एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत में योगासन को खेल और विज्ञान के रूप में स्थापित करने में जिन व्यक्तित्वों का उल्लेख आदर के साथ किया जाता है, उनमें डॉ. आरती पाल का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
हाल ही में उन्हें अर्जुन पुरस्कार के लिए नामित किया जाना न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष, साधना और उपलब्धियों का सम्मान है, बल्कि भारतीय योगासन खेल की बढ़ती वैश्विक पहचान का भी प्रमाण है। यह प्रथम बार अर्जुन अवार्ड योगासन खेल में डॉ आरती पाल को दिया जाएगा, योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि डॉ.आरती पाल वर्तमान में योगासन भारत (Yogasana Bharat) की जॉइंट सेक्रेटरी के रूप में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
इस पद पर रहते हुए उन्होंने योगासन को एक संगठित, नियमबद्ध और प्रतिस्पर्धात्मक खेल के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके प्रयासों से देशभर में योगासन खिलाड़ियों को एक सशक्त मंच मिला है और युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली है शैक्षणिक क्षेत्र में भी डॉ. आरती पाल की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली है।
वे पतंजलि विश्वविद्यालय, उत्तराखंड में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। यहां वे योग के शास्त्रीय सिद्धांतों को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए विद्यार्थियों को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और नैतिक रूप से भी सशक्त बना रही हैं। उनका मानना है कि योग केवल अभ्यास नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन पद्धति है।
खेल उपलब्धियों की बात करें तो डॉ. आरती पाल ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय योगासन प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई स्वर्ण पदक (गोल्ड मेडल) अपने नाम किए हैं। उनकी यह उपलब्धियां निरंतर अभ्यास, अनुशासन और समर्पण का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन ने भारत की योग परंपरा को विश्व स्तर पर गौरव प्रदान किया है। डॉ. आरती पाल विशेष रूप से महिला खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
उन्होंने यह सिद्ध किया है कि समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर महिलाएं खेल, शिक्षा और प्रशासन तीनों क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं। वे निरंतर कार्यशालाओं, प्रशिक्षण शिविरों और प्रतियोगिताओं के माध्यम से युवाओं को मार्गदर्शन प्रदान कर रही हैं। अर्जुन पुरस्कार के लिए उनका नामांकन निश्चय ही उनके अब तक के योगदान की एक महत्वपूर्ण पहचान है।
यह सम्मान न केवल डॉ. आरती पाल के लिए, बल्कि संपूर्ण योगासन समुदाय के लिए गर्व का विषय है। आने वाले समय में उनसे और भी बड़ी उपलब्धियों की अपेक्षा की जा रही है, जो भारत को योग की वैश्विक राजधानी के रूप में और अधिक सुदृढ़ करेंगी। इस अवसर पर योगासन भारत के समस्त पदाधिकारियों ने उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती (सुशासन दिवस) के अवसर पर पीएम मोदी ने लखनऊ के वसंत कुंज में भव्य राष्ट्र प्रेरणा स्थल का उद्घाटन किया।
लगभग 230 करोड़ रुपये की लागत से बने इस स्मारक को राष्ट्र को समर्पित करते हुए पीएम मोदी ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए अपनी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया। इस दौरान उन्होंने विशेष रूप से अनुच्छेद 370 को हटाये जाने को एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया।
जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि हमारी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की उस दीवार को गिरा दिया है, जिसने दशकों तक विकास और एकता को रोक रखा था।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान के खिलाफ जो बलिदान दिया था, उसे आज के भारत ने सिद्ध कर दिखाया है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता की जीत करार दिया।
कथनी करनी था एक समान
मां भारती के चरणों में
सर्वस्व समर्पण ध्येय अरमान ,
हम रहें या न रहें
तेरा वैभव अमर रहे मां
थी यही उनकी पहचान
अटल जी कहा करते थे
हे प्रभु इतनी ऊंचाई
न देना मुझे कि गैरों को
गले लगा न सकूं ,
जमीन पर रहने वालों से
आंखें अपनी मिला न सकूं
सरकारें एक जैसी होती है
सत्ता का चरित्र समान होता है
सत्ताधारी का अपना
विशेष अरमान होता है ,
यह अलग बात है कि
चरित्र बदलने का
हम प्रयास कर रहे हैं
राजनीति तो माध्यम है
राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हो
ऐसा अभ्यास कर रहे हैं
दूसरों पर हंसना और बात है
खुद पर हंसना बड़ी बात है
हास्य-रस शक्ति देता है
जूझने का बल देता है ,
कभी-कभी वीर रस
जो काम नहीं कर पाता
चुटकी भर हास्य से
जीवन बादल जाता है
नव चेतना निकल आता है
हम आज के वर्तमान हैं
अटल जी का विशाल व्यक्तित्व
कार्यकर्ताओं के सम्मान हैं
वह हैं हमारे प्रेरणा स्रोत ,
हमारा हर एक कार्य
अटलजी के आदर्श से
है समर्पित ओत-प्रोत..
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुशासन के शाश्वत आदर्श, सहज, सहृद, चेतना/भावना/संवेदना के प्रतिमूर्ति, सहज उपलब्ध, हमारे प्रेरणा व्यक्तित्व, पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर उन्हें नमन।
मित्रों को सुशासन दिवस की हृदयतल से बधाई..! सामान्य कार्यकर्ता, स्वयंसेवक, जननेता, राजनेता से राष्ट्रनेता तक की उनकी गरिमा मयी यात्रा अभिनंदनीय है।
भारत माता के सेवा के यज्ञ में उन्होंने अपना सर्वस्व आहुति स्वरूप समर्पित किया। आपका संपूर्ण जीवन यात्रा वंदनीय एवं प्रेरणा का स्रोत है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रेमानंद महाराज आम जन से लेकर बड़ी-बड़ी सेलिब्रिटी तक के लोकप्रिय संत माने जाते हैं। उनसे मिलने के लिए कई भक्त आश्रम पहुंचते हैं तो कई लोगों को उनकी रात में होने वाली पदयात्रा का इंतजार बेसब्री से होता है।
अब प्रेमानंद महाराज की झलक पाने के लिए भक्तों को रात का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, उनकी पदयात्रा का समय अब बदल गया है। अगर आप भी प्रेमानंद महाराज के दर्शन के लिए उनकी पदयात्रा में शामिल होना चाहते हैं तो नया समय यहां जान लें।
प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा अब रात को 2 बजे नहीं बल्कि शाम 5 बजे निकलेगी। ऐसे में इस बदले हुए समय से श्रद्धालुओं को आसानी होगी। प्रेमानंद महाराज की पदयात्रा वृंदावन स्थित श्रीकृष्ण शरणम् फ्लैट से शुरू होकर श्री राधा केलिकुंज आश्रम तक निकलती है। यह पदयात्रा करीब दो किलोमीटर की होती है। इस दौरान असंख्य भक्त उनकी एक झलक पाने के लिए लंबी कतार लगाए खड़े रहते हैं।
संत प्रेमानंद का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे है। प्रेमानंद जी के परिवार में भक्तिभाव का माहौल था और इसी का प्रभाव उनके जीवन पर भी पड़ा। प्रेमानंद जी महाराज संन्यासी बनने के लिए घर का त्याग कर वाराणसी आ गये और यहीं अपना जीवन बिताने लगे।
प्रेमानंद जी महाराज ने दस वर्षों से भी अधिक समय तक अपने गुरु सद्गुरु देव की सेवा की। अपने गुरु देव और श्री वृंदावन धाम के दिव्य आशीर्वाद से वे शीघ्र ही पूर्णत: सहचरी भाव में खो गये और श्री राधा के चरण कमलों में उनकी अटूट भक्ति विकसित हो गयी और वह श्री राधा रानी की दिव्य शक्ति के अंश बन गये।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। बुनियादी ढांचे से जुड़े खर्च को एक बार फिर से आर्थिक विकास के इंजन के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि इसका गुणक प्रभाव बहुत अधिक होता है। सीधे शब्दों में कहें तो बुनियादी ढांचे में लगाया गया प्रत्येक एक रुपया अर्थव्यवस्था में लगभग 3 रुपये की वृद्धि करता है। यह आंकड़ा अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि बुनियादी ढांचे के लिए सार्वजनिक पूंजीगत व्यय क्यों इतना महत्त्वपूर्ण है।
पिछले बजट में बुनियादी ढांचे के खर्च को थोड़ा कमतर आंकने का जो रुझान दिखा अब उसे बदलने की सख्त जरूरत है। यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि मौजूदा माहौल में निजी निवेशक अब भी नये-नये बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में हाथ डालने से हिचकिचा रहे हैं। बुनियादी ढांचे पर कितना खर्च करना है, इसका एक स्थापित वृहद अर्थव्यवस्था से जुड़ा ढांचा है।
हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य यह है कि बुनियादी ढांचे में सकल पूंजी निर्माण (जीसीएफआई) वास्तव में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 7 फीसदी होना चाहिए। इस 7 फीसदी में से सामान्यत: लगभग 3.5 फीसदी केंद्रीय बजट से आता है, जबकि बाकी 3.5 फीसदी राज्य, निजी पूंजी और ईबीआर (अतिरिक्त बजटीय संसाधन जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी शामिल हैं) से आता है। इस ढांचे का इस्तेमाल करते हुए देखें तो आगामी बजट में बुनियादी ढांचे का कुल खर्च 14 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए।
विकास के अगले चरण के लिए निजी भागीदारी को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) तंत्र को फिर से आक्रामक रूप से सक्रिय बनाना होगा। वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) के तहत पीपीपी इकाई को अब केवल कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर बेहद आवश्यक सामाजिक बुनियादी ढांचे से जुड़े जमीनी स्तर पर परिणाम दिखाने होंगे।
उन्हें स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, पर्यटन, आवास, स्वच्छता, जल, कौशल विकास, डिजिटल परियोजनाएं और कृषि-बुनियादी ढांचे जैसे जरूरी सामाजिक क्षेत्र के लिए सक्षम ढांचा तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए। सरकार की भूमिका क्षेत्र विशेष के मॉडल रियायती समझौते तैयार करने और व्यवहार्यता फंडिंग अंतर (वीजीएफ) जैसे जोखिम कम करने वाले तंत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
राज्यों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और उन्हें पिछले बजट में घोषित इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट डेवलपमेंट फंड (आईआईपीडीएफ) से सहयोग लेना चाहिए। निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए कर नीति में भी सुधार की आवश्यकता है। मध्यम आकार की निजी बुनियादी ढांचा कंपनियों के पास 20-30 विशेष उद्देश्य वाली इकाइयां (एसपीवी) होती हैं जबकि बड़े खिलाड़ियों के पास 50 से अधिक हो सकते हैं।
एक समूह कराधान व्यवस्था बने जो फर्मों को समूह के स्वामित्व वाले एसपीवी में लाभ और हानि को मिलाने की अनुमति दे तो इससे नकद प्रवाह स्थिर होगा, ऋण प्रोफाइल मजबूत होगी और उधार लेने की लागत कम होगी। यह लंबे समय से चली आ रही एक तर्कसंगत मांग है। आने वाले वर्षों के लिए एक महत्त्वपूर्ण पहलू शहर-स्तर के बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करना है।
इसमें गतिशीलता के लिए सड़कें आदि, जल और जल-निकासी तंत्र, जलवायु के अनुकूल बुनियादी ढांचा और किफायती आवास शामिल हैं। पिछले केंद्रीय बजट में घोषित अर्बन चैलेंज फंड (यूसीएफ) एक बेहतरीन कदम है और अब इसे जमीन पर कार्रवाई दिखानी चाहिए। इसके अलावा, शहरों में बढ़ते ट्रैफिक जाम को देख केंद्र सरकार को तब तक किसी भी शहरी परिवहन परियोजना की फंडिंग बंद कर देनी चाहिए जब तक कि संबंधित शहर अनिवार्य एकीकृत महानगरीय परिवहन प्राधिकरण (यूएमटीए) को पूरी तरह से लागू नहीं कर देता।
जब सरकार के निवेश से किसी जगह जमीन की कीमत बढ़ती है तब उस बढ़े हुए मुनाफे का कुछ हिस्सा सरकार को वापस मिलना चाहिए यानी लैंड वैल्यू कैप्चर (एलवीसी) को फंडिंग का एक नियमित साधन बनाया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करेगा कि बुनियादी ढांचे की फंडिंग का कुछ हिस्सा सुधार शुल्क, विकास अधिकार या कॉरिडोर वैल्यू कैप्चर जैसे साधनों से आये।
बहुत लंबे समय से, सार्वजनिक खर्च से बढ़ती जमीन की कीमतों का लाभ सिर्फ कुछ चुनिंदा दलालों, अफसरशाहों और राजनेताओं के हाथ में जाने दिया गया है जिसे रोकना होगा। हाई-स्पीड रेल (एचएसआर) के लिए रेलवे से अलग बजट होना आवश्यक है। यह बुनियादी ढांचे का एक नया वर्ग है जिसे पारंपरिक रेलवे ढांचे के भीतर प्रबंधित नहीं किया जा सकता।
एचएसआर को अपनी तकनीक, मार्ग योजना और भूमि अधिग्रहण के लिए एक अलग दृष्टिकोण की आवश्यकता है, साथ ही लंबी अवधि की वित्तीय प्रतिबद्धता भी चाहिए। यह क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को तेज कर सकता है और मझोले तथा छोटे शहरों को प्रमुख आर्थिक केंद्रों से जोड़ सकता है, और विकास के नए गलियारों को खोल सकता है।
अब एचएसआर को पारंपरिक सड़कों और राजमार्गों के क्षेत्र की जगह सबसे अधिक सार्वजनिक फंडिंग प्राप्त करने वाला क्षेत्र बनना चाहिए। इसे पारंपरिक रेलवे खर्च से अलग आवंटन मिलना चाहिए, साथ ही पारंपरिक रेलवे बोर्ड से अलग एक आधुनिक संस्थागत प्रणाली को बढ़ावा देना चाहिए। बुनियादी ढांचे की उपयुक्त परिभाषा को भी अद्यतन करना महत्त्वपूर्ण है। कई क्षेत्र बुनियादी ढांचा घोषित होने की होड़ में हैं।
बुनियादी ढांचे का वर्गीकरण वाहक को स्वीकारता है न कि सामग्री को। उदाहरण के तौर पर एक बंदरगाह बुनियादी ढांचा माना जाता है, जबकि जहाज नहीं (और निश्चित रूप से जहाज निर्माण भी नहीं जिसे हाल ही में बुनियादी ढांचे का दर्जा दिया गया है)।
डीईए के पास अनुमोदित बुनियादी ढांचा क्षेत्रों की सूची का संशोधन लंबे समय से लंबित है और इसे तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है। नये, पेशेवर रूप से सही क्षेत्रों को जोड़ने से निश्चित रूप से विकास को बढ़ावा मिलेगा। वर्ष 2026-27 के बजट को एक बार फिर यह संकेत देना चाहिए कि बुनियादी ढांचा भारतीय विकास मॉडल की सर्वोच्च प्राथमिकता बना हुआ है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। जबलपुर में रविवार को संत रामपाल जी महाराज के पावन सानिध्य में एलईडी टीवी के माध्यम से एक दिवसीय भव्य सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर हरियाणा के हिसार जिले के गांव डाया में आयोजित किसान रत्न सम्मान समारोह का लाइव प्रसारण श्रद्धालुओं को दिखाया गया।
21 दिसंबर 2025 को भारतीय किसान यूनियन की ओर से संत रामपाल जी महाराज को भव्य किसान रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। इससे पूर्व भी उन्हें किसान मसीहा, किसान रक्षक, धनाना रत्न सहित समाज सेवा से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। संत जी के मार्गदर्शन में अब तक 400 से अधिक बाढ़-प्रभावित गांवों में जल निकासी के लिए मोटर, पाइप सहित हर आवश्यक वस्तु पहुंचाई जा चुकी है, जिससे किसानों को बड़ा लाभ मिला है।
सत्संग के दौरान बताया गया कि संत रामपाल जी महाराज का विश्व कल्याण मिशन समानता, भाईचारे और सच्ची भक्ति का संदेश देता है। वे दहेज प्रथा, नशा, मांसाहार और अन्य सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क (ग्वालियर)। 21 दिसंबर 2025 को हिसार जिले के डाया गांव में भारतीय किसान यूनियन द्वारा किसानों के मसीहा कहे जाने वाले संत रामपाल जी महाराज जी को किसान रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया।
इस सम्मान समारोह का लाइव प्रसारण ग्वालियर जिले की भीतरवार तहसील स्थित कृष्णा मैरिज गार्डन में आयोजित एक दिवसीय विशाल जिला स्तरीय सत्संग में प्रोजेक्टर के माध्यम से किया गया। यह कार्यक्रम संत रामपाल जी महाराज जी के पावन सान्निध्य में संपन्न हुआ, जिसमें दूर-दराज क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुँचकर आयोजन की शोभा बढ़ाई।
सत्संग के दौरान संत रामपाल जी महाराज जी ने आए हुए श्रद्धालुओं को शास्त्रानुकूल भक्ति का ज्ञान कराया और यह भी बताया कि भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिल सकता। जितना जिसकी किस्मत में लिखा है, उतना ही मिलेगा। भले ही इंसान बुराइयों का सहारा लेकर रिश्वत ले और अपने कर्म खराब करे, सब व्यर्थ ही रहेगा। संत रामपाल जी महाराज जी ने सत्संग में कबीर साहेब जी की वाणी का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया -
अर्थात व्यक्ति के भाग्य में जो लिखा है, उसे कोई घटा या बढ़ा नहीं सकता। लेकिन पूर्ण सतगुरु की शरण में आकर साधक जब पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी की भक्ति करता है, तो परमात्मा अपने साधक के भाग्य में आने वाले दुखों को नष्ट कर देते हैं। सत्संग समापन के पश्चात भारतीय किसान यूनियन सहित 100 गांवों और 22 खाप पंचायतों द्वारा संत रामपाल जी महाराज जी को किसान रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर उपस्थित किसान यूनियन के अध्यक्ष चौधरी दिलबार सिंह हुड्डा सहित कई महान हस्तियों ने संत रामपाल जी महाराज जी के जनकल्याणकारी कार्यों की सराहना करते हुए गीतों, कविताओं और अपने शब्दों के माध्यम से आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं का अनुशासन विशेष रूप से सराहनीय रहा।
सभी श्रद्धालु सुव्यवस्थित ढंग से एक क्रम में बैठकर शांतिपूर्वक सत्संग श्रवण करते नजर आए। आयोजन स्थल पर स्वच्छता की उचित व्यवस्था रही और किसी भी प्रकार की भगदड़ या अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। कई लोगों ने संत जी के ज्ञान से प्रभावित होकर नाम दीक्षा ग्रहण की और अपने जीवन को नई दिशा प्रदान की।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse