह 23 जनवरी को उत्तर प्रदेश में पहली वर्चुअल रैली को संबोधित कर सकते हैं। सूत्रों ने यह जानकारी दी है। सूत्रों ने बताया कि अमित शाह 23 जनवरी से उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार की शुरुआत करेंगे। बता दें कि शनिवार को चुनाव आयोग ने प्रचार प्रतिबंधों को 22 जनवरी तक आगे बढ़ा दिया है। चुनाव आयोग की गाइडलाइन के मुताबिक, राजनीतिक तल जनसभा, साइकिल रैली, बाइक रैली, पदयात्रा नहीं निकाल सकेंगे। इसके अलावा 5 लोगों के साथ घर-घर प्रचार करने की अनुमति है। हालांकि चुनाव आयोग ने वर्चुअल रैलियां करने की अनुमति दी है।

Published / 2022-01-16 12:46:00
बेबश बिहार : शाम ढलते ही कई गांवों में लगता है शराबियों का जमघट, पुलिस को दौड़ाते हैं माफिया

टीम एबीएन। शराबमुक्त बिहार की घोषणा के वर्षों बाद आज भी दर्जनों गांवों में शराब चुलाने व बेचने का कारोबार निरंतर चल रहा है। मौत (दारू) का यह कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है। दर्जनों गांवों में शराब चुलाई जा रही है। कई गांवों में तो शाम ढलते ही शराबियों का जमघट लगने लगता है। इस तरह की मौतों के बाद भी लोग या प्रशासन सबक नहीं ले रहा। बस कुछ दिन हाय तौबा और फिर से वही पुरानी चाल चलन...। नालंदा के हरनौत बाजार के दर्जनों लोगों ने बताया कि शराबबंदी का असर हर लोगों को भाने लगा था। लेकिन, कुछ ही माह बाद प्रशासनिक लापरवाही के कारण बेअसर दिखने लगा। गत माह मुख्यमंत्री के कड़े तेवर देखकर पुलिस महकमा में खलबली मच गई थी। शराब कारोबारी व शराबी को पकड़ने के लिए दिन रात अभियान भी चला। लेकिन, कुछ ही दिनों में फिर से वही रवैया शुरू हो गया। शराब का कारोबार एक बार फिर से पांव (नेटवर्क) पसारने लगा है। कभी हरनौत बाजार में शराबी शराब के नशे में धुत होकर पुलिस वाले का सर फोड़ देते हैं, कभी तेलमर गांव में बिजली गुल कर पुलिस कर्मियों को दौड़ा-दौड़ा कर परेशान करते हैं। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि शराब के धंधेबाजों का विरोध करने पर आम लोगों के साथ क्या सलूक किया जा सकता है। पुलिस की मिलीभगत से खुलेआम शराब चुलाने व बेचने का कारोबार चल रहा है।

Published / 2022-01-16 12:43:33
1 लाख 47 हजार: कोरोना महामारी के 21 महीनों में ये है अपने माता-पिता को गंवाने वाले बच्चों की संख्या : एनसीपीसीआर की रिपोर्ट

एबीएन डेस्क। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ा खुलासा किया है। आयोग के ताजा आंकड़ों की मानें तो कोरोना महामारी के दौर में एक अप्रैल 2020 के बाद से देश के 1 लाख 47 हजार 492 बच्चों ने अपने माता, पिता या दोनों में से किसी एक को गंवा दिया है। एनसीपीसीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले करीब दो साल में अनाथ हुए बच्चों में से ज्यादातर के माता-पिता की जान कोरोनावायरस या फिर किसी अन्य घटना में गई है। सुप्रीम कोर्ट को एनसीपीसीआर ने यह जानकारी एक स्वतः संज्ञान से जुड़े मामले में दीं। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से पूछा था कि उन बच्चों की संख्या क्या है, जिन्होंने कोरोना महामारी के दौरान अपने माता-पिता को गंवा दिया। इसी को लेकर एनसीपीसीआर ने यह आंकड़े कोर्ट को सौंपे। आयोग ने यह भी कहा कि उसके आंकड़े 11 जनवरी 2021 तक के हैं और इन्हें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से बाल स्वराज पोर्टल-कोविड केयर में दिए गए डेटा के आधार पर जुटाया गया है। एनसीपीसीआर के मुताबिक, 11 जनवरी तक जो डेटा अपलोड हुआ है, उससे सामने आता है कि देश में अप्रैल 2020 से लेकर अब तक दोनों माता-पिता को खोने वाले बच्चों की संख्या 10 हजार 94 रही, जबकि माता या पिता में किसी एक को गंवाने वालों की संख्या 1 लाख 36 हजार 910 मिली। इसके अलावा छोड़े गए बच्चों की संख्या 488 रही। इन सभी आंकड़ों को जोड़ा जाए तो देश में माता-पिता को गंवाने वाले बच्चों की संख्या 1 लाख 47 हजार 492 पहुंचती है। किस उम्र के कितने बच्चों ने गंवाए माता-पिता? माता-पिता गंवाने वाले बच्चों में 76 हजार 508 लड़के रहे, जबकि 70 हजार 980 लड़कियां हैं, जबकि चार ट्रांसजेंडर बच्चे भी इसमें शामिल रहे। एफिडेविट के मुताबिक, जिस आयु वर्ग के बच्चे महामारी के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, उनमें आठ से 13 साल के 59,010 बच्चे, 14-15 साल के 22 हजार 763 बच्चे, 16-18 साल के 22,626 बच्चे शामिल रहे। इसके अलावा चार से सात साल के बीच के 26,080 बच्चों के माता या पिता या दोनों की इस दौरान जान गई।

Published / 2022-01-16 12:26:34
हिमाचल : खाई में गिरी कार, पति-पत्नी की मौत, तीन बच्चे गम्भीर

एबीएन डेस्क। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में औट थाना क्षेत्र के तहत बांधी के शाला गांव के समीप एक कार गहरी खाई में गिर गई। हादसे में पति-पत्नी की मौत हो गई जबकि तीन लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। घायलों का इलाज सिविल अस्पताल नगवाईं में चल रहा है। गीता नंद (32) पुत्र गोपाल शाला निवासी और उसकी पत्नी डिंपल कुमारी (30) गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों को प्राथमिक उपचार के लिए सिविल अस्पताल नगवाईं लाया गया, जहां दोनों की मौत हो गई। गीता नंद की बेटियां अक्षरा, दीक्षा और बेटा भुवनेश्वर घायल हो गए हैं। घायलों का अस्पताल में उपचार चल रहा है। एसएचओ औट ललित महंत ने मामले की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि शवों को पोस्टमार्टम के लिए कुल्लू अस्पताल भेजा गया है। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिए जाएंगे।

Published / 2022-01-16 07:26:41
दुमका-भागलपुर सड़क बदहाल, हथेली पर रहती है जान

एबीएन डेस्क। भले ही जिले को राज्य की उपराजधानी कहा जाता है लेकिन यहां की सड़कों की स्थिति अत्यंत बदहाल है, जिससे लोग काफी परेशान हैं। उनका कहना है कि एक-दो दशक से सड़कों की यह स्थिति हमने नहीं देखी। आखिरकार इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा। दुमका को देवघर और भागलपुर से जोड़ने वाली मुख्य सड़क की हालत भी काफी खराब है, जबकि यह काफी व्यस्ततम सड़क है। हजारों वाहनों का प्रतिदिन आवागमन होता है। सड़क के जर्जर होने से लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दुमका से महारो चौक के बीच स्थित महारो पुल का ऊपरी सतह इस कदर जर्जर हो गया है कि इसमें लगी छड़ें बाहर निकल गई हैं। आवागमन कर रहे लोगों से हमने बात की। उन लोगों का कहना है कि आए दिन यहां दुर्घटना होती रहती है। इस वजह से हमेशा डर लगा रहता है कि पता नहीं कब कोई हादसे का शिकार हो जाये, लेकिन जरूरी काम से आना-जाना ही पड़ता है। वे परेशान हैं और इसे जल्द बनाने की मांग कर रहे हैं।

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