वन और पर्यावरण

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Published / 2022-03-17 17:40:43
रांची का तापमान 34° पार, जानें होली के दिन कैसा रहेगा मौसम...

टीम एबीएन, रांची। राजधानी रांची में मौसम ने अब धीरे-धीरे अपना रुख बदलना शुरू कर दिया है। अधिकतम तापमान में बढ़ोतरी के कारण लोगों को अब गर्मी का एहसास होने लगा है। 15 मार्च तक अधिकतम तापमान 34 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया है। होली के दिन मौसम की बात करें तो 18 मार्च को मौसम साफ रहेगा। वहीं, 19 मार्च को आसमान में कहीं-कहीं पर आंशिक बादल छाए रहेंगे। पिछले 24 घंटे में झारखंड में मौसम शुष्क रहा। उच्चतम तापमान 38.5 डिग्री सेल्सियस गोड्डा में रिकॉर्ड किया है, जबकि न्यूनतम तापमान गढ़वा में 18.6 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया। राज्य में अगले दो-तीन दिनों के दौरान अधिकतम तापमान में 2 से 3 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। मौसम विज्ञान केंद्र रांची के अनुसार 2020 में कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन के कारण मौसम काफी अच्छा देखने को मिला था। अधिकतम जगह तापमान नॉर्मल देखने को मिला था। झारखंड के मौसम वैज्ञानिक ने फिलहाल तापमान में बढ़ोतरी और बदलाव को ग्रीन हाउस इफेक्ट को माना है। मौसम वैज्ञानिक अभिषेक आनंद ने बताया कि पिछले 7 वर्षों में 15 मार्च तक राजधानी रांची का अधिकतम तापमान कई बार 34 डिग्री सेल्सियस से ऊपर गया है, इससे मौसम के बदलाव को समझा जा सकता है। उन्होंने बताया कि 2016 में 15 मार्च तक 2 बार 34 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया, 2017 में एक बार, 2018 में दो बार, 2019 में एक बार, जबकि 2020 में मौसम बिल्कुल सामान्य था। 2021 में 5 बार 34 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान रिकॉर्ड किया गया, वहीं, 2022 में 15 मार्च तक सिर्फ एक बार 34 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान रिकॉर्ड किया गया है। मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार अभी जो तापमान में बढ़ोतरी हुई है वह सामान्य है। बीच में कई बार बारिश के कारण तापमान में गिरावट भी आई है।

Published / 2022-03-16 16:26:41
बंगाल की खाड़ी में बन रहे दबाव से अगले हफ्ते आ सकता है चक्रवात "आसनी"

एबीएन सेंट्रल डेस्क। दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर के ऊपर बना कम दबाव का एक क्षेत्र अगले सप्ताह की शुरुआत में एक चक्रवात में बदलने की उम्मीद है और ऐसा पूर्वानुमान है कि यह बांग्लादेश और उससे सटे उत्तरी म्यांमार की ओर बढ़ सकता है। मौसम कार्यालय ने बुधवार को यह जानकारी दी। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने कहा कि मंगलवार को बने निम्न दबाव का क्षेत्र (एलपीए) के पूर्व-उत्तरपूर्व की ओर बढ़ने और शनिवार तक पूरी तरह से एलपीए बनने की उम्मीद थी। विभाग ने कहा कि बाद में यह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की ओर बढ़ने से पहले कम दबाव का क्षेत्र में बदल गया। मौसम प्रणाली के 21 मार्च को एक चक्रवाती तूफान में बदलने और 22 मार्च तक उत्तर-उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ने का अनुमान है। जब यह चक्रवात में बदल जाता है, तो इसका नाम "आसनी" रखा जाएगा, जो कि श्रीलंका द्वारा सुझाया गया एक नाम है। मौसम कार्यालय ने कहा, इसके बाद, यह उत्तर-उत्तरपूर्व की ओर बढ़ेगा और 23 मार्च की सुबह तक बांग्लादेश और उससे सटे उत्तरी म्यांमा तट के पास पहुंच जाएगा। बृहस्पतिवार और शुक्रवार को दक्षिण-पूर्वी बंगाल की खाड़ी और उससे सटे दक्षिण अंडमान सागर पर स्थिति खराब होने की आशंका है। मौसम कार्यालय ने मछुआरों को सलाह दी है कि वे बुधवार को दक्षिण बंगाल की खाड़ी और उससे सटे भूमध्यरेखीय हिंद महासागर के मध्य भागों में और बृहस्पतिवार तथा शुक्रवार को दक्षिण-पूर्वी बंगाल की खाड़ी और अंडमान तटीय क्षेत्र में न जाएं। कार्यालय ने मछुआरों को शनिवार और मंगलवार के बीच अंडमान सागर और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर नहीं जाने की सलाह दी है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में रविवार को तेज हवाएं चलने का अनुमान है।

Published / 2022-03-02 08:13:46
झारखंड : उत्तरी भाग में बने साइक्लोनिक सरकुलेशन से बारिश की आशंका

टीम एबीएन, रांची। झारखंड के मौसम में उतार-चढ़ाव लगातार देखने को मिल रहा है। राज्य में एक बार फिर मौसम में बदलाव देखा जा सकता है। इसका कारण ओडिशा का साइक्लोनिक सरकुलेशन है। रांची मौसम विज्ञान केंद्र ने संभावना जताई है कि ओडिशा के उत्तरी भाग में बने साइक्लोनिक सरकुलेशन का असर झारखंड में देखने को मिल सकता है। रांची मौसम विज्ञान केंद्र के मौसम वैज्ञानिक अभिषेक आनंद के अनुसार मार्च में झारखंड के दक्षिणी और मध्य भाग में गर्जन और वज्रपात के साथ बारिश के आसार हैं। वहीं, 2 मार्च को झारखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के कुछ स्थानों पर भी गरज के साथ बारिश का अनुमान है।

Published / 2022-02-27 16:58:59
30-40 किमी रफ्तार की हवा को देख मौसम विभाग अलर्ट

टीम एबीएन, रांची। फरवरी माह की आखिरी सप्ताह में सूर्य का तेवर तीखा हो जाता है और लोगों को गर्मी का एहसास होने लगता है, लेकिन इस साल मौसम का मिजाज बदला सा है। प्रत्येक दो तीन दिनों में हल्की बारिश रही है, जिससे ठंड बढ़ जाती है। रविवार की सुबह से रांची के ऊपर आसमान में काले बादल छाए हुए हैं और 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से ठंडी हवाएं चल रही है। रांची मौसम विज्ञान केंद्र के मुताबिक राज्य के कई इलाकों में वज्रपात की संभावना है। वज्रपात की आशंका को देखते हुए मौसम विभाग ने अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग के अनुसार पाकुड़, साहिबगंज, देवघर, दुमका, गोड्डा, गढ़वा, गिरिडीह, कोडरमा और लातेहार जिले के कुछ हिस्सों में गर्जन के साथ हल्के से मध्यम दर्जे की बारिश होगी। इसके साथ ही वज्रपात भी गिरने की आशंका है। बारिश के दौरान 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से हवा चलने की संभावना है। मौसम विभाग के अनुसार हवाओं का पैटर्न लगातार बदल रहा है। कभी दक्षिणी पश्चिमी तो कभी उत्तर पूर्वी होने से ठंडक बनी हुई है। मौसम वैज्ञानिकों ने बताया कि फरवरी की आखिरी सप्ताह में पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव लगभग थम जाता है। इससे तापमान बढ़ने लगता है। लेकिन इस साल पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव लगातार बना हुआ है। उन्होंने कहा कि मौसम विज्ञान केंद्र की ओर सतर्क और सावधान रहने को लेकर दिशा निर्देश जारी किया गया है। उन्होंने कहा कि बारिश के दौरान सुरक्षित स्थानों पर रहे और पेड़ के नीचे या बिजली के खंभे के नीचे नहीं रहें।

Published / 2022-02-21 15:13:13
2022 में कैसा रहेगा मॉनसून, कितनी होगी बारिश...

एबीएन सेंट्रल डेस्क। इस साल मॉनसून कैसा रहने वाला है? मॉनसून में इस बार कितनी बारिश होगी? खरीफ की फसलों के लिए मॉनसून ठीक रहेगा या नहीं? मौसम विशेषज्ञों ने मॉनसून 2022 का पूवार्नुमान लगाते हुए इन सब सवालों पर जानकारी दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस साल मॉनसून सामान्य रहने के संकेत कर रहा है। विशेषज्ञों ने संभावना जताई है कि शुरूआती मॉनसून अच्छा रहेगा, जिसमें अच्छी बारिश देखने को मिलेगी। किसानों को इससे फायदा पहुंचेगा। उनकी फसलों के लिए यह बारिश बेहद उपयोगी होगी। मौसम पूवार्नुमान एजेंसी स्काईमेट ने दी जानकारी : निजी मौसम पूवार्नुमान एजेंसी स्काईमेट (रह्य८ेी३) ने साल 2022 के लिए प्रारंभिक मॉनसून पूवार्नुमान मार्गदर्शन को जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि इस साल मॉनसून सामान्य रहेगा। एजेंसी के वॉइस प्रेसीडेंस और मौसम वैज्ञानिक डॉ. पालावत ने एक न्यूज वेबसाइट से कहा कि जलवायु पैटर्न ला नीना नीनो धीरे-धीरे कम हो रहा है और तटस्थ स्थिति में जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि इसका असर मॉनसून पर नेगेटिव नहीं पड़ेगा। पिछले दो मॉनसून अच्छे रहे हैं। उन्होंने बताया कि मॉनसून की शुरूआत में हमें अच्छी बारिश देखने को मिलेगी, हालांकि अगस्त और सितंबर मध्य में कम बारिश देखने को मिल सकती है, लेकिन कुछ मिलाकर मॉनसून सामान्य रहने की संभावना है। मॉनसून को लेकर किसानों के चेहरे में नहीं होगी मायूसी : उन्होंने कहा कि अगर बारिश की शुरूआत समय पर होती है तो यह मॉनसून किसानों और उनकी फसलों के लिए अनुकूल हो सकता है। शुरूआती मॉनसून बेहतर ही रहेगा। ला नीना कमजोर ही रहेगा और फसलों को लेकर किसानों के लिए मायूसी नहीं रहेगी। वह कहते हैं कि स्काईमेट अप्रैल महीने में मॉनसून 2022 की संभावनाओं पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी करेगा। मौसम वैज्ञानिक ने कहा, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान की नकारात्मक स्थितियां कमजोर हो रही हैं। प्रशांत महासागर की यह स्थितियां, खराब मॉनसून की संभावना नहीं बनाती हैं लेकिन तटस्थ सीमाओं के भीतर सामान्य या अधिक वर्षा का कारण नहीं बन सकती है।

Published / 2022-02-04 15:05:52
फल-सब्जियों की खेती कर आय बढ़ा सकते हैं किसान : कृषि वैज्ञानिक

मेदिनीनगर। आजादी के अमृत महोत्सव के तहत कृषि सहकारिता, किसान कल्याण विभाग एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से पाटन प्रखंड के सतउआ गांव में किसान गोष्ठी सह प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया गया। गोष्ठी की शुरूआत कृषि अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिक प्रमोद कुमार ने की। मौके पर श्री कुमार ने कहा कि पाटन की ज्यादातर भूमि बलुई-दोमट है। यहां अन्य प्रखंडों की तुलना में सिंचाई के लिए आसानी से जल भी उपलब्ध है। यहां के कृषक फल एवं सब्जियों की खेती कर अपनी आय पांच से छह गुणा बढ़ा सकते हैं। किसान गोष्ठी के बाद सभी कृषकों को आत्मा पलामू के द्वारा कृषक के खेतों में लगे चना की फसल का भ्रमण कराया गया। साथ ही उन्हें इसकी खेती की विस्तार पूवर्क जानकारी दी गयी। प्रखंड कृषि पदाधिकारी असफाक अहमद ने जिला में कृषि विभाग की ओर से किसानों के लिए चलाई जा रही योजनाओं की जानकारी देते हुए इसका लाभ लेने की बातें कही। पाटन प्रखंड के एटीएम विनय कुमार ने कृषकों की आय बढ़ाने तथा प्रखंड क्षेत्र में स्वीट कॉर्न का प्रत्यक्षण कराने की बातें कही। मौके पर किसान मित्र अजय मेहता, सहित अनिरूद्ध महतो, प्रमोद सिंह, संतोष तिवारी, रामजन्म सिंह, प्रखंड कृषक सलाहकार समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र साहु, जैवित पाण्डेय, मुरारी पाण्डेय, अजय पाण्डेय, अशोक पाण्डेय, बच्चु यादव, देवन्द्र प्रसाद के अलावा गांव के अन्य कृषक उपस्थित थे।

Published / 2022-02-04 10:53:00
सीएम हेमन्त ने शुरू की राज्य के धरोहर बचाने की तैयारी

टीम एबीएन, रांची। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में झारखंड राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक हुई। यह बोर्ड की 14वीं बैठक थी। जिसमें मुख्यमंत्री ने वन विभाग के अधिकारियों के साथ समीक्षा करते हुए कई महत्त्वपूर्ण दिशा निर्देश दिए। बैठक में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अधिकारियों के साथ कुल 9 एजेंडों पर चर्चा की। जिसमें 5 एजेंडे स्वीकार किए गए। स्वीकृत किये गये एजेंडो में साहिबगंज के फॉसिल पार्क को बेहतर बनाना, हाथी कॉरिडोर पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई। बैठक में चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि साहिबगंज में पाए जाने वाले फॉसिल पदार्थ को संरक्षित करें क्योंकि फॉसिल सिर्फ पत्थर नहीं इतिहास के पन्ने हैं। इसका सम्मान करें। वहीं मुख्यमंत्री ने वन्यजीव को सुरक्षित रखने के लिए भी अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि वन विभाग हाथी कॉरिडोर पर विशेष ध्यान दें। हाथियों के कॉरिडोर से गुजरने वाली सड़कों के किनारे दीवार या लोहे का ऊंचा बैरियर लगा दिया जाता है। जिस वजह से हाथियों को आवागमन में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके लिए अंडरपास का निर्माण बेहतर ढंग से करवाया जाए ताकि वन क्षेत्र में हाथी आजादी से विचरण कर सकें। वहीं वन्यजीवों के संरक्षण के लिए सड़क निर्माण में भी बदलाव लाने का दिशा-निर्देश मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वन विभाग के अधिकारियों को दिया। ताकि जंगल के बगल से गुजरने वाले नेशनल हाईवे या स्टेट हाईवे पर चलने वाले वाहनों से वन्यजीवों को परेशानी ना हो। इस बैठक में मुख्य सचिव सुखदेव सिंह, अपर मुख्य सचिवएल खियांगते, डीजीपी नीरज सिन्हा, वन विभाग के अधिकारी राजीव रंजन, एडीजी प्रशांत कुमार सहित वन विभाग के कई वरिष्ठ पदाधिकारी एवं वन्य जीव संरक्षण के लिए कार्य करने वाले गैर सरकारी संगठन के सदस्य व अन्य मौजूद रहे।

Published / 2022-02-03 14:43:58
शरीर में गुर्दे के जैसी है धरती के पर्यावरण में नम या आर्द्र भूमि की अहमियत...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (वेंकटेश दत्ता)। भारत रामसर सम्मेलन और जैविक विविधता के सम्मेलन, दोनों का हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन हैरानी की बात यह कि आर्द्र भूमि के संरक्षण के लिए कोई स्पष्ट नियामक ढांचा नहीं है। हालांकि कुछ राज्यों में आर्द्र भूमि विकास प्राधिकरण बनाए तो गए हैं, लेकिन ये भी अन्य परंपरागत कानूनों के अधीन ही हैं। पर्यावरण विज्ञानियों के सामने इस वक्त एक बड़ी चिंता आर्द्र भूमि (वेटलैंड) के संरक्षण को लेकर उभरी है। धरती के पर्यावरण में नम या आर्द्र भूमि की अहमियत वैसे ही है जैसे शरीर में गुर्दे की। नम भूमि ही धरती के भीतर मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आर्द्र भूमि जैव विविधता से लेकर मीठे पानी के जलाशयों, कार्बन अवशोषण और आजीविका का भीबड़ा स्रोत मानी जाती है। ऐसे में यदि आर्द्र भूमि खत्म होती जाएगी तो धरती पर नए तरह का संकट खड़ा हो जाएगा। भारत में आर्द्र भूमि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 4.7 फीसद है। जाहिर है, यह काफी कम है और इसलिए इसका संरक्षण कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है। वैसे दुनियाभर में आर्द्र भूमि पर संकट गहराता जा रहा है। इसलिए इसे बचाने के लिए पहली बार दो फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में वैश्विक सम्मेलन बुलाया गया था और दुनियाभर में फैली आर्द्र भूमि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी गई थी। अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की लगभग दो हजार चार सौ आर्द्रभूमियों में से सैंतालीस भारत में हैं और उन्हें रामसर स्थल कहा जाता है। ये विश्व स्तर पर प्रमुख संरक्षित स्थलों में से हैं। ईस्ट कलकत्ता आर्द्र भूमि, पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर के पूर्व में स्थित प्राकृतिक और मानव निर्मित आर्द्र भूमि का एक बड़ा परिसर है जो एक सौ पच्चीस वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहां कृषि क्षेत्र, सीवेज फार्म और कई तालाब हैं। इस आर्द्र भूमि का उपयोग कोलकाता के सीवेज शोधन के लिए भी किया जाता है, और अपशिष्ट जल में निहित पोषक तत्व मछलियों की आबादी और कृषि को बनाए रखता है। इसी तरह नौ रामसर स्थलों के साथ उत्तर प्रदेश देश में ऐसी आर्द्र भूमि वाला दूसरा बड़ा राज्य है। उत्तर प्रदेश में गंगा नदी क्षेत्र का एक अद्वितीय और विशाल पारिस्थितिक तंत्र है जो पौधों और जानवरों की समृद्ध विविधता को बरकरार रखता है। इसमें तालाबों, झीलों और आर्द्र भूमि का एक बड़ा क्षेत्र है। मछलियों की जैव विविधता में उत्तर प्रदेश का योगदान 14.11 फीसद का का है, और इनमें से बहुत से इन आर्द्र भूमि से आते हैं। उत्तर प्रदेश में गंगा के बाढ़ के मैदान का लगभग पांच फीसद हिस्सा आर्द्र भूमि से ढका है। बृजघाट से नरोरा तक ऊपरी गंगा नदी भी एक रामसर स्थल है। हैदरपुर आर्द्र भूमि क्षेत्र भारत में सबसे नया रामसर स्थल है जिसे दिसंबर 2021 में ही इस शृखंला में जोड़ा गया था। यह भूमि क्षेत्र मध्य गंगा बैराज के साथ गंगा नदी के बाढ़ के मैदानों पर बिजनौर जिले में 6908 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। इस वर्ष विश्व आर्द्र भूमि दिवस की विषयवस्तु ह्यलोगों और प्रकृति के लिए आर्द्र भूमिह्ण है। यह वैश्विक आह्वान दुनिया भर में आर्द्र भूमि को बचाने के लिए किया गया है। इसरो ने उपग्रह से प्राप्त चित्रों से इसका एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण भी किया है। इसके अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 27181 आर्द्र भूमि क्षेत्र हैं जो लगभग 63,525 हेक्टेयर क्षेत्र बनाते हैं। इनमें से लगभग चालीस फीसद आर्द्र भूमि क्षेत्र सौ हेक्टेयर से अधिक आकार के हैं। अकेले हरदोई जिले में दो हजार से अधिक आर्द्र भूमि क्षेत्र हैं। तटीय इलाकों में नमी क्षेत्र और बैकवाटर मैंग्रोव के जंगलों का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है जहां लोग भोजन, ईंधन, चारा और आवास के लिए इन पर निर्भर हैं। पारंपरिक मछुआरे आज भी अपनी स्थायी आजीविका के लिए पूरी तरह से मछली और शंख जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। शहरीकरण, प्रदूषण, अतिक्रमण और गहन कृषि के कारण भू-उपयोग में बदलाव के कारण भारत में आर्द्र जमीन का अस्तित्व खतरे में है। ऐसे कई भू क्षेत्र अपनी पुरानी पहचान खो चुके हैं और उन्हें बदलते परिवेश के अनुसार विकास का दंश झेलना पड़ा है। लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र के कार्य में उनकी मुख्य भूमिका को बदला नहीं जा सकता है। इसलिए मौजूदा जल निकायों की रक्षा करने और आर्द्र भूमि क्षेत्रों को बचाने के लिए उचित संरक्षण रणनीति और सशक्त प्रबंधन योजना बनाने की जरूरत है। तेजी से हो रहे शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण आर्द्र भूमि का लगातार क्षरण हो रहा है। सिर्फ पिछले एक दशक में हम लगभग तीस फीसद भूमि खो चुके है। उत्तर प्रदेश में ही रायबरेली, हरदोई, लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर और बहराइच जिलों में हजारों एकड़ आर्द्र भूमि है। अकेले रायबरेली ने 1972 से लगभग नवासी फीसद आर्द्र भूमि खो दी है। लखनऊ ने पिछले पांच दशकों में लगभग सत्तर फीसद आर्द्र भूमि खो दी है। गहन सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन आर्द्र भूमि के खत्म होने का कारण बन रहा है। इसके अलावा गन्ना, धान और गेहूं जैसी जल-गहन फसलों के साथ आर्द्र भूमि को कृषि क्षेत्रों में परिवर्तित करना भी है। नहरों और सड़कों के अवैज्ञानिक निर्माण के कारण कई आर्द्र भूमि खंड मानचित्र से गायब हो चुके हैं। आर्द्र भूमि के संरक्षण के लिए भारत में कोई मजबूत नियामक ढांचा नहीं है। इस समस्या को अभी भी अलग-थलग करके देखा जा रहा है। जल संसाधन प्रबंधन और विकास योजनाओं में शायद ही इसका उल्लेख किया जाता है। ऐसे संवेदनशील पारिस्थितिकीय तंत्रों के प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी पर्यावरण और वन मंत्रालय के हाथों में है। हालांकि भारत रामसर सम्मेलन और जैविक विविधता के सम्मेलन दोनों का हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन हैरानी की बात यह कि आर्द्र भूमि के संरक्षण के लिए कोई स्पष्ट नियामक ढांचा नहीं है। हालांकि कुछ राज्यों में आर्द्र भूमि विकास प्राधिकरण बनाए तो गए हैं, लेकिन ये भी अन्य परंपरागत कानूनों के अधीन ही हैं। इस वक्त आर्द्र भूमि को आर्द्र भूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत संरक्षित किया जाता है। आर्द्र भूमि को बचाने की दिशा में पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कदम इसके भूमि दस्तावेज को सुरक्षित करना है। उपग्रह चित्रों और ड्रोन कैमरों का उपयोग करके इनका दस्तावेज बनाया जाना चाहिए। आर्द्र भूमि का जल-प्रसार क्षेत्र मौसम के अनुसार बदलता रहता है। मानसून के समय जल-प्रसार का मापन कर उसे राजस्व रिकार्ड में दर्ज कर देना चाहिए। मानसून के बाद से ग्रीष्मकाल तक आर्द्रभूमि के जल प्रसार क्षेत्र में उल्लेखनीय कमी पाई जाती है जिसका फायदा उठा कर लोग अतिक्रमण करते हैं। मानसून के बाद फैले जल का परिसीमन करके भू-राजस्व अभिलेखों को ठीक से बनाए रखा जाना चाहिए। तालाबों, झीलों और आर्द्र भूमि के पुनरुद्धार के लिए कार्य योजना का निर्माण वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए, न कि तदर्थ उपायों पर। सिंचाई की बेहतर तकनीकों को अपना कर भूजल पर दबाव कम किया जा सकता है। इसके अलावा किसानों को मोटा अनाज उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है, जिसमें बहुत अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है। पर्यावरण संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक समग्र वैज्ञानिक, तकनीकी और सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण की जरूरत होती है। इसमें जनभागीदारी और सहयोग जरूरी है। कई मामलों में स्थानीय समुदायों की उपेक्षा भी ऐसे संकट को बढ़ाती है। आर्द्र भूमि के तट पर रहने वाले समुदाय स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हैं क्योंकि अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए वे पारिस्थितिक तंत्रों पर ही निर्भर हैं। ऐसे में पारिस्थितिकी तंत्र का प्रभावी प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गया है।

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