समाज

View All
Published / 2025-02-17 21:04:21
कुंभ ने युवामन को दी नये दौर के अध्यात्म तलाशने की जिज्ञासा

  • 20-25 साल के युवा बड़ी संख्या में महाकुंभ पहुंचे 
  • 20-25 साल के युवा भी बड़ी संख्या में इस बार प्रयागराज में जारी महाकुंभ में पहुंचे, गूगल व सोशल मीडिया पर भी महाकुंभ संबंधी कंटेंट की खोज की। संगम के जल में पवित्र डुबकी लगाने के बाद अपनी धार्मिक जिज्ञासाएं जाहिर करते नजर आये। तो क्या इसे युवा आध्यात्मिकता का एक नया ट्रेंड कहा जाये? यह भी कि नयी पीढ़ी के लिए धार्मिकता और आध्यात्मिकता जैसी धारणाओं के मायने क्या हैं? कहीं यह मात्र रील-प्रेरित सतही आध्यात्मिकता तो नहीं 

डॉ संजय वर्मा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अध्येताओं ने किशोर और युवावस्था के दौर की व्याख्या इस रूप में की है कि यह उम्र तीव्र वैचारिक भूख, जीवन के अर्थ व उद्देश्य की खोज और रिश्तों से जुड़ाव की इच्छा की होती है। इस उम्र में वह मानसिक द्वंद्व भी नजर आता है, जिसमें वे यह फैसला नहीं कर पाते हैं कि कोई विचार उनके जीवन के विकास और दिशा को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है। अटकाव और भटकाव के इस दौर में अक्सर ये किशोर और युवा वहां पहुंचने की कोशिश करते हैं जहां उन्हें अपने अंदर उठ रहे सवालों के जवाब मिल सकें। 

यह अकारण नहीं है कि इस बार प्रयागराज महाकुंभ 2025 में जुटे करोड़ों श्रद्धालुओं में एक बड़ी संख्या उन युवाओं की रही- जिन्हें जेनरेशन जेड कहा जाता है। जेनरेशन जेड में वे लोग आते हैं, जिनका जन्म 1990 और 2010 के बीच हुआ है। इनमें से ज्यादातर छात्र हैं या कुछ ऐसे हैं जिन्होंने कुछ साल पहले कोई नौकरी या कारोबार शुरू किया है। इस पीढ़ी के युवाओं की एक पहचान और है। इसी पीढ़ी ने अपने जवान होने की उम्र में फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप को पैदा होते और इन सोशल मीडिया मंचों को जवान होते हुए देखा है। 

इस पीढ़ी का महाकुंभ से जुड़ाव इस रूप में भी देखा जा सकता है कि इन युवाओं ने प्रयाग में डुबकी लगाने से पहले गूगल पर महाकुंभ के बारे में सर्च किया। इंस्टाग्राम पर आईआईटियन बाबा और चेहरे-मोहरे की सुंदरता के बल पर वायरल हुई युवती मोनालिसा को देखकर जिज्ञासावश जमघट लगाया। पर क्या उनकी इस जिज्ञासा और संशय की स्थिति को कहीं से भी उस युवा आध्यात्मिकता से जोड़ा जा सकता है- जिसकी इन दिनों महाकुंभ के प्रयोजन से चर्चा छिड़ी हुई है। 

तीर्थाटन में बढ़ी रुचि के मायने 

यात्राओं और होटल आदि की बुकिंग करने वाली वेबसाइट एलएक्सआईगो के आंकड़ों को सही मानें तो इस बार महाकुंभ में 20-25 साल के युवाओं की तादाद 45 या इससे ज्यादा की उम्र वालों की तुलना में काफी ज्यादा रही। बीते एक साल में धार्मिक स्थलों की यात्रा संबंधी बुकिंग में 150 फीसदी इजाफा हुआ है। शायद इसी बदलाव का असर है कि प्रयागराज के साथ-साथ काशी और अयोध्या पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ में उन युवाओं की भागीदारी ज्यादा दिखी जो शायद पहली बार इस तरह की धार्मिक-आध्यात्मिक यात्रा पर निकले हैं। 

लेकिन क्या उनकी इस यात्रा को आध्यात्मिकता की खोज कहें। या यह सिर्फ छापामार पर्यटन है जिसमें युवा हर दिन कुछ नया खोजने यहां से वहां जाने का उपक्रम करते दिखते हैं। एक बात तो बेखटके कही जा सकती है कि जिस फोमो (एफओएमओ) फीयर आफ मिसिंग आउट यानी कुछ छूट जाने या खो जाने का भय युवाओं को सताने लगा है, धर्मस्थलों की ओर उनकी दौड़ उस डर को कुछ अंशों में अभिव्यक्त करती है। ये युवा सोशल मीडिया पर अपना स्टेटस अपडेट करना चाहते हैं। 

दिखाना चाहते हैं कि महाकुंभ के दुर्लभ संयोग में संगम स्नान का पुण्य उन्होंने भी अर्जित किया है। कुछ अलग फील करने की चाह (जो कई बार युवाओं को नशे की राह पर ले जाती है) भी एक वजह है जो उन्हें इस आयोजन तक खींच ले गई। लेकिन उनकी उत्सुकता इतनी सतही भी नहीं कही जानी चाहिए। महाकुंभ पहुंचने वाले युवाओं में एक तबका ऐसा भी है जो भक्ति के रंग में रंगा, उत्साह से लबरेज और भारतीय संस्कृति को करीब से जानने-समझने की ललक लेकर वहां पहुंचा। उसे यह महसूस हुआ कि विविधि संस्कृतियों वाले इस महादेश को और उसकी आध्यात्मिकता की वास्तविकता को समझने के लिए इससे बेहतर कोई और जगह नहीं हो सकती। 

अध्यात्म के प्रति जिज्ञासा का भाव 

साधुओं की संगत में बैठकर स्मार्टफोन लेकर यह पूछते हुए वीडियो बनाते तमाम युवाओं को भी इस बार नोटिस किया गया, जो यह पूछ रहे थे कि आखिर सनातन धर्म क्या है, यह दूसरे धर्मों से कैसे और कितना अलग है? साधुओं का हठयोग क्या है? ये साधु कैसे न्यूनतम संसाधनों पर जीवित रह पाते हैं और कठिनतम स्थितियों का सामना कर पाते हैं? हालांकि युवाओं को इन आध्यात्मिक सवालों का समाधान जल्दी में चाहिए, पर उनकी इस जिज्ञासा को हल्के में नहीं लेना चाहिए। हो सकता है कि उनका अध्यात्म के प्रति जो आरंभिक रुझान है, वह उन्हें सच्ची आध्यात्मिकता की ओर ले जाए। 

आईआईटियन बाबा के रूप में मशहूर शख्स को एक मिसाल माना जा सकता है, जो युवा आध्यात्मिकता के नए ट्रेंड की पड़ताल करने और उसे सहेजने की मांग करता है। इन जिज्ञासाओं, व्याख्याओं और सोशल मीडिया पर प्रसारित-प्रचारित इंस्टा-रील्स के प्रसंग से यह सवाल उठा है कि क्या ये सब चीजें हमारे युवाओं के आध्यात्मिक रुझान को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं। और क्या यही वह युवा आध्यात्मिकता है, जिसे भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को जरूरत है। निश्चय ही इसमें पहला प्रसंग आईआईटी वाले बाबा का उठता है। 

दावा किया गया कि आईआईटी- बॉम्बे से डिग्री ले चुका और एक कंपनी में सालाना लाखों का वेतन पाने वाला एक युवा संन्यासी बन गया और बाबा के रूप में महाकुंभ में शामिल होकर उसने आध्यात्मिकता के नए पहलुओं को सामने रखा। वैसे तो कथित सांसारिकता से विमुख हुए आईआईटियन बाबा की अस्पष्ट सी बातों-व्याख्याओं में से अध्यात्म की गहरी समझ हासिल करने का दावा करना जल्दबाजी होगा, लेकिन एक पढ़े-लिखे शख्स के मुंह से अध्यात्म की बातें सुनना युवाओं को खूब भाया। इससे युवाओं की यह जिज्ञासा सामने आ गई है कि आखिर अध्यात्म में ऐसा क्या है कि वह पढ़े-लिखे लोगों को अपनी ओर खींच लेता है। 

एकाग्रता की कमी से जुड़े पहलू 

असल में जेनरेशन जेड कहलाने वाले युवाओं की दुनिया में इंटरनेट और खास तौर पर सोशल मीडिया मंचों ने जो बड़े बदलाव किए हैं, उनमें एक तो उनमें एकाग्रता की कमी (अटेंशन डेफिसिट) की शक्ल में किया है। मोबाइल इंटरनेट की तकनीकी ने युवाओं के दिमागों को उलझाने के लिए इतनी तेज गति से दृश्यों और सूचनाओं की बौछार शुरू की है जिसमें उन्हें हर क्षण खुद को व्यस्त रखने के लिए कुछ नया और रोमांचक चाहिए होता है। सोशल मीडिया पर सक्रिय ये युवा किसी एक चीज से बड़ी जल्दी ऊब जाते हैं। किसी एक मुद्दे पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। 

उन्हें किसी बहुत बड़ी तलब की तरह थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ अप्रत्याशित और आवेगपूर्ण कंटेंट की जरूरत होती है। इससे युवा दुनिया में एक नए किस्म के मनो-सामाजिक विकास का चरण कायम हुआ है, जिसमें वे अपनी एक मुकम्मल पहचाने बनाने के संकट से जूझ रहे हैं। इसमें कभी उन्हें साथियों और माता-पिता की अपेक्षाओं का दबाव झेलना पड़ता है तो कभी डिजिटल स्क्रीनों पर दिख रहे व तेजी से बदल रहे दृश्यों और सूचनाओं से तालमेल बिठाने की जरूरत महसूस होती है। ऐसी स्थितियों में वे कई बार खुद के बारे में वास्तविक और ईमानदार होने के बजाय इन चीजों का अभिनय मात्र करते हैं। ऐसा दूसरे लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर प्रदर्शित उदाहरणों के दबाव में होता है। 

अगर युवाओं का यह व्यवहार जारी रहता है, तो यह उन्हें छद्म किस्म की आत्म-अस्वीकृति और आत्म-धोखे की ओर ले जा सकता है। इन दबावों में वे यह सीख नहीं पाते हैं कि खुद के प्रति सच्चा होना क्या होता है और अपनी कमजोरियों को व्यक्त करते व स्वीकारते हुए कैसे आगे बढ़ा जाता है। ऐसे में वे आईआईटी बाबा के नाम से मशहूर हुए शख्स की तरह जटिल व्यक्तित्व बन सकते हैं। ऐसे युवाओं में सतत चिंता और अवसाद के लक्षण विकसित हो जाते हैं। यह दशा उनके स्वाभाविक विकास, कैरियर, रिश्तों और उनकी सामाजिक हैसियत को प्रभावित करती है। इनसे बचाव के लिए युवाओं को एक ऐसे सुरक्षात्मक माहौल की जरूरत होती है, जिसमें उनका परिवार, दोस्त, योग शिक्षक, एक संरक्षक या आध्यात्मिक गुरु उनका सही मार्गदर्शन कर सकता है। 

रील-प्रेरित आध्यात्मिकता 

हालांकि इस मामले में विडंबना यह है कि इसके लिए भी बहुत से युवा सोशल मीडिया की शरण में चले जाते हैं। वे उस रील-प्रेरित आध्यात्मिकता के जाल में फंस जाते हैं, जो छद्म है और खोखली है। ऐसे में उन्हें यह बताने की जरूरत है कि वह कौन सी आध्यात्मिकता है जिसकी उन्हें सच में जरूरत है। इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण शोध हुए हैं, जो बताते हैं कि युवा किस किस्म की आध्यात्मिकता में यकीन करते हैं। शोधकर्ता गैलप और बेजिला ने जो रिसर्च की है, वह बताती है कि नई पीढ़ी के युवाओं की आध्यात्मिकता ईश्वर में आस्था से जुड़ी है। 

इस शोध के मुताबिक अमेरिका में 95 फीसदी किशोर और युवा ईश्वर में विश्वास करते हैं। इसमें यह भी माना गया है कि आध्यात्मिकता और धार्मिक आयोजनों में भागीदारी को अमेरिकी समाज किशोरों के विकास का एक महत्वपूर्ण आयाम मानता है। सबसे दिलचस्प आंकड़े द प्रोजेक्ट टीन कनाडा में मिले। इसमें शोधकर्ताओं ने पाया कि उत्तरदाताओं ने खुद को एक धर्म के सदस्य के रूप में माना। अध्ययन में शामिल 60 फीसदी युवाओं ने आध्यात्मिकता को महत्वपूर्ण माना, जबकि 48 प्रतिशत युवाओं ने ऐसे संकेत दिए कि उनकी आध्यात्मिक जरूरतें हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के 236 कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 112,232 नये छात्रों पर आधारित अध्ययन में बताया गया कि 77 फीसदी छात्र इस बात से सहमत थे कि वे आध्यात्मिक प्राणी हैं। 

ये अध्ययन निश्चय ही आध्यात्मिकता को लेकर युवाओं के रुझान को स्पष्ट करते हैं, लेकिन समस्या यह है कि इनमें से ज्यादातर से यह पता नहीं चलता है कि आखिर वे किस आध्यात्मिकता की बात कर रहे हैं या जिसे वे आध्यात्मिकता कह रहे हैं, क्या वास्तव में वह अवधारणा इसकी परिभाषाओं से मेल खाती है। शोध अध्ययनों के अनुसार किशोरों और युवाओं के लिए आध्यात्मिकता के अर्थ सोशल मीडिया या रील-प्रेरित हैं और अत्यधिक सतही हैं। 

वे जीवन के लक्ष्यों, समाज और परिवार से संबंधों के बारे में अमूर्त ढंग से सोचते हैं और ऐसे समाधानों के प्रति आकर्षित हो जाते हैं जो अव्यावहारिक हैं। ऐसे युवाओं को कुछ देर सांस रोककर ध्यान में बैठ जाना ही आध्यात्मिकता लगता है। बहुत हुआ तो पालतू पशुओं को खाना खिला देना ही उनके लिए आध्यात्मिकता है। इस आध्यात्मिकता में न तो उन्हें अपने चित्त-मन को शांत करना सिखाया जाता है और न ही यह बताया जाता है कि जीवन का असली मतलब क्या है।

जिंदगी के अर्थ से जुड़े गंभीर प्रश्न

जिंदगी के बारे में वे (युवा) अक्सर कुछ सवाल तो उठाते हैं, लेकिन उनके प्रश्न ह्लजीवन के अर्थह्व या ह्लजीवन में उद्देश्यह्व के उस बड़े दायरे को लेकर संबोधित नहीं होते हैं जो तीन परस्पर संबंधित मुद्दों से जुड़े होते हैं। ये तीन मुद्दे हैं- एक, जीवन का अर्थ क्या है। अर्थात हमारा या मनुष्य का जीवन क्या दशार्ता है, इसके अस्तित्व का क्या महत्व है। दो, जीवन की सार्थकता किसमें है। यानी क्या जीवन जीने योग्य या उद्देश्यपूर्ण है। और तीन, जीवन में हमारा उद्देश्य क्या है। यह मुद्दा जीवन के लक्ष्य, पूरा किए जाने वाले कार्य से संबंधित है। 

इतिहास देखें तो युवाओं और किशोरों के व्यवहार में अध्यात्म प्रेरित जीवन के अर्थ का महत्व और स्पष्ट होता है। जैसे, 1930 के दशक में युवाओं ने नाजी जर्मनी में हिटलर का समर्थन किया था क्योंकि तब उनका मानना था कि जातीय रूप से श्रेष्ठ जर्मनी का निर्माण उनका जीवन मिशन था। इसी तरह 1960 के दशक में कम्युनिस्ट चीन में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान, रेड गार्ड्स ने सर्वहारा वर्ग के दुश्मनों के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी। क्योंकि उन्होंने पाया था कि कम्युनिस्ट यूटोपिया का निर्माण उनका पवित्र जीवन लक्ष्य था। 

इसी तरह, अफ्रीका के कई युवा अपने देशों के लिए बदलावों की चाहत में सैन्य गतिविधियों में भाग लेते हैं। ये सारी गतिविधियां समय, काल और परिवेश के अनुसार आध्यात्मिक आदर्श कही जा सकती हैं। साफ है कि ऐसे उद्देश्यों के बिना अध्यात्म को जानने, समझने या समझाने की कोई प्रेरणा ऊपरी चमक-दमक से प्रेरित है। इस आध्यात्मिकता से कोई भला नहीं हो सकता है।

युवाओं के लिए आध्यात्मिकता क्यों जरूरी

बहुत से लोगों का मत है कि आध्यात्मिकता को जानने, समझने और हासिल करने की एक उम्र होती है जो बुढ़ापे की ओर अग्रसर व्यक्तियों के लिए जरूरी है। जबकि सच यह है कि आध्यात्मिकता युवाओं के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि किसी अन्य आयु वर्ग के लिए। जबकि किशोरावस्था या युवावस्था में आध्यात्मिकता की सहज खोज का फायदा यह है कि कम उम्र में ही उन मुद्दों और तत्वों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है जो किसी के जीवन को और जिंदगी जीने के नजरिये को और बेहतर बना सकते हैं। 

युवाओं के लिए आध्यात्मिकता से जुड़ाव का पहला विशेष कारण यह है कि इससे युवा अपनी मानसिक क्षमताओं का सही दिशा में इस्तेमाल करना सीख सकते हैं। कई बाहरी और आंतरिक दबाव झेल रहे और भय, चिंता, पछतावे, बेचैनी और अति-उत्साह से भरी जिंदगी में आध्यात्मिक चेतना युवाओं को सही रास्ता दिखा सकती है। हालांकि युवाओं को आध्यात्मिकता की आरंभिक समझ देना ही काफी नहीं है। आध्यात्मिकता के विकास में उनका सक्रियता से चिंतन करना और आध्यात्मिकता के वास्तविक स्वरूप को अनुभव करना भी महत्वपूर्ण है। 

जैसे, उनमें यह समझ विकसित होनी चाहिए कि इस पृथ्वी पर एक मनुष्य के रूप में हम क्यों मौजूद हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है और हम कहां जा रहे हैं? यदि हम सचेत हैं तो हमें क्या करना चाहिए? ये महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रश्न हैं जो सचेत चिंतन की मांग करते हैं। अधिक अनुभव पाने और चिंतन करने के अलावा, धार्मिक समूहों और समारोहों में शामिल होना आध्यात्मिकता विकसित करने का एक अच्छा अवसर प्रदान करता है। शोधकर्ताओं ब्रूस और कॉकरेहम ने समाजसेवा या सामूहिक कार्यों में भागीदारी को अनिवार्य करने के रूप में युवाओं में आध्यात्मिकता को बढ़ावा देने के विभिन्न तरीकों का प्रस्ताव दिया। 

इन शोधकर्ताओं का सुझाव युवाओं में आध्यात्मिकता को बढ़ावा देने के लिए पाठ्यक्रम-आधारित कार्यक्रमों का उपयोग करने का भी है। आध्यात्मिक चेतना कैसे सोशल मीडिया और जीवन के उलझावों के बीच कैसे एक बेहतर राह सुझा सकती है, इसे एक लकड़हारे का उदाहरण देकर लेखक स्टीफन कोवे ने अपनी किताब- द सेवन हैबिट्स आफ हाइली इफेक्टिव पीपल में समझाया है। उन्होंने लिखा कि लकड़हारा पेड़ों को काटने में इतना व्यस्त रहता है कि उसके पास अपनी कुल्हाड़ी और आरी की धार को तेज करने का समय नहीं होता है। इससे भोथरी धार वाली कुल्हाड़ी या आरी से पेड़ों को काटने में अतिरिक्त श्रम और समय लगता है। 

इस कारण लकड़हारा अपनी दक्षता खो देता है और लक्ष्य हासिल करने में नाकाम होता है। लेकिन जब आध्यात्मिकता की मदद से उसमें मन को शांत और एकाग्र करने वाले गुणों का विकास होता है, तो वह धैर्यवान बनता है और अपनी क्षमताओं और दक्षताओं का सही दिशा में इस्तेमाल कर पाता है। असल में, आध्यात्मिकता की समझ विकसित होने से जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए आंतरिक शक्ति का विकास होता है। ऐसी आध्यात्मिकता हमारे जीवन को एक उच्च अर्थ और उद्देश्य देती है। यह समझ विकसित होती है कि सफलता बाहरी उपलब्धियों में निहित नहीं है। बल्कि अगर किसी के पास मन की शांति, अच्छा स्वास्थ्य और परिवार और दोस्तों से सौहार्दपूर्ण संबंध नहीं हैं, तो पैसे, प्रसिद्धि और ताकत से मिली सफलता बेमानी है। -लेखक मीडिया यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

Published / 2025-02-17 18:21:24
श्री श्याम ध्वजा निशान पदयात्रा दो मार्च को, तैयारियां जोरों पर

टीम एबीएन, रांची। श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा समिति के तत्वावधान में 2 मार्च 2025 दिन- रविवार को रांची नगर में राजस्थान के खाटू श्रीश्याम जी के परंपरा के अनुसार ही श्री श्याम ध्वजा निशान पदयात्रा का आयोजन होने जा रहा है। जिसकी तैयारियां जोरों पर है। 

श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा समिति के संयोजक गोपाल मुरारका एवं प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि 2 मार्च को श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा रांची के नेवरी विकास विद्यालय के समीप श्री दुर्गा मंदिर से सुबह 8 बजे बाबा श्री श्याम का ध्वजा पदयात्रा शुरू होकर नगर के प्रमुख मार्गो बूटी मोड़ बरियातू रोड, सर्कुलर रोड, कचहरी रोड, मेन रोड, अप्पर बाजार भ्रमण करते हुए श्री खाटू श्री श्याम मंदिर हरमू रोड में ध्वजा समर्पण के साथ समाप्त होगी। 

इस यात्रा की दूरी श्री खाटू धाम की परंपरा अनुसार 17 किलोमीटर रिंगस से खाटू धाम की है। यूं तो इस पावन माह में कई ध्वजा पदयात्राएं होती है पर इस यात्रा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जो भी भक्त श्री श्याम प्रभु की निशान को अपनी मन की बात कहता है और उसे सच्चे विश्वास से श्री श्याम प्रभु को अर्पित करता है तो बाबा उन भक्तों की सारी मुरादे पूरी करते हैं।

इसी परंपरा के अनुसार रांची में विगत 3 वर्षों से श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा समिति द्वारा यह आयोजन हो रहा है। उन्होंने बताया कि 2 मार्च को श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा के निशान कार्ड हेतु श्याम प्रेमी मोबाइल नं- 9835 111002, 82922 61009, 95340 33233, 82355 75481,से अतिशीघ्र संपर्क कर अपना नाम लिखवाकर ध्वजा निशान कार्ड प्राप्त कर सकते हैं।

कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु- हरिशंकर परशुरामपुरिया, ललित कुमार पोद्दार, गोपाल मुरारका, राजेश ढांढनियां, अशोक लाडिया, रवि चौधरी, संजय परशुरामपुरिया, मनोज खेतान, प्रवीण सिंघानिया, विष्णु चौधरी, हेमंत जोशी, आनंद चौधरी, प्रदीप अग्रवाल, रोहित अग्रवाल, प्रमोद परशुरामपुरिया, अमित शर्मा, संजय सर्राफ, नवीन डोकानियां, निकुंज पोद्दार, सूरज लोधा सहित अन्य श्याम भक्त जोर-शोर से तैयारियां में लगे हैं। उक्त जानकारी श्री श्याम ध्वजा पदयात्रा समिति, रांची के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।

Published / 2025-02-16 22:13:40
केवल पूजन मात्र से सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं अशोक सुंदरी

  • भगवान शिव की पुत्री अशोक सुंदरी के जन्म और विवाह की कथा 

राजकुमारी पाण्डेय

एबीएन सोशल डेस्क। भगवान शिव की एक पुत्री का नाम अशोक सुंदरी था। हालांकि महादेव की और भी पुत्रियां थीं जिन्हें नागकन्या माना गया- जया, विषहर, शामिलबारी, देव और दोतलि। अशोक सुंदरी को भगवान शिव और पार्वती की पुत्री बताया गया इसलिए वह गणेशजी की बहन है। इनका विवाह राजा नहुष से हुआ था।

पद्मपुराण अनुसार अशोक सुंदरी देवकन्या हैं। दरअसल, माता पार्वती के अकेलेपन को दूर करने हेतु कल्पवृक्ष नामक पेड़ के द्वारा ही अशोक सुंदरी की रचना हुई थी। एक बार माता पार्वती विश्व में सबसे सुंदर उद्यान में जाने के लिए भगवान शिव से कहा। तब भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती को नंदनवन ले गये। वहां माता को कल्पवृक्ष से लगाव हो गया और वे उस वृक्ष को लेकर कैलाश आ गईं।

कल्पवृक्ष मनोकामना पूर्ण करने वाला वृक्ष है। पार्वती ने अपने अकेलेपन को दूर करने हेतु उस वृक्ष से यह वर मांगा कि उन्‍हें एक कन्या प्राप्त हो। तब कल्पवृक्ष द्वारा अशोक सुंदरी का जन्म हुआ। माता पार्वती ने उस कन्या को वरदान दिया कि उसका विवाह देवराज इंद्र जैसे शक्तिशाली युवक से होगा।

इसी वरदान के असर के कारण एक बार अशोक सुंदरी अपनी दासियों के साथ नंदनवन में विचरण कर रही थीं तभी वहां हुंड नामक राक्षस  आया। जो अशोक सुंदरी की सुंदरता से मोहित हो गया और उसने अशोक सुंदरी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।लेकिन अशोक सुंदरी ने अपने वरदान और विवाह के बारे में बताया कि उनका विवाह नहुष से ही होगा। 

यह सुनकर राक्षस ने कहा कि वह नहुष को मार डालेगा। ऐसा सुनकर अशोक सुंदरी ने राक्षस को शाप दिया कि जा दुष्ट तेरी मृत्यु नहुष के हाथों ही होगी। यह सुनकर वह राक्षस घबरा गया। तब उसने राजकुमार नहुष का अपहरण कर लिया। लेकिन नहुष को राक्षस हुंड की एक दासी ने बचा लिया। इस तरह महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में नहुष बड़े हुए और उन्होंने हुंड का वध किया। 

इसके बाद नहुष तथा अशोक सुंदरी का विवाह हुआ हुआ। विवाह के बाद अशोक सुंदरी ने ययाति जैसे वीर पुत्र तथा सौ रुपवती कन्याओं को जन्म दिया। ययाति भारत के चक्रवर्ती सम्राटों में से एक थेऔर उन्हीं के पांच पुत्रों से संपूर्ण भारत पर राज किया था। उनके पांच पुत्रों का नाम था-  1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है।

Published / 2025-02-15 21:43:40
बाबा मंदिर कलश यात्रा में शामिल हुए हजारों लोग : सुनील कुमार गुप्ता

टीम एबीएन, रांची। आज दिनांक 15/ 2/ 2025 को बाबा मंदिर न्यू मधुकम रोड नंबर 5अ/7 रांची के प्रांगण से बाबा मंदिर प्राण प्रतिष्ठ समारोह के प्रथम दिन कलश शोभा यात्रा में हजारों की संख्या में माताएं -बहनों ने हर्षोल्लाष के साथ शामिल हुए। बाबा मंदिर के अध्यक्ष पंकज सिन्हा ने कहा कि इस आयोजन में हमारे संस्थापक संरक्षक सुनील कुमार गुप्ता, संरक्षक अनिल कुमार गुप्ता और बाबा मंदिर के तमाम पदाधिकारियों का बहुत योगदान रहा है। इस प्रकार से सहयोग से हमारी संस्था सभी कार्यों को सुदृढ़ रूप से सफल कर लेंगे। 

संस्थापक सह संरक्षक सुनील गुप्ता ने कहा कि बाबा मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के  कलश यात्रा में रांची के कई क्षेत्रों से महिलाएं कलश लेने के लिए आये जिसके लिए उनका तहे दिल से सुक्रिया किया, साथ ही सभी को 16/02/25 को 3:00 बजे मूर्ति  नगर भ्रमण के लिए आमंत्रित किये। 

संरक्षक अनिल गुप्ता ने संस्था के सभी पाधिकारियों का आभार वयक्त करते हुए कहा कि यह चार दिन की पूजा को सफल बनाने के लिए हम अपना 24/4 घंटा साथ रहने का आह्वान के साथ जिस प्रकार क्षेत्र की श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ रहा है इस से प्रतीत होता है की हिन्दू अब जाग चुका है। 
मुख्य अतिथि के रूप में रांची विधायक सीपी सिंह जी  उपस्थित हुए और अपने हाथों से कलश, चनारी, और जय माता दी का पट्टा वितरण किये जिससे संस्था और श्रद्धालुओं ने अपने आप गौरवान्वित महसूस किया।  

इस आयोजन इस आयोजन का सफल बनाने में विशिष्ट अतिथि के रूप में आये चुन्नू मिश्रा, पूर्व पार्षद आशा देवी, अतिथि भीम प्रभाकर, जितेंद्र वर्मा, मुकेश मुक्ता, विनोद राजन जुटे हुए थे। वहीं पदाधिकारी अध्यक्ष- पंकज सिन्हा, उपाध्यक्ष- कृष्णा राज,  सचिव -अनिल प्रमाणिक, कोषाध्यक्ष - चंदन कुमार, सतीश कुमार, कार्यकारणी अध्यक्ष- कंचन राय, कार्यकारणी उपाध्यक्ष- राकेश रंजन कुमार, समाज सेवी- राजेश खंडेलवाल , वरिष्ठ समिति सलाहकार- भवन किशोर प्रसाद, संगठन मंत्री- सुनील साव, अनुज शर्मा, प्रमोद शर्मा,रमेश कुमार साव, राजेश विश्वकर्मा,सुनील कुमार मिस्त्री, संतोष गुप्ता, सहयोगी सदस्य राहुल गुप्ता, विनोद राजन, ऋषभ गुप्ता, सागर गुप्ता, सूरज साव, बबलू साव, अनिल गुप्ता, मधुकर सिंह, धनञ्जय सोनी, अन्य सदस्यों का साथ रहा। उक्त जानकारी विनोद राजन ने दी।

Published / 2025-02-15 20:33:52
13 को होलिका दहन और 15 को होली

संतोष पांडेय (सोनु)

एबीएन सोशल डेस्क। रंगों का महीना फाल्गुन शुरू हो गया है। यह महीना शुरू होते ही भक्त श्याम प्रभु के दर्शन के लिए खाटू धाम व कान्हा के दर्शन के लिए वृंदावन जाने लगे हैं। फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष में एक तिथि की वृद्धि होने के कारण यह पक्ष सोलह दिनों का है। इस पक्ष में सप्तमी तिथि की वृद्धि है। 16 फरवरी को संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत है। 21 को जानकी जयंती, 24 को विजया एकादशी, 25 को भौम प्रदोष व्रत और 26 को महाशिवरात्रि है।

27 फरवरी को श्राद्ध की अमावस्या और 28 फरवरी को स्नान दान की अमावस्या है। वहीं एक को द्वितीया है। इस पक्ष में प्रतिपदा तिथि की हानि होने के कारण यह पक्ष 14 दिनों का है। इस पक्ष में होलिका दहन व होली का त्योहार मनाया जायेगा। 13 मार्च को होलिका दहन है। इस दिन व्रत की पूर्णिमा है। होलिका दहन भद्रा बाद रात्रि 10.44 बजे होगा। 

गुरुवार को दिन के 10.02 बजे के बाद से पूर्णिमा लग रहा है, जो 14 मार्च को दिन के 11.12 बजे तक रहेगा। पंडित संतोष कुमार पांडेय (सोनु) ने कहा कि 14 को स्नान दान की पूर्णिमा होने के कारण 15 को होली का त्योहार मनाया जायेगा। 14 को केवल काशी में होली मनायी जायेगी। तीन मार्च को वैनायकी गणेश चतुर्थी का व्रत होगा। 

वहीं 10 मार्च को आमल की एकादशी है। 11 मार्च को भौम प्रदोष व्रत है। 13 मार्च को व्रत की पूर्णिमा है। इस दिन दिन के 10.02 से रात 10.37 बजे तक भद्रा है। इस कारण भद्रा के बाद होलिका दहन होगा। मिथिला पंचांग के अनुसार रात 10.47 के बाद होलिका दहन होगा। वहीं 15 मार्च को होली मनायी जायेगी।

Published / 2025-02-15 20:28:55
श्री राधा-कृष्ण मंदिर में महिलाओं ने किया भजन- कीर्तन और हनुमान चालीसा पाठ

टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित पुंदाग श्री राधा- कृष्ण मंदिर श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवा धाम मे श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि महिला मंडल ने भजन-कीर्तन एवं हनुमान चालीसा का पाठ किया। महिला मंडल के सदस्यों द्वारा गाये सुमधुर संगीतमय भजनों एवं हनुमान चालीसा के पाठ में श्रोता खूब झूमे एवं पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

पुजारी अरविंद पांडे पूरे विधि विधान से पूजा अर्चना कर श्री राधा कृष्ण के भोग लगाकर प्रसाद वितरण किया। दोपहर मे सेवा धाम सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम मे रह रहे मंदबुद्धि, बेसहारा एवं दीनबंधु प्रभु जी एवं उनकी सेवा करने वाले साथियों को भोजन कराया गया। 

मंदिर के शीश महल में विराजमान भगवान श्री राधा -कृष्ण, श्रीमद् भागवत गीता ग्रंथ, भगवान का वस्त्र, मोर मुकुट, मुरली की पूजा अर्चना किया जा रहा है। मंदिर में श्री कृष्ण की जन्म से लेकर महाभारत तक की झांकियां मुख्य आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। उक्त जानकारी श्री कृष्णा प्रणाम सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।

Published / 2025-02-13 21:29:38
बाल विवाह मुक्त भारत में सभी करें सहयोग : डॉ वीरेंद्र कुमार

केंद्रीय मंत्री डॉ वीरेंद्र कुमार ने कहा, बाल विवाह मुक्त भारत बनाने में धर्मगुरु व नागरिक समाज संगठन करें सहयोग

एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ वीरेंद्र कुमार ने विभिन्न धर्मों के धर्मगुरुओं व विवाह संपन्न करने वाले पुरोहितों से बाल विवाह के खात्मे के लिए सरकार के प्रयासों में सहयोग करने का आह्वान करते हुए कहा कि सबके मिले- जुले प्रयासों से अतीत में भारत ने सती प्रथा जैसी कई कुप्रथाओं का सफलतापूर्वक उन्मूलन किया है। 

ऐसे में कोई कारण नहीं कि हम बाल विवाह की बुराई को देश से खत्म नहीं कर पाएं। वे आकांक्षी जिला एवं प्रखंड कार्यक्रम के अंतर्गत एसोसिएशन फॉर वालंटरी एक्शन (एवीए) की बाल अधिकार कार्यकर्ताओं की चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। एवीए बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए देश के 416 जिलों में काम कर रहे 250 से भी ज्यादा गैरसरकारी संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी संगठन है।

डॉ वीरेंद्र कुमार ने कहा कि हम वो देश हैं जिसने एक बार कुछ ठान लिया तो फिर कुछ भी असंभव नहीं है। हमने सती प्रथा जैसी कई कुरीतियों का खात्मा किया है। ऐसे में हमें पूर्ण विश्वास है कि बाल विवाह का भी खात्मा होगा। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में हमारी सरकार बाल विवाह मुक्त भारत के सपने को पूरा करने और बच्चों के चौतरफा कल्याण और सशक्तीकरण के लिए काम कर रही है।

जेआरसी के सहयोगी एवीए ने हाल ही में देश के 12 राज्यों के 73 आकांक्षी जिलों के 104 प्रखंडों के 15,000 गांवों में बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा व सशक्तीकरण और इन गांवों को बाल विवाह मुक्त घोषित करने के लिए नीति आयोग से हाथ मिलाया है। एवीए वर्षों से बाल मजदूरी और बच्चों की ट्रैफिकिंग की रोकथाम के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले अग्रणी संगठन के तौर पर बच्चों को ट्रैफिकिंग गिरोहों और उनका शोषण करने वाले नियोक्ताओं से उन्हें मुक्त करा रहा है। 

डॉ वीरेंद्र कुमार ने कहा कि नागरिक संगठनों और विभिन्न धर्मगुरुओं के सहयोग से एक जागरूक समाज सफलतापूर्वक बाल विवाह की रोकथाम कर सकता है। इसके लिए सभी धर्मों के धर्मगुरुओं को अपनी मान्यताओं और परंपराओं को परे रखते हुए 2030 तक बाल विवाह मुक्त भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए दृढ़संकल्प और प्रतिबद्धता के साथ काम करना चाहिए। 

देशभर से आये बाल अधिकार कार्यकर्ताओं और जिला समन्वयकों को संबोधित करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा कि नीति आयोग के साथ एवीए का यह सहयोग बाल विवाह, बाल मजदूरी और बच्चों की ट्रैफिकिंग के खात्मे के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। ऋभु ने कहा, भारत एक ऐसा विश्वगुरु बनने की राह पर है जो वंचितों, शोषितों को उनके हक दिलाने की अगुवाई करेगा। 

आज हमारे कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि पूरी दुनिया हमें देख रही है। अगर हम हर जरूरतमंद बच्चे को शिक्षा और सरकारी योजनाओं से जोड़ सकें तो यह साझेदारी बाल विवाह और बच्चों की ट्रैफिकिंग रोकने की दिशा में एक मील का पत्थर और अहम पड़ाव साबित हो सकती है। बाल विवाह-मुक्त भारत अब महज संभावना नहीं बल्कि यह अवश्यंभावी है। 

2030 तक देश से बाल विवाह के खात्मे के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें रोकथाम, सुरक्षा और कानूनी कार्रवाई की समग्र रणनीति पर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि आज जमीनी स्तर पर हो रहे बदलाव व्यापक स्तर पर बनने वाली नीतियों को प्रभावित कर रहे हैं और व्यापक नीतियां अब जमीनी स्तर पर बच्चों तक पहुंच रही हैं। इस खबर से संबंधित अधिक जानकारी के लिए जितेंद्र परमार (8595950825) से संपर्क करें।

Published / 2025-02-13 21:27:41
ट्रेन में गूंजी किलकारी, हो रही रेलवे की तारीफ

महिला को उठी प्रसव पीड़ा, चलती ट्रेन में दिया बच्ची को जन्म, अब हर तरफ हो रही रेलवे की तारीफ

टीम एबीएन, रांची। झारखंड के रांची में एक महिला ने चलती ट्रेन में बच्ची को जन्म दिया। मासूम की किलकारी सूरत से आ रही सूरत-मालदा टाउन एक्सप्रेस में गूंजी है। रिपोर्ट के मुताबिक रेलवे प्रशासन ने ग्रीन कॉरिडोर बनाकर ट्रेन को हटिया रेलवे स्टेशन पहुंचाया, जहां महिला ने रेलवे अस्पताल में स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। इसके लिए रेलवे अधिकारियों ने तत्परता दिखायी और यात्रियों के सहयोग से ये संभव हो सका।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बच्ची को जन्म देने वाली मां का नाम ऊषा देवी है, वह सूरत से रांची आ रही थी। राउरकेला स्टेशन से ट्रेन के आगे बढ़ाने के बाद उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। फिर हटिया स्टेशन पर ट्रेन पहुंची तो उसे मेडिकल हेल्प दी गयी। इसके बाद यात्रियों को इसकी सूचना दी। कुछ देर बाद महिला का ट्रेन में ही प्रसव हो गया। यात्रियों ने रेलवे प्रशासन को सूचित किया। 

यहां रांची रेल मंडल ने त्वरित कार्रवाई करते हुए गोविंदपुर रेलवे स्टेशन में महिला यात्री को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई, इसी के साथ ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया, ताकि ट्रेन हटिया स्टेशन से पहले कहीं न रुक सके। बता दें कि हटिया स्टेशन पर ट्रेन के आने से पहले वहां मेडिकल टीम मौजूद थी।  ट्रेन के आते ही महिला यात्री को प्राथमिक उपचार के लिए भेजा गया। यहां बेहतर चिकित्सा के लिए मंडल रेल अस्पताल हटिया लाया गया, जहां डॉक्टर ने जांच के बाद बताया कि मां और बच्ची दोनों सुरक्षित और स्वस्थ हैं। 

महिला यात्री को तत्काल सहायता उपलब्ध करायी गयी और ग्रीन कॉरिडोर के जरिए ट्रेन को शीघ्र हटिया पहुंचाया गया। इसपर सीनियर डीसीएम निशांत कुमार ने मीडिया को बताया कि यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के लिए रेलवे प्रशासन हमेशा तत्पर रहा है। ऐसे में अब रेलवे की इस सेवा की हर तरफ तारीफ हो रही है।

Page 58 of 219

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

Tranding

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse