एबीएन सेंट्रल डेस्क। भाजपा नेता नवीन मार्कण्डेय ने मंगलवार को प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि मुंगेली जिले के लालपुर में गुरु बाबा घासीदास जी के जयंती कार्यक्रम में सतनामी समाज के युवाओं के विरोध प्रदर्शन पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की प्रतिक्रिया को घोर आपत्तिजनक टिप्पणी बताते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से सतनामी समाज के युवाओं को इशारों इशारों में कुत्ता कहकर बाबा गुरु घासीदास जी और सतनामी समाज का घोर अपमान किया है।
चार साल की विफलताओं और वादाखिलाफी से आक्रोशित युवा जब मुख्यमंत्री से सवाल करते हैं, उनकी कुनीतियों का विरोध करते हैं तो वे बौखला जाते हैं। आपा खोकर अपशब्द कहते हैं। ओछी टिप्पणी करते हैं। अब तो हद हो गई कि गुरु बाबा जी के धार्मिक आयोजन में भूपेश बघेल ने सतनामी समाज के युवाओं की तुलना कुत्ते से कर दी। बघेल बौरा गए हैं। विक्षिप्त जैसा व्यवहार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री पद की गरिमा को तार -तार कर दिया है।
मुख्यमंत्री ने अपनी कुंठा निकालते हुए उस महान संत का अपमान किया है, जिन्होंने सभी मनुष्यों के एक समान होने का संदेश मानवता को दिया है। भूपेश बघेल ने सतनामी समाज को गाली दी है। सत्ता के अहंकार का ऐसा दुर्लभ उदाहरण कहीं नहीं मिलेगा। भूपेश बघेल अविश्वसनीयता के प्रतीक हैं जो कि मुख्यमंत्री पद पर बैठा कोई व्यक्ति इस तरह असभ्य, अभद्र और अमर्यादित हो सकता है।
प्रदेश भाजपा नेता नवीन मार्कण्डेय ने कहा कि लोरमी के लालपुर में बाबा गुरु घासीदास जयंती कार्यक्रम में भूपेश बघेल को सतनामी समाज के युवकों के विरोध का सामना क्यों करना पड़ा, उन्हें यह समझना चाहिए था और युवाओं की शिकायत का समाधान करना चाहिए था क्योंकि वे मुख्यमंत्री हैं। जब मुख्यमंत्री सभा को संबोधित कर रहे थे, उसी दौरान सतनामी समाज के युवकों ने बैनर-पोस्टर लहराकर आरक्षण मामले पर विरोध कर मुख्यमंत्री वापस जाओ के नारे लगाये तो इसके लिए ये युवा नहीं, बल्कि अनुसूचित जाति वर्ग के साथ विश्वासघात करने वाले भूपेश बघेल जिम्मेदार हैं।
इस पर भी मुख्यमंत्री ने पद की मर्यादा को तिलांजलि देते हुए यह तक कह दिया कि शाम होते कौन भौंकते हैं, उनसे हम डरने वाले नहीं। कांग्रेस बताये कि वह सतनामी समाज को क्या मानती है, बाबा गुरु घासीदास जी का परिवार या वह जो कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बता रहे हैं।
प्रदेश भाजपा नेता नवीन मार्कण्डेय ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सभा में अपने हक की बात करने गए युवाओं के प्रति इतना द्वेष मुख्यमंत्री की कुंठित मानसिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। गुरु घासीदास जी की जयंती के अवसर पर, जिनका संदेश सामाजिक समरसता और आपसी भाईचारा है, उस सतनामी समाज के युवाओं को भौंकने वाला कह कर मुख्यमंत्री ने पूरे अनुसूचित जाति समाज का सरेआम अपमान किया है। भारतीय जनता पार्टी इसकी कड़ी निंदा करती है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कृत्य माफी योग्य नहीं है। भाजपा कड़ा विरोध करेगी।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जब तक समाज से माफी नहीं मांगते तब तक भाजपा भूपेश बघेल का पुतला दहन, एससी - एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर, धरना-प्रदर्शन ज्ञापन आंदोलन करती रहेगी। जिसके अंतर्गत प्रदेश के सभी जिलों में आज 20 दिसम्बर को पुतला दहन, 22 दिसंबर को थानों में एफआईआर तथा 29 या 30 दिसम्बर को 1 दिवसीय धरना-प्रदर्शन कर राज्यपाल महोदया को ज्ञापन दिया जायेगा।
पत्रकार वार्ता में रायपुर शहर जिलाध्यक्ष जयंती पटेल, प्रदेश मीडिया सह प्रभारी अनुराग अग्रवाल, अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश महामंत्री दयावंत धर बांधे व वेदराम जांगड़े मौजूद रहे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पतंजलि अनुसंधान संस्थान के तत्वावधान में आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के अंतर को पाटने के लिए एकीकृत दृष्टिकोण रखते हुए एक मंच पर चर्चा विषय पर संचालित सम्मेलन के दूसरे दिन स्वामी रामदेव ने कहा कि आज औद्योगिकरण बहुत गलत दिशा में जा रहा है। वर्तमान में सबसे ज्यादा पैसा फार्मा कंपनियों के पास है।
स्वामी रामदेव ने कहा कि दुर्भाग्य से पूरी दुनिया में मेडिकेशन का सोर्स फार्मा कम्पनियों के पास ही है और उनका उद्देश्य कम से कम निवेश के साथ ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना है। जिस तरह मेडिकल व फार्मा इण्डस्ट्री काम कर रही है, उस पर पूरी दुनिया को विचार करना होगा। मनुष्य को स्वयं विवेकी बनना होगा, जिम्मेदार बनना होगा। उन्होंने कहा कि कि एलोपैथी डॉक्टर्स दवा निर्माण नहीं कर सकता किन्तु आयुर्वेद में चिकित्सक लगभग 1000 औषधियां बनाने में सक्षम है। यह आयुर्वेद की आत्मनिर्भरता है।
आचार्य बालकृष्ण ने आॅनलाइन माध्यम से कहा कि यदि हम अपनी संस्कृति, परंपरा और अपनी परंपरागत विद्या को आधुनिक विज्ञान सम्मत स्थापित कर पाते हैं तो देश ही नहीं पूरी दुनिया उसको स्वीकार करने के लिए बाध्य होगी। स्वामी रामदेव के नेतृत्व में आयुर्वेद का जो वैभव है आप सब के सहयोग के विश्वव्यापी बनेगा।
पतंजलि अनुसंधान संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ अनुराग वार्ष्णेय ने कहा कि हमने गिलोय, तुलसी, अष्टवर्ग पादप, अश्वगंधा पर आधुनिक पैरामीटर्स के आधार पर अनुसंधान कर तथ्यों के साथ उनके चमत्कारी प्रभावों को दुनिया के सामने रखा है। पतंजलि वह पहला संस्थान है जिसने आयुर्वेद को एविडेंस बेस्ड मेडिसिन का दर्जा दिलाने की ओर ठोस कदम बढ़ाया है।
कार्यक्रम में एआइएमएस भोपाल व एआइएमएस जम्मू के प्रो. वाईके गुप्ता ने कहा कि आयुर्वेद बहुत प्राचीन है। यह ऐसा विज्ञान है जिसको हमने भुला दिया था। एलोपैथी का सिस्टम बहुत नया है लेकिन उसकी भी अपनी खूबियां हैं।
डिजनरेटिव बीमारियों की बात करें तो उसमें आयुर्वेद का पलड़ा भारी है, लेकिन इमरजेंसी की बात करें तो एलोपैथिक की भी हमें जरूरत पड़ती है। तो हमें यह प्रयास करना चाहिए कि एलोपैथी और आयुर्वेद दोनों को मिलाकर एकीकृत चिकित्सा पद्धति बनाई जाये। सम्मेलन में एनआईएमएस विश्वविद्यालय, जयपुर के डायरेक्टर सर्जिकल डिसिप्लिंस प्रोफेसर अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि हमें वैज्ञानिक तथ्यों से परिचित होकर आयुर्वेद व एलोपैथ के सम्मिश्रण से एकीकृत चिकित्सा या समग्र चिकित्सा को बढ़ावा देना होगा।
महर्षि मार्कण्डेश्वर इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साइंस एण्ड रिसर्च, मुलाना के प्रोफेसर एण्ड फामार्कोलॉजी हैड प्रो प्रेम खोसला ने कहा कि समय व काल की कसौटी पर परखी पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधियां दुष्परिणाम रहित हैं। एआइआइएमएस, भोपाल के डीन रिसर्च तथा माइक्रोबायोलॉजी के विभागप्रमुख प्रो देबासीस बिस्वास ने द आयुवेर्दा विंडो इन द हाऊस आॅफ मेडिसिन विषय पर तथा पतंजलि अनुसंधान संस्थान की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ स्वाति हलदर ने एविडेंस बेस्ड आयुर्वेदिक सॉल्यूशन्स फॉर इन्फैक्शियस डिजीज विषय पर चर्चा की। बीएचयू, बनारस के रस शास्त्र व भैषज्ञ कल्पना विभाग के सहायक प्राचार्य डॉ रोहित शर्मा ने बॉयोलॉजिकल प्लासिबल एंड एविडेंस बेस्ड इनसाइट्स आॅन आयुर्वेदिक फार्मास्यूटिकल्स तथा पतंजलि अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ कुनाल भट्टाचार्य ने एक्सप्लोरिंग ट्रेडिशनल आयुर्वेदा मेडिसिन फ्राम नैनोमेडिसिन प्रोस्पेक्टिव विषय पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में पतंजलि अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ ऋषभदेव, डीजीएम आॅपरेशन प्रदीप नैन, डॉ निखिल मिश्रा, डॉ सीमा गुजराल, डॉ ज्योतिष श्रीवास्तव, देवेन्द्र कुमावत, संदीप सिन्हा तथा डॉ कुणाल भट्टाचार्य का विशेष सहयोग रहा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के फैकल्टी डॉ बस्कर बक्थावाचलू ईएमबीओ ग्लोबल इन्वेस्टिगेटर नेटवर्क के नये सदस्य चुने गये हैं। एक्सीलेंस इन लाइफ साइंसेज ईएमबीओ ने आठ नए सदस्यों का ईएमबीओ ग्लोबल इन्वेस्टिगेटर नेटवर्क में स्वागत किया है। चिली, भारत, सिंगापुर और ताइवान में लैब तैयार कर चुके समूह के युवा ग्रुप लीडर जनवरी 2023 से आर्थिक सहायता और विभिन्न प्रशिक्षण और नेटवर्किंग की सुविधाएं प्राप्त करेंगे। ईएमबीओ ग्लोबल इन्वेस्टिगेटर अवार्ड जीवन विज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत युवा ग्रुप लीडरों के लिए बहुत प्रतिष्ठित सम्मान है।
डॉ बस्कर बक्थावाचलू आईआईटी मंडी के स्कूल आॅफ बायो साइंसेज एवं बायो इंजीनियरिंग के फैकल्टी हैं। उनका ग्रुप न्यूरो डीजेनरेटिव बीमारियों के सेलुलर मैकेनिज्म को समझने में लगा है। ग्रुप की विशेष अभिरुचि यह जानने में है कि आरएनए-बाइंडिंग प्रोटीन में जेनेटि कम्युटेशन से किस तरह मस्तिष्क में विषैला प्रोटीन जमा होने लगता है जिसके चलते न्यूरोनल मृत्यु होती है जो एमियो ट्रॉफिक लैटरलस्क्लेरोसिस एएलएस जैसी कई न्यूरो डीजेनेरेटिव रोगों में देखी गई है।
डॉ बस्कर बक्थावाचलू का लैब ऐसे मैकेनिज्म को समझने के लिए बतौर मॉडल ड्रोसोफिला और इंड्युस्डप्लुरिपोटेंट स्टेम सेल (आईपीएससी) का उपयोग करता है और न्यूरो डीजेनरेशन रोकने या टालने के लक्ष्य से संभावित दवाओं का पता लगाता है। ईएमबीओ से प्राप्त पुरस्कार के बारे में डॉ बस्कर बक्थावाचलू, आईआईटी मंडी ने कहा कि यह पुरस्कार हमारे परिश्रम का सम्मान है। ईएमबीओ ग्लोबल इन्वेस्टिगेटर नेटवर्क में शामिल होने से नेटवर्किंग के कई द्वार खुलते हैं। खासकर मेरे छात्रों को अधिक अवसर मिलेंगे जो अब पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों से संपर्क कर पायेंगे। चार वर्षों के दौरान नये ग्लोबल इनवेस्टिगेटर अपने नेटवर्क और रिसर्च पोर्टफोलियो बनाने और विस्तार करने में आर्थिक सहायता प्राप्त करेंगे।
इस राशि से वे नई पद्यतियां और टेक्निक जानने या फिर प्रयोग करने के लिए अपने कार्य क्षेत्र और इसके बाहर भी अन्य संस्थान जाकर सहयोग करार कर पायेंगे। उन्हें वैज्ञानिक बैठकों में भाग लेने या आयोजित करने और ईएमबीओ लीडरशिप और प्रबंधन प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए भी आर्थिक सहायता उपलब्ध होगी। इस प्रोग्राम का उद्देश्य यूरोपीय वैज्ञानिकों के साथ सहयोग को बढ़ावा देना ही नहीं बल्कि स्थानीय स्तर पर ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना भी है और इस तरह यूरोप के बाहर भी ईएमबीओ समुदायों को बढ़ावा दिया जायेगा।
इधर, फियोनावाट, निदेशक, ईएमबीओने कहा, कि हम चुने गये नये सदस्यों को ईएमबीओ ग्लोबल इन्वेस्टिगेटर बनने की बधाई देते हैं और हमें विश्वास है कि वे इस प्रोग्राम से बहुत कुछ सीखेंगे और अपनी दिलचस्पी के काम में प्रगति करेंगे। नये ईएमबीओ ग्लोबल इन्वेस्टि गेटर एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा होंगे। जिसमें 700 से अधिक वर्तमान और पूर्व ईएमबीओ ग्लोबल इन्वेस्टिगेटर, इंस्टालेशनग्रांटीज और यंग इंवेस्टिगेटर शामिल हैं। नेटवर्क की शुरुआत 2019 में की गई थी और इस साल सफल आवेदकों का यह ग्रुप ग्लोबल इन्वेस्टिगेटरों का चौथा समूह है। इस बार कुल 43 आवेदनों के साथ 2022 की सफलता दर 19 प्रतिशत दर्ज की गई। इसके बाद प्रवेश के लिए आवेदन की समय सीमा पहली जून 2023 है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। हम श्रमिकों की आपूर्ति और बचत को लेकर एशिया की वृद्ध होती आबादी के प्रभाव का आकलन करने की परियोजना पर काम कर रहे हैं। इस परियोजना के पहले निष्कर्ष की चर्चा हमने पिछले महीने की थी। इसका सार यही था कि एशिया की दस बड़ी अर्थव्यवस्थाओं (ए-10: चीन, भारत, इंडोनेशिया, जापान, फिलिपींस, वियतनाम, थाइलैंड, कोरिया, मलेशिया और ताइवान) में जनसांख्यिकीय परिवर्तन की गति आर्थिक संक्रमण से कहीं तेज है। यहां हम शोध के दूसरे निष्कर्ष की चर्चा करेंगे, जो कार्यबल की क्षमताओं से जुड़ा है। इसका सार यही निकलता है कि कार्यबल की क्षमताएं और काबिलियत उसकी संख्या या उपलब्धता पर भारी पड़ने वाली हैं।
कम से कम अगले एक दशक तो यही रुझान दिखने के आसार हैं। ए-10 देश, जो विनिर्मित वस्तुओं के वैश्विक व्यापार में वर्चस्व रखते हैं, उनकी संख्या 2010 तक वृद्धिशील वैश्विक कामगारों की आधी थी, लेकिन जल्द ही उनकी कामकाजी आबादी बूढ़ी होती दिखेगी। वहीं वैश्विक आबादी तो अभी भी निरंतर बढ़ने पर है, लेकिन जिन देशों में युवाओं की आबादी बढ़ रही है, उनमें राजनीतिक रूप से स्थिरता कम होने के साथ ही आर्थिक मोर्चे पर उनका जुड़ाव भी नहीं है।
इन देशों के रुझान भी विविधता लिए हुए हैं। जहां भारत, इंडोनेशिया और फिलिपींस में कामगारों की संख्या में सालाना 0.9 से 1.6 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा सकती है, लेकिन चीन, जापान, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया में यह सालाना 0.2 से एक प्रतिशत के संकुचन का शिकार हो सकती है। इसके अतिरिक्त, एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में श्रम बल भागीदारी अनुपात तो ऊंचा रहा है, लेकिन वह भी अब अवसान की ओर है, जिसमें निकट भविष्य में और गिरावट के आसार हैं।
इस गिरावट का एक बड़ा पहलू यही है कि लोग शिक्षा प्राप्त करने में अधिक वर्ष लगा रहे हैं, लेकिन यह कामगार उपलब्धता को घटा देता है। इसके अतिरिक्त, हमारे ट्रेडमार्क-मालिकाना सर्वे के निष्कर्ष भी इस परिकल्पना को पुष्ट करते हैं कि उत्तर एशियाई देशों में जैसे-जैसे आय बढ़ती है, वैसे-वैसे औद्योगिक नौकरियों में काम करने की युवाओं की इच्छा भी घटती जाती है। अर्थव्यवस्थाओं के अधिक समृद्ध होने के कारण सेवाओं की बढ़ती मांग भी औद्योगिक कामगारों की उपलब्धता को प्रभावित करती है।
हालांकि, इससे पहले कि हम इन देशों में औद्योगिक कामगारों की किल्लत को लेकर चिंतित हों, यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि ए-10 देशों की 28 प्रतिशत कामकाजी आबादी अभी भी कृषि में लगी हुई है। कृषि कामगारों को औद्योगिक काम के लिए कौशल प्रदान करना यकीनन चुनौतीपूर्ण है, फिर भी औद्योगिक कामकाज की ओर सुस्त संक्रमण के बावजूद, कृषि में लगे लोग बढ़ती उम्र के कारण उससे बाहर हो रहे हैं और नई पीढ़ी कृषि के बजाय औद्योगिक या सेवा क्षेत्र की ओर उन्मुख हो रही है, जिनकी तादाद काफी बड़ी है। कृषि में श्रम उत्पादकता पांच प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही है, जो कामगारों में गिरावट की भरपाई कर रही है।
असल में दो कारक खासे महत्त्वपूर्ण हैं। एक कामगारों की गुणवत्ता और दूसरा कार्यस्थल की गुणवत्ता। जिन अभिभावकों के कम बच्चे होते हैं, उनके पास बच्चों के विकास में निवेश करने के लिए अधिक समय और संसाधन होते हैं। इससे न केवल उनकी शिक्षा का औसत स्तर, बल्कि उनका शारीरिक विकास भी प्रभावित होता है। एशिया के सभी देशों में कम वजन वाले बच्चों की संख्या सार्थक रूप से कम हुई है। बेहतर बाल पोषण भले ही सरकारी हस्तक्षेपों पर निर्भर करता है, लेकिन इसमें अभिभावकों द्वारा ध्यान रखा जाना भी मायने रखता है।
भारत, इंडोनेशिया और फिलिपींस जैसी अर्थव्यवस्थाओं में जहां कुपोषण के मामले अभी भी ऊंचे स्तर पर हैं, वहां यह एक अहम नीतिगत चुनौती है। वर्ष 1966 में जन्मे और 1990 में जन्मे बच्चों की लंबाई में सुधार 1990 में कायम टोटल फर्टिलिटी रेट या टीएफआर के साथ विपरीत रूप से सहसंबद्ध है और यह दोनों लैंगिक स्तर पर है। इस अवधि में दक्षिण कोरिया और चीन में वयस्कों की औसत लंबाई में तीन सेंटीमीटर से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
सभी क्षेत्रों में स्कूल की पढ़ाई की अवधि के औसत वर्ष बढ़े हैं, जिनमें तीन से पांच वर्षों की बढ़ोतरी हुई है और इस मोर्चे पर इंडोनेशिया और वियतनाम में सबसे अधिक सुधार हुआ है। एक बार पुन: यह सरकारी प्रयासों के साथ-साथ अभिभावकों की क्षमता और दृढ़ता से संभव होता दिखता है, क्योंकि उनके बच्चे कम हैं, जिनकी शिक्षा पर वे अधिक निवेश को तत्पर हैं।
वर्ष 2018 में चीन के आंकड़ों से इसे समझा जा सकता है, जहां 25 से 30 वर्ष की आयु के 27 प्रतिशत लोग स्नातक थे, जबकि 45 से 54 वर्ष आयु वर्ग में स्नातकों का आंकड़ा 7 प्रतिशत ही था। बेहतर शिक्षा कामगारों को अधिक प्रभावी मशीनों के उपयोग में सक्षम बनाती है, जिससे श्रम उत्पादकता में वृद्धि होती है। हाल में एक शोध पत्र में इसका उल्लेख भी हुआ है, जिसमें अमेरिका में पिछले पांच दशकों के दौरान मशीन से जुड़े कामगारों की शैक्षणिक अर्हताओं का अध्ययन किया गया है।
अधिक शिक्षित लोगों का कामकाजी जीवन भी लंबा चलता है, क्योंकि शारीरिक क्षमताओं की तुलना में मानसिक क्षमताएं कहीं ज्यादा टिकाऊ होती हैं। हालांकि, औद्योगिक श्रम की उपलब्धता के दृष्टिकोण से एक अहम पहलू यह भी है कि अधिक शिक्षित लोग फैक्टरियों में काम करने के कम इच्छुक होते हैं। अमेरिका में कृषि, उत्पादन और निर्माण कार्य में स्नातकों की सक्रियता 10 प्रतिशत से कम है, जबकि कुल कामकाजी आबादी में उनकी भागीदारी 37 प्रतिशत और सेवा कार्यबल में 43 प्रतिशत है।
कार्यस्थलों की गुणवत्ता में सुधार के लिए भी भारी संभावनाएं विद्यमान हैं। जापान, कोरिया और ताइवान को अपवाद छोड़कर ए-10 अर्थव्यवस्थाओं के कार्यबल में भारी अनौपचारिकता है। अनौपचारिक कामगारों की उत्पादकता सीमित होती है। इसका कारण उनमें कौशल की कमी के साथ-साथ उन उपक्रमों का आकार (अनौपचारिक उपक्रमों का आकार अमूमन छोटा होता है) भी होता है, जिनमें वे काम करते हैं, क्योंकि वे कौशल-निर्माण में निवेश और व्यापक आर्थिक दायरे से जुड़ी संभावनाओं को भुनाने में कम सक्षम होते हैं। डिजिटलीकरण और सुधारों ने इन अर्थव्यवस्थाओं में राज्य की क्षमताओं को जैसे-जैसे बढ़ाया है, वैसे-वैसे उपक्रमों के आकार में वृद्धि के साथ ही औपचारीकरण भी तेज हुआ है, जिससे श्रम उत्पादकता में भी सुधार होना चाहिए।
कुल मिलाकर मानव पूंजी में सुधार जनसांख्यिकीय स्तर पर कुछ नुकसान की भरपाई कर सकता है। औसतन लोग कम बच्चे पैदा करेंगे, लेकिन अधिक संभावना है कि वे सशक्त एवं अधिक सक्षम कामगार के रूप में ढलेंगे। वहीं, बुढ़ाते हुए समाजों में रोबोटीकरण का तेज रुझान भी दिख रहा है। इन सभी कारकों के चलते ए-10 अर्थव्यवस्थाओं में औद्योगिक उत्पादन सालाना 3 से 4 प्रतिशत की वृद्धि कर रहा है और इस गति ने पिछले एक दशक के दौरान सार्थक रूप से तेजी पकड़ी है।
इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबलिंग, परिधान और खिलौना निर्माण जैसे कुछ उद्योगों में आटोमेशन यानी स्वचालन अभी भी खासा मुश्किल है। इसके प्रबल आसार दिखते हैं कि ये उद्योग बुढ़ाती अर्थव्यवस्थाओं से युवा अर्थव्यवस्थाओं की ओर उन्मुख होंगे, यह देखते हुए कि वे इस बदलाव को भुनाने के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण के साथ ही वैश्विक आपूर्ति श्रंखला से स्वयं को एकीकृत करेंगे।
हमने वृद्धि के सर्वसम्मत अनुमान और वस्तुओं एवं सेवाओं में अंतर करते हुए कुछ तार्किक आकलनों के आधार पर अगले पांच वर्षों के लिए वस्तुओं की मांग-आपूर्ति का एक प्रतिरूप प्रस्तुत किया है। हमने पाया कि भारत, इंडोनेशिया और फिलिपींस जैसी युवा अर्थव्यवस्थाओं में औद्योगिक श्रम आपूर्ति अधिशेष स्थिति में बनी रहेगी, जो अपनी आबादी को सफलतापूर्वक काम में लगाएंगे और चीन की उत्पादकता वृद्धि में भी बहुत ज्यादा कमी नहीं आने वाली। ऐसे में जोखिम उस खंडित वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए अधिक है, जहां न केवल उत्पादकता वृद्धि मंद पड़ी है, बल्कि कामगारों की उपलब्धता भी कम है।
भारत जैसे युवा देशों के लिए दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में यही मुख्य सबक होगा कि वे मानव पूंजी में सुधार, बच्चों में आरंभिक स्तर पर पोषण सुनिश्चित करने, शैक्षणिक स्तर सुधारने और आर्थिक औपचारीकरण की प्रक्रिया को गति देने पर ध्यान केंद्रित करें। चूंकि जन्म दर तेजी से घट रही है, तो जो बच्चे आज पैदा हो रहे हैं, वे तब वयस्क कामगार के रूप में तैयार होंगे, जब कामकाजी आबादी संकुचित हो रही होगी। ऐसे में उन्हें उन अवसरों को बेहतर तरीके से भुनाने में सक्षम बनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। (लेखक क्रेडिट सुइस में एपैक स्ट्रैटजी के सह-प्रमुख हैं)
एबीएन सेंट्रल डेस्क। चीन सहित दुनिया के तमाम देशों में कोरोना फिर से कहर बनकर टूट रहा है। नवंबर की शुरुआत से वैश्विक स्तर पर कोरोना के मामलों में एकाएक उछाल आया है। अस्पताल मरीजों से भरे हुए हैं और मृतकों की संख्या फिर से रिकॉर्ड तोड़ रही है। वहीं, दूसरी तरफ भारत में कोरोना के मामलों में गिरावट जारी है।
रविवार को खत्म हुए सप्ताह में, देश में कोरोना के कारण सिर्फ 12 मौतें दर्ज की गयी हैं। वहीं, पिछले तीन दिनों से एक भी मौत का मामला सामने नहीं आया है। मार्च 2020 के बाद दैनिक मृत्यु के मामले में यह सबसे कम है। वहीं, बीते सप्ताह में कोरोना के 1103 नये मामले दर्ज किये गये हैं। यह पहले लॉकडाउन 23-29 मार्च, 2020 के बाद से सबसे कम है। उस सप्ताह, 736 नए मामलों का पता चला था, जिसके बाद अगले सप्ताह यह आंकड़ा बढ़कर 3,154 पहुंच गया था। आंकड़ों के मुताबिक, बीता हुआ सप्ताह (दिसंबर, 12-18) में पिछले सात दिनों में कोरोना के मामलों में 19% की गिरावट देखी गई है। देश में कोरोना के नए मामलों में बीते पांच महीनों से गिरावट जारी है। साप्ताहिक लिहाज से देखें तो गिरावट 18-24 जुलाई के बाद से शुरू हुई। तब देश में 1.36 लाख नये मामले दर्ज किये गये थे।
उसके बाद से सभी सप्ताह में मामलों में गिरावट दर्ज की जाती रही। मार्च, 2020 (16 से 22 मार्च) के बाद से बीते सप्ताह हुईं 12 मौतें भी सबसे कम थीं। एशिया, यूरोप सहित कई देशों में कोरोना के मामले में भारी उछाल देखा गया है। दो नवंबर को वैश्विक मामले 3.3 लाख थे। इसके बाद से यह लगातार बढ़ रहे हैं। 18 दिसंबर को यह आंकड़ा 55 प्रतिशत बढ़कर 5.1 लाख पहुंच गया।
जापान में कोरोना से बुरा हाल
जापान में कोरोना के मामलों में सबसे अधिक उछाल देखा गया है। बीते सात दिनों में यहां एक मिलियन से भी ज्यादा मामले दर्ज किये गये हैं। यह पिछले सप्ताह से 23% की उछाल है। इस सप्ताह देश में 1,600 से अधिक मौतें हुई हैं, जो करीब 19 प्रतिशत का उछाल है। वहीं, दक्षिण कोरिया ने पिछले सप्ताह 450,000 से अधिक ताजा मामले दर्ज किये गये थे, जो बीते सप्ताह से 9% ज्यादा हैं। इसके अलावा ब्राजील, जर्मनी में भी मामले बढ़ रहे हैं। हांगकांग और ताइवान जैसे देशों में एक लाख नये मामलों की सूचना मिली है।
टीम एबीएन, दिल्ली/रांची। भारतीय किसान संघ झारखण्ड प्रदेश से किसान गर्जना रैली में भाग लेकर झारखण्ड के किसान और साथ में किसान संघ के सभी पदाधिकारी गण, प्रदेश अध्यक्ष जय सिंह, महामंत्री प्रकाश नारायण, धीरेन्द्र अग्रवाल, प्रदेश मंत्री दीपक, प्रदेश कार्यकारणी शिव जी, रांची से कामेश्वर मुंडा, देवघर से उदय महराज, डीओ साहेब, हजीराबाग से इन्द्रनारायण कुशवाहा, लातेहार से बबन जी के सामूहिक नेतृत्व में झारखंड राज्य से हजारों किसान गर्जना रैली में शामिल हुए।
साथ ही बुढ़मू प्रखण्ड अध्यक्ष चन्दन और रातू प्रखंड अध्यक्ष बेनी साहू के नेतृत्व में हजारों महिला और युवा किसानों ने भाग लिया। साथ ही दिल्ली के रामलीला मैदान में झारखंड राज्य के तरफ से प्रकाश नारायण ने झारखंड के किसानों के तरफ से मंच पर अपनी विचार प्रगट किया। साथ ही 70 वर्षों से पुरानी मांग लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य की मांग को जल्द से जल्द पूरा करने एवं युवा किसानों की समस्या से अवगत कराया। बताया कि किस तरह से किसान की स्थिति दयनीय हो रही है और गांवों से युवाओं का पलायन हो रहा है। इसके समाधान के लेकर भारत के प्रधानमंत्री मोदी से इस बजट में मोदी जी से एसटी हटाने, किसान सम्मान निधि को 18,000 करने की मांग को जल्द से इसी वर्ष के बजट में प्रावधान किये जाने की मांग की। जय जवान। जय बलराम। जय किसान...।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संतोष)। चीन क्या चाहता है? वह 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गतिविधियां बढ़ाने के बावजूद उन्हें गोलीबारी तक पहुंचने से रोके हुए है। ऐसा करके वह भारतीय सैनिकों और आम जनमानस को भड़का क्यों रहा है? उसका लक्ष्य और संदेश क्या है? हम इन सब को लेकर किस प्रकार की प्रतिक्रिया दे रहे हैं?
फिलहाल, सैन्य जवाब नहीं दिया जा रहा है। भारत के सशस्त्र बल जमीन पर पर्याप्त और प्रभावी ढंग से निपट रहे हैं। इसे वीरान और अलग-थलग मोर्चे पर हाथापाई और धक्कामुक्की के एक निरंतर चल रहे सिलसिले के रूप में नहीं देखा जा सकता है। हमें यह समझना होगा कि चीन चाहता क्या है। अगर केवल भूभाग का मामला होता तो वह गोलाबारी से परहेज न करता। तब उसने दूर से मार करने वाले हथियार आजमाये होते ताकि न्यूनतम मानव क्षति हो।
क्या वह इसलिए कर रहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ लगे इलाके और लद्दाख की तरह बफर जोन में बदले गए इलाके को तर्कसंगत ठहराया जा सके? केवल इतना करने के लिए वह 15,000 फुट की ऊंचाई पर और इतने विपरीत हालात में करीब तीन डिवीजन और भारी हथियार नहीं तैनात करेगा। इससे न तो उसकी सुरक्षा मजबूत होगी, न ही संसाधनों तक उसकी पहुंच बेहतर होगी, न ही अपने इलाके की रक्षा करने की भारत की इच्छाशक्ति कमजोर होगी।
इसके बावजूद भारत में चीन की हरकतों को लेकर सारी बहस भूभाग पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो सतर्कता बरतते हुए कभी चीन का नाम नहीं लेते उन्होंने 2020 में एक दफा इस मुद्दे पर कुछ कहा था और वह यह कि कोई नहीं आया।
विपक्ष की आलोचना और सामरिक टिप्पणियां भी भूभाग पर केंद्रित रहती हैं। हाल के दिनों में राहुल गांधी भी मोदी पर हमला करते हुए दिखे कि चीन के हाथों जमीन गंवाने के बावजूद मोदी चुप हैं। तृणमूल कांग्रेस से लेकर असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम तक तमाम विपक्षी दलों का यही रुख है।
चीन के कदमों या उसकी हरकतों से नहीं लगता कि वह जमीन पर कब्जा करना चाहता है। बहुत संभव है कि वह हमारे दिमागों पर काबिज होना चाहता है। वह सैन्य तैनाती के मामले में भारत को पीछे छोड़ना चाहता है और शीत युद्ध के बाद के तीन दशकों के सामरिक पुनर्संतुलन के बीच भारत को असंतुलित करना चाहता है। भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते के बाद इस प्रक्रिया ने जोर पकड़ा और मोदी के आगमन के बाद इसे नए सिरे से गति मिली।
चीन भारत को कई जटिल सामरिक और राजनीतिक संदेश दे रहा है। हम भी जमीन या सैन्य रणनीतिक मसलों पर ध्यान देकर अपना कुछ खास भला नहीं कर रहे हैं। इससे हमारी राजनीतिक और सामरिक संस्कृति के बारे में भी कुछ अच्छी बात सामने नहीं आती। हमें इस विषय को आगे और खंगालने की आवश्यकता है। कोई पक्ष जब जंग हार जाता है तो वह आने वाली कई पीढ़ियों तक उसी जंग को बार-बार लड़ता रहता है। हम भी अपनी कल्पनाओं में 1962 की जंग को बार-बार लड़ते रहते हैं। मानो हम खुद को यकीन दिलाना चाहते हों कि हमारा प्रदर्शन पहले से बेहतर रहेगा।
एक कठोर सत्य यह है कि वह युद्ध 60 वर्ष पहले हुआ था। तब से अब तक दुनिया बहुत बदल चुकी है। भू राजनीति बदली है, शीतयुद्ध समाप्त हो चुका है, चीन भी बदला है और भारत भी। सैन्य मामलों में भी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। अब यांत्रिक शक्ति की जगह साइबर लड़ाई, ड्रोन, रोबोट और मानव संपर्क की कमी ने ले ली है। यदि हमारी कल्पना अभी भी सन 1962 की चौकियों में उलझी हुई है तो मुझे साहस करके यह कह लेने दीजिए कि हमारी सामरिक और राजनीतिक सोच भी उसी मानसिकता में अटकी हुई है।
यही वजह है कि विपक्ष ने गश्त के अधिकार या कथित रूप से भूभाग गंवाने को लेकर हमले शुरू कर दिये। शायद मोदी सरकार भी उसी पुराने सोच से ग्रस्त है और इसी के चलते वह संसद में इस विषय पर चर्चा की इजाजत नहीं दे रही है।
अगर मामला जमीन का या गश्त के अधिकार का हो तो घरेलू राजनीति में मामले को तब तक निर्णायक रूप से हल करना असंभव है जब तक आप यह खुलासा करने को तैयार न हों कि आप कहां थे और कहां हैं? ये दोनों बातें दिक्कतदेह हो सकती हैं। मैं इनके विस्तार में नहीं जाऊंगा।
वास्तव में चर्चा व्यापक राजनीतिक, सामरिक और भूराजनीतिक पहलुओं के बारे में होनी चाहिए और हमारा राजनीतिक माहौल उसके लिए तैयार नहीं है। भाजपा दो कारणों से हिचक रही है। पहली वजह राजनीतिक है और वह यह कि पार्टी नहीं चाहती कि राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री के रिकॉर्ड पर सवाल उठाया जाए या उस पर सार्वजनिक चर्चा हो। वह पार्टी को वोट दिलाने वाले सबसे बड़े नेता हैं।
उनकी सबसे बड़ी योग्यता यही बताई जाती है कि आजाद भारत के इतिहास में राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर वह सबसे मजबूत रुख रखते हैं। शी चिनफिंग समय-समय पर इसे चोट पहुंचाते रहते हैं। दूसरी वजह भी राजनीतिक है लेकिन वह उतनी दलगत नहीं है। मौजूदा दौर में वैश्विक शक्ति के पुनसंर्तुलन की जो जरूरत है, भारत जिस तरह के कदम उठा रहा है, इसमें जो संवेदनशीलता शामिल है, वह जिस गुणवत्ता वाली बहस की मांग करता है वह मौजूद ही नहीं है।
ऐसा नहीं है कि हमारे राजनीतिक वर्ग के परिपक्वता की कमी है। अधिकांश प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं में यह क्षमता है और वे ऐसा कर चुके हैं। वे राष्ट्रीय सुरक्षा और तेजी से बदलते वैश्विक समीकरण को समझते हैं। बात बस यह है कि उनके और सत्ताधारी दल के बीच समुचित विश्वास की कमी है।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत वाली सरकार के आगमन के साढ़े आठ वर्ष बाद तक विपक्ष को कभी भरोसे में नहीं लिया गया। यहां तक कि बंद दरवाजों के पीछे होने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा के संवेदनशील मसलों पर भी नहीं। यह राजनीतिक बिखराव देश की सबसे बड़ी सामरिक कमजोरी है।
चीन इसी को निशाना बना रहा है। वह नहीं चाहता कि उसे कोई जान गंवानी पड़े। गलवान में हुई जानलेवा झड़प बीते दो वर्षों में उसकी नीति की सबसे बड़ी नाकामी थी। चीन के आचरण का तरीका देखिए।
हर कुछ महीने में चीन भारत को शमिंर्दा करने की कोई हरकत करता है, ताकि प्रधानमंत्री मोदी परेशान हों और साथ ही भारतीय रणनीतिकार भ्रमित हों। इसके दो ताजा उदाहरण हैं तवांग में झड़प और देश के सबसे प्रमुख चिकित्सा शिक्षा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान पर साइबर हमला। ये दोनों तब हुए हैं जब हमने अमेरिका के साथ युद्ध अभ्यास समाप्त ही किया है। अगर भारत क्वाड के साझेदार देश के साथ हिमालय में तिब्बत के करीब अभ्यास करके संकेत दे रहा था तो चीन ने भी अपनी तरह से इसका प्रत्युत्तर दिया। इस प्रतीकात्मक कार्रवाई का उत्तर अधिक क्षति पहुंचाने वाली कार्रवाई से दिया गया।
यह सिलसिला आने वाले समय में जारी रहेगा। चीन की नजर जमीन पर नहीं है। उसका लक्ष्य हमारी राष्ट्रीय इच्छा, नैतिकता और स्वायत्तता की भावना है जिससे हमारा सामरिक चयन तय होता है। वे भारत और मोदी सरकार के सबसे कमजोर पहलू को निशाना बना रहे हैं, यानी हमारी विभाजित राजनीति को। यह बात सरकार को विवश करती है कि वह संसद में लोगों को साफ जानकारी न दे और खामोश रहने पर मजबूर रहे और चीन अधिकाधिक इलाके पर काबिज होता रहे। यह कब्जा लद्दाख या अरुणाचल प्रदेश पर नहीं बल्कि हमारी राजनीतिक जमीन पर होगा।
नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार भारत की रक्षा को तभी मजबूत कर सकते हैं जब शीर्ष पर राजनीतिक समीकरणों को बेहतर किया जाए और विपक्ष के साथ सम्मान से पेश आया जाए तथा उनके साथ भरोसा साझा किया जाए ताकि भारत एकजुट होकर अपनी बात कह सके। अगर आप 1962 पर केंद्रित प्रतिष्ठित पुस्तकें पढ़ेंगे तो आप पाएंगे कि संसद में हुई उग्र बहसों और आलोचना से शमिंर्दा होकर नेहरू एक ऐसे युद्ध में जा फंसे जिसके बारे में उन्हें पता था कि हार निश्चित है।
उन्हें शर्मिंदा करने वाले सभी आलोचक विपक्ष के नहीं थे। उनमें से कई तो उनकी पार्टी और यहां तक कि उनके मंत्रिमंडल के साथी थे। सन 1962 के प्रमुख सबकों में से एक यह था कि हमें कहीं अधिक बेहतर, परिपक्व और आपसी विश्वास वाली राजनीति की आवश्यकता है। इस समय जबकि सैन्य बल अपना काम प्रभावी ढंग से कर रहे हैं, हमें एक बार फिर उसी राजनीति की जरूरत है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सरकार ने सोमवार को राज्यसभा को बताया कि इस्पात मंत्रालय ने 2005 से 2022 के बीच कार्बन उत्सर्जन में 15 प्रतिशत तक की कटौती की है एवं 2030 तक इसमें 10 प्रतिशत और कटौती करने का लक्ष्य रखा है।
इस्पात मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान पूरक सवालों के जवाब में यह जानकारी दी। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश बन गया है और पिछले आठ साल में देश की उत्पादन क्षमता दोगुनी हो गई है।
सिंधिया ने कहा कि इस्पात मंत्रालय 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को शून्य बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए अल्पावधि, मध्यावधि और दीर्घावधि के उपाय किए गए हैं। उन्होंने कहा कि अल्पावधि के तहत 2030 तक ऊर्जा एवं संसाधन दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा आदि के उपयोग को बढ़ावा देकर कार्बन उत्सर्जन में कमी पर ध्यान दिया गया है।
इसी प्रकार मध्यावधि में 2030 से 2047 के बीच हरित हाइड्रोजन और कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण पर जोर दिया गया है तथा दीर्घावधि के तहत 2047 से 2070 तक के लिए उपाय किए जाने हैं। उन्होंने कहा कि इस्पात उद्योग में अकार्बनीकरण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न उपाय किये गये हैं।
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