टीम एबीएन, रांची। मौसम विभाग के अनुसार झारखंड में मानसून दस्तक देने वाला है। जी हां, 4 दिनों तक राज्य में बादल बरसेंगे। मौसम विभाग के अनुसार आज राज्य के लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, रांची, खूंटी और पश्चिमी सिंहभूम जिलों में कुछ स्थानों पर भारी बारिश हो सकती है।
मौसम विभाग के अनुसार कल यानी मंगलवार को गुमला, सिमडेगा और खूंटी जिलों में कुछ जगहों पर बहुत भारी बारिश की संभावना है। इसके अलावा लातेहार, लोहरदगा, रांची और पश्चिमी सिंहभूम में भी भारी बारिश की चेतावनी दी गयी है।
बुधवार को कोडरमा, हजारीबाग, गिरिडीह और बोकारो में बहुत भारी बारिश का अनुमान है, जिनके लिए आॅरेंज अलर्ट जारी है। चतरा, पलामू, लातेहार, देवघर, जामताड़ा और धनबाद जिलों में भारी बारिश की संभावना को देखते हुए यलो अलर्ट जारी किया गया है।
गुरुवार को हजारीबाग, कोडरमा, गिरिडीह, रामगढ़, बोकारो, धनबाद, देवघर, जामताड़ा और दुमका जिलों में कहीं-कहीं भारी वर्षा हो सकती है। मौसम विभाग के अनुसार, यह बारिश राज्य में मानसून की दस्तक की शुरूआत मानी जा रही है।
टीम एबीएन, पलामू / रांची। एक जुलाई से पलामू टाइगर रिजर्व और टाइगर रिजर्व के अंतर्गत आने वाले नेशनल पार्क में पर्यटन गतिविधि को बंद कर दिया जायेगा। यह पर्यटन गतिविधि 31 सितंबर तक बंद रहेगी। तीन महीने तक किसी भी प्रकार की पर्यटन गतिविधि का संचालन नहीं किया जायेगा।
बाघ के लिए संरक्षित झारखंड का एकमात्र पलामू टाइगर रिजर्व में भी पहली जुलाई से पर्यटन गतिविधि को बंद करने की तैयारी की जा रही है। पलामू टाइगर रिजर्व के अंतर्गत बेतला नेशनल पार्क भी है वहां भी पर्यटन गतिविधि को बंद किया जायेगा। दरअसल जुलाई से सितंबर तक बारिश का मौसम होता है। इस मौसम में कई वन्य जीव अपना प्रजनन करते हैं। प्रजनन में दखलअंदाजी को रोकने के लिए पर्यटन गतिविधि को रोका जाता है।
इसके अलावा कई ऐसे पेड़ पौधे हैं जो बारिश के दिनों में जंगल से बाहर निकलते हैं। बाघों के प्रजनन के लिए शांत वातावरण की जरूरत होती है, यही वजह होती है कि इलाके में पर्यटकों की जाने पर रोक लगा दी जाती है। बरसात के दिनों में टाइगर रिजर्व आसपास नदी और नाले उफान पर होते हैं। इस दौरान रास्तों को भी नुकसान होता है। इस दौरान पर्यटकों को सुरक्षा उपलब्ध कराना प्रबंधन के लिए एक चुनौती भरा कार्य हो जाता है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड के लोगों, अब गर्मी झेलने के लिए तैयार हो जाइये। मौसम विभाग ने कहा है कि धीरे-धीरे तापमान में वृद्धि होने वाली है। अधिकतम तापमान 4 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ सकता है।
साथ ही 2 दिन तक यानी 7 और 8 जून को राज्य के पूर्वी और उससे सटे हिस्से में कहीं-कहीं गरज के साथ वर्षा-वज्रपात का भी अनुमान मौसम विभाग ने जारी किया है।
रांची के मौसम के बारे में मौसम केंद्र ने कहा है कि शनिवार को आंशिक बादल छाये रहेंगे। गर्जन वाले बादल भी बन सकते हैं। रांची का अधिकतम तापमान 7 जून को 35 डिग्री और न्यूनतम तापमान 24 डिग्री रहने का अनुमान है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पर्यावरण है तो हम हैं और अगर पर्यावरण सुरक्षित नहीं होगा तो हम भी चैन की सांस नहीं ले पाएंगे। पर्यावरण के इसी महत्व से सभी को अवगत कराने के लिए हर साल 5 जून के दिन विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मकसद लोगों को पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझाना और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक कराना है।
सरकारें चाहे जितनी भी कोशिश कर लें लेकिन अगर लोग अपने स्तर पर पर्यावरण को बचाने के लिए कदम नहीं उठाएंगे तो पर्यावरण संरक्षण नहीं हो पाएगा। सरकार कूड़ा हटा सकती है लेकिन कूड़ा फैलाने वाले जबतक नहीं रुकेंगे तबतक कूड़े का ढेर लगता रहेगा। पानी की खपत, बिजली का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल, प्लास्टिक का इस्तेमाल, पेड़ों की कटाई और प्रदूषण पर्यावरण को क्षति पहुंचाते हैं।
ऐसे में बच्चों से लेकर बड़ों तक को पर्यावरण संरक्षण का महत्व पता होना जरूरी है जिससे धरती को साफ रखा जा सके, सुरक्षित रखा जा सके। इस साल विश्व पर्यावरण दिवस की थीम है प्लास्टिक प्रदूषण को हटाना। प्लास्टिक पर्यावरण के लिए सबसे खतरनाक चीजों में से एक है। वर्तमान में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो घर या बाहर प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करता होगा।
प्लास्टिक ऐसा मटीरियल है जो सालोंसाल तक खत्म नहीं होता है जिस चलते पर्यावरण को इससे अत्यधिक नुकसान होता है। यह जमीन पर हो तो धरती पानी को नहीं सोख पाती और अगर समुद्र में डाली जाए तो जलीय जीवों के लिए खतरा बन जाती है। ऐसे में इस साल की थीम प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने और प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए चुनी गयी है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता सह हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष संजय सर्राफ ने कहा है कि हर वर्ष 5 जून को पूरी दुनिया में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह दिन न केवल हमें पर्यावरण के महत्व का स्मरण कराता है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को भी जागरूकता के रूप में प्रस्तुत करता है।
इसकी शुरुआत 1972 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा की गयी थी, जब स्टॉकहोम (स्वीडन) में आयोजित मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में इस दिन को विशेष रूप से मनाने का निर्णय लिया गया। इसके बाद 1974 से इसकी विधिवत शुरुआत हुई और तब से हर साल यह दिन किसी एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है।
विश्व पर्यावरण दिवस का उद्देश्य लोगों को पर्यावरणीय संकटों के प्रति जागरूक करना और उन्हें पर्यावरण की सुरक्षा के लिए प्रेरित करना है। आज वैश्विक स्तर पर वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का क्षरण, प्लास्टिक प्रदूषण, वायु और जल प्रदूषण जैसी समस्याएं गंभीर रूप धारण कर चुकी हैं।
ऐसे में पर्यावरण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति हमारी जीवनरेखा है और इसकी रक्षा करना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। हर साल किसी एक देश को मेजबान बनाकर एक विशेष थीम के साथ यह दिवस मनाया जाता है। विश्व पर्यावरण दिवस 2025 की थीम विश्व स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण का अंत है। यह थीम प्लास्टिक कचरे की गंभीर समस्या से निपटने का एक वैश्विक संकल्प है।
हर साल सैकड़ों मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग दो-तिहाई केवल एक बार उपयोग के लिए होता है और जल्दी ही फेंक दिया जाता है। यह प्लास्टिक नदियों और महासागरों को प्रदूषित करता है, हमारी फूड चेन में प्रवेश कर जाता है, और माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारे शरीर में भी जमा हो जाता है।
प्लास्टिक से हो रहे पर्यावरणीय नुकसान की ओर ध्यान आकर्षित करता है। इसी तरह, हर वर्ष एक नयी चुनौती और समाधान को लेकर कार्यक्रमों, रैलियों, वृक्षारोपण अभियानों, शिक्षण कार्यशालाओं और सफाई अभियानों का आयोजन होता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है।
जहां एक ओर विकास की गति तेज़ है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन भी हो रहा है। यदि हम अभी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा, जल और स्वस्थ पर्यावरण मिलना दुर्लभ हो जायेगा। इसलिए स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी व गैर-सरकारी संस्थानों और आम नागरिकों की भागीदारी से यह अभियान अधिक सशक्त बन सकता है।
विश्व पर्यावरण दिवस केवल सरकारों या संगठनों का ही काम नहीं है। यह हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। रोजमर्रा की आदतों में छोटे-छोटे परिवर्तन जैसे प्लास्टिक का कम उपयोग, पानी की बचत, बिजली की खपत को नियंत्रित करना, अधिकाधिक वृक्षारोपण, और सार्वजनिक परिवहन का प्रयोग करना, हमारे पर्यावरण को बेहतर बना सकते हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह अवसर प्रदान करता है कि हम अपने ग्रह की रक्षा के लिए एकजुट हों। यह केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक सतत चेतावनी है कि यदि हमने समय रहते पर्यावरण की रक्षा नहीं की, तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। हम सब मिलकर इस धरती को हरा-भरा और जीवनदायिनी बनाये रखने की प्रतिज्ञा ले।
एबीएन सेन्ट्रल डेस्क। केरल में मानसून के दस्तक देने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि इससे झारखंड में भी जल्द ही मौसम सुहावना हो जाएगा और लोगों को गर्मी से राहत मिलेगी, लेकिन लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। क्योंकि बिहार के चौखट पर अभी तक मानसून ने दस्तक नहीं दी है, ऐसे में झारखंड में इसके आने में थोड़ी देरी हो सकती है और लोगों को कुछ और इंतजार करना पड़ सकता है।
रांची मौसम केंद्र के मौसम वैज्ञानिक अभिषेक आनंद ने बताया कि 24 मई केरल में मानसून ने दस्तक दी। ऐसे में उम्मीद थी कि 5 से 6 जून तक झारखंड में भी दस्तक देगा। अगर सब कुछ ठीक रहा तो। लेकिन, बंगाल की खाड़ी में बने सिनॉप्टिक फीचर और मानसून के स्थिर होने के कारण अब थोड़ा लेट होगा।
मौसम वैज्ञानिक अभिषेक आनंद ने बताया कि नॉर्थ वेस्ट बंगाल की तरफ लो प्रेशर एरिया बना हुआ है। इस लो प्रेशर एरिये की वजह से यह मानसून की हवा को कमजोर कर देता है। ऐसे में फिलहाल बारिश की संभावना नजर नहीं आ रही है। यह प्रेशर अगर आगे चलकर और प्रबल हुआ तो मानसून की नमी को कमजोर कर देगा।
इसलिए फिलहाल मानसून आने में थोड़ा समय लगेगा। क्योंकि, झारखंड में मानसून बंगाल और बिहार को टच करते हुए ही आता है। इन दोनों जिलों में दस्तक देने के बाद ही झारखंड की तरफ रुख करता है। लेकिन अभी तक इन दोनों जगह मानसून नहीं आया है।
दरअसल, केरल में एक हफ्ते पहले मानसून आने से ऐसा अनुमान था कि इस बार मानसून पहले आयेगा। लेकिन इस तरह का सिनॉप्टिक फीचर बंगाल की खाड़ी में लो प्रेशर और केरल में मानसून का थोड़ा स्थिर होना, मानसून के लेट होने का कारण है।
मौसम वैज्ञानिक ने बताया कि केरल में मानसून पहुंचने और स्थिर रहने के कारण झारखंड में इसके पहुंचने में कुछ विलंब हो सकता है ऐसे में पहले जो अनुमान था कि जून के फर्स्ट वीक में मानसून आएगा अब ऐसा नहीं होगा बल्कि लेट होगा।
ऐसे में लोगों को जून के लास्ट वीक का इंतजार करना होगा. लास्ट वीक तक निश्चित तौर पर मानसून झारखंड में दस्तक दे देगी और इस बार जरूरत से अधिक बारिश होगी। इस बार 108 प्रतिशत तक बारिश हो सकती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय मौसम विभाग (आइएमडी) ने भारत में जून में सामान्य से अधिक वर्षा होने का अनुमान लगाया है, जो दीर्घावधि औसत का 108 प्रतिशत होगी। यह 2025 के दौरान मानसून की शुरुआत का संकेत है, जो 16 वर्षों में सबसे पहले है। आइएमडी के अनुसार, जून में सामान्य से अधिक वर्षा होगी, जो दीर्घावधि औसत का 108 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
2024 में भारत में 934.8 मिमी वर्षा हुई, 2023 में 820 मिमी वर्षा हुई थी, जो औसत से 94.4% अधिक थी। कटऊ ने कहा कि पूरे मानसून के दौरान देश में 87 सेमी की दीर्घकालिक औसत बारिश का 106 प्रतिशत बारिश हो सकती है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम रविचंद्रन ने कहा कि इस मौसम में मानसून कोर जोन में सामान्य से अधिक (लंबी अवधि के औसत का 106 प्रतिशत से अधिक) बारिश होने की संभावना है।
मानसून कोर जोन में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा और आसपास के इलाके शामिल हैं। इस क्षेत्र में ज्यादातर बारिश दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान होती है और यह कृषि के लिए काफी हद तक इस पर निर्भर करता है। उत्तर-पश्चिम भारत में सामान्य बारिश होने की संभावना है, जबकि पूर्वोत्तर में सामान्य से कम बारिश हो सकती है।
आइएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि मध्य और दक्षिण भारत में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज किए जाने की संभावना है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आइएमडी) ने बीते सोमवार को कहा कि दक्षिण-पश्चिम मानसून अपनी सामान्य तारीख से 16 दिन पहले मुंबई पहुंच गया है। 1950 के बाद से पहली बार इसका इतनी जल्दी आगमन हुआ है। मानसून ने शनिवार को केरल में दस्तक दी, जो 2009 के बाद से भारत की मुख्य भूमि पर इतनी जल्दी इसका पहली बार आगमन है। उस साल यह 23 मई को इस राज्य में पहुंचा था।
दक्षिण-पश्चिम मानसून आमतौर पर एक जून तक केरल में प्रवेश करता है। 11 जून तक मुंबई पहुंचता है और आठ जुलाई तक पूरे देश को कवर कर लेता है। यह 17 सितंबर के आसपास उत्तर-पश्चिम भारत से लौटना शुरू कर देता है और 15 अक्टूबर तक पूरी तरह से लौट जाता है।
दक्षिण पश्चिम मानसून के भारत के लिए इतना खास होने की पहली वजह तो ये है कि जून से सितंबर तक की ये मानसूनी बारिश देश में सालाना बारिश का 70% है। यानी देश की पानी की जरूरतें सबसे ज्यादा इसी बारिश के भरोसे पूरी होती हैं। भारत में खेती की 60% जमीन सिंचाई के लिए मानसून के ही भरोसे है। धान, मक्का, बाजरा, रागी और अरहर जैसी खरीफ की फसलें दक्षिण पश्चिम मानसून के भरोसे ही रहती हैं।
मौसम विभाग ने आगामी कुछ दिनों में केरल, कर्नाटक, तटीय महाराष्ट्र और गोवा के कुछ इलाकों में बहुत से बहुत भारी बारिश होने की संभावना जताई है। साथ ही केरल, मुंबई शहर सहित कोंकण, मध्य महाराष्ट्र के घाट क्षेत्रों, कर्नाटक के तटीय और घाट क्षेत्रों में आज अत्यंत भारी बारिश की संभावना है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड में 31 मई तक गर्जन, हल्की बारिश, आकाशीय बिजली गिरने और 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवा चलने को लेकर येलो अलर्ट जारी किया गया है।
मौसम विभाग के अनुसार झारखंड में 10 जून से पहले मॉनसून के पहुंचने की सम्भावना है। यही वजह है विभिन्न जिलों में प्री मॉनसून की बारिश ही रही है।
इससे राज्य भर में तापमान में कमी आई है और लोगों को गर्मी से राहत मिली है। रांची और आसपास के इलाकों में सोमवार को बादल छाए रहे।
पिछले 24 घण्टों में राज्य में सबसे अधिक बारिश पश्चिमी सिंहभूम के ढालभूमगढ़ में 47.4 मिली मीटर रिकार्ड की गई। वहीं सबसे अधिक अधिकतम तापमान डालटेनगंज में 35.2 डिग्री और सबसे कम न्यूनतम तापमान 20.5 डिग्री सेल्सियस लातेहार में रिकॉर्ड किया गया।
वहीं रांची में सोमवार का अधिकतम तापमान 30, जमशेदपुर में 34.4, बोकारो में 33.1 और चाईबासा में तापमान 34.4 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया।
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