टीम एबीएन, रांची। अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन एवं झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त तत्वावधान में सामाजिक जीवन में संस्कार और शुचिता-चर्चा एवं चिंतन जैसे अत्यंत सामयिक एवं प्रासंगिक विषय पर एक विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन रांची के हरमू रोड स्थित मारवाड़ी भवन परिसर में किया गया।
इस महत्वपूर्ण आयोजन में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े बुद्धिजीवियों, पदाधिकारियों एवं गणमान्य नागरिकों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों के पारंपरिक स्वागत से हुआ, जिसमें पदाधिकारियों द्वारा सभी आगंतुकों को पुष्प गुच्छ प्रतीक चिन्ह एवं अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के अध्यक्ष श्री सुरेश चंद्र अग्रवाल ने की, जबकि संचालन राजेश कौशिक एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रांतीय महामंत्री विनोद कुमार जैन ने कुशलतापूर्वक निभाया।
मौके पर विषय प्रवर्तक के रूप में कोलकाता से पधारे डॉ. संजय हरलालका ने अपने उद्बोधन में संस्कार और शुचिता के महत्व को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भौतिकता के बढ़ते प्रभाव के कारण सामाजिक मूल्यों में गिरावट देखी जा रही है, ऐसे में संस्कारों का संरक्षण और शुचिता का पालन अत्यंत आवश्यक हो गया है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि परिवार ही संस्कारों की पहली पाठशाला होता है और यदि हम अपने बच्चों को सही दिशा देना चाहते हैं, तो हमें स्वयं आदर्श प्रस्तुत करना होगा।
प्रमुख वक्ता के रूप में पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री गोवर्धन गाड़ोदिया ने अपने विचार रखते हुए कहा कि समाज की मजबूती उसके नैतिक मूल्यों पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि संस्कार केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति है, जो व्यक्ति को सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाती है। उन्होंने समाज में शुचिता बनाये रखने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया और युवाओं को इस दिशा में अग्रसर होने का आह्वान किया।
पूर्व सांसद महेश पोद्दार ने अपने संबोधन में सामाजिक जिम्मेदारियों की चर्चा करते हुए कहा कि आज के दौर में व्यक्ति अपने व्यक्तिगत हितों में इतना उलझ गया है कि सामूहिक हितों की अनदेखी हो रही है। उन्होंने कहा कि शुचिता केवल बाहरी व्यवहार तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह हमारे विचारों, आचरण और निर्णयों में भी परिलक्षित होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि समाज में नैतिकता और पारदर्शिता को बढ़ावा दिया जाए, तो अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान स्वत: हो सकता है। इस संगोष्ठी में अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पवन कुमार गोयनका ने वर्चुअल माध्यम से जुड़कर अपने विचार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि मारवाड़ी समाज अपनी परंपराओं, संस्कारों और नैतिक मूल्यों के लिए सदैव जाना जाता रहा है और इन मूल्यों को बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने इस प्रकार के विचार-विमर्श को समय की आवश्यकता बताते हुए आयोजकों की सराहना की।
अध्यक्षीय उद्बोधन में सुरेश चंद्र अग्रवाल ने कहा कि समाज को सशक्त बनाने के लिए संस्कारों की नींव को मजबूत करना अनिवार्य है। उन्होंने सभी वक्ताओं के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि इस संगोष्ठी के माध्यम से जो संदेश समाज को मिला है, वह निश्चित रूप से सकारात्मक परिवर्तन लाने में सहायक होगा।अंत में, कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए सभी आयोजकों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया। यह संगोष्ठी न केवल एक विचार-विमर्श का मंच बनी, बल्कि समाज को नयी दिशा देने का भी कार्य किया, जिसमें संस्कार और शुचिता के महत्व को पुन: स्थापित करने का सार्थक प्रयास किया गया।
मौके पर ओम प्रकाश अग्रवाल, सज्जन पाड़िया, विनोद जैन, पवन पोद्दार, प्रमोद अग्रवाल, कौशल राजगढ़िया, अनिल अग्रवाल, सुभाष पटवारी, संजय सर्राफ, निर्मल बुधिया, किशन साबू, रमन बोडा, चंडी प्रसाद डालमिया, रवि शंकर शर्मा, विनोद महलका, अशोक नारसरिया, रतन बंका, अरुण भरतिया, प्रकाश बजाज, प्रमोद बगड़िया, राजेश भरतिया, ललित पोद्दार, अरुण जोशी, राजकुमार मित्तल, अजय डीडवानिया, विकास अग्रवाल कमल खेतावत, विजय कुमार खोवाल, भरत बगड़िया, किशन अग्रवाल, रौनक झुनझुनवाला, विनीता सिंघानिया, रीना सुरेखा, छाया अग्रवाल, सीमा पोद्दार, प्रीति फोगला सहित बड़ी संख्या में सदस्य गण उपस्थित थे। उक्त जानकारी झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने दी।
टीम एबीएन, रांची । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर आज दिनांक 11 अप्रैल 2026 को रांची के प्रतिष्ठित फिरायलाल बैंक्वेट हॉल में एक प्रमुख जन गोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख श्री रामलाल जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक रूप से भारत माता के पवित्र चित्र पर समस्त उपस्थितजन द्वारा पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई, उसके पश्चात दीप प्रज्वलन कर शुभारंभ किया गया। प्रांत संपर्क प्रमुख श्री राजीव कमल बिट्टू जी ने विषय-प्रवेश करते हुए सभी प्रमुख जनों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन किया।
अपने सरस, प्रेरणादायी एवं तथ्यपरक उद्बोधन में श्री रामलाल जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना, विकास यात्रा, मूल उद्देश्यों एवं कार्यपद्धति पर प्रकाश डालते हुए समाज के सामने संघ का वास्तविक स्वरूप प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार एक जन्मजात स्वयंसेवक थे। उनके जीवन की अनेक घटनाएं इस तथ्य को स्पष्ट करती हैं।
उन्होंने वंदे मातरम गान किया था, जिसके कारण अंग्रेजी शासन ने उन्हें स्कूल से निष्कासित कर दिया था। डॉ. हेडगेवार का सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रभाव, संगठन एवं समाज-निर्माण के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का प्रतीक है। संघ की स्थापना के समय से ही डॉ. हेडगेवार की दृष्टि हिंदू समाज को संगठित करने, भेदभाव रहित समाज का निर्माण करने पर केंद्रित रही।
श्री रामलाल जी ने स्पष्ट किया कि संघ का मूल ध्येय सज्जन शक्ति से युक्त, संगठित, आत्मनिर्भर एवं राष्ट्रहित में समर्पित समाज का निर्माण करना है। श्री रामलाल जी ने कहा कि समाज में आरएसएस के विषय में अनेक गलत धारणाएं प्रचलित हैं। ऐसी प्रमुख जन गोष्ठियां उन सभी संदेहों, भ्रांतियों को स्पष्ट करने का सबसे सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य व्यवहार और प्रवृत्ति से जाना जाता है, न कि प्रचार से।
देश विभाजन (1947) के कालखंड का विशेष उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि उस विकट समय में द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) ने स्वयंसेवकों को निर्देश दिया था - हर हिंदू जब तक विभाजन से दूसरे भाग (पाकिस्तान) में न पहुंचे, तब तक तुम सभी यहीं रहना। आखिरी हिंदू के निकलने के बाद ही तुम जाओ। ऐसी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी संघ स्वयंसेवकों ने पीड़ित हिंदुओं की सहायता, सुरक्षा और सुरक्षित पुनर्वास के लिए समर्पण भाव से कार्य किया। सेवा कार्यों का विशेष उल्लेख करते हुए श्री रामलाल जी ने कहा कि संघ स्वयंसेवक किसी भी भेदभाव के बिना समाज के प्रत्येक वर्ग की सेवा करते हैं।
चरखी दादरी विमान दुर्घटना का जीवंत उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि उस विमान में अरब देशों के यात्री थे, जिनमें अधिकांश मुस्लिम परिवार थे। फिर भी संघ के स्वयंसेवकों ने मानवता को सर्वोपरि रखते हुए निष्कपट सेवा की। इस अलौकिक सेवा कार्य के लिए वहां के लोगों ने संघचालक को मस्जिद में बुलाकर सम्मानित किया। श्री रामलाल जी ने कहा, हमें प्रचार नहीं करना है, लेकिन सत्य तथ्य समाज के समक्ष रखना आवश्यक है।
श्री रामलाल जी ने बताया कि संघ का संपर्क समाज के विभिन्न वर्गों, विचारधाराओं एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों से निरंतर बना रहता है। संघ स्वयंसेवक शिक्षा, सेवा, ग्राम विकास, आपदा राहत, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
जहां सरकारी विद्यालय नहीं हैं, वहां हजारों एकल विद्यालय संघ स्वयंसेवक चला रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, संघ व्यक्ति निर्माण का केंद्र है।
शताब्दी वर्ष के विशेष संदर्भ में श्री रामलाल जी ने कहा कि संघ पंच परिवर्तन का विषय लेकर घर-घर संपर्क, नागरिक गोष्ठियों और समाज संवाद के माध्यम से व्यापक जनजागरण का कार्य कर रहा है। सज्जन, प्रभावी और राष्ट्रहित में सोचने वाली सामाजिक शक्ति को साथ लेकर भारत को अधिक संगठित, सक्षम और विश्वकल्याण के भाव से युक्त बनाने का संघ का व्यापक उद्देश्य है।
कार्यक्रम में समाज के अनेक प्रमुख जन बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। प्रमुख उपस्थितजन में डॉ. राम जी यादव, डॉ. शुभ्रा, संजय सेठ, पराशक्ति पल्लव, प्रांत संपर्क प्रमुख राजीव कमल बिट्टू, प्रांत प्रचारक गोपाल शर्मा, प्रांत सह संघचालक अशोक श्रीवास्तव जी एवं सह प्रांत प्रचारक राजीव कांत जी एवं संघ एवं विविध संगठन के पदाधिकारियों समेत 300 की संख्या में समाज की सज्जन एवं मातृशक्ति शामिल रहे।
यह प्रमुख जन गोष्ठी न केवल आरएसएस के शताब्दी वर्ष का महत्वपूर्ण आयोजन था, बल्कि समाज में प्रचलित भ्रांतियों को दूर करने और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का सशक्त मंच भी सिद्ध हुई। श्री रामलाल जी के उद्बोधन ने सभी उपस्थितजन को गहन चिंतन एवं राष्ट्र निर्माण में सहभागिता के लिए प्रेरित किया।
एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद की प्रांतीय संत मार्गदर्शक मंडल तथा जिला मार्गदर्शक मंडल के साधु, संत, महात्माओं की द्विदिवसीय बैठक शनिवार 11 अप्रैल को रांची के अपर बाजार स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर में प्रारंभ हुई।
जिसका उद्घाटन विहिप के केंद्रीय मंत्री अशोक तिवारी, झारखंड के मार्गदर्शक मंडल के संयोजक सह केंद्रीय सदस्य स्वामी कृष्ण चैतन्य ब्रह्मचारी, अखिल भारतीय संत समिति झारखंड के अध्यक्ष स्वामी आत्मानंद पुरी, बिहार के महामंत्री रंजीतेशानंद सरस्वती, जैन मुनि स्वामी पद्मराज, मेंही आश्रम चुटिया के बालकृष्ण महाराज, संकट मोचन मंदिर, रांची के संत केशव दास महाराज, दिव्यानंद महाराज, स्वामी दिव्य ज्ञान, सहित अन्य संत एवं पदाधिकारियों ने भगवान के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर किया।
कार्यक्रम का संचालन पटना एवं गौहाटी क्षेत्र के धमार्चार्य संपर्क प्रमुख वीरेंद्र विमल तथा झारखंड के धर्माचार्य संपर्क प्रमुख युगल किशोर प्रसाद ने किया। सहित पचास से अधिक संत आज की बैठक में बैठक में उपस्थित रहे। सभी उपस्थित संतों को भगवा चादर देकर सम्मानित किया गया।
विषय प्रवेश करते हुए अशोक तिवारी ने संत समाज से निवेदन किया। हिंदुओं की एकजुटता, सनातन संस्कारों की पुनर्प्रतिष्ठा, मतांतरण पर रोक, सामाजिक समरसता, युवाओं में जड़ जमा रहे नशा पर रोक, गोरक्षा आदि विषयों पर हिंदू समाज के जनजागरण का अभियान चलायें।
अशोक जी के निवेदन के बाद उपस्थित संतों ने भी बारी-बारी से अपनी कार्य योजना तथा अपने संकल्प की जानकारी दी। बैठक कल अपराह्न तक चलेगी। बैठक में विहिप के झारखंड प्रांतीय अध्यक्ष चंद्रकांत रायपत ने उपस्थित संत समाज का स्वागत किया। गोरक्षा विभाग के केन्द्रीय सहमंत्री केशव राजू ने गोवंश रक्षा तथा गोवंश आधारित कृषि के संबंध में जानकारी दी।
बैठक में केन्द्रीय मंत्री अंबरीष सिंह, ब्रह्मचारी विभु सुमन, संत उमेशानंद, सत्यनारायण महाराज, हजारीबाग के संत विजयानंद दास, प्रदेश मंत्री मिथिलेश्वर मिश्र, रांची महानगर अध्यक्ष कैलाश केसरी, अनिल तिवारी, योगेश केदवाल, रेणु अग्रवाल, राजेश कुमार, सहित प्रान्त एवं रांची के पदाधिकारी बड़ी संख्या में सहभागी हुए। उक्त जानकारी विहिप के अनिल तिवारी ने दी।
एबीएन सोशल डेस्क। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष सह विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि बैसाखी भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है,जो हर वर्ष अप्रैल माह में मनाया जाता है। इस वर्ष बैसाखी का पर्व 14 अप्रैल को मनाया जाएगा। यह पर्व विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के कई हिस्सों में अत्यंत धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। बैसाखी न केवल एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि यह किसानों के लिए फसल कटाई का भी प्रमुख पर्व है।
बैसाखी का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। सिख धर्म के लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन वर्ष 1699 में आनंदपुर साहिब में दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस ऐतिहासिक घटना ने सिख समुदाय को एक नई पहचान और संगठन प्रदान किया।
इसलिए यह दिन सिखों के लिए धार्मिक गौरव और आत्मसम्मान का प्रतीक है। इस अवसर पर गुरुद्वारों में विशेष कीर्तन, अरदास और लंगर का आयोजन किया जाता है।बैसाखी का संबंध भारतीय कृषि संस्कृति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यह रबी फसलों के पकने और कटाई का समय होता है, जब किसान अपनी मेहनत का फल प्राप्त करते हैं।
खेतों में लहलहाती फसलें किसानों के चेहरे पर खुशी और संतोष लाती हैं। इसी खुशी को व्यक्त करने के लिए लोग भांगड़ा और गिद्धा जैसे पारंपरिक नृत्य करते हैं और एक-दूसरे को बधाइयाँ देते हैं।इस पर्व की विशेषता इसकी सामाजिक एकता और भाईचारे की भावना में भी दिखाई देती है। बैसाखी के अवसर पर लोग जाति, धर्म और वर्ग के भेदभाव को भुलाकर एक साथ उत्सव मनाते हैं।
मेले, झांकियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस पर्व को और भी आकर्षक बनाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से मेलों का आयोजन होता है, जहां लोग खरीदारी, मनोरंजन और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते हैं।बैसाखी का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि जीवन में कृतज्ञता और सकारात्मकता का भाव जागृत करना भी है।
यह पर्व हमें प्रकृति, अन्नदाता किसान और ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करने की प्रेरणा देता है। साथ ही यह हमें परिश्रम, एकता और समर्पण के महत्व को भी समझाता है।आस्था के दृष्टिकोण से बैसाखी आत्मिक शुद्धि और नवजीवन का संदेश देती है। लोग इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और ईश्वर से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
यह पर्व नई शुरुआत और आशा का प्रतीक भी है, जो हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।अंततः, बैसाखी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, कृषि परंपरा और धार्मिक आस्था का अद्भुत संगम है। यह हमें जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन, समर्पण और आनंद के साथ आगे बढ़ने का संदेश देता है।
टीम एबीएन, रांची । सेठ रामेश्वर लाल पोद्दार स्मृति भवन न्यास मंडल एवं रघुनंदन टिबरेवाल, ऋषि टिबरेवाल परिवार के संयुक्त तत्वाधान में पोद्दार धर्मशाला, चुटिया रांची में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला। इस अवसर पर परम पूज्य गुरु मां चैतन्य मीरा ने कथा का प्रारंभ भगवान भोलेनाथ की महिमा के वर्णन से किया।
उन्होंने अपने प्रवचन में भगवान शिव की सरलता और करुणा का उल्लेख करते हुए बताया कि भोलेनाथ इतने भोले हैं कि वे अपने भक्तों की थोड़ी सी प्रार्थना पर भी तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। उन्होंने रावण और स्वर्ण लंका का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान शिव ने कुबेर द्वारा निर्मित सोने की लंका भी रावण को दक्षिणा में दे दी थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रभु की कृपा पाने के लिए मन का निर्मल होना अत्यंत आवश्यक है।
इसी संदर्भ में उन्होंने रामचरितमानस की चौपाई- निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा- का भावार्थ समझाते हुए कहा कि भगवान केवल निष्कपट और शुद्ध हृदय वाले भक्तों को ही स्वीकार करते हैं।कथा के दौरान मां चैतन्य मीरा ने जीवन में “सुनीति” और “सुरुचि” के अंतर को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि सुनीति का मार्ग प्रारंभ में कठिन अवश्य लगता है, लेकिन उसका फल स्थायी और कल्याणकारी होता है। वहीं, सुरुचि का मार्ग शीघ्र सुख तो देता है, किंतु उसका प्रभाव अल्पकालिक होता है।
इस संदर्भ में उन्होंने ध्रुव महाराज की कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि ध्रुव ने सुनीति का मार्ग अपनाया, प्रारंभ में कष्ट सहा, लेकिन अंततः उन्हें भगवान का साक्षात्कार प्राप्त हुआ।कथा के उत्तरार्ध में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का मार्मिक और भावपूर्ण वर्णन किया गया। मां चैतन्य मीरा ने बताया कि कंस जैसे अत्याचारी का अंत करने, पृथ्वी का भार कम करने तथा ऋषि-मुनियों के संताप को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने वासुदेव और माता देवकी के घर जन्म लिया।
उन्होंने वासुदेव द्वारा बालक कृष्ण को यमुना नदी पार कर नंद बाबा और यशोदा मैया के पास पहुंचाने की लीला का सजीव चित्रण किया, जिसे सुनकर पूरा पंडाल भावविभोर हो उठा। कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर श्रद्धालुओं ने उल्लासपूर्वक उत्सव मनाया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा पंडाल ब्रजधाम में परिवर्तित हो गया हो और सभी श्रद्धालु ब्रजवासी बनकर इस दिव्य आनंद में सराबोर हो रहे हों।
कथा के दौरान मनमोहक झांकियों और सजीव चित्रण ने वातावरण को और भी भक्तिमय बना दिया। कार्यक्रम के अंत में सामूहिक आरती एवं प्रसाद वितरण किया गया। इस अवसर पर अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन की बहनों तथा सेठ रामेश्वर लाल पोद्दार स्मृति भवन की महिला समिति के सदस्यों को सम्मानित किया गया।
इस पावन अवसर पर फतेहचंद अग्रवाल, प्रकाश मोदी, राधेश्याम अग्रवाल, कमल कुमार अग्रवाल, प्रदीप मोदी, सांवरमल अग्रवाल, केशु अग्रवाल, मुकेश साबू, जितेंद्र कुमार, सुभाष पोद्दार, मुरारी टिबरेवाल, दीपक अग्रवाल, पंकज, कमल, अनमोल, पुलकित, रेखा अग्रवाल, अनु पोद्दार सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। पूरे आयोजन में भक्तिमय वातावरण और उत्साह का विशेष संचार देखने को मिला।
टीम एबीएन, रांची। चुटिया स्थित सेठ रामेश्वर लाल पोद्दार स्मृति भवन धर्मशाला में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। यह धार्मिक आयोजन सेठ रामेश्वर लाल पोद्दार स्मृति भवन न्यास मंडल एवं रघुनंदन टिबरेवाल, ऋषि टिबरेवाल परिवार के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हो रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन भाग लेकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
कथा वाचन के दौरान सुप्रसिद्ध कथा व्यास पूज्य मां चैतन्य मीरा ने श्राद्ध पक्ष में श्रीमद् भागवत कथा एवं श्री राम कथा के श्रवण के विशेष महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस पावन काल में कथा सुनने से हमारे पितरों को शांति प्राप्त होती है तथा उन्हें प्रभु के चरणों में स्थान मिलता है। इससे वे प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह अपने दिवंगत परिजनों के कल्याण हेतु ऐसे पुण्य कार्यों में सहभागिता करे।
मां चैतन्य मीरा ने आगे कहा कि श्रीमद् भागवत कथा केवल आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम ही नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की सही कला भी सिखाती है। कथा हमें मनुष्य के बीच प्रेम, करुणा और समर्पण का भाव विकसित करने की प्रेरणा देती है। उन्होंने बताया कि अनेक संतों ने श्रीमद् भागवत को ही अपना आराध्य माना है, क्योंकि यही वह ग्रंथ है जो हमें भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ता है। भगवान श्रीकृष्ण अपनी आराध्या राधा रानी के बिना अधूरे हैं, इसलिए कथा श्रवण से ही हम राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
उन्होंने कथा श्रवण के नियमों पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति श्रद्धा और सरल भाव से कथा सुनता है, तो वह वास्तविक रूप में प्रभु को समझ सकता है। उन्होंने उद्धव प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं बताया है कि जो भी उन्हें पाना चाहता है, उसके लिए श्रीमद् भागवत ही सर्वोत्तम साधन है। कथा के समापन पर मां चैतन्य मीरा ने सभी श्रद्धालुओं को अपनी संपूर्ण ऊर्जा के साथ प्रभु का स्मरण करने का संदेश दिया, ताकि कथा की महिमा को अपने जीवन में उतारकर समाज के कल्याण में योगदान दिया जा सके।
इस अवसर पर उन्होंने अपने द्वारा संचालित प्रतिष्ठित नेचुरोपैथी एवं आयुर्वेद रिट्रीट सेंटर की जानकारी भी दी, जहां बिना दवाइयों के विभिन्न प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों जैसे मसाज थेरेपी, हाइड्रोथेरेपी, मडथेरेपी, योग, फिजियोथैरेपी, एक्यूप्रेशर एवं डाइट थेरेपी के माध्यम से रोगियों का सफल उपचार किया जाता है। कार्यक्रम में पुरोहित श्री अनूप दाधीच एवं उनके सहयोगियों द्वारा प्रतिदिन विधिवत पूजन कराया जा रहा है। तृतीय दिवस पर श्री दाधीच के जन्मदिन के अवसर पर मां चैतन्य मीरा ने उन्हें दुपट्टा ओढ़ाकर आशीर्वाद प्रदान किया। कथा के अंत में भव्य आरती, पूजा-अर्चना एवं प्रसाद वितरण किया गया।
कार्यक्रम में फतेहचंद अग्रवाल, राधेश्याम अग्रवाल, कमल कुमार अग्रवाल, सुभाष पोद्दार, प्रवीण पोद्दार, योगेंद्र पोद्दार, श्याम बिहारी अग्रवाल, मोहन अग्रवाल, मुकेश साबू, पुलकित अग्रवाल, अनमोल सिंघानिया, पंकज सिंघानिया, कमल मोदी, विष्णु मोहता, बंसीधर रमुका, पवन अग्रवाल, श्याम सुंदर अग्रवाल, छगन महाराज, रेखा अग्रवाल, अनु पोद्दार सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। इस आयोजन को सफल बनाने में श्याम सेवा समिति के सदस्यों का विशेष योगदान रहा, जो प्रतिदिन तन-मन से सेवा कार्य में जुटे हुए हैं। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या इस धार्मिक आयोजन की लोकप्रियता और आस्था का प्रमाण है।
टीम एबीएन, रांची। रांची चुटिया स्थित रामेश्वर लाल पोद्दार स्मृति भवन धर्मशाला में सेठ रामेश्वरलाल पोद्दार स्मृति भवन ट्रस्ट एवं श्री रघुनंदन टिबरेवाल परिवार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। इस पावन अवसर पर सुप्रसिद्ध कथा वाचिका पूज्य मां चैतन्य मीरा जी ने अपने मधुर वचनों से भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान का अमृतपान कराया।
कथा के दौरान मां चैतन्य मीरा ने राजा परीक्षित और कलयुग की कथा का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि किस प्रकार राजा परीक्षित को एक ऋषि के श्राप का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए एक गहरी सीख है। उन्होंने बताया कि कलयुग ने स्वर्ण में अपना स्थान बनाकर स्वयं राजा परीक्षित की बुद्धि को भ्रमित कर दिया, जिससे वे धर्म के मार्ग से विचलित हो गये।
मां ने वर्तमान समय से इस कथा को जोड़ते हुए कहा कि आज के समाज में जो आपसी भेदभाव, गृह क्लेश, अशांति और मानसिक तनाव देखने को मिल रहा है, वह सब कलयुग के प्रभाव का ही परिणाम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब मनुष्य अपने मूल धर्म और आध्यात्मिकता से दूर हो जाता है, तब उसके जीवन में अशांति और भ्रम उत्पन्न होता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि इस कलयुग में भगवान का नाम, भक्ति और श्रीमद् भागवत कथा ही ऐसे साधन हैं, जो हमें इन नकारात्मक प्रभावों से बचा सकते हैं। यदि व्यक्ति अपने जीवन में भक्ति मार्ग को अपनाता है, प्रभु के प्रति सच्चा प्रेम और आस्था रखता है, तो उसका कोई भी अहित नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि आज के समाज के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वह प्रभु से जुड़े, अन्यथा जीवन का वास्तविक कल्याण संभव नहीं है।
मां चैतन्य मीरा ने आगे बताया कि उनके द्वारा नासिक स्थित आश्रम में तथा आनलाइन माध्यम से ध्यान एवं योग के नियमित शिविर आयोजित किये जाते हैं। इन शिविरों का उद्देश्य लोगों को मानसिक शांति प्रदान करना, जीवन की समस्याओं से उबारना तथा उन्हें एक स्वस्थ और संतुलित जीवन की ओर अग्रसर करना है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि अब ये शिविर नासिक के अलावा अन्य स्थानों पर भी आयोजित किये जायेंगे, ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें।
उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं से जूझ रही है। ध्यान और योग के माध्यम से इन समस्याओं को दूर किया जा सकता है तथा जीवन में एकाग्रता और सकारात्मकता लाई जा सकती है। कार्यक्रम के मुख्य यजमान श्री रघुनंदन अग्रवाल, ऋषि अग्रवाल ने पूरे परिवार के साथ विधिवत पूजा अर्चन की।
कार्यक्रम के अंत में समिति के सदस्यों द्वारा विधिवत आरती की गयी, जिसमें उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने भाग लिया। तत्पश्चात प्रसाद का वितरण किया गया। पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा और श्रद्धालु भाव-विभोर होकर कथा का आनंद लेते नजर आए।यह सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बनी हुई है, बल्कि समाज को आध्यात्मिक दिशा देने का कार्य भी कर रही है।
इस अवसर पर-न्यास के सचिव फतेहचंद अग्रवाल, न्यास कोषाध्यक्ष राधे श्याम अग्रवाल, कमल कुमार अग्रवाल, ओम प्रकाश मोदी, अमित मुरारका, सुभाष पोद्दार, सांवरमल अग्रवाल, योगेंद्र पोद्दार, कैलाश केसरी, अनमोल सिंघानिया, पुलकित अग्रवाल, रेखा अग्रवाल, अनु पोद्दार, सहित कई गणमान्य लोग एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित थे।
टीम एबीएन, रांची। आज मुनिश्री 108 प्रमाण सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि आत्मा की पहचान ही मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। हमारे जीवन को आगे बढ़ाने के लिए हमें दोषों और दुर्बलताओं से मुक्त होना जरूरी है।
प्रतिदिन किसी न किसी ऐसी दुर्बलता की चर्चा आप सबके बीच हो रही है जो हमारे व्यक्तित्व को कमजोर बनाती है और जिससे हमारे जीवन का आंतरिक और बाह्य विकास अवरूद्ध होता है बात प की है और प पर ध्यान जाते-जाते मेरे मानस में एक शब्द गूंज रहा है वह है पक्षपात, यह पक्षपात बड़ा प्रसिद्ध शब्द है और हर किसी के जीवन में किसी न किसी रुप में इसका प्रभाव देखने में आता है।
दरअसल, पक्षपात है क्या, किसी व्यक्ति के प्रति विशेष राग आशक्ति या मोह वश उसके प्रति उचित अनुचित का ध्यान रखे बिना विशेष झुकाव होना पक्षपात है उसकी योग्यता और क्षमता का अंदाज लगाये बिना किसी के साथ विशेष लगाव या झुकाव रखना पक्षपात है, पक्षपात मतलब भेदभावपूर्ण नीती। यह पक्षपात जहां भी हो व्यक्ति को अंदर से तोड़ती जब तक पक्षपात होगा। भेदभाव बना रहेगा।
प्रेम सौजन्य और सौहार्द्र को टिका पाना बहुत कठिन है संत कहते हैं घर परिवार हो या लोक व्यवहार पक्षपात की वृत्ति से ऊपर उठकर चलो क्योंकी यह तुम्हारी प्रगति में बाधक है। चार स्तर पर जैसे पक्षपात करना, पक्षपात होना, पक्षपात दिखाना और पक्षपात से मुक्त निष्पक्ष रहना। कई बार ऐसा देखने में आता है कि लोग एक दूसरे का पक्षपात करते हैं घर परिवार में ऐसा ज्यादा देखने में आता है।
किसी एक के प्रति विशेष झुकाव और उसके प्रति होने वाला विशेष झुकाव औरों के लिए अलगाव उत्पन्न कर देता है उसे लगता है मैं उपेक्षित हूं तिरस्कृत हूं यह गड़बड़ है घर में बहू वर्षों से खट रही है मेहनत कर रही है उसके लिए किसी प्रकार की प्रशंसा के दो शब्द नहीं उसकी खुशी की कोई परवाह नहीं कहीं भेजने के लिए कोई बात नहीं परन्तु एक नयी थोड़ी पढ़ी-लिखी बहू आयी बड़े घर से आई।
उसी दिन से उसकी आरती उतारी जाती हैं पूर्ण सुख सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है इसी से फूंट पैदा होती है एक के प्रति उपेक्षापूर्ण भाव और दूसरे के प्रति अपेक्षा का भाव इस स्थिति में मन टूटने लगता है। पक्षपात ठीक नहीं है यह जीवन में बहुत बड़ा बाधक है। जीवन में संतुलन बना कर चलने से प्रगति निरन्तर होगी और उसको गौण करके चलने से मार्ग वही अवरुद्ध होगा।
मनुष्य जब बाहरी आकर्षणों से हटकर अंतर्मुख होता है, तभी उसके भीतर अध्यात्म का सच्चा प्रकाश पैदा होता है। मुनिश्री ने बताया कि क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ये चार बंदिशें आत्मा को जकड़कर रखती हैं, और साधना का अर्थ है इन बंधनों से मुक्ति। उन्होंने कहा कि पंचकल्याणक का हर दिवस आत्म जागरण की याद दिलाता है।
जब मन स्थिर हो जाता है और विचार पवित्र हो जाते हैं, तब जीवन सहज रूप से शांति और संयम की ओर चलता है। प्रवचन सभा मुनिश्री के बिहार के दौरान भगवान महावीर मनिपाल हॉस्पिटल स्थित महावीर भवन में हुई। रांची से तीर्थराज श्री सम्मेद शिखर जी के लिए मुनि श्री का मंगल विहार जारी है। आज का रात्रि विश्राम पंचरतन विहार में होगा एवं 8 अप्रेल की आहार चर्या कूटे में रामपाल गंगवाल के बगीचे में होगी।
मुनिसंघ का आगामी 12 अप्रैल को गोमिया में मुनि संघ का मंगल प्रवेश संभावित है, जबकि 15 अप्रैल को मुनिसंघ की भव्य मंगल अगवानी पारसनाथ में होगी। मुनिश्री का मंगल विहार प्रात: 07 बजे बिरसा मुंडा फन पार्क से हुआ। बिहार के दौरान रांची समाज से, कुनकुरी समाज से, रामगढ़ से, शिखर जी से आए भक्तगण शामिल हुए। यह जानकारी मीडिया प्रभारी राकेश काशलीवाल ने दी।
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