एबीएन सेंट्रल डेस्क। मई में चली हीट वेव ने गर्मी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं। वैज्ञानिकों के एक समूह ने जलवायु की समीक्षा के बाद बताया कि भारत में मई में चली हीट वेव अबतक की सबसे गर्म हीट वेव से भी डेढ़ डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रही।
क्लाइमामीटर के समीक्षों ने बताया कि मई में भारत में जो भीषण हीटवेव चली, वह अल नीनो प्रभाव, मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का असामान्य रूप से गर्म होने और ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के चलते हीटवेव और गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है।
वैज्ञानिकों ने साल 1979-2001 और साल 2001-2023 के बीच के तापमान की तुलना की। इस तुलना के आधार पर वैज्ञानिकों ने बताया कि देश में जो सबसे गर्म हीटवेव दर्ज की गयी थी, मई में चली हीटवेव उससे भी डेढ़ डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रही। वैज्ञानिकों ने पाया कि अब भारत में हीटवेव इंसानी सहनशीलता से ज्यादा होती जा रही है और इसकी वजह जीवाश्म इंधन का ज्यादा इस्तेमाल है।
फ्रेंच नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च के डेविडे फ्रांडा ने बताया कि भारत में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच गया है और इसका कोई तकनीकी समाधान नजर नहीं आ रहा है। हमें कार्बन डाइ आॅक्साइड के उत्सर्जन को कम करने की कोशिश करनी चाहिए।
सिंगापुर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में हीटवेव और ज्यादा खतरनाक होंगी। दुनिया का तापमान बढ़ने की वजह अल-नीनो प्रभाव के साथ ही मानव जनित जलवायु परिवर्तन है। उत्तर पश्चिम भारत के कई हिस्सों और मध्य भारत में लू का प्रकोप मई में ज्यादा खतरनाक रहा। कई राज्यों में हीटवेव के चलते लोगों की मौत हुई। देश में लोकसभा चुनाव के दौरान कम मतदान प्रतिशत की वजह भी भयंकर गर्मी और लू को माना जा रहा है।
साथ ही देश के 150 बड़े जलाश्यों में पानी घटकर सिर्फ 22 प्रतिशत रह गया है। ऊर्जा की खपत बढ़ने से भी कई राज्यों में बिजली कटौती की समस्या से लोग परेशान हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में 25 हजार के करीब हीट स्ट्रोक के मामले सामने आए, जिनमें 56 लोगों की मौत गर्मी से संबंधित बीमारियों से हुई। इनमें से 46 मौतें अकेले मई में हुईं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। विश्व पर्यावरण दिवस हर वर्ष 5 जून को आयोजित किया जाता है। पर्यावरण हमारे जीने का मुख्य आधार है तथा इसका संरक्षण हम सभी का परम कर्तव्य है। पर्यावरण का अर्थ संपूर्ण प्राकृतिक परिवेश से है, जिसमें हम रहते हैं इसमें हमारे चारों ओर के सभी जीवित और निर्जीव तत्व शामिल होते हैं। जैसे की हवा, पानी, मिट्टी, पेड़-पौधे, जानवर और अन्य जीव- जंतु है पर्यावरण के घटक परस्पर एक दूसरे के साथ जुड़कर एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं।
हालांकि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और मानव जीवन शैली के लिए उनके गलत उपयोग से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। दूषित पर्यावरण इन घटकों को प्रभावित करता है, जो जीवन जीने के लिए आवश्यक है। ऐसे में पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने प्रकृति और पर्यावरण का महत्व समझाने के उद्देश्य से हर साल विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं। इस दिवस को मनाने के पीछे का उद्देश्य पूरी दुनिया के लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना है।
इस संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय दिवस में 150 से अधिक देशों के लोग भाग लेते हैं। स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित पृथ्वी बनाने के लिए तरह-तरह के जागरुकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं और लोगों को पर्यावरण का महत्व समझाया जाता है। मौके पर प्रदूषण से लेकर कई ऐसे विषयों पर चर्चा की जाती हैं जो कि पर्यावरण के लिए हानिकारक है। इस अवसर पर लोगों को पेड़-पौधे लगाने के लिए भी प्रेरित किया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने साल 1972 में विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत की थी। इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1972 में मानव पर्यावरण पर स्टॉकहोम सम्मेलन में की गयी थी। पहला विश्व पर्यावरण दिवस एक साल बाद 5 जून 1973 को मनाया गया था। सम्मेलन ने पर्यावरणीय मुद्दों को उजागर करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की शुरूआत का संकेत दिया। इस साल समारोह की 51वीं वर्षगांठ है।
इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस 2024 की थीम हरित भविष्य की यात्रा है, जो हमारे ग्रह की रक्षा करने और सभी के लिए अधिक टिकाऊ भविष्य सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सामूहिक प्रयास पर आधारित है इस विषय को चुनने के पीछे का कारण यह है कि आज का समय में पृथ्वी को बचाने का एकमात्र उपाय वनों को बचाना ही है। विश्व पर्यावरण दिवस पर्यावरण को समर्पित दिन है।
यह दिन पर्यावरण के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है, जो व्यक्तिगत, समुदाय और वैश्विक स्तर पर लोगों को प्रोत्साहित कर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारियों के बारे में भी जागरूक किया जाता है। लोगों को पर्यावरण के लिए संकट बन चुके जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई, प्रदूषण, बायोडायवर्सिटी लॉस जैसे मुद्दों पर चिंतन कर इन्हें बचाने की मुहिम के तौर पर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। उक्त जानकारी झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन एवं पवित्रम सेवा परिवार के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
टीम एबीएन, रांची। अघोर पथ नागरिक मंच ने वृक्ष लगा कर मनाया विश्व पर्यावरण दिवस। रांची सहर मे बढ़ती तापमान और पर्यावरण असंतुलन के मद्देनजर अघोर पथ (रांची बड़ा तालाब, पश्चिम) के मुहल्ले वासियों ने वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित कर पीपल, मोहगनी, कोईनार, गुलमोहर और कंडेल के पोधे लगाए। कुछ महीने पहले चीनी मिट्टी कारखाना, अघोर पथ मे पुराने पीपल के वृक्ष को जला कर मार दिया गया था, जिससे सभी दुखी थे। इसके भरपाई के लिए उस स्थान मे पुनः पीपल का वृक्ष लगाया गया। इस अवसर मे वृक्षारोपण कर पर्यावरण संरक्षण के लिए सभी को प्रेरित किया गया। उपस्थित सभी लोगों ने इस वर्ष वर्षा ऋतु मे ज्यादा से ज्यादा वृक्षारोपण करने करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम को सफल बनाने मे विक्रम शाहदेव, ब्रिज नंदन प्रसाद, राजेश शाहू, राजू गुप्ता, मनोज ओराव, नागदमनि शाहदेव, अमित कश्यप, मुहल्ले एवं आंचल शिशु आश्रम के बच्चे, संतोष ओराव के साथ अन्य जागरूक नागरिक उपस्थित थे। सभी के सहयोग से कार्यक्रम को सफलता पूर्वक आयोजित किया गया।
एबीएन न्यूज नेटवर्क, मेदिनीनगर। पांकी थाना के सोरठ गांव में एक कुआं में पानी पीने उतरने के दौरान डूबने से करीब 40 बंदरों की मौत हो गयी। इतनी अधिक संख्या में बंदरों की मौत के जिम्मेवार वन विभाग के अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई की जाय। उक्त बातें आजसू के केंद्रीय सचिव सतीश कुमार ने कही।
उन्होंने कहा कि जब वन विभाग के पदाधिकारी के संज्ञान में है कि पलामू में हिट बेव जारी है, तो जानवर के लिए पानी की व्यवस्था क्यों नहीं की गयी? सरकार गर्मी में जानवर को पानी पिलाने के लिए राशि आवंटित करती है। जिसका वारा न्यारा वन विभाग और प्रशासनिक अधिकारी कर लेते हैं। वन्य जीव संरक्षण कानून की धज्जियां उड़ायी जा रही है। झारखंड में वन विभाग की जिम्मेवारी मुख्यमंत्री की है।
सरकारी संरक्षण में जंगल की अंधाधुंध कटाई भी इस वन्य जीवों की हत्या का जिम्मेवार हैं। जल जंगल जमीन पर जनता का अधिकार हो, ये नारा तकिया कलाम बन कर रह गया है। हिट वेव से मरने वाले चमगादड़ और बंदर की मौत की जांच-पड़ताल कर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाये।
टीम एबीएन, रांची। राजधानी के लोगों को भीषण गर्मी से राहत मिली है। शनिवार को रांची का अधिकतम तापमान 38 डिग्री के आसपास रहा। इस दौरान आसपास के कई इलाकों में हल्की बारिश हुई। जहां बारिश नहीं भी हुई तो वहां भी बादल छाये रहे।
मौसम विज्ञान केंद्र के मुताबिक अगले दो से तीन घंटे में संताल परगना व गुमला के कुछ इलाकों में बारिश के साथ मध्यम दर्जे की मेघ गर्जन व वज्रपात की संभावना जतायी गयी है। मौसम विभाग का कहना है कि साइक्लोनिक डिप्रेशन का असर अब कमजोर पड़ गया है।
हालांकि एक मानसून ट्रफ है, जो कि यूपी और बिहार होते हुए पार हो रहा है। इसका असर राज्य के कई इलाकों में देखने को मिला है। जिसके कारण रांची के आसपास के कई इलाकों में हल्की बारिश हुई। बारिश होने से राजधानी वासियों ने राहत की सांस ली।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश के कई राज्यों में भीषण गर्मी ने लोगों का हाल बेहाल कर रखा है। हालांकि, बुधवार को दिल्ली-एनसीआर समेत पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में बारिश के होने से मौसम ने अचानक से करवट ली। अब दक्षिण पश्चिम मानसून ने गुरुवार को पूर्वानुमान से एक दिन पहले ही केरल और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में दस्तक दे दी।
मौसम वैज्ञानिकों ने कहा कि चक्रवात ने मानसून के प्रवाह को बंगाल की खाड़ी की ओर खींच लिया, जो पूर्वोत्तर में समय से पहले मानसून के दस्तक देने का एक कारण हो सकता है। चक्रवाती तूफान रेमल रविवार को पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के तट से टकराया था। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने कहा कि दक्षिण-पश्चिम मानसून केरल में दस्तक दे चुका है और आज यानी 30 मई 2024 को पूर्वोत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों की ओर बढ़ गया है।
इससे पहले 15 मई को मौसम विभाग ने मानसून के 31 मई को केरल में दस्तक देने की घोषणा की थी। केरल में पिछले कुछ दिनों से भारी बारिश हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप मई में अतिरिक्त बारिश दर्ज की गयी है। केरल में मानसून के आगमन की सामान्य तिथि एक जून और अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नगालैंड, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर व असम में मानसून के दस्तक देने की तिथि 5 जून है।
आईएमडी के लेटेस्ट अपडेट के मुताबिक, 24 घंटों में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, सिक्किम और पूर्वोत्तर में मध्यम से भारी बारिश होने की संभावना है। इसके अलावा, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक के कुछ हिस्सों, तमिलनाडु और गोवा में हल्की बारिश होने का संभावना है। इसके अलावा, राजस्थान के लोगों को भी बारिश के होने से इस भीषण गर्मी से कुछ राहत मिल सकती है।
दिल्ली में गुरुवार को न्यूनतम तापमान 30.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। आईएमडी ने दिन में हल्की बारिश होने और धूल भरी आंधी चलने का अनुमान भी जताया है। दिल्ली के प्राथमिक मौसम केंद्र सफदरजंग वेधशाला में बुधवार को अधिकतम तापमान 46.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो 79 वर्षों में सबसे अधिक है। दिल्ली में 17 जून 1945 को तापमान 46.7 डिग्री सेल्सियस था। मौसम विभाग ने आज आंशिक रूप से बादल छाए रहने, लू चलने, धूल भरी आंधी या तूफान आने और तेज हवाओं के साथ बहुत हल्की बारिश होने की संभावना जतायी है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड की राजधानी रांची के मौसम वैज्ञानिक अभिषेक आनंद ने कहा कि इसी दिन यानी 1 जून को राज्य के उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी भागों में कहीं-कहीं गरज और तेज हवाओं के साथ वज्रपात होने की संभावना है।
शनिवार एवं रविवार यानी 2 और 3 जून को भी झारखंड के उत्तर-पूर्वी तथा दक्षिणी भागों में कहीं-कहीं गरज के साथ बारिश हो सकती है। इस दौरान तेज हवाएं चलेंगी। कुछ जगहों पर वज्रपात भी हो सकता है। झारखंड के 24 में से 18 जिलों में लोग लू का प्रकोप झेल रहे हैं। इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों पर भी इसका असर दिखने लगा है।
बृहस्पतिवार (30 मई) को सूबे में 7 लोगों की मौत हो गयी। सबसे ज्यादा 4 लोगों की मौत पलामू में हुई। गिरिडीह में एक बिरहोर की, तो सरायकेला में 2 लोगों की गर्मी से मौत हो गयी। गिरिडीह जिले में सैकड़ों चमगादड़ मर गये हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। मानसून शब्द अरबी शब्द मौसिम से आया है, जिसका अर्थ है मौसम। अक्सर जब लोग मानसून के बारे में सोचते हैं, तो कई दिनों और हफ्तों तक होने वाली भारी बारिश का ख्याल करते हैं। जबकि असल में बरसात जो है वो मानसून का हिस्सा भर है। मानसून महज बरसात से कहीं अलग है। मासनूस अपने आप में हमारे वातावरण की एक पूरी प्रक्रिया या घटना है।
ये बिलकुल भी जरूरी नहीं कि मानसून बरसात ही लाए, कई बार ये शुष्क मौसम का कारण बन सकता है। तो मानसून है क्या और ये घटना आखिर घटित कैसे होती है। इसका जवाब है कि मानसून हवा की दिशा में बदलाव के कारण होता है जो मौसम बदलने पर होता है। कम शब्दों में मानसून हवाओं का बदलाव है, जो अक्सर बहुत ज्यादा बरसात वाले मौसम या बहुत शुष्क मौसम का कारण बनता है। हालांकि मानसून आमतौर पर एशिया के कुछ हिस्सों से जुड़ा होता है, यह कई उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी हो सकता है- जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका के कई हिस्से भी शामिल हैं।
मानसून हवाओं में मौसमी बदलाव के कारण होता है। अब हवाओं में बदलाव क्यों होता है। तो जब मौसम बदलने के कारण जमीन और जल का तापमान बदलता है, तो इसका सीधा असर हवांओं पर होता है और वे हवाएं अपना रुख बदल लेती हैं। इसे ऐसे समझें जब गर्मियों की शुरुआत होती है तो जमीन जल स्रोतों यानी वॉटर बॉडीज से पहले और जल्दी गर्म होती है। और मानसूनी हवाएं हमेशा ठंडी से गर्म की ओर बहती हैं। गर्मियों में जब जमीन ज्यादा गर्म होती है तो ये मानसूनी हवाएं इस क्षेत्र की ओर आती हैं और इधर बरसात करती हैं।
अभी तक आपने समझा कि मानसून असल में क्या है। अब नक्शे पर इसका मलबत समझते हैं। मानसून उन हवाओं को कहा जाता है जो हिंद महासागर और अरब सागर की ओर से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर आती हैं। ये भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों में भारी वर्षा का कारण बनती हैं। इन्हें मौसमी हवाएं भी कहा जा सकता है।
जैसा कि हमने आपको बताया हिन्द महासागर एवं अरब सागर की ओर से आनी वाली मौसमी हवाएं मानसून हैं, जिनके साथ दक्षिणी एशिया क्षेत्र में बरसात आती है। भारत में मानसून दक्षिण-पश्चिम तट पर जून माह में आता है। सितंबर तक इसका असर देखने को मिलता है। कुल मिलकार जून से शुरू हुआ इन मौसमी हवाओं का प्रभाव चार महीने तक रहता है।
बीते कुछ सालों से अप्रैल-मई के महीने में भी भारी बरसात देखी जा रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इसका कारण क्लाइमेट चेंज है। वहीं वेस्टर्न डिस्टरबेंस भी इसके पीछे के कारण बने। बीते कुछ सालों से अप्रैल महीने में वेस्टर्न डिस्टरबेंस देखने को मिल रहा है। जिसके चलते ये बिना मानसून की बरसात देखी गई। इस बरसात के पीछे का कारण होती हैं वेस्टर्न डिस्टरबेंस से बनने वाली चक्रवाती हवाएं न कि मौसमी बदलाव।
मौसम विभाग द्वारा जारी साल 2024 के माससून को लेकर जारी पूर्वानुमान के मुताबिक इस साल करीब 106 फीसदी बारिश की संभावना है। हालांकि इसमें 5 फीसदी कम ज्यादा हो सकता है। मौसम विभाग के मुताबिक इस साल मानसून 1 जून से भारत में प्रवेश कर सकता है। यह केरल में 1 जून, कर्नाटक, असम, त्रिपुरा और गोवा में 5 जून, तेलंगाना, सिक्किम और महाराष्ट्र में 10 जून, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और गुजरात के कुछ हिस्सों में 15 जून के आसपास दस्तकद दे सकता है। वहीं लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में 20 जून तक प्रवेश कर सकता है।
मौसम विभाग के मुताबिक साल 2024 में बेहतर मानसून की संभावना के पीछे अल नीनो प्रभाव है, जो धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। इससे अगस्त-सितंबर के बीच ला नीना की स्थिति पैदा हो सकती है, जिसका अर्थ यह लगाया गया है कि इस वजह से बारिश सामान्य से अधिक हो सकती है।
देखिये चर्चा जो चला वो कहां तक आ पहुंचा। हमने मानसून जाना, फिर समझा कि मानसून आता कैसे है साल 2024 में मानसून कब आयेगा। इसके साथ ही हमें पता चला कि इस साल ला नीना की स्थिति के चलते बारिश सामान्य से ज्यादा हो सकती है। अब समझते हैं कि ये अल-नीनो और ला-नीना क्या हैं।
जैसा कि हमने आपको बताया- मानसून मौसम बदलने से हवा के रूख में होने वाला बदलाव है। आमतौर पर हवाएं भूमध्य रेखा के साथ पश्चिम की ओर बहती हैं, जो समुद्र के गर्म पानी को दक्षिण अमेरिका से एशिया की ओर ले जाती हैं। अब गर्म पानी को ठंडा करने के लिए समुंद्र के नीचे का पानी ऊपरी सतह पर आता है। इससे दो विपरीज जलवायु पैटर्न अल-नीनो और ला-नीना बनते हैं।
अल-नीनो क्या है: जब यह हवा मजबूत होती है, तो दक्षिण अमेरिका से ज्यादा गर्म पानी एशिया की तरफ आता है। यह अल-नीनो की स्थिति है। जिससे वातावरण में एक कूलिंग प्रभाव पैदा होता है।
ला नीना क्या है : वहीं, जब यह हवाएं कमजोर होती हैं, तो एशिया की लाया जाने वाला गर्म पानी कम मात्रा में इधर आता है। तो समुद्र की गहरायी का ठंडा पानी ऊपर नहीं आता। इससे वातावरण में गर्म प्रभाव पैदा होता है। जिसे ला नीना के नाम से जाना जाता है।ला नीना होने पर ज्यादा बरसात होती है।
हमने आपको मानसून की तो पूरी जानकारी दी। और आपको यह भी पता चला कि मानसून इस बार पूरे जोर पर होगा और बरसात अधिक होने की संभावना है। मानसून सुनते ही ज्यादातर लोग खुशी से झूम उठते हैं। और साल 2024 में गर्मी ने जो बदमाशी की हुई है उसके बाद तो हर कोई मानसून के ही इंतजार में है।
लेकिन मानसून की शुरूआत अपने साथ लाती है ढेर सारी बीमारियां और कई तरह के संक्रमण। जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे पैदा कर सकते हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि अगर आप मानसून में कुछ बुनियादी सावधानियां बरतते हैं तो सेहतमंद रह सकते हैं। भारत में मानसून के दौरान होने वाले रोग मुख्यत: तीन तहर से फैलते या होते हैं। पहले मच्छर जनित रोग, दूसरे दूषित पानी, हवा और भोजन से हाने वाले रोग, तीसरे संक्रामक रोग।
मानसून मच्छरों के पनने के लिए सबसे अच्छा मौसम या वक्त है। और भारत में मच्छर और मच्छर से होने वाले रोग बड़ी समस्या हैं। डेंगू और मलेरिया जैसे रोग भारत में बेहद आम हो जाते हैं मानसून के दौरान। एक अनुमान के अनुसार भारत में हर साल पूरी दुनिया में सामने आए डेंगू के मामलों का 35 फीसदी तो मलेरिया के मामलों का 11 फीसदी होता है।
डेंगू: डेंगू का वायरस एडेनोस मच्छर के काटने से फैलता है। भले डेंगू जंगल की आग की तरह फैल रहा है, लेकिन यह संक्रामक बीमारी नहीं है। यह छूने या छींकने से नहीं फैलता है, लेकिन संक्रमित व्यक्ति के आसपास रहने पर सावधान रहना चाहिए। आमतौर पर वायरल सर्दी से अन्य वायरस और कीटाणु शरीर को संक्रमित कर सकते हैं।
चिकनगुनिया: चिकनगुनिया का वायरस कुछ दिनों तक बुखार और जोड़ों के दर्द का कारण बनता है जो हफ्तों या महीनों तक रह सकता है। चिकनगुनिया एक वायरल फीवर है जो संक्रमित मच्छरों के काटने से होता है। चिकनगुनिया वायरस इनफेक्टेड मच्छर जब किसी व्यक्ति को काट लेता है तो यह वायरस उस व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है। चिकनगुनिया के संक्रमण होने पर अचानक बुखार और जोड़ों में दर्द की समस्या हो सकती है।
मलेरिया: मलेरिया एक जानलेवा मच्छर जनित रक्त रोग है। लक्षणों में बुखार, ठंड लगना और सिरदर्द शामिल हैं। यह परजीवी संक्रमित मच्छरों के काटने से मनुष्यों में फैलता है।
जहां मच्छरों का प्रकोप ज्यादा हो वहां आने जाने से बचें। मच्छर से बचने के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें। मच्छर या कीड़े भगाने वाली क्रीम का उपयोग करें। घर और उसके आसपास पानी इकट्ठा न होने देंलंबी स्लीव्स की शर्ट और पैंट पहनें। घर के अंदर और बाहर मच्छरों को कंट्रोल करने के लिए जरूरी कदम उठाएं। स्वच्छता बनाए रखें और अपने बाथरूम को नियमित रूप से साफ करेंमच्छरों से खुद के बचाव के लिए मच्छरदानी का इस्तेमाल करें। मच्छर मारने या भगाने वाली दवा का छिड़काव करें। खूब सारा पानी पिएं और खुद को हाइड्रेटेड रखें।
हैजा: हैजा भी आंत का ही एक गंभीर संक्रमण है। हैजा विब्रियो कॉलेरी नाम के जीवाणु से होता है। यह छोटी आंत में बैक्टीरिया द्वारा के पहुंच जाने पर होता है। इसमें दस्त, उल्टी हो सकते हैं।
हेपेटाइटिस ए : हेपेटाइटिस ए मानसून में होने वाले वायरल संक्रमणों में से एक है। यह भी आपके लिवर को प्रभावित करता है। यह लिवर में भयंकर सूजन का कारण बन सकता है।
टाइफाइड: टाइफाइड बुखार एक बैक्टीरियल इन्फेक्शन है। यह दूषित पानी या खाने की वजह से होता है। टाइफाइड में पाचन तंत्र प्रभावित होता है। यह आंतों के रास्ते को प्रभावित करता है। यही वहज है इसे आंतों का बुखार भी कहा जाता है। अगर यह रक्तप्रवाह में फैल जाए तो जानलेवा हो सकता है।
पीलिया : दूषित भोजन और पानी से पीलिया हो सकता है। पीलिया सबसे आम लिवर डिसआर्डर में से एक है जिसमें हमारे ब्लड फ्लो में बिलीरुबिन का लेवल बढ़ जाता है। बिलीरुबिन एक पीले रंग का तरल पदार्थ होता है जो की पित्त (बाइल) में पाया जाता है। यह रेड ब्लड सेल्स के टूटने से और बोन मैरो सेल से बनता है।
लेप्टोस्पायरोसिस : मानसून के दौरान गंदे पानी के कारण यह होता है। इसे वैलस डिजीज के नाम से भी जाना जाता है।
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण : गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण बैक्टीरिया, वायरल या परजीवी से हो सकता है। इसके लक्षणों में दस्त, पेट में ऐंठन और मतली शामिल हो सकते हैं।
सर्दी और फ्लू: जैसा कि हमने बताया मानसून हवा में होने वाला मौसमी बदलाव है। इस दौरान हवा से फैलने वाले कई संक्रमण बढ़ जाते हैं। जो सर्दी, खांसी, सामान्य फ्लू, वायरल बुखार जैसी समस्याओं का कारण बनते हैं। इस दौरान कमजोर इम्यूनिटी वाले लोग जैसे बच्चे और बुजुर्ग ज्यादा प्रभावित होते हैं। इस दौरान सामान्यत: सर्दी और फ्लू और इन्फ्लुएंजा होते हैं।
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