एबीएन न्यूज नेटवर्क, लोहरदगा/ रांची। संगठन सृजन अभियान के तहत हर स्तर पर पार्टी को मजबूत करने के उद्देश्य से लोकसभा के माननीय सांसद सुखदेव भगत को हिमाचल प्रदेश राज्य का एआईसीसी आब्जर्वर पर बनाया गया, जिसकी जानकारी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव के सी वेणुगोपाल ने पत्र के माध्यम से दिया।
सुखदेव भगत ने सांसद के रूप में अपनी प्रतिभा, अपनी मेहनत और अपने परफॉर्मेंस से बहुत कम समय में राष्ट्रीय नेता एवं अच्छे वक्ता के रूप में अपनी पहचान बना ली है। सुखदेव भगत के कार्यों ने कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं को प्रभावित किया है।
इससे पहले भी पार्टी ने सुखदेव भगत को पांच राज्यों का कांग्रेस संसदीय दल (सीपीसी) के राज्य कमेटी का संयोजक बनाया था। चंडीगढ़ के लिए नेशनल टैलेंट हंट का नोडल समन्वयक बनाया गया। बिहार विधानसभा का स्टार प्रचारक बनाया गया।
कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इससे पूर्व भी सांसद सुखदेव भगत को गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान राज्य का एआईसीसी आब्जर्वर बनाया था और अब हिमाचल प्रदेश राज्य का एआईसीसी आॅब्जर्वर बनाया है जो जिले और राज्य के कांग्रेसियों के लिए गर्व की बात है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने रविवार को आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह वोट चोरी में लिप्त हैं और चाहे वे कहीं भी चले जायें, एक दिन पकड़े जाएंगे। बिहार के किशनगंज में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) देश को बांटने की साजिश कर रहे हैं, जबकि इंडिया गठबंधन देश को एकजुट करने की दिशा में काम कर रहा है।
उन्होंने कहा कि मोदी, शाह और चुनाव आयोग के पास हमारे वोट चोरी के आरोपों का कोई जवाब नहीं है, क्योंकि सच्चाई अब जनता के सामने आ चुकी है। प्रधानमंत्री, शाह कहीं भी चले जाएं, लेकिन वे वोट चोरी के लिए पकड़े जायेंगे। राहुल गांधी ने दावा किया कि उन्होंने हाल ही में हरियाणा में बड़े पैमाने पर वोट चोरी का खुलासा किया है।
उन्होंने कहा कि हरियाणा में करीब दो करोड़ मतदाता हैं, लेकिन मतदाता सूची में लगभग 25 लाख फर्जी नाम पाये गये। आज तक न तो मोदी और न ही मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने यह कहने की हिम्मत दिखायी कि राहुल गांधी झूठ बोल रहे हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि यदि जनता एकजुट होकर वोट चोरी को रोक दे, तो बिहार में इंडिया गठबंधन की सरकार सौ फीसदी बनेगी।
उन्होंने कहा, बिहार में मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि महागठबंधन अगली सरकार बनायेगा। सौ प्रतिशत संभावना है। लेकिन आपको भाजपा की वोट चोरी रोकनी होगी। मतदान के दिन हर युवा, मजदूर और किसान का यह कर्तव्य है कि वे वोट चोरी को नाकाम करें। सीमांचल क्षेत्र की रैली में राहुल गांधी ने कहा कि भाजपा और आरएसएस का उद्देश्य समाज को बांटना और वोट चोरी से ध्यान हटाना है।
उन्होंने कहा कि मोदी और शाह जनता की आवाज से डरते हैं। उन्होंने भारत की आत्मा के साथ विश्वासघात किया है। वे पकड़े जायेंगे। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आर्थिक नीतियों को राज्य में रोजगार की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि बिहार के लोग आज बेंगलुरु से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक सड़कों, स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों का निर्माण कर रहे हैं। इतने मेहनती लोग अपने ही राज्य में रोजगार क्यों नहीं पा सकते?
उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार को जवाब देना चाहिए कि 20 साल में उन्होंने मछली और मखाना जैसी प्रचुर फसलों वाले राज्य में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां क्यों नहीं लगायी? पूर्णिया की सभा में गांधी ने कहा कि मुख्यमंत्री बिहार के युवाओं को रोजगार नहीं देना चाहते। बिहार का युवा अब मजदूर बनकर नहीं रहना चाहता। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में उद्योगपतियों को सस्ती दर पर जमीन दी जा रही है।
राहुल ने कहा कि अमित शाह कहते हैं कि भूमि की कमी के कारण बिहार में औद्योगिक विकास नहीं हो सकता। लेकिन यही सरकार किसी बड़े कारोबारी को 1,000 एकड़ जमीन सस्ते दाम पर देने का रास्ता निकाल लेती है। उन्होंने इशारा भागलपुर जिले में एक प्रस्तावित पावर प्लांट की ओर किया। गांधी ने कहा कि मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूं कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बिहार में अगली बार सत्ता में नहीं आयेगी और नीतीश कुमार फिर कभी मुख्यमंत्री नहीं बन पायेंगे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को बेंगलुरू में एक कार्यक्रम में हिंदू होने का मतलब बताया। उन्होंने कहा कि हिंदू होने का अर्थ है, भारत माता के वंशज, भारत के लिए जिम्मेदार। जो भी भारत के लिए लड़े, वे सभी हिंदू हैं। सभी मुसलमान और इसाई के पूर्वज भी इसी भूमि के रहे हैं, इसलिए वे सभी भी हिंदू हैं। मुसलमानों में भी माना जाता है कि जब तक वतन की मुट्ठी भर मिट्टी जनाजे में नहीं पड़ती, तब तक जन्नत नसीब नहीं होती।
संघ के 100 वर्षों की यात्रा पर बेंगलुरू में आयोजित दो दिवसीय लेक्चर सीरीज के पहले दिन आरएसएस प्रमुख भागवत ने कहा कि चार प्रकार के हिंदू होते हैं। पहला, जो अपने होने पर गर्व करते हैं। दूसरे हिंदू वह जो यह तो कहते हैं कि वे हिंदू हैं, पर गर्व नहीं महसूस करते। तीसरे हिंदू वो हैं, जो निजी रूप से स्वयं को हिंदू मानते हैं, पर किसी लाभ-नुकसान के भय से सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते। और चौथी तरह के हिंदू वो हैं, जो यह तक भूल चुके हैं कि वे हिंदू हैं।
भागवत ने कहा कि संघ एक अद्वितीय संगठन है। पूरी दुनिया में इसके समान कोई नहीं है। संघ न तो किसी परिस्थिति की प्रतिक्रिया है, और न ही विरोध। संघ का उद्देश्य विनाश नहीं बल्कि पूर्णता की स्थापना है, पूरे समाज को एकजुट करना है।
उन्होंने कहा कि संघ का एक ही लक्ष्य है संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन। संघ प्रत्येक व्यक्ति को शाखा में प्रशिक्षण देकर सिखाता है कि वह केवल भारत माता के बारे में सोचे। संपूर्ण समाज के संगठन तथा व्यक्ति-निर्माण की पद्धति को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विकसित किया है।
मोहन भागवत ने कहा कि संघ हिंदू समाज का संगठन भारत माता के वैभव के लिए करना चाहता है, सत्ता के लिए नहीं। संघ के संचालन के लिए एक भी पैसा बाहर से नहीं लिया जाता। उन्होंने कहा कि विश्व में ऐसा कोई स्वैच्छिक संगठन नहीं है, जिसने संघ जैसी कठिनाइयों का सामना किया हो। संघ ने तीन प्रतिबंध झेले, हालांकि तीसरा प्रतिबंध वास्तविक अर्थों में कोई खास प्रतिबंध नहीं था।
संघ प्रमुख ने कहा कि हम भूल गए हैं कि हम भारतीय कौन हैं। आत्मविस्मृति ने हमें जकड़ लिया है। हम अपने ही लोगों को भूल गए और हमारी विविधता तथा भिन्नताएं विभाजन की रेखा बन गईं। स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद का मानना था कि हमारे समाज ने अपने इतिहास को भुला दिया है और यही सुधारों की असफलता का कारण बना।
आरएसएस प्रमुख भागवत ने कहा कि ब्रिटिश पहले हमलावर नहीं थे, भारत पर आक्रमण बहुत पहले से शुरू हो चुके थे। सबसे पहले शक, हूण, कुषाण और यवनों ने हमले किए। उसके बाद इस्लामी आक्रांताओं ने किए और आखिर में ब्रिटिशों ने। ब्रिटिश हमलावरों के आने से पहले तक हम राष्ट्र के रूप में एकजुट थे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। खुशी तो सबकी अपनी-अपनी है, लेकिन आंकड़े भी तो कुछ कहते हैं ना! टाइम आउट के सिटी लाइफ इंडेक्स 2025 में लोगों से पूछा गया कि उनका शहर कितना मजेदार है, नाइटलाइफ कैसी है, खाना कितना लाजवाब, जिंदगी की क्वालिटी क्या है और सबसे जरूरी - क्या ये शहर उन्हें खुश रखता है और यहां के लोग पॉजिटिव लगते हैं? नतीजा एशिया की सबसे खुशहाल शहर की ताज मुंबई के सिर सजा, जिसने बीजिंग, शंघाई, चियांग माई और हनोई को पछाड़ दिया।
बीजिंग और शंघाई दूसरे-तीसरे नंबर पर हैं, जहां क्रमश: 93 फीसदी और 92 फीसदी लोग खुश हैं। ये दोनों मेगा शहर सेफ्टी, सुविधा, खर्च और कल्चर में टॉप पर हैं, और जेन के लिए फ्यूचर वाली जीवंत जगहें बने हुए हैं।
थाइलैंड का चियांग माई और वियतनाम का हनोई टॉप फाइव में हैं। दोनों में 88 फीसदी लोग कहते हैं कि उनका शहर उन्हें खुशी देता है। रोजमर्रा की खुशी में हनोई ने थोड़ा आगे निकला। दोनों ही शहर हरे-भरे स्पेस, सुस्त रफ्तार और गहरे कम्युनिटी बॉन्ड के लिए मशहूर हैं : शांति और कनेक्शन ढूंढ़ने वालों के लिए परफेक्ट।
कुछ बड़े शहर क्यों पीछे रह गये? हर बड़ा शहर टॉप पर नहीं पहुंचा। सियोल, सिंगापुर और टोक्यो नीचे हैं, टोक्यो में तो सिर्फ 70 फीसदी लोग ही कहते हैं कि शहर उन्हें खुश रखता है। लंबे वर्किंग आॅवर्स और तेज रफ्तार जिंदगी थका देती है, जिससे साफ पता चलता है कि पार्क, बाथहाउस और नेचर ट्रिप्स कितने जरूरी हैं स्ट्रेस कम करने के लिए।
चाहे मुंबई का स्ट्रीट फूड हो, बीजिंग-शंघाई की मॉडर्न सुविधाएं, या चियांग माई-हनोई के हरे-भरे कोने - ये सर्वे साबित करता है कि खुशी एक फीलिंग भी है और शहर की दी हुई जिंदगी का आइना भी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। वंदे मातरम, ये शब्द एक मंत्र है, एक ऊर्जा है, एक स्वप्न है, एक संकल्प है। वंदे मातरम, ये एक शब्द मां भारती की साधना है, मां भारती की आराधना है। वंदे मातरम, ये एक शब्द हमें इतिहास में ले जाता है। ये हमारे आत्मविश्वास को, हमारे वर्तमान को, आत्मविश्वास से भर देता है, और हमारे भविष्य को ये नया हौंसला देता है कि ऐसा कोई संकल्प नहीं, ऐसा कोई संकल्प नहीं जिसकी सिद्धि न हो सके। ऐसा कोई लक्ष्य नहीं, जो हम भारतवासी पा ना सकें।
वंदे मातरम के सामूहिक गान का ये अद्भुत अनुभव, ये वाकई अभिव्यक्ति से परे है। इतनी सारी आवाजों में एक लय, एक स्वर, एक भाव, एक जैसा रोमांच, एक जैसा प्रवाह, ऐसा तारतम्य, ऐसी तरंग, इस ऊर्जा ने ह्दय को स्पंदित कर दिया है। भावनाओं से भरे इसी माहौल में, मैं अपनी बात को आगे बढ़ा रहा हूं। मंच पर उपस्थित कैबिनेट के मेरे सहयोगी गजेंद्र सिंह शेखावत, दिल्ली के उपराज्यपाल वी. के. सक्सेना, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जी, अन्य सभी महानुभाव, भाइयों और बहनों।
आज हमारे साथ देश के सभी कोने से लाखों लोग जुड़े हुए हैं, मैं उनको भी मेरी तरफ से वंदे मातरम से शुभकामनाएं देता हूं। आज 7 नवंबर का दिन बहुत ऐतिहासिक है, आज हम वंदे मातरम के 150वें वर्ष का महाउत्सव मना रहे हैं। ये पुण्य अवसर हमें नई प्रेरणा देगा, कोटि-कोटि देशवासियों को नई ऊर्जा से भर देगा। इस दिन को इतिहास की तारीख में अंकित करने के लिए आज वंदे मातरम पर एक विशेष कॉइन और डाक टिकट भी जारी किए गए हैं।
मैं देश के लक्ष्यावदी महापुरुषों को, मां भारती के संतानों को वंदे मातरम, इस मंत्र के लिए जीवन खपाने के लिए आज श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं, और देशवासियों को इस अवसर पर बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मैं सभी देशवासियों को वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर बहुत-बहुत शुभकामनाएं भी देता हूं। हर गीत, हर काव्य का अपना एक मूल भाव होता है, उसका अपना एक मूल संदेश होता है। वंदे मातरम का मूल भाव क्या है? वंदे मातरम का मूल भाव है- भारत, मां भारती।
भारत की शाश्वत संकल्पना, वो संकल्पना जिसने मानवता के प्रथम पहर से खुद को गढ़ना शुरू कर दिया। जिसने युगों-युगों को एक-एक अध्याय के रूप में पढ़ा। अलग-अलग दौर में अलग-अलग राष्ट्रों का निर्माण, अलग-अलग ताकतों का उदय, नई-नई सभ्यताओं का विकास, शून्य से शिखर तक उनकी यात्रा, और शिखर से पुन: शून्य में उनका विलय, बनता बिगड़ता इतिहास, दुनिया का बदलता भूगोल, भारत ने ये सब कुछ देखा है।
इंसान की इस अनंत यात्रा से हमने सीखा और समय-समय पर नए निष्कर्ष निकाले। हमने उनके आधार पर अपनी सभ्यता के मूल्यों और आदर्शों को तराशा, उसे गढ़ा। हमने, हमारे पूर्वजों ने, हमारे ऋषियों ने, मुनियों ने, हमारे आचार्यों ने, भगवंतों ने, हमारे देशवासियों ने अपनी एक सांस्कृतिक पहचान बनाई। हमने ताकत और नैतिकता के संतुलन को बराबर समझा। और तब जाकर, भारत एक राष्ट्र के रूप में वो कुन्दन बनकर उभरा जो अतीत की हर चोट सहता भी रहा और सहकर भी अमरत्व को प्राप्त कर गया।
भारत की ये संकल्पना, उसके पीछे की वैचारिक शक्ति है। उठती-गिरती दुनिया से अलग अपना स्वतंत्र अस्तित्व बोध, ये उपलब्धि, और लयबद्ध, लिपिबद्ध होना, लयबद्ध होना, और तब जाकर के ह्दय की गहराई से, अनुभवों के निचोंड़ से, संवेदनाओं की असीमता को प्राप्त कर करके वंदे मातरम जैसी रचना मिलती है। और इसलिए, गुलामी के उस कालखंड में वंदे मातरम इस संकल्प का उद्घोष बन गया था, और वो उद्घोष था- भारत की आजादी का।
माँ भारती के हाथों से गुलामी की बेड़ियाँ टूटेंगी, और उसकी संताने स्वयं अपने भाग्य की भाग्य विधाता बनेंगी। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था- बंकिमचंद्र की आनंदमठ केवल उपन्यास नहीं है, ये स्वाधीन भारत का एक स्वप्न है। आप देखिए, आनंदमठ में वंदे मातरम का प्रसंग, वंदे मातरम की एक-एक पंक्ति के, बंकिम बाबू के एक-एक शब्द के, उसके हर भाव के, अपने गहरे निहितार्थ थे, निहितार्थ हैं। ये गीत गुलामी के कालखंड में रचना तो जरूर हो गई उस समय, लेकिन उसके शब्द कुछ वर्षों की गुलामी के साये में कभी भी कैद नहीं रहें।
वो गुलामी की स्मृतियों से आजाद रहें। इसलिए, वंदे मातरम हर दौर में, हर कालखंड में प्रासंगिक है, इसने अमरता को प्राप्त किया है। वंदे मातरम की पहली पंक्ति है- सुजलाम् सुफलाम् मलयज-शीतलाम्, सस्यश्यामलाम् मातरम्। अर्थात्, प्रकृति के दिव्य वरदान से सुशोभित हमारी सुजलाम् सुफलाम् मातृभूमि को नमन। यही तो भारत की हजारों साल पुरानी पहचान रही है। यहाँ की नदियां, यहाँ के पहाड़, यहाँ के वन, वृक्ष और यहां की उपजाऊ मिट्टी, ये धरती हमेशा सोना उगलने की ताकत रखती है।
सदियों तक दुनिया भारत की समृद्धि की कहानियाँ सुनती रही थी। कुछ ही शताब्दी पहले तक, ग्लोबल ॠऊढ का करीब एक चौथाई हिस्सा भारत के पास था। जब बंकिम बाबू ने वंदे मातरम की रचना की थी, तब भारत अपने उस स्वर्णिम दौर से बहुत दूर जा चुका था। विदेशी आक्रमणकारियों ने, उनके हमले, लूटपाट अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियाँ, उस समय हमारा देश गरीबी और भुखमरी के चंगुल में कराह रहा था। तब भी, बंकिम बाबू ने, उस बुरे हालात के स्थितियों में भी, चारों तरफ दर्द था, विनाश था, शोक था, सबकुछ डूबता हुआ नजर आ रहा था, ऐसे समय बंकिम बाबू ने समृद्ध भारत का आह्वान किया। क्योंकि, उन्हें विश्वास था कि मुश्किलें कितनी भी क्यों ना हों, भारत अपने स्वर्णिम दौर को पुनर्जीवित कर सकता है। और इसलिए उन्होंने आह्वान किया, वंदे मातरम।
गुलामी के उस कालखंड में भारत को नीचा और पिछड़ा बताकर जिस तरह अंग्रेज अपनी हुकूमत को स्थापित करते थे, इस प्रथम पंक्ति ने उस दुष्प्रचार को पूरी तरह से ध्वस्त करने का काम किया। इसलिए, वंदे मातरम केवल आजादी का गान ही नहीं बना, बल्कि आजाद भारत कैसा होगा, वंदे मातरम ने वो सुजलाम सुफलाम सपना भी करोड़ों देशवासियों के सामने प्रस्तुत किया।
आज ये दिन हमें वंदे मातरम की असाधारण यात्रा और उसके प्रभाव को जानने का अवसर भी देता है। जब सन् 1875 में बंकिम बाबू ने बंगदर्शन में वंदे मातरम् प्रकाशित किया था, तो कुछ लोगों को लगता था कि ये तो केवल एक गीत है। लेकिन, देखते ही देखते वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता संग्राम का, कोटि-कोटि जनों का स्वर बन गया। एक ऐसा स्वर, जो हर क्रांतिकारी की जबान पर था, एक ऐसा स्वर, जो हर भारतीय की भावनाओं को व्यक्त कर रहा था।
आप देखिए, आजादी की लड़ाई का शायद ही ऐसा कोई अध्याय होगा, जिससे वंदे मातरम किसी न किसी रूप से जुड़ा नहीं था। 1896 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम गाया। 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ। ये देश को बांटने का अंग्रेजों का एक खतरनाक एक्सपेरिमेंट था। लेकिन, वंदे मातरम उन मंसूबों के आगे चट्टान बनकर के खड़ा हो गया। बंगाल के विभाजन के विरोध में सड़कों पर एक ही आवाज थी- वंदे मातरम।
बरिसाल अधिवेशन में जब आंदोलनकारियों पर गोलियाँ चलीं, तब भी उनके होंठों पर वही मंत्र था, वही शब्द थे- वंदे मातरम! भारत के बाहर रहकर आजादी के लिए काम कर रहे वीर सावरकर जैसे स्वतंत्र सेनानी, वो जब आपस में मिलते थे, तो उनका अभिवादन वंदे मातरम से ही होता था। कितने ही क्रांतिकारियों ने फांसी के तख्त पर खड़े होकर भी वंदे मातरम बोला था। ऐसी कितनी ही घटनाएँ, इतिहास की कितनी ही तारीखें, इतना बड़ा देश, अलग-अलग प्रांत और इलाके, अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग, उनके आंदोलन, लेकिन जो नारा, जो संकल्प, जो गीत हर जबान पर था, जो गीत हर स्वर में था, वो था- वंदे मातरम।
1927 में महात्मा गांधी ने कहा था- वंदे मातरम हमारे सामने संपूर्ण भारत का ऐसा चित्र उपस्थित कर देता है, जो अखंड है। श्री अरबिंदो ने वंदे मातरम को एक गीत से भी आगे, उसे एक मंत्र कहा था। उन्होंने कहा- ये एक ऐसा मंत्र है जो आत्मबल जगाता है। भीकाजी कामा ने भारत का जो ध्वज तैयार करवाया था, उसमें बीच में भी लिखा था- वंदे मातरम
हमारा राष्ट्र ध्वज समय के साथ कई बदलावों से गुजरा, लेकिन तब से लेकर आज तक हमारे तिरंगे तक, देश का झण्डा जब भी फहरता है, तो हमारे मुंह से अनायास निकलता है- भारत माता की जय! वंदे मातरम! इसीलिए, आज जब हम उस राष्ट्रगीत के 150 वर्ष मना रहे हैं, तो ये देश के महान नायकों के प्रति हमारी श्रद्धांजलि है। और ये उन लाखों बलिदानियों को भी श्रद्धापूर्वक नमन है, जो वंदे मारतम का आह्वान करते हुए, फांसी के तख्त पर झूलते हुए, जो वंदे मातरम बोलते हुए, कोड़ों की मार सहते रहे, जो वंदे मातरम का मंत्र जपते हुए बर्फ की सिल्लियों पर अडिग रहे।
आज हम 140 करोड़ देशवासी ऐसे सभी नाम-अनाम-गुमनाम राष्ट्र के लिए जीने-मरने वालों को श्रद्धांजलि देते हैं। जो वंदे मारतम कहते हुए देश के लिए बलिदान हो गए, जिनके नाम इतिहास के पन्नों में कभी दर्ज ही नहीं हो पाए। हमारे वेदों ने हमें सिखाया है- माता भूमि:, पुत्रोऽहं पृथिव्या:"॥ अर्थात्, ये धरती हमारी माँ है, ये देश हमारी माँ है। हम इसी की संतानें हैं। भारत के लोगों ने वैदिक काल से ही राष्ट्र की इसी स्वरूप में कल्पना की, इसी स्वरूप में आराधना की है। इसी वैदिक चिंतन से वंदे मातरम ने आजादी की लड़ाई में नई चेतना फूंकी।
राष्ट्र को एक मानने वालों के लिए राष्ट्र को माँ मानने का विचार हैरानी भरा हो सकता है। लेकिन, भारत अलग है। भारत में माँ जननी भी है, और माँ पालनहारिणी भी है। अगर संतान पर संकट आ जाए, तो माँ संहारकारिणी भी है। इसलिए, वंदे मातरम कहता है- अबला केन मा एत बले। बहुबल-धारिणीं नमामि तारिणीं रिपुदल-वारिणीं मातरम्॥ वंदे मातरम, अर्थात् अपार शक्ति धारण करने वाली भारत माँ, संकटों से पार भी कराने वाली, और शत्रुओं का विनाश भी कराने वाली है। राष्ट्र को माँ, और माँ को शक्ति स्वरूपा नारी मानने का ये विचार, इसका एक प्रभाव ये भी हुआ कि हमारा स्वतन्त्रता संग्राम, स्त्री-पुरुष, सबकी भागीदारी का संकल्प बन गया।
हम फिर से ऐसे भारत का सपना देख पाये, जिसमें महिलाशक्ति राष्ट्र निर्माण में सबसे आगे खड़ी दिखाई देगी। वंदे मातरम, आजादी के परवानों का तराना होने के साथ ही, इस बात की भी प्रेरणा देता है कि हमें इस आजादी की रक्षा कैसे करनी है, बंकिम बाबू के पूरे मूल गीत की पंक्तियाँ हैं- त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरण-धारिणी कमला कमल-दल-विहारिणी वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम् नमामि कमलाम् अमलां अतुलाम् सुजलां सुफलाम् मातरम्, वंदेमातरम! अर्थात्, भारत माता विद्यादायिनी सरस्वती भी है, समृद्धि दायिनी लक्ष्मी भी हैं, और अस्त्र-शास्त्रों को धारण करने वाली दुर्गा भी हैं।
हमें ऐसे ही राष्ट्र का निर्माण करना है, जो ज्ञान, विज्ञान और टेक्नोलॉजी में शीर्ष पर हो, जो विद्या और विज्ञान की ताकत से समृद्धि के शीर्ष पर हो, और जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर भी हो। बीते वर्षों में दुनिया भारत के इसी स्वरूप का उदय देख रही है। हमने विज्ञान और टेक्नोलॉजी की फील्ड में अभूतपूर्व प्रगति की। हम दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरे। और, जब दुश्मन ने आतंकवाद के जरिए भारत की सुरक्षा और सम्मान पर हमला करने का दुस्साहस किया, तो पूरी दुनिया ने देखा, नया भारत मानवता की सेवा के लिए अगर कमला और विमला का स्वरूप है, तो आतंक के विनाश के लिए दश प्रहरण-धारिणी दुर्गा भी बनना जानता है।
वंदे मातरम से जुड़ा एक और विषय है, जिसकी चर्चा करना उतना ही आवश्यक है। आजादी की लड़ाई में वंदे मातरम की भावना ने पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया था। लेकिन दुर्भाग्य से, 1937 में वंदे मातरम के महत्वपूर्ण पदों को, उसकी आत्मा के एक हिस्से को अलग कर दिया गया था। वंदे मातरम को तोड़ दिया गया था, उसके टुकड़े किए गए थे। वंदे मातरम के इस विभाजन ने देश के विभाजन के बीज भी बो दिये थे। राष्ट्र निर्माण का ये महामंत्र, इसके साथ ये अन्याय क्यों हुआ? ये आज की पीढ़ी को भी जानना जरूरी है। क्योंकि वही विभाजनकारी सोच देश के लिए आज भी चुनौती बनी हुई है।
हमें इस सदी को भारत की सदी बनाना है। ये सामर्थ्य भारत में है, ये सामर्थ्य भारत के 140 करोड़ लोगों में है। हमें इसके लिए खुद पर विश्वास करना होगा। इस संकल्प यात्रा में हमें पथभ्रमित करने वाले भी मिलेंगे, नकारात्मक सोच वाले लोग हमारे मन में शंका-संदेह पैदा करने का प्रयास भी करेंगे। तब हमें आनंद मठ का वो प्रसंग याद करना है, आनंद मठ में जब संतान भवानंद वंदे मातरम गाता है, तो एक दूसरा पात्र तर्क-वितर्क करता है। वह पूछता है कि तुम अकेले क्या कर पाओगे? तब वंदे मातरम से प्रेरणा मिलती है, जिस माता के इतने करोड़ पुत्र-पुत्री हों, उसके करोड़ों हाथ हों, वो माता अबला कैसे हो सकती है?
आज तो भारत माता की 140 करोड़ संतान हैं। उसके 280 करोड़ भुजाएं हैं। इनमें से 60 प्रतिशत से भी ज्यादा तो नौजवान हैं। दुनिया का सबसे बड़ा डेमोग्राफिक एडवांटेज हमारे पास है। ये सामर्थ्य इस देश का है, ये सामर्थ्य माँ भारती का है। ऐसा क्या है, जो आज हमारे लिए असंभव है? ऐसा क्या है, जो हमें वंदे मातरम के मूल सपने को पूरा करने से रोक सकता है?
आज आत्मनिर्भर भारत के विजन की सफलता, मेक इन इंडिया का संकल्प, और 2047 में विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ते हमारे कदम, देश जब ऐसे अभूतपूर्व समय में नई उपलब्धियां हासिल करता है, तो हर देशवासी के मुंह से निकलता है- वंदे मातरम! आज जब भारत चंद्रमा के साउथ पोल पर पहुंचने वाला पहला देश बनता है, जब नए भारत की आहट अंतरिक्ष के सुदूर कोनों तक सुनाई देती है, तो हर देशवासी कह उठता है- वंदे मातरम!
आज जब हम हमारी बेटियों को स्पेस टेक्नोलॉजी से लेकर स्पोर्ट्स तक में शिखर पर पहुँचते देखते हैं, आज जब हम बेटियों को फाइटर जेट उड़ाते देखते हैं, तो गौरव से भरा हर भारतीय का नारा होता है- वंदे मातरम!आज ही हमारे फौज के जवानों के लिए वन रैंक वन पेंशन लागू होने के 11 वर्ष हुए हैं। जब हमारी सेनाएं, दुश्मन के नापाक इरादों को कुचल देती हैं, जब आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवादी आतंक की कमर तोड़ी जाती है, तो हमारे सुरक्षाबल एक ही मंत्र से प्रेरित होते हैं, और वो मंत्र है झ्र वंदे मातरम!
मां भारती के वंदन की यही स्पिरिट हमें विकसित भारत के लक्ष्य तक ले जाएगी। मुझे विश्वास है, वंदे मातरम का मंत्र, हमारी इस अमृत यात्रा में में भारती की कोटि-कोटि संतानों को निरंतर शक्ति देगा, प्रेरणा देगा। मैं एक बार फिर सभी देशवासियों को वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर ह्दय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं और देशभर से मेरे साथ जुड़े हुए आप सबसे बहुत-बहुत धन्यवाद करते हुए, मेरे साथ खड़े होकर के पूरी ताकत से, हाथ ऊपर करके बोलिएझ्र
वंदे मातरम!
एबीएन सेंट्रल डेस्क। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में विगत सोमवार को बिहार की राजधानी पटना में आयोजित उत्सव को संबोधित किया। केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने स्वदेशी संकल्प पत्र का सामूहिक पाठ भी किया। कार्यक्रम में केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
इस अवसर पर केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि आज का दिन भारतीय चेतना की जागृति का दिन है क्योंकि 150 वर्ष पहले आज ही के दिन महान स्वतंत्रता सेनानी बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जी ने वंदे मातरम गीत लिखा था। उन्होंने कहा कि बंकिमचंद्र जी ने इस गीत की रचना कर राष्ट्रीय चेतना का एक महामंत्र देश को देने का काम किया जो आगे चलकर भारत की आजादी का उद्घोष और सूत्र बना।
आजादी के बाद यह गीत देश को जोड़ने का कारण भी बना। श्री शाह ने कहा कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने महान भारत के लिए जो स्वप्न देखे थे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में विगत 11 साल में उन स्वप्नों को पूरा करने के लिए देश के सामूहिक प्रयास से कई काम हुए हैं।
श्री शाह ने कहा कि आज वंदे मातरम के सामूहिक गान के साथ ही एक साल तक भारत की चेतना की पुनजार्गृति का चरणबद्ध प्रयास शुरू हुआ है। उन्होंने कहा कि हमारा जीवन वंदे मातरम के मंत्र और उसमें निहित भाव के अनुरूप हो इसके लिए पूरे राष्ट्र में एक साथ अभियान चलाया जाएगा। यह अभियान फिजिकल के साथ-साथ डिजिटल स्वरूप में भी चलाया जाएगा।
श्री शाह ने कहा कि 150 नाम से सोशल मीडिया पर हर भाषा में एक अभियान चलाया जाएगा जिसमें सभी क्षेत्रीय भाषाओं में वंदे मातरम लिखकर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का प्रयास किया जाएगा। केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में सरकार ने कई कार्यक्रम आयोजित किए हैं। साथ ही कई राजनीतिक दलों, स्वंयसेवी संगठनों और देश की चेतना की पुनजार्गृति के महोत्सव में हिस्सा लेने वाले लोगों ने भी कई कार्यक्रम आयोजित किए हैं।
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम एक प्रकार से आनंद मठ नवलकथा का एक हिस्सा है, जो बाद में आजादी के आंदोलन का उद्घोष बना। श्री शाह ने कहा कि 1936 में बर्लिन ओलंपिक में हॉकी फाइनल से पहले हमारी हॉकी टीम ने सामूहिक वंदे मातरम गाया तब ही यह निश्चित हो गया कि जब भी हमारा देश आजाद होगा, उस वक्त यह गीत एक राजनीतिक सूत्र की जगह पूरे देश को एक रखने और देशभक्ति को हमेशा जगाए रखने का प्रेरणा स्रोत बनेगा।
अमित शाह ने कहा कि 15 अगस्त, 1947 को सरदार पटेल के आग्रह पर पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने पूरा वंदे मातरम गाकर आजाद भारत के हृदय के पहले स्पंदन को झंकृत करने का काम किया था। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी ने वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार कर देश के लिए वंदे मातरम को सम्मान के साथ स्वीकार करनी का रास्ता प्रशस्त किया था। उन्होंने कहा कि वहीं से वंदे मातरम हम सबके लिए एक राष्ट्र चेतना का गान बना है और आज इसके 150वें वर्ष का पर्व है।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि वंदे मातरम जब लिखा गया हमें उस कालखंड को भी समझना होगा। 1875 में मुगलों की लंबी गुलामी के बाद अंग्रेजों के शासन का कालखंड बना। उस वक्त प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी विफल हो चुका था औ? पूरे देश के मन में आँशंका थी कि क्या हमारी राष्ट्रीय चेतना दोबारा जागृत होगी। श्री शाह ने कहा कि उस वक्त बंकिम बाबू ने राष्ट्रीय चेतना का यह महागान गाया, जो हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पहला उद्घोष बना।
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम से यह स्पष्ट होता है कि भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक विचार और संस्कृति है जो सब भारतीयों को बांधकर और जोड़कर रखती है।
श्री अमित शाह ने कहा कि हमारी पार्टी ने हमेशा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर बल दिया है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिकल्पना की चेतना वंदे मातरम गीत से ही मिली होगी।
उन्होंने कहा कि आजादी के हमारे कई दीवाने वंदे मातरम बोलते हुए हँसते-हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए। आज उन सभी महान आत्माओं की इच्छा और कल्पना का भारत बनाने का समय आ गया है। श्री शाह ने कहा कि आज से 2047 तक का समय वंदे मातरम गीत से प्रेरणा लेकर महान भारत की रचना का समय है।
केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी भी दिल्ली में वंदे मातरम के सामूहिक गान में सम्मिलित हुए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे समय पर हम सबने यह निश्चित किया है कि वंदे मातरम की 150वीं जयंती के दिन हम स्वदेशी के लिए भी समर्पित करेंगे। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत की रचना स्वदेशी के बिना संभव ही नहीं है। श्री शाह ने आह्वान किया कि वंदे मातरम् की 150वीं जयंती पर देशवासी स्वदेशी को अपनाने का संकल्प लें। गृह मंत्री ने कहा कि हम सब यह संकल्प लेकर 2047 तक भारत को एक महान राष्ट्र बनाने की प्रक्रिया में शामिल हों और आज एक बार फिर भारत माता को अपना जीवन समर्पित करने का संकल्प लें।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि साल 1937 में वंदे मातरम् को तोड़ दिया गया था और इसके विभाजन से ही देश के विभाजन के बीज पड़ गए थे। इस मौके पर उन्होंने स्पेशल टिकट और सिक्का भी जारी किया है।
पीएम मोदी ने कहा कि वंदे मातरम् से जुड़े एक अहम मुद्दे पर चर्चा करना आवश्यक है। उन्होंने याद दिलाया कि आजादी की लड़ाई में इस गीत की भावना ने पूरे राष्ट्र को प्रकाशित किया था।
लेकिन दुर्भाग्य से 1937 में वंदे मातरम् के महत्वपूर्ण पदों को उसकी आत्मा के एक हिस्से को अलग कर दिया गया था। प्रधानमंत्री ने इस विभाजन को गहरे दुःख का विषय बताते हुए कहा कि राष्ट्रीय गीत को तोड़कर उसके दो टुकड़े कर दिये गये, जिसने आगे चलकर देश के विभाजन की नींव रखी।
पीएम ने जोर देकर कहा कि वंदे मातरम् की आत्मा को ही अलग कर दिया गया था। यह बयान उस ऐतिहासिक बहस की ओर इशारा करता है जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने 1937 में वंदे मातरम् के कुछ छंदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया था, जबकि कुछ अन्य छंदों पर विवाद होने के कारण उन्हें हटा दिया गया था।
पीएम मोदी ने इस अवसर पर वंदे मातरम् के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले सभी महापुरुषों को श्रद्धांजलि दी और कहा कि इस गीत का मूल भाव ही मां भारती की सेवा और आराधना है।
एबीएन स्पोर्ट्स डेस्क। आईसीसी महिला क्रिकेट विश्व कप 2025 की विजेता भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सदस्यों ने राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की। राष्ट्रपति ने टीम को बधाई दी और कहा कि उन्होंने इतिहास रच दिया है और युवा पीढ़ी के लिए आदर्श बन गयी हैं।
उन्होंने कहा कि यह टीम भारत का प्रतिबिंब है। वे विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों और विभिन्न परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन वे एक टीम हैं - भारत।
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