वन और पर्यावरण

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Published / 2022-01-18 14:53:33
कम पानी खर्च कर दोगुना मुनाफा कमा खुशहाल बन रहे उद्यमी किसान

टीम एबीएन, रांची। झारखंड में हमेशा से परंपरागत तरीके से खेती करने वाली रांची के ओरमांझी की रहने वाली महिला किसान सुनीता देवी ने नहीं सोचा था कि सिंचाई के तरीके में बदलाव लाने से उत्पादन में बहुत फर्क आयेगा और पानी की भी समस्या नहीं रहेगी। सुनीता ने सिंचाई की कठिनाई को टपक सिंचाई से दूर करते हुए दूसरे किसानों के लिए एक मिसाल पेश की है। आज सुनीता ग्रामीण विकास विभाग अंतर्गत झारखंड स्टेट लाईवलीहुड प्रमोशन सोसाईटी के तहत झारखंड बागवानी सघनीकरण टपक सिंचाई परियोजना से जुड़कर टपक सिंचाई से खेती शुरू कर अच्छी आमदनी कर रही हैं। सुनीता कहती हैं, टपक सिंचाई योजना से उनकी जिंदगी में काफी बदलाव आ गया। हमारे पास सिंचाई के लिए सिर्फ कुआं था, जो अक्सर सूख जाता था। जिस कारण हम सिंचाई के लिए पूरी तरह बारिश पर ही आश्रित थे। लेकिन, अब ड्रिप के लग जाने के बाद खेती करना काफी आसान हो गया है। आज एक साथ कई तरह की फसल की खेती कर सालाना 1.5 लाख तक की आमदनी कर लेती हूं। सुनीता की ही तरह झारखण्ड बागवानी सघनीकरण टपक सिंचाई परियोजना ने राज्य की हजारों महिला किसानों के जीवन में बदलाव की नई कहानी लिखी है। पश्चिमी सिंहभूम के तांतनगर प्रखण्ड के चिरची गांव निवासी संकरी परंपरागत तरीके से खेती कर सालाना 20-25 हजार रुपये अर्जित करती थी, अब वह टपक सिंचाई परियोजना से जुड़कर सालाना 80-90 हजार रुपए का मुनाफा कमा रही हैं । राज्य के 9 जिलों के 30 प्रखण्ड में इस परियोजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है। अब तक पूरे राज्य में करीब 11800 किसान सूक्ष्म टपक सिंचाई एवं अन्य सुविधाओं को लेकर अच्छे उत्पादन से ज्यादा कमाई कर उद्यमिता के पथ पर हैं। अबतक इस परियोजना से जुड़ने के लिए करीब 23 हजार किसानों का पंजीकरण किया जा चुका है। राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में किसानों को सुविधाओं से लैस करना है, ताकि झारखण्ड के कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी उन्हें सिंचाई समेत किसी प्रकार की दिक्कत ना हो। इसी कड़ी में राज्य के किसानों को टपक सिंचाई के जरिए कम पानी में बेहतर फसल उपजाने के लिए प्रशिक्षण एवं सुविधा मुहैया करायी जा रही है। जिसका उद्देश्य राज्य के कृषकों को स्थायी एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि के जरिए सब्जी उत्पादन में बढ़ोतरी दर्ज करवाना है। सरकार अपने उद्देश्य में सफल भी हो रही है, जिससे हजारों कृषक जो पहले साल में एक फसल पर निर्भर रहते थे, अब साल में तीन-चार फसल उपजाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं।

Published / 2022-01-11 17:20:52
कचरा उत्पादन पूरी तरह खत्म करना ही बचाव और जमीनी हकीकत

एबीएन डेस्क (सुनीता नारायण)। भारत अपने यहां कचरे से निपटने के लिए तेजी से नीतियां तैयार कर रहा है। कचरा यानी घरों, संस्थानों और कारखानों में चीजों के इस्तेमाल से निकलने वाला अवशिष्ट। अब इसका प्रभाव हमारी गतिविधियों पर भी नजर आना चाहिए। हमारे कचरे को ऐसा संसाधन बनना चाहिए जिस पर दोबारा काम हो, दोबारा इस्तेमाल हो और जिसका पुनर्चक्रण हो सके। ऐसा करने से हमारी दुनिया में वस्तुओं का इस्तेमाल कम हो सकेगा और पर्यावरण को पहुंचने वाले नुकसान पर भी नियंत्रण किया जा सकेगा। यह उपाय सबके लिए लाभदायक है। हमें पता है कि जैसे-जैसे हमारे समाज अमीर और शहरी होते जाते हैं वैसे-वैसे ठोस कचरे की प्रकृति भी बदलती जाती है। जैविक अपघटन लायक कचरे के बजाय आम परिवार प्लास्टिक, कागज, धातु तथा अन्य ऐसे कचरे ज्यादा निकालते हैं जो पर्यावरण के अनुकूल नहीं होते। प्रति व्यक्ति आधार पर उत्पादित कचरे की मात्रा भी बढ़ती है। देश के शहरी इलाकों में से कई में पहले ही कचरे का उत्पादन बहुत अधिक बढ़ चुका है। सन 2000 में जब पहली बार नगर निकायों के लिए ठोस कचरे से संबंधित नियम अधिसूचित किए गए तब वे इस विचार पर आधारित थे कि कचरे को संग्रहीत किया जाए, वाहन से ले जाया जाए और किसी दूरवर्ती सुरक्षित जगह पर निपटाया जाए। इसका लक्ष्य यह था कि हम कचरे को अपने आसपास से हटाकर अपने शहरों को साफ रखें। परंतु यह नीति व्यावहारिक स्तर पर नाकाम रही और हमारे शहरों में कचरे का ढेर एकत्रित होता गया। नगर निकायों की क्षमता में कमी की वजह से जो कचरा इकठ्ठा करके दूर नहीं ले जाया जा सका वह हमारे घरों के आसपास एकत्रित होता रहा। जो कचरा संग्रहित किया गया उसे भी कहीं फेंका जाता और यह कचरा आज शर्मिंदा करने वाले कचरे के पहाड़ों में बदल चुका है। बीते कुछ वर्षों के दौरान देश में कचरा प्रबंधन की रणनीति में काफी बदलाव आया है। मौजूदा नीति की बात करें तो केंद्र सरकार की स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) 2.0 में कचरे को अलग-अलग करने, सूखे और गीले कचरे का प्रसंस्करण करने और कचरा फेंकने के लिए निर्धारित लैंडफिल साइट पर भेजे जाने वाले कचरे को न्यूनतम करने का प्रावधान किया गया। एसबीएम 2.0 के दिशा-निर्देशों के अनुसार जैव अपघटन के लिए अनुपयुक्त कचरा जिसे किसी भी तरह उपचारित नहीं किया जा सकता उसे किसी भी हालत में कुल कचरे के 20 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए और केवल इसे ही लैंडफिल की जगहों पर भेजा जाना चाहिए। इस हिसाब से दिशानिर्देशों में कहा गया है कि शहरों में कचरा फेंकना पूरी तरह बंद होना चाहिए। उन्हें अपने पूरे कचरे का भलीभांति प्रसंस्करण करना चाहिए। दिशा-निर्देशों में जोर दिया गया है कि कचरे से ऊर्जा तैयार करने की परियोजनाएं वित्तीय और परिचालन के मामले में तभी व्यवहार्य हो सकती हैं जब उन्हें रोजाना 150 से 200 टन उच्च कैलोरिफिक वैल्यू वाला ऐसा कचरा मिले जो छांटा हुआ तथा सूखा हुआ हो और जिसका पुनर्चक्रण संभव न हो। हमने यह भी सीखा है कि ऐसे संयंत्र कोई जादू की छड़ी नहीं होते। इनके ऊर्जा उत्पादन करने के लिए यह आवश्यक है कि इन्हें आपूर्ति किया जाने वाला कचरा उच्च गुणवत्ता वाला हो तथा इसे छांटने का काम एकदम प्राथमिक यानी स्रोत के स्तर पर हो। बिना इसके संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाएगा और निष्क्रिय हो जाएगा। दिशानिर्देश यह अवसर भी मुहैया कराते हैं कि 3,000 से अधिक लैंडफिल साइट जहां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक करीब 80 करोड़ टन कचरा फेंका जाता है, उसे दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है। इससे न केवल मूल्यवान जमीन मुक्त होगी जिस पर हरियाली लगाई जा सकती है और अन्य उपयुक्त इस्तेमाल किया जा सकता है, बल्कि पर्यावरण से जुड़ी आपदाओं को भी टाला जा सकता है। इसके लिए खासतौर पर तैयार नीतियों की आवश्यकता है ताकि इन लैंडफिल वाली जगहों से निकलने वाली सामग्री का समुचित इस्तेमाल हो सके। शहरों को भी अब इन जगहों पर नया कचरा डालने से बचना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो यहां का कचरा कभी समाप्त नहीं होगा। अच्छी खबर यह है कि देश की ठोस कचरा प्रबंधन नीति को अब इस प्रकार तैयार किया जा रहा है कि ठोस कचरे को दोबारा इस्तेमाल किया जा सके। यह रुख सही मायनों में एक चक्रीय अर्थव्यवस्था पर केंद्रित है। इस नीति में कचरे को पूरी तरह समाप्त करने और विभिन्न सामग्रियों को पूरी तरह दोबारा इस्तेमाल करने की बात शामिल है। ऐसे में समय के साथ हमें यह भी पता चलेगा कि कौन से पदार्थ दोबारा इस्तेमाल नहीं किए जा सकते हैं। हम उनका इस्तेमाल कम कर सकते हैं। इससे नीतियां और व्यवहार पर्यावरण के अधिक अनुकूल होंगे। उस दृष्टि से देखें तो नीति बन चुकी है लेकिन हमारे व्यवहार में बदलाव शेष है। सबसे बड़ी समस्या है कचरे को स्रोत के स्तर पर अलग-अलग करना। अगर घरों में कचरे को छांट भी लिया जाए तो इसे अलग-अलग प्रसंंस्करण इकाई पहुंचाना मुश्किल है। वास्तव में प्रसंस्करण इसलिए हो पाता है क्योंकि कुछ लोगों की आजीविका हमारे कचरे पर टिकी है। मसलन कचरा बीनने वाले। शहरों के प्रबंधक कचरे के प्रबंधन के लिए अलग-अलग विकल्पों पर काम कर रहे हैं ताकि इससे राजस्व जुट सके। सबसे बुरी बात यह है कि शहरों में प्लास्टिक कचरा तेजी से बढ़ रहा है। हमें मानना होगा कि हमारे इस्तेमाल वाले प्लास्टिक का पुनर्चक्रण नहीं हो सकता इसलिए इसका इस्तेमाल बंद करना होगा। एकल इस्तेमाल वाले प्लास्टिक को लेकर हमारी मौजूदा नीति इस बड़ी समस्या से निपटने के लिए अपर्याप्त है। जरूरत इस बात की है कि कचरा प्रबंधन के नए तरीके सीखे जाएं। इसके लिए सबसे आवश्यक है यह जानना कि क्या कारगर है और क्यों? इसीलिए सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरनमेंट ने नीति आयोग के साथ मिलकर एक दस्तावेज तैयार किया है, जिससे शहरों के कचरे के अनुसार उनके निपटान के नए सबक सीखे जा सकते हैं। इनको अपनाने की आवश्यकता है। यही बदलाव का सही अवसर है।

Published / 2022-01-10 15:15:26
पर्यावरण आंदोलनकर्मी का नेतृत्व और मार्गदर्शन स्वर्ग से भी करते रहेंगे सुंदरलाल बहुगुणा...

एबीएन डेस्क। पिछली जयंती तक पर्यावरण और पारिस्थितिकी विज्ञानकर्मियों और आंदोलनकारियों का मार्गदर्शन और नेतृत्व करने के लिए स्वयं सुंदरलाल बहुगुणा हमलोग के बीच मौजूद थे, लेकिन कोरोना के दूसरे कहर ने उनको हमसे छीन लिया। आज भौतिक रूप से वह हमारे बीच भले न हों, लेकिन दशकों का उनका अनुभव, ज्ञान, कर्मठता, निष्ठा, समर्पण हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा। वह पलामू भी आए थे, टाउन हॉल के सार्वजनिक आयोजन से उन्होंने पलामूवासियों को उपकृत और कृतार्थ भी किया था। उनकी सादगी, सहजता, सरलता ने मेरी हिम्मत बढ़ाई थी कि जब भी देहरादून जाऊं, उनके सान्निध्य में कुछ पल बिताऊं, उनका आशीर्वाद लूं। 6 मार्च 2020 को सुंदरलाल बहुगुणा के दर्शन करने हेतु मैं शास्त्री नगर, देहरादून स्थित उनके आवास पहुंचा था, वह अपने बेटी-दामाद के यहां रहते थे। मेरे साथ पत्नी शीला श्रीवास्तव और मेरा छोटा पुत्र परिमल परितोष था। 93वर्ष की उम्र में पत्नी विमला बहुगुणाकी तीमारदारी में वह लगे थे। पूछता हूं-कौन-सी बिमारी हैं? बताते हैं-बुढ़ापा अपने आप में सबसे बड़ी बिमारी है। लेकिन, सुंदरलाल बहुगुणा अपनी पीड़ा और दर्द छुपा नहीं पाते। कहने से नहीं चूके-हमारी पूर्व की पीढ़ी ने प्रकृतिका जो खूबसूरत स्वरूप विरासतमें हमें सौंपा था, उसे हमारी पीढ़ी सहेज,संवार कर नहीं रख सकी। जब आज हमारी पीढ़ी दुनिया को अलविदा कह रही है तो दिल में एक कसक तो है ही कि प्रकृति के साथ हमने अन्याय किया। अगली पीढ़ी को हम पहले जैसी खूबसूरत दुनिया सौंपकर नहीं जा रहे हैं। सुंदरलाल बहुगुणा को लोग पर्यावरण गांधी भी कहते हैं। उन्हें पद्मश्री(1981), जमनालाल बजाज पुरस्कार (1985), सरस्वती सम्मान(1987), गांधी सम्मान (1999) और पद्मविभूषण(2001) जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। लेकिन, समाज, राष्ट्र या विश्व उनकी पीड़ा और दर्द का निवारण नहीं करती तो ये सारे सम्मान ढकोसलेबाजी और खानापूर्ति दीखते हैं। (ध्यातव्य है कि 1981में एक तरफ सरकार उनको पद्मश्री से सम्मानित कर रही थी, दूसरी तरफ हिमालय में पेड़ों की कटाई भी जारी थी।यह सरकार का परस्पर विरोधाभासी रवैया था।सुंदरलाल बहुगुणा ने सरकार की इस विरोधाभासी रवैया के खिलाफ पद्मश्री सम्मान लेने से इन्कार कर दिया था।) आज दो वर्ष बाद भी कानों में उनकी आवाज गूंजती है, उनकी पीड़ा मुझे झकझोरती है-विरासत में जितनी खूबसूरत दुनिया हमारी पीढ़ी को मिली थी, उसे सहेज संवार कर हम नहीं रख सके। अपने सार्वजनिक संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम में अपनी शिरकत से लेकर चिपको आन्दोलन और टिहरी बांध विरोधी आन्दोलन की छोटी से छोटी बात उन्हें याद थी।उनके पास संघर्ष-गाथा के अद्भुत संस्मरणों का जखीरा था।

Published / 2022-01-06 17:26:23
गुड न्यूज : पलामू टाइगर रिजर्व में बाघ के मिलने की पुष्टि

टीम एबीएन, पलामू। एशिया के प्रसिद्ध पलामू टाइगर रिजर्व इलाके में बाघ के मौजूद होने की पुष्टि हुई है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट को पलामू टाइगर रिजर्व में 22 दिसंबर को छह स्कैट (मल) मिले थे, जिसकी जांच में एक बाघ के होने की पुष्टि हुई है। जबकि दूसरा स्कैट तेंदुआ का है। बाकी बचे 4 स्कैट पुराने बताए जा रहे हैं। पलामू टाइगर रिजर्व में बाघ और उसके शावक के पग मार्क भी मिले हैं, जिन्हें जांच के लिए दोबारा वाइल्ड लाइफ इंस्टीच्यूट भेजा गया है। पलामू टाइगर रिजर्व के निदेशक कुमार आशुतोष ने बताया कि पीटीआर में बाघ होने की पुष्टि के बाद इलाके में निगरानी बढ़ा दी गई है। इसके साथ ही 1129 वर्ग किलोमीटर में फैले पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की गिनती भी जारी है। बाघों की गिनती के लिए फरवरी के अंत तक पीटीआर में एक हजार ट्रैकिंग कैमरे लगाए जाने की योजना है। इससे पहले 2018 में हुई गिनती में पीटीआर के 3 इलाके में बाघों की संख्या शून्य बताई गई थी। फरवरी 2019 में भी पीटीआर के बेतला नेशनल पार्क इलाके में एक मृत बाघ मिला था। बता दें कि 70 के दशक में सबसे पहले पलामू से ही बाघों की गिनती पूरे देश में शुरू हुई थी।

Published / 2021-12-27 03:00:01
कृषि कानून वापस लाने वाले बयान पर कृषि मंत्री की सफाई, कहा- यह नहीं कहा…बिल्कुल गलत है

एबीएन डेस्क। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने अपने टिप्पणी पर सफाई दी है जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार फिर से कृषि कानून वापस लाएगी। इस बयान पर कृषि मंत्री ने सफाई देते हुए कहा है कि मैं कभी यह कहा ही नहीं। मैंने यह कहा कि भारत सरकार ने अच्छे कानून बनाए थे। अपरिहार्य कारणों से हम लोगों ने उन्हें वापस लिया है। कृषि से जुड़े नए मसौदे के सवाल पर तोमर ने कहा- यह नहीं कहा… बिल्कुल गलत प्रचार है। उन्होंने किसानों से इस मुद्दे पर कांग्रेस द्वारा पैदा किए जा रहे भ्रम से सावधान रहने का आग्रह किया। मंत्री ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र के नागपुर में एक कृषि कार्यक्रम में दिए संबोधन के दौरान इस मुद्दे पर उनकी टिप्पणियों को गलत समझा गया और उनकी मंशा वह नहीं थी जो दिखाया जा रहा है। उन्होंने कहा, कार्यक्रम में मैंने कहा था कि हमने कृषि कानूनों पर एक कदम पीछे लिया है लेकिन सरकार किसानों की भलाई की दिशा में काम करने के लिए हमेशा आगे बढ़ती रहेगी। अत: इस मुद्दे पर कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए और सरकार का कृषि कानूनों को फिर से लाने का कोई इरादा नहीं है।

Published / 2021-12-11 14:22:52
छतरपुर और हरिहरगंज पहुंचे पलामू आयुक्त ने ड्रैगन फ्रूट और अमरूद की खेती का किया अवलोकन

छतरपुर/हरिहरगंज। प्रमंडलीय आयुक्त जटा शंकर चौधरी शनिवार को छतरपुर प्रखंड क्षेत्र के शिवदयालडीह गांव पहुंचे। इस दौरान उन्होंने किसान अजीम अंसारी द्वारा 50 डिसमिल में लगाए गए ड्रैगन फ्रुट की खेती को देखा। ड्रैगन फ्रुट के खेती की अवलोकन के दौरान आयुक्त ने पाया कि खेती से जुड़े किसानों को ड्रैगन फ्रुट की खेती की देखभाल से संबंधित जानकारी का अभाव है। उन्होंने तत्काल जिला कृषि पदाधिकारी को किसानों को इसकी खेती के लिए प्रशिक्षित करते हुए पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने का निदेश दिया, ताकि किसान ऐसे वैक्लिपक खेती फसल का अधिक मुनाफा ले सकें। किसान ने ड्रैगन फ्रुट की खेती के साथ टमाटर का फसल भी लगाया है, ताकि ड्रेगन फ्रुट की फसल तैयार होने के पूर्व टमाटर की खेती से आर्थिक मुनाफा ले सकें। इसके बाद आयुक्त ने हरिहरगंज के कटकोंबा गांव पहुंचकर वहां हो रहे थाई वैरायटी की अमरूद के बाग का अवलोकन किया और इससे जुड़े किसानों का हौसला बढ़ाया। उन्होंने जिला कृषि पदाधिकारी को निदेश दिया कि अमरूद की खेती को जिले एवं राज्य के अन्य किसानों को दिखायें, ताकि उनमें इस तरह की खेती के लिए जागरूकता आए और किसानों की रूचि नगदी फसलों के उत्पादन की ओर बढ़े। उन्होंने कहा कि इस तरह की खेती को दिखाये जाने से किसानों में जागरूकता आएगी और वे भी प्रेरित होकर ऐसे नगदी फसलों की खेती कर उत्पादन बढ़ायेंगे और मुनाफा लेंगे। विदित हो कि हरिहरगंज के कटकोंबा गांव में बंजर भूमि पर किसान अजय मेहता अपने अन्य सहयोगी किसानों की मदद से 60 एकड़ की भूमि पर 42 हजार से अधिक थाई वैराईटी के अमरूद का पौधा लगाया है। वर्तमान समय में करीब 70 क्विंटल प्रतिदिन अमरूद की बिक्री पटना, गया, धनबाद, सासाराम, डेहरी तथा लोकल बाजार हरिहरगंज एवं छतरपुर में बिक्री की जा रही है। मौके पर आयुक्त जटा शंकर चौधरी के साथ जिला कृषि पदाधिकारी अरूण कुमार, छतरपुर अनुमंडल पदाधिकारी एनपी गुप्ता, एटीएम मुकेश शर्मा उपस्थित थे। आयुक्त छतरपुर अनुमंडल पदाधिकारी कार्यालय पहुंचकर अनुमंडल क्षेत्र में विकासात्मक योजनाओं पर चर्चा की। आपके अधिकार-आपकी सरकार आपके द्वार कार्यक्रम को लेकर आयोजित हो रहे कैंपों में आवेदनों का निष्पादन से संबंधित जानकारी भी ली। वहीं फोरलेन के कार्यों के संबंध में जानकारी प्राप्त करते हुए इसमें तेजी लाने हेतु आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया।

Published / 2021-11-25 14:41:58
झारखंड की नदियां और जल का संरक्षण...

एबीएन डेस्क (शिवशंकर उरांव)। हिमालय तीन प्रमुख भारतीय नदियों का स्रोत है- सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र। भारतीय संस्कृति की साक्षी गंगा अपने मूल्यवान पारिस्थितिकी, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्त्व के साथ भारत की सबसे पवित्र नदियों में से एक है। लगभग ढाई हजार किलोमीटर की यात्रा करने वाली यह भारत की सबसे लंबी नदी है। गंगा नदी घाटी क्षेत्र देश की छब्बीस फीसद भूमि का हिस्सा है और भारत की तियालीस फीसद आबादी इससे पोषित होती है। भारत के कुल अनुमानित भूजल संसाधनों का लगभग चालीस फीसद गंगा बेसिन से आता है। शहरी, आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्रों से मीठे पानी की लगातार बढ़ती मांग और संरचनात्मक नियंत्रण के कारण गंगा का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो गया है। पारंपरिक नदी प्रबंधन में संरचनात्मक नियंत्रण का प्रभुत्व था, जिसके परिणामस्वरूप नदी कार्यों का स्तर कम होता गया। गंगा पुनर्जीवन और संरक्षण के चार संरचनात्मक स्तंभ हैं- अविरल धारा (निरंतर प्रवाह), निर्मल धारा (स्वच्छ जल), भूगर्भिक इकाई (भूवैज्ञानिक विशेषताओं का संरक्षण) और पारिस्थितिक इकाई (जलीय जैव विविधता का संरक्षण)। हमें यह जानना चाहिए कि चार पुनर्स्थापना स्तंभों को एकीकृत किए बिना हम गंगा की सफाई के सपने को साकार नहीं कर सकते। भारत में पानी राज्य का विषय है और जल प्रबंधन वास्तव में ज्ञान आधारित सोच और समझ पर नहीं टिका है। गंगा के प्रबंधन में ह्यबेसिन-व्यापक एकीकरणह्ण का अभाव है, साथ ही विभिन्न तटवर्ती राज्यों के बीच भी तालमेल की भारी कमी है। इसके अलावा, जल जीवन मिशन के तहत 2024 तक सभी निर्दिष्ट स्मार्ट शहरों में जलापूर्ति और अपशिष्ट जल उपचार के बुनियादी ढांचे को उन्नत करने और स्वच्छ जलापूर्ति सुनिश्चित करने की एक बड़ी चुनौती है। सीमित जल संसाधनों को देखते हुए यह कार्य बहुत बड़ा है। लगभग तीन दशकों तक गंगा को साफ करने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपनाई गईं। इनमें गंगा एक्शन प्लान (जीएपी, चरण एक और दो ) और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की स्थापना जैसे प्रयास थे, लेकिन लंबे समय तक इनके ठोस नतीजे नहीं मिले। दिसंबर 2019 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में अपनी पहली बैठक में गंगा परिषद ने पांच राज्यों में गंगा बेसिन के दोनों ओर पांच किलोमीटर क्षेत्र में जैविक समूहों को बढ़ावा देकर गंगा के मैदानों में स्थायी कृषि को बढ़ावा देने की योजना पर काम किया। सरकार को अंतत: बेसिन में अधिक क्षेत्र को शामिल करने के लिए इसे फैलाने की योजना बनानी चाहिए। नदी किनारे की कृषि संपूर्ण जैविक होनी चाहिए। शहरीकरण के विस्तार और जनसंख्या के कारण नदियाँ प्रदूषित हुई हैं। इसका असर यहाँ की स्वर्णरेखा नदी पर भी पड़ा है। यह छोटानागपुर के पठारी भूभाग नगड़ी से निकलती है। राँची जिÞले से प्रवाहित होती हुई स्वर्ण रेखा नदी सिंहभूम जिÞले में प्रवेश करती है तथा उड़ीसा राज्य में चली जाती है। स्वर्ण रेखा के सुनहरी रेत में सोने की मात्रा पाई जाती है। किन्तु इसकी मात्रा अधिक न होने के कारण व्यवसायी उपयोग नहीं किया जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद की रिर्पोट से स्वर्णरखा के प्रदूषण के स्तर का खुलासा हुआ है। आलम यह है कि ड्रेनेज तथा सिवेज का निकास इस नदी में हो रहा है। इसके प्रदूषण के सन्दर्भ में झारखण्ड उच्च न्यायालय को स्वत: संज्ञान लेना पड़ा। उच्च न्यायालय ने राज्य को सरकार को निर्देश दिया है। इसके लिये राज्य सरकार ने 1319 करोड़ रुपये की लागत से योजना का प्रारूप तैयार किया है। राज्य में गंगा साहेबगंज जिले से प्रभाहित होती है। बिहार के तर्ज पर पीने का जल हम वहां से उन जिलों को उपलब्ध करा सकते हैं जहां कठिनाई है। राज्य सरकार ने पहले भी इस योजना को स्वीकृत करने के लिये मंत्रालय से अनुरोध किया था, लेकिन मंत्रालय की ओर से कार्रवाई की सूचना अप्राप्त है। केन्द्र सरकार से अनुरोध किया है कि वह सम्पूर्ण सीवेज सिस्टम को विकसित कर बहुप्रतिक्षित माँग को पूरा करें। उन्होंने योजना की राशि केन्द्र के स्तर से या अन्तरराष्ट्रीय वित्त पोषण के माध्यम से उपलब्ध कराने का भी सुझाव दिया है। झारखण्ड की दूसरी महत्त्वपूर्ण नदी है दामोदर। दामोदर नदी का पानी पीने लायक नहीं रह गया है। पीने की बात तो दूर पानी इतना काला और प्रदूषित है कि लोग नहाने से भी कतराते हैं। इस प्रदूषण के जिम्मेदार हैं यहां के कल-कारखाने और खदान। हजारीबाग, बोकारो एवं धनबाद जिलों में इस नदी के दोनों किनारों पर बड़े कोलवाशरी हैं, जो प्रत्येक दिन हजारों घनलीटर कोयले का धोवन नदी में प्रवाहित करते हैं। इन कोलवाशरियों में गिद्दी, टंडवा, स्वांग, कथारा, दुगदा, बरोरा, मुनिडीह, लोदना, जामाडोबा, पाथरडीह, सुदामडीह एवं चासनाला शामिल हैं। इन जिलों में कोयला पकाने वाले बड़े-बड़े कोलभट्ठी हैं जो नदी को निरन्तर प्रदूषित करते रहते हैं। चन्द्रपुरा ताप बिजलीघर में प्रतिदिन 12 हजार मिट्रिक टन कोयले की खपत होती है और उससे प्रतिदिन निकलने वाले राख को दामोदर में प्रवाहित किया जाता है। इसके अतिरिक्त बोकारो स्टील प्लांट का कचरा भी इसी नदी में गिरता है।नजीजतन दामोदर नदी के जलनमूने में ठोस पदार्थों का मान औसत से अधिक है। नदी निरन्तर छिछली होती जा रही है और इसके तल एवं किनारे का हिस्सा काला पड़ता जा रहा है।दामोदर नदी के जल में भारी धातु- लौह, मैगजीन, तांबा, लेड, निकेल आदि पाये जाते हैं। प्रदूषण का आलम यह है कि नदी के जल में घुलित आॅक्सीजन की मात्रा औसत से काफी कम है। इसके सवाल पर निरन्तर आन्दोलन होता आया है। 3 फरवरी 2015 को हुई बैठक में यह किया गया था कि दामोदर नदी जो गंगा की सहायक नदी है, उसे नमामि गंगे परियोजना में शामिल किया जाएगा। नदियों में मिलने वाले सभी प्राकृतिक नाले आज सीवेज चैनल में बदल गए हैं। ऐसे नालों को फिर से स्वस्थ जल निकायों में बदलना होगा।झारखंड की नदियों का संरक्षण और उनका सदउपयोग के साथ गंगा के जल से राज्य को होने वाले लाभ का अधिकाधिक उपयोग भी आवश्यक है। आखिर जल ही जीवन है और हरियाली भी। (लेखक भाजपा एसटी मोर्चा झारखंड के अध्यक्ष हैं)।

Published / 2021-11-24 15:09:15
जलवायु परिवर्तन की चिंता और चुनौतियां

एबीएन डेस्क। एक साल में झारखंड का गिरिडीह पूर्ण सौर ऊर्जा से संचालित शहर होगा। जलवायु परिवर्तन की लगातार गंभीर होती समस्या पर विचार करने के लिए स्काटलैंड के शहर ग्लासगो में कोप-26 शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया जो 31 अक्टूबर से 12 नवंबर तक चला। जलवायु परिवर्तन को लेकर काम करने वाली संस्था इंटरगवर्नमेंटल पैनल आॅन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) का लक्ष्य उत्सर्जन के स्तर को जीरो करने का है यानी ऐसी स्थिति जहां कोई भी देश ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन की मात्रा में बढ़ोतरी नहीं होने देगा। 2050 तक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाने दिया जाएगा। 130 से अधिक देशों ने इस लक्ष्य को स्वीकार किया है लेकिन भारत इस में शामिल नहीं है। 2 सप्ताह तक चले 26 में वैश्विक सम्मेलन में भारत ने अंतिम समय पर अपने कड़े प्रतिरोध के कारण कोयला ऊर्जा संबंधी घोषणा से फेजआउट (उत्पादन खत्म करना)को हटवा कर फेज डाउन (धीरे-धीरे कम करना) जुड़वा दिया। इस बात के लिए दुनिया भर की आलोचना झेलने के बाद भारत की तरफ से यह स्पष्ट किया है कि मसौदे में बदलाव में अकेले भारत की नहीं है? यह भी गौरतलब है कि संपन्न देशों को अपनी नैतिक जिम्मेदारी का पूर्ण एहसास इन 2 सप्ताह के दौरान नहीं कराया जा सका। परिणाम स्वरूप विकासशील देशों की मांग कि धनी देश ऊर्जा स्थानांतरण (प्रदूषण करने वाले उर्जा स्रोतों की जगह स्वच्छ ऊर्जा की ओर जाने) में विकास शील देशों की ज्यादा मदद करें, लगभग अनसुनी रही। 2009 और 2015 में विकसित देशों ने वादा किया था कि 2020 से वे हर साल इस मद में 100अरब डालर देंगे। तापमान वृद्धि रोकने का लक्ष्य 2 डिग्री से घटाकर 1.5 डिग्री किया गया है, इसलिए ऊर्जा ट्रांसफर करने में अधिक पैसों की जरूरत होगी। सम्मेलन में अपेक्षा की गई कि 2025 तक 100 अरब डॉलर प्रतिवर्ष देने के बाद यह देश इस राशि को और बढ़ाएंगे ताकि सन 2030 तक कोयला आधारित बिजली को काफी हद तक कम किया जा सके। भारत और चीन धीरे-धीरे कोयले पर निर्भरता कम करना चाहते हैं, क्योंकि दोनों देशों में कोयला प्रचूर मात्रा में है और अचानक दूसरे ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन या परमाणु ऊर्जा) पर निर्भर नहीं हुआ जा सकता क्योंकि इन स्रोतों से उत्पादन प्रति मेगावाट कई गुना ज्यादा खर्च आता है । फिर कोयला, पेट्रोलियम, गैस एलपीजी आदि में लगे लाखों कर्मचारियों के रोजगार का भी प्रश्न है। भारत 1342 ट्रिलियन यूनिट बिजली उत्पादन करता है जिसमें 948 ट्रिलियन यूनिट कोयले से बनती है ।भारत में कोयला खदानों से लेकर अंतिम खपत तक 40 लाख लोग नौकरी करते हैं? इसलिए भारत अभी इसका इस्तेमाल बंद नहीं कर सकता। कोयला सबसे सस्ता इंधन है जो अर्थव्यवस्था रोशन कर लाखों लोगों को गरीबी के अंधेरे से निकालने के लिए घरेलू रूप से उपलब्ध है। चीन 4876 ट्रिलियन यूनिट बिजली कोयले से बनाता है ।भारत ने 2019 में 999 ट्रिलियन यूनिट उत्पादन किया और 2020 में इससे कम कर 948 ट्रिलियन पर ले आया। चीन, भारत और अमेरिका मिलकर उतना कोयला इस्तेमाल करते हैं जितना पूरी दुनिया कुल मिलाकर करती है। 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में आस्ट्रेलिया में प्रति व्यक्ति कोयला उत्सर्जन सबसे अधिक है इसके बाद दक्षिण कोरिया, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और चीन है। जीवाश्म ईंधन - कोयला, तेल और गैस में कोयला पर्यावरण का सबसे बड़ा शत्रु है जो 20% ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करता है। कोयला जलने से वायु प्रदूषण, स्मोग एसीड रेन जैसे पर्यावरणीय दुष्परिणामों और स्वास्थ संबंधी बीमारियों का खतरा है, इसलिए दुनिया कोयले के विकल्प ध्यान दे रही है। 6 साल पहले पेरिस में दुनिया भर के देश जलवायु परिवर्तन को लेकर कार्यक्रमो पर सहमत हुए थे तब ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और 1.5 डिग्री सेल्सियस करने की कोशिश पर रजामंदी बनी थी। पेरिस समझौते में विकसित देशों ने शपथ ली थी कि वे हर साल जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए सौ बिलियन डॉलर देंगे मगर ऐसा हुआ नहीं। सी ओ पी 26 मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए और उन्होंने साहसी घोषणा करते हुए कहा कि भारत वर्ष 2070 में कुल 0 उत्सर्जन /नेटजीरो का लक्ष्य प्राप्त करेगा। इसके साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत एक मात्र देश है जो पेरिस समझौते के तहत जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए उसकी भावना के तहत अक्षरश: कार्य कर रहा है। गैर जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता को 450 गीगावॉट से बढ़ाकर 500 गीगावॉट करने की घोषणा की उनके अनुसार भारत 500 गीगावॉट के जीवाश्म ईंधन क्षमता 2030 तक हासिल करेगा। भारत 2030 तक अपनी ऊर्जा जरूरतों का 50% नवीकरणीय ऊर्जा से प्राप्त करेगा। भारत आज से 2030 के बीच अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में कटौती करेगा। पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली को बनाया जाए। मोदी ने याद कि विकसित देशों को जलवायु पित्त पोषण के लिए 100 अरब डॉलर देने के अपने वादे को पूरा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसकी निगरानी इसी तरह की जानी चाहिए जैसे जलवायु की होती है। भारत का दुनिया की आबादी में 17% हिस्सेदारी है लेकिन उत्सर्जन महज 5% है। 2070 तक नेट जीरो की लक्ष्य को प्राप्त करना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण है। कोयले के चलन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने की राह में खड़ी बाजार की शक्तियां, दुरुह वित्तीय स्थितियां और अन्य कई बाधाएं हैं।भारत के विकास में बने चुनौतियों को और जलवायु से जुड़े रणनीतियों को सिर्फ कोयले तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता मगर कोयला निश्चित रूप से चर्चा का प्रमुख केन्द्र है। अक्षय ऊर्जा कोयले से बनने वाली बिजली के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी और किफायती हैं। यह बहुत महत्वकांक्षी लक्ष्य है। वर्ष 2030 तक हमारी कुल ऊर्जा उत्पादन क्षमता का 57% गैर जीवाश्म इंधन स्रोतों से होगा। कोयले का आयात पर किए जाने वाला खर्च एक लाख करोड़ प्रतिवर्ष से कुछ नीचे है जो 2030 में 13 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। विकसित देशों की तरफ से क्लाइमेट फाइनेंस की जो प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है वह जरूरत के हिसाब से बहुत थोड़ी है। 100 बिलियन डॉलर ना तो वैश्विक तापमान वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए काफी है और न नेटजीरो सिनेरियो के लिए पर्याप्त है। एक अनुमान के मुताबिक विकासशील देशों को वर्ष 2030 तक 5.9 ट्रिलियन डॉलर की जरूरत होगी। अकेले भारत को ही अपनी 500 गीगा वाट अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता स्थापित करने और अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा क्लाइमेट फाइनेंस की आवश्यकता होगी।

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