एबीएन सेंट्रल डेस्क। जबरन धर्मांतरण को सुप्रीम कोर्ट ने देश के लिये बड़ी समस्या बताया है। प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद केन्द्र में बैठी मोदी सरकार का यह कर्तव्य बन जाता है कि जबरन धर्मांतरण के खिलाफ वह पूरे देश में एक कानून बनाये।
मंगलवार को जारी कांग्रेस के प्रेस-नोट में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी धर्मांतरण को लेकर देश भर में अफवाह फैलाने और राजनीति करने का काम करती है। लेकिन जब इस मामले में ठोस पहल करने या कानून बनाने की बात आती है तब भाजपा की नीयत में खोट साफ नजर आता है। भारतीय जनता पार्टी धर्मांतरण और सांप्रदायिकता पर सिर्फ राजनीति करना चाहती है। वह नही चाहती इस समस्या का कोई ठोस निदान हो। सुप्रीम कोर्ट धर्मांतरण पर चिंतित है वह देश में धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनने की वकालत कर रही है।
ऐसे में मोदी सरकार इस मामले पहल कर शीघ्र कानून बनाना चाहिए। अलग-अलग राज्य धर्मांतरण के मामले में कानून बना रहे है। लेकिन जब यह समस्या पूरे देश की है तब एक राष्ट्र एक कानून के सिद्धांत का पालन धर्मांतरण में भी होना चाहिये।
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि भाजपा अपने राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में धर्मांतरण को लेकर चिंता व्यक्त करती है, लेकिन अपनी ही केन्द्र सरकार को कानून बनाने के लिके उसने कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया। आरएसएस, भाजपा धर्मांतरण को लेकर ईसाईयों के उपर आरोप लगाती है, लेकिन आरएसएस स्वंय ईसाई समुदाय के लिये क्रिसमस का भोज आयोजित करवाती है। संघ का यह दोहरा चरित्र यह बताने के लिये पर्याप्त है कि संघ के लिये धर्मांतरण और सांप्रदायिकता ऐसा राजनैतिक एजेंडा है जो वह समय-समय पर भाजपा की राजनैतिक जरूरतों के अनुसार बदलती रहती है।
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि छत्तीसगढ़ विशेषकर बस्तर में धर्मांतरण को लेकर जो विवाद की स्थिति उत्पन्न हो रही है उसके पीछे भाजपा का षड़यंत्र और पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की अदूरदर्शिता है। भारतीय जनता पार्टी के 15 सालों में छत्तीसगढ़ धर्मांतरण का केंद्र बन गया था। बस्तर के कुछ क्षेत्रों में जो स्थितियां पैदा हुई है उसके पीछे 15 सालो तक चली गतिविधियां जिम्मेदार है। जिसको रोकने की दिशा में भाजपा की रमन सरकार ने कभी ध्यान नहीं दिया। तब धर्मांतरण की गतिविधियों को संचालित करने वालों का दखल तत्कालीन सीएम हाउस तक था। राज्य सरकार उनके प्रति नर्म सख्त अख्तियार किये हुये थी। 2004 से 2018 तक बस्तर में अधिकांश चर्च बने। भाजपा के नेता मंत्री प्रार्थना सभाओं में शामिल हुआ करते थे। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद 98 प्रतिशत चर्च भाजपा के रमन राज में बने।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पूरे उत्तर भारत में ठंड का कहर जारी है। दिल्ली में मंगलवार सुबह घना कोहरा छाया रहा जिससे दृश्यता घटकर 50 मीटर रह गई और सड़क तथा रेल यातायात प्रभावित हुआ। ऐसे में भारी कोहरे के कारण करीब आज 277 ट्रेनों को रद्द कर दिया है। बता दें कि मौसम विभाग के अनुसार पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार के कई हिस्सों में भीषण ठंड और घने से बहुत घने कोहरे की स्थिति बनी हुई है। अगले 2-3 दिनों तक लोगों को कड़ाके की ठंड का सामना करना पड़ेगा।
वहीं, रेलवे की वेबसाइट के मुताबिक 277 ट्रेनों को पूरी तरह से कैंसिल किया गया है तो वहीं 50 ट्रेनों को आंशिक तौर पर रद्द कर दिया गया है। साथ ही 38 ट्रेनों को रिशेड्यूल किया गया है और 17 ट्रेनों के रूटों में बदलाव किया गया है। रेलवे के मुताबिक, की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, इन ट्रेनों में ज्यादातर ट्रेनों को कोहरे के कारण कैंसिल किया गया है और बाकी के ट्रेनों को परिचालन और मरम्मत कार्य के कारण रद्द किया गया है। वहीं इसके साथ ही खराब मौसम के कारण दिल्ली एयरपोर्ट पर करीब 40 उड़ानें देरी से चल रही हैं। सुबह 7 बजे तक किसी फ्लाइट के डायवर्जन की सूचना नहीं थी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश में पिछले 24 घंटे के दौरान कोरोना वायरस से संक्रमित 121 नये मरीज सामने आये हैं। इस अवधि में 172 लोग स्वस्थ हुए हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मंगलवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में कोरोना वायरस के कुल एक्टिव मामले 2,319 हैं। इसके साथ देश में अबतक 4,41,47,174 लोग कोरोना से स्वस्थ हो चुके हैं।
पिछले 24 घंटे में देशभर में 1.69 लाख नमूनों की जांच की गयी। अबतक कुल 91.23 करोड़ लोगों का कोरोना टेस्ट किया जा चुका है। देश का मौजूदा रिकवरी रेट 98.8 है और दैनिक संक्रमण की दर 0.07 प्रतिशत है। पिछले 24 घंटे में कोरोना वैक्सीन की 56,829 खुराक दी गयी। इसके साथ देश में अबतक कुल 220.14 करोड़ वैक्सीन दी जा चुकी है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश की नदियों में जम रही गाद के कारण सिर्फ बाढ़ का ही खतरा नहीं बढ़ा है, बल्कि इससे बांधों (डैम) की जल संग्रह क्षमता भी प्रभावित हो रही है। संयुक्त राष्ट्र ने इस गंभीर खतरे के प्रति सतर्क करते हुए अपने एक हालिया अध्ययन में दावा किया है कि अगर स्थितियां नहीं सुधरीं, तो वर्ष 2050 तक भारत के 3,700 डैम की जल संग्रह क्षमता 26 फीसदी कम हो जायेगी। केंद्रीय जल आयोग ने वर्ष 2015 में रिपोर्ट दी थी कि देश के 141 बड़े डैमों में से एक चौथाई की कम से कम 30 फीसदी जल संग्रह क्षमता कम हो चुकी है।
गाद के कारण विश्व के 50 हजार से ज्यादा बड़े डैम की जल संग्रह क्षमता 13-19 प्रतिशत कम हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र के जल, पर्यावरण व स्वास्थ्य से संबंधित संस्थान यूएनयू-आइएनडब्ल्यूईएच ने अध्ययन के हवाले से अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि वर्ष 2050 तक 150 देशों के 47,403 बड़े डैम की सम्मिलित जल संग्रह क्षमता 6,316 से घटकर 4,665 अरब घन मीटर रह जायेगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज 17वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के मेजबान शहर मध्यप्रदेश के इंदौर की सांस्कृतिक विरासत की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि इंदौर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि एक दौर है, जो समय से आगे चलता है फिर भी विरासत को समेटे रहता है। मोदी यहां आयोजित 17वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के औपचारिक उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान गुयाना के राष्ट्रपति मोहम्मद इरफान अली, सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी, मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, विदेश मंत्री एस जयशंकर समेत कई अन्य गणमान्य लोग और बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय उपस्थित थे।
मोदी ने प्रवासी भारतीय समुदाय को इंदौर शहर के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में देश में एक अलग पहचान स्थापित की है। खाने पीने के मामले में भी इंदौर पूरी दुनिया में लाजवाब है। इंदौरी नमकीन का स्वाद, यहां का पोहा, साबूदाने की खिचड़ी, कचौड़ी, समोसे, शिकंजी, जिसने इसे देखा उसके मुंह का पानी नहीं रुका और जिसने इन्हें चखा वह कहीं और मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने इसी क्रम में स्ट्रीट फूड के लिए बेहद प्रसिद्ध इंदौर की छप्पन दुकान और सराफा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यही वजह है कि कुछ लोग इंदौर को स्वच्छता के साथ-साथ स्वाद की राजधानी भी कहते हैं। श्री मोदी ने कहा कि इंदौर अपने आप में अद्भुत है। उन्होंने कहा कि लोग कहते हैं कि इंदौर एक शहर है, लेकिन उन्हें लगता है कि इंदौर एक दौर है। यह वह दौर है जो समय से आगे चलता है, फिर भी विरासत को समेटे रहता है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि यह प्रवासी भारतीय सम्मेलन मध्यप्रदेश की उस धरती पर हो रहा है जिसे देश का ह्रदय क्षेत्र कहा जाता है। प्रदेश में मां नर्मदा का जल, यहां के जंगल, आदिवासी परंपरा, यहां का आध्यात्म, ऐसा कितना कुछ है जो यात्रा को अविस्मरणीय बनाएगा। उन्होंने सम्मेलन में आए प्रवासी भारतीयों से इंदौर से सटे उज्जैन स्थित श्री महाकाल लोक और भगवान महाकालेश्वर के दर्शन का भी अनुरोध किया। इस तीन दिवसीय सम्मेलन की शुरूआत कल हुई थी, हालांकि इसका औपचारिक उद्घाटन आज प्रधानमंत्री श्री मोदी ने किया। सम्मेलन का समापन समारोह कल होगा। इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी उपस्थित रहेंगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। हिमाचल प्रदेश में एक बार फिर भूकंप के झटकों से धरती हिली। रविवार आधी रात प्रदेश में भूकंप के झटके महसूस किये गये। मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के मुताबिक भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 2.5 मापी गयी। यह भूकंप मध्यरात्रि 12ः42 बजे आया। इसका केंद्र मंडी जिला के सुंदरनगर के समीप बेयरकोट गांव में जमीन से पांच किलोमीटर की गहराई में था।
आसपास के जिलों में भी तीन से पांच सेकंड तक झटके महसूस किये।
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निदेशक सुदेश मोक्ता ने बताया कि तीव्रता कम होने के कारण भूकंप से कहीं भी नुकसान की रिपोर्ट नहीं है। उल्लेखनीय है कि पिछले 23 दिनों में राज्य के विभिन्न हिस्सों में छह बार भूकंप आया है। 03 जनवरी को सोलन जिला में 2.7 तीव्रता के भूकंप के झटके लगे थे। इससे पहले 31 दिसंबर को मंडी जिला में भी इतनी ही तीव्रता का भूकंप आया था। 26 दिसंबर को कांगड़ा, 21 दिसंबर को लाहौल-स्पीति और 16 दिसंबर को किन्नौर जिला में भूकंप के झटके लग चुके हैं।
गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील जोन चार और पांच में शामिल है। भूविज्ञानी इस पर्वतीय राज्य में शक्तिशाली भूकंप आने की आशंका जता चुके हैं। वर्ष 1905 में कांगड़ा और चम्बा जिलों में आये विनाशकारी भूकंप में 10 हजार से अधिक लोग मारे गये थे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश में महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में काफी बढ़ोतरी नजर आ रही है। वर्ष 2022 में राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने 6,900 मामले दर्ज किए। बढ़ते मामलों को लेकर आयोग बहुत चिंतित है।
बीते साल महिलाओं के खिलाफ अपराधों की विभिन्न श्रेणियों में दर्ज 30,900 मामलों में से 23 फीसदी केस घरेलू हिंसा के हैं। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि आयोग को की गई शिकायतों की संख्या में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है।
कोविड-19 महामारी काल के आंकड़ों पर करीब से नजर डालने से पता चलता है कि महिला अपराध की विभिन्न श्रेणियों में कुल शिकायतों की संख्या 2020 में लगभग 23,700 थी। यह 2021 में 30 फीसदी बढ़कर 30,800 से अधिक हो गई। हालांकि, 2022 में घरेलू हिंसा के मामलों में मामूली बढ़ोतरी दर्ज हुई। बीते साल से 30,900 हो गये।
पिछले साल भी अधिकतम शिकायतें तीन श्रेणियों में दर्ज की गई हैं। इनमें इज्जत के साथ जीने का अधिकार सुरक्षित करने के 31 फीसदी, घरेलू हिंसा के 23 फीसदी और दहेज व विवाहिताओं के उत्पीड़न के 15 फीसदी मामले शामिल हैं।
सर्वाधिक 55 फीसदी यूपी की, दिल्ली दूसरे नंबर पर
वर्ष 2022 में कुल शिकायतों में से 55 फीसदी यूपी से मिलीं। बाद दिल्ली (10%) और महाराष्ट्र की (5%) थीं। 2021 में भी इन्हीं तीन राज्यों से सबसे ज्यादा शिकायतें महिला आयोग को मिली थीं।
जनसुनवाई व हेल्पलाइन के कारण बढ़ी शिकायतों की संख्या
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा का कहना है कि शिकायतों की संख्या बढ़ने की वजह जन सुनवाई के कारण महिलाओं तक संगठन की पहुंच बढ़ना और 24 घंटे की हेल्पलाइन है। आयोग मिलने वाली शिकायतों के समयबद्ध ढंग से निराकरण व कार्रवाई की पहल करता है। आयोग के मौजूदा शिकायत प्रकोष्ठ के अलावा, घरेलू हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं को रिपोर्ट करने और सहायता लेने के लिए जुलाई 2021 में 24x7 हेल्पलाइन 7827170170 सेवा शुरू की गई है।
घरेलू हिंसा रोकने के लिए यह जरूरी
शर्मा का कहना है कि महिला आयोग सोशल मीडिया व अपने प्लेटफॉर्म के माध्यम से महिलाओं को आगे आने, बोलने और अपनी चिंताओं को साझा करने का संदेश देने की कोशिश कर रहा है। इस कारण महिलाएं एनसीडब्ल्यू के ऑनलाइन शिकायत तंत्र का उपयोग कर रही हैं। उन्होंने कहा कि घरेलू हिंसा को रोकने के लिए जागरूकता बढ़ाने, रूढ़िवादिता का विरोध, पितृ प्रधान मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। एनसीडब्ल्यू शिकायतों को हल करने के अलावा जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित करता है। जागरूकता पैदा करने के लिए महिलाओं की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्रीय गृह मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने कर्नाटक में पार्टी के लिए जो चुनाव मैदान तैयार किया है उसमें कुछ गड़बड़ियां हैं। शाह अपने किसी आधिकारिक काम के सिलसिले में बेंगलुरु में थे, लेकिन बाद में एक विशाल राजनीतिक जनसभा को संबोधित करने के लिए ओल्ड मैसूरु क्षेत्र में चले गये।
इस इलाके के राजनीतिक इतिहास पर संक्षेप में नजर डालते हैं। ओल्ड मैसूरु में 11 जिले हैं और 224 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा में वहां से 89 सीट हैं। बेंगलुरु की 28 सीट ओल्ड मैसूरु क्षेत्र में आती हैं। वर्ष 2008 में जब राज्य में भाजपा अपने चरम पर थी तब पार्टी ने इस क्षेत्र से 28 सीट जीतीं। इनमें से 17 सीट बेंगलुरु से और 11 सीट क्षेत्र के अन्य हिस्से से मिली थीं। वर्ष 2018 में भाजपा ने ओल्ड मैसूर की 22 सीट जीत लीं जिनमें 11 सीट बेंगलुरु क्षेत्र से थीं जबकि शेष सीट क्षेत्र के अन्य हिस्से से थीं। गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा ने कभी भी इस क्षेत्र में 11 से अधिक सीट नहीं जीती हैं जहां (बेंगलुरु को छोड़कर) 61 सीट हैं।
कपास और गन्ना के समृद्ध किसानों के प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र की असली ताकत जनता दल सेक्युलर, जद (एस) है, जिसका नेतृत्व वोक्कालिगा नेता देवेगौड़ा का परिवार कर रहा है जो कई दशकों से राज्य की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका में रहे हैं। एकमात्र अपवाद वह संक्षिप्त अवधि थी जब यह मान लिया गया था कि पार्टी टूट गयी है।
वर्ष 2019 में मांड्या जिले के कृष्णराजपेट निर्वाचन क्षेत्र में एक उपचुनाव हुआ जहां भाजपा ने कभी भी इस क्षेत्र के आठ या उससे अधिक विधानसभा क्षेत्रों से कुल मिलाकर 10,000 से अधिक वोट हासिल नहीं किये हैं। जद (एस) के पूर्व विधायक के सी नारायण गौड़ा पूर्ववर्ती जद (एस)-कांग्रेस सत्तारूढ़ गठबंधन के उन 17 विधायकों में से एक थे जिन्होंने राज्य में भाजपा के लिए सरकार बनाने का रास्ता तैयार करने में मदद देने के साथ ही इस्तीफा दे दिया था। वह इस सीट पर चुनाव लड़े और 9,000 वोटों के अंतर से चुनाव जीत गये।
तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के बेटे बीएस विजयेंद्र ने इस चुनाव का व्यापक प्रबंधन किया था। यह क्षेत्र देश में वोक्कालिगा का प्रमुख केंद्र था। बीएस येदियुरप्पा का परिवार लिंगायत समुदाय से ताल्लुक रखता है। पहली बार ऐसा लग रहा था कि विजयेंद्र के नेतृत्व में चलाया गया प्रचार अभियान किसी इलाके में अपनी मजबूत पकड़ बनाने में कामयाब रहा है, जो भाजपा के पक्ष में नहीं था।
पिछले सप्ताह की बात करते हैं। अमित शाह मांड्या गये और देवेगौड़ा परिवार के खिलाफ पूरा दबाव बनाने की कोशिश की। रैली में मौजूद लोगों का कहना है कि अनुवादक ने उनके भाषण की पुनर्व्याख्या की, जिसकी वजह से न केवल शाह के तीखे संबोधन के अनुवाद में कई गलतियां हुईं बल्कि उस अनुवादक ने अपनी ओर से भी कुछ पंक्तियां और नारे जोड़े। शाह को हस्तक्षेप करना पड़ा और कुछ मौकों पर उन्हें सार्वजनिक रूप से फटकार भी लगानी पड़ी।
अनुवादक ने भाषण के तीखे सुर को मद्धम करने की कोशिश शायद जानबूझकर की कि भाजपा को एचडी देवेगौड़ा परिवार की आलोचना उनके गृहनगर में करने पर उसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। लेकिन हर किसी ने शाह को यह कहते हुए सुना कि अगर जद (एस) सत्ता में आती है तब कर्नाटक एक परिवार का एटीएम बनकर रह जायेगा। परिवार ने इस विरोध को भुनाने की कोशिश के तहत देवेगौड़ा के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने जवाब देते हुए कहा कि अमित शाह, एचडी देवेगौड़ा के पैर के नाखूनों के बराबर भी नहीं हैं।
इसके बाद अमित शाह ने भाजपा नेताओं की एक बैठक बुलाई जिसे पार्टी की राज्य इकाई ने आयोजित किया। हालांकि विजयेंद्र को इसमें आमंत्रित नहीं किया गया था। इस बैठक में मौजूद लोगों के अनुसार शाह ने भाजपा नेतृत्व को जोर देते हुए कहा कि राज्य इकाइयां एक साथ मिलकर जल्द से जल्द काम करें।
कर्नाटक पहला बड़ा राज्य होगा जहां अप्रैल महीने में लगभग 100 दिनों की अवधि में चुनाव होंगे। क्या गुजरात मॉडल को वहां लागू किया जायेगा जिसमें पार्टी और सरकार में बड़े बदलाव होंगे? हालांकि इसकी संभावना नहीं दिखती है। राज्य में पार्टी प्रमुख नलिन कतील का कार्यकाल अगस्त में समाप्त हो गया था। उन्हें इस पद से हटाया नहीं गया है। इसके विपरीत, गुजरात में सीआर पाटिल को चुनाव से दो साल पहले पार्टी प्रमुख बनाया गया था। यहां सरकार को सत्ता विरोधी लहर का सामना गंभीर तरीके से करना पड़ रहा है और यह भ्रष्टाचार और अन्य घोटालों के मामले से घिरी हुई है।
बीएस येदियुरप्पा को संसदीय बोर्ड में जगह देकर राज्य से बाहर कर दिया गया था। लेकिन इस वक्त राज्य में ऐसा कोई नजर नहीं आ रहा है जो उनकी जगह लेने में सक्षम दिख रहा हो। इसके अलावा भी अन्य समस्याएं हैं। अमित शाह, गौड़ा परिवार के खिलाफ तब तक लड़ सकते हैं, जब तक कि उनका क्रोध खत्म न हो जाये। तथ्य यह है कि भाजपा के पास एक भी विश्वसनीय वोक्कालिगा नेता नहीं है जिसे वह एक विकल्प के रूप में तैयार कर सके।
अगर वोक्कालिगा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेस के डीके शिव कुमार को जद (एस) के विकल्प के रूप में पेश किया जाता है तब शाह की गौड़ा परिवार की आलोचना करने से कांग्रेस को मदद मिल सकती है! चुनावों की उलटी गिनती शुरू हो गयी है और जनता का मौजूदा मिजाज यह है कि चुनाव के बाद त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनेगी। यहां तक कि भाजपा में भी कोई पार्टी के लिए सामान्य बहुमत की भी बात नहीं कर रहा है।
भाजपा के पास इतिहास रचने और सत्तारूढ़ पार्टी के सत्ता से बाहर होने की परंपरा को खत्म करने का मौका है। आखिरी बार ऐसा 1978 में देवराज अर्स के साथ ऐसा हुआ था। इसके लिए पार्टी को तुरंत कार्रवाई करते हुए कठोर कदम उठाने होंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील कम नहीं हुई है। लेकिन इसका लाभ उठाने के लिए जमीन पर एक मजबूत नेता की आवश्यकता है।
येदियुरप्पा ऐसे नेता हो सकते थे लेकिन उन्होंने घोषणा की है कि वह वर्ष 2023 का चुनाव नहीं लड़ेंगे। पार्टी को जल्द ही राज्य में डबल इंजन वाली सरकार के लिए भी काम करना है। इसके बगैर कर्नाटक चुनाव बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
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