टीम एबीएन, रांची (पंडरा)। पंडरा के चटकपुर में आयोजित विराट हिंदू सम्मेलन ऐतिहासिक उत्साह और भव्यता के साथ संपन्न हुआ। हजारों हिंदू समाज के सदस्य एकत्रित हुए, जहां वक्ताओं ने राष्ट्र निर्माण, सांस्कृतिक संरक्षण और छुआछूत मुक्त समाज के संकल्प को दोहराया।
चिन्मय आश्रम, रांची के स्वामी परिपूर्णानंद सरस्वती जी ने मुख्य वक्ता के रूप में समाज को संबोधित किया। उन्होंने कहा, हिंदू समाज को अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। बच्चों को संस्कारवान और योग्य बनाने, परंपराओं जैसे तिलक-जनेऊ का गर्व से पालन करने तथा धन का सदुपयोग समाज-धर्म कार्यों में करने पर जोर दिया। अतिथि सत्कार और दान को सौभाग्य बताते हुए उन्होंने एकजुट समाज की अपील की।
अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका एवं मुख्य वक्ता सुश्री सुनीता ताई हल्देकर ने हिंदू समाज को विश्व का सबसे उदार समाज बताया। रघुकुल रीति का स्मरण कराते हुए उन्होंने नारी शक्ति के विस्तार, भारत माता की प्रतिष्ठा और सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, मंदिर, श्मशान और जल स्रोतों पर सभी का समान अधिकार हो भेदभाव मुक्त समाज बनाएं। पंच परिवर्तन से व्यक्ति निर्माण और सुदृढ़ परिवार व्यवस्था पर बल दिया।
सम्मेलन का मुख्य संदेश रहा विविधता में एकता। महाकुंभ की तुलना देते हुए वक्ताओं ने जीवन के हर क्षेत्र में एकजुट रहने का आह्वान किया। समापन राष्ट्रव्यापी भाव मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा समाज रहे गीत के एवं भारत माता की आरती के साथ संपन्न हुआ। यह सम्मेलन हिंदू समाज की एकता और सामाजिक समरसता का प्रतीक बना। उक्त जानकारी सकल हिंदू समाज, पंडरा के प्रचार व्यवस्था प्रमुख आलोक मिश्र ने दी।
एबीएन सोशल डेस्क। पहियों पर चलकर राज्य के 2,364 गांवों में 11,81,876 से अधिक लोगों तक बाल विवाह मुक्त झारखंड का संदेश पहुंचाने वाले अपनी तरह के अनूठे अभियान बाल विवाह मुक्ति रथ का अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर समापन हुआ। इस दौरान रथ ने राज्यभर में 36,482 किलोमीटर की यात्रा की।
बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने बाल विवाह के खात्मे के लिए भारत सरकार के 100 दिवसीय गहन जागरूकता अभियान को मजबूती देने के लिए देशभर में 500 से अधिक ऐसे ही बाल विवाह मुक्ति रथ निकाले थे, जिन्होंने देश के कोने-कोने में जाकर जनसमुदाय को बाल विवाह के खिलाफ बने कानूनों के बारे में जागरूक और संवेदनशील बनाया। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के 22 सहयोगी झारखंड में जमीन पर काम कर रहे हैं।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के 22 सहयोगी संगठनों के इस अभियान को पूरे राज्य में अभूतपूर्व समर्थन मिला। जाति, धर्म और विचारधारा के बंधन को तोड़ते हुए विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, महिला भुक्तभोगियों, नागरिक समाज संगठनों, पुलिस और धर्मगुरुओं ने एकजुट होकर बाल विवाह के खात्मे के सामूहिक संकल्प को दोहराया।
राज्यभर में एक महीने तक चली इस यात्रा के दौरान बाल विवाह मुक्ति रथ स्कूलों, ग्राम सभाओं, धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंचा व 1,524 कार्यक्रमों के जरिए बाल विवाह के खिलाफ संदेश पहुंचाया। इनमें रैलियां, नुक्कड़ नाटक, शपथ समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रम और महिला भुक्तभोगियों की कहानियां शामिल थीं। बाल विवाह मुक्ति रथ इस दौरान 1,242 से अधिक स्कूलों व कॉलेजों एवं 1,213 धार्मिक स्थलों तक पहुंचा। अभियान में 2,96,825 छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के साथ-साथ 1,313 धर्मगुरुओं ने भागीदारी की। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2019–21 की अवधि में झारखंड में बाल विवाह की दर 32.2 प्रतिशत रही, जो राष्ट्रीय औसत 23.3 प्रतिशत से काफी अधिक है।
देश के विभिन्न राज्यों में इन रथों को मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सांसद, जिलाधिकारी और कई राज्यों की विधानसभाओं के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने-अपने राज्यों में बाल विवाह मुक्ति रथ को रवाना किया। राज्यों के 49 मंत्रियों, 82 सांसदों और 154 विधायकों के अलावा 99 जिलाधिकारियों ने विभिन्न जिलों में इस रथ को रवाना किया। एक महीने की इस यात्रा के दौरान देशभर में बाल विवाह मुक्ति रथ ने 28 राज्यों के 66,344 गांवों में पहुंचते हुए 6,79,077 किलोमीटर की यात्रा की और 5,22,68,033 लोगों तक बाल विवाह के खिलाफ संदेश पहुंचाया।
अभियान की सफलता और भारत के बाल विवाह के खिलाफ दृढ़ संकल्प के बाबत जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की सीनियर एडवाइजर (पॉलिसी) ज्योति माथुर ने कहा, यह रथ केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि न्याय का वाहक है। यह जनसमुदाय तक कानून, संरक्षण और जवाबदेही का संदेश लेकर जाता है, ताकि सरकार की मंशा जमीन पर वास्तविक सुरक्षा में तब्दील हो सके। इस अभियान में शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर शिक्षाविदों और महिला भुक्तभोगियों तक सभी ने उत्साह से भागीदारी की। खास तौर पर जमीनी स्तर के महिला नेतृत्व का अग्रिम मोर्चे से इस संदेश को आगे ले जाते देखना बेहद प्रेरक रहा। ऐसी व्यापक भागीदारी और तात्कालिकता के साथ हमें विश्वास है कि भारत 2030 की वैश्विक समयसीमा से पहले ही बाल विवाह जैसे अपराध से मुक्त हो जाएगा।
उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय की एक हालिया रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा, हमारा हौसला बढ़ाने वाली बात यह है कि दुनिया अब उसे स्वीकार कर रही है जो हम एक दशक से कह रहे हैं कि बाल विवाह दरअसल हमारे बच्चों से बलात्कार है और इसे उसी रूप में देखा और समझा जाना चाहिए।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने अपने सहयोगी संगठनों, स्थानीय प्रशासन, कानून लागू करने वाली एजेंसियों, सामुदायिक नेताओं व बाल विवाह में सेवाएं प्रदान करने वाले बैंड बाजा, घोड़ी, सजावट, डीजे व खाना बनाने वाले कैटर्रस के समन्वित प्रयासों से पिछले एक वर्ष में ही झारखंड में 16,348 बाल विवाह रुकवाए हैं।
पोस्टरों, प्रभावशाली नारों, लाउडस्पीकर और शपथ हस्ताक्षर बोर्ड से सुसज्जित बाल विवाह मुक्ति रथ को इस तरह तैयार किया गया था कि यह रास्ते में आने वाले दूरदराज और हाशिए पर रहने वाले समुदायों तक पहुंच सके। जहां बेहतर सड़कों वाले इलाकों में चार पहिया वाहनों के माध्यम से अभियान चलाया गया, वहीं सबसे दूरस्थ गांवों तक मोटरसाइकिल और साइकिल कारवां के जरिए संदेश पहुंचाया गया। यात्रा के दौरान बाल विवाह मुक्ति रथ ने पंचायतों, जिला प्रशासन, बाल विवाह निषेध अधिकारियों और अन्य सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर समुदायों तक जागरूकता का संदेश पहुंचाया और बाल विवाह के खिलाफ शपथ दिलाई।
एबीएन सोशल डेस्क। हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष एवं झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हर वर्ष 8 मार्च को पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन महिलाओं के अधिकारों, सम्मान, समानता और उनके सामाजिक-आर्थिक योगदान को मान्यता देने के उद्देश्य से मनाया जाता है।
यह केवल एक उत्सव का दिन नहीं है, बल्कि महिलाओं के अधिकारों, समान अवसरों और उनके सशक्तिकरण के लिए जागरूकता फैलाने का भी महत्वपूर्ण अवसर है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत 20वीं शताब्दी की शुरूआत में हुई थी। वर्ष 1908 में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में हजारों महिला श्रमिकों ने अपने अधिकारों, बेहतर कार्य परिस्थितियों, उचित वेतन और मतदान के अधिकार की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था।
इसके बाद वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी महिला सम्मेलन में जर्मनी की समाजसेवी क्लारा जेटकिन ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा। उनके प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए वर्ष 1911 से कई देशों में इस दिवस को मनाना शुरू किया गया। बाद में वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक रूप से 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मान्यता दी।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को समान अधिकार दिलाना, लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना और समाज में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समाज के विकास में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य, कला, खेल, व्यवसाय और प्रशासन जैसे हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी प्रतिभा और क्षमता का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं।
इस दिवस का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं को समान अवसर नहीं मिल पाते हैं। कई स्थानों पर उन्हें शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रखा जाता है। ऐसे में यह दिन समाज को यह संदेश देता है कि महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर प्रदान करना प्रत्येक समाज और राष्ट्र की जिम्मेदारी है।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की विशेषता यह है कि इस दिन विभिन्न देशों में महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मानित किया जाता है और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। स्कूल-कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं, सरकारी संगठनों और विभिन्न मंचों पर सेमिनार, सांस्कृतिक कार्यक्रम, जागरूकता अभियान तथा सम्मान समारोह आयोजित किये जाते हैं।
इसके माध्यम से महिलाओं के आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है। आज के समय में महिलाएं हर क्षेत्र में नयी ऊंचाइयों को छू रही हैं और समाज के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह प्रेरणा देता है कि हम महिलाओं के सम्मान, अधिकार और समानता के लिए मिलकर कार्य करें तथा एक ऐसा समाज बनाएं जहां हर महिला सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त महसूस करे।इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल महिलाओं का उत्सव नहीं, बल्कि समानता, सम्मान और मानवाधिकारों के प्रति समाज की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।
टीम एबीएन, रांची। आज सदर अस्पताल में 77वां खिचड़ी वितरण प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस सेवा कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 800 लोगों को खिचड़ी वितरित की गयी। आज के इस सेवा कार्य के प्रायोजक एफजेसीसीआई के सेक्रेटरी जनरल रोहित अग्रवाल जी रहे। उनके सहयोग से यह कार्यक्रम बहुत ही सुचारू और सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
मौके पर एफजेसीसीआई के प्रेसिडेंट आदित्य मल्होत्रा भी उपस्थित रहे और उन्होंने इस सेवा कार्य की सराहना की। कार्यक्रम में लायंस क्लब ग्लोबल रांची के सेक्रेटरी संतोष अग्रवाल, ट्रेजरर अल्तमाश आलम तथा खिचड़ी को-आर्डिनेटर मोनिका गोयनका भी उपस्थित थीं। सभी के सहयोग से यह सेवा कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया
टीम एबीएन, रांची। संत शिरोमणि स्वामी सदानंद महाराज जी के सानिध्य में श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित पुंदाग रांची स्थित सदगुरु कृपा अपना घर आश्रम में रह रहे 50 से अधिक निराश्रितों, दिव्यांग प्रभुजनों के बीच होली का पावन उत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। यह आयोजन श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर के प्रांगण में संपन्न हुआ, जहां रंगों के इस महापर्व ने सेवा, समर्पण और सामाजिक समरसता का सुंदर संदेश दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत मंदिर के पुजारी पंडित अरविंद पांडे द्वारा श्री राधा रानी की विधिवत पूजा-अर्चना एवं महाभोग अर्पण से हुई। वैदिक मंत्रोच्चार और भक्तिमय वातावरण के बीच उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान से सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना की। पूजा के उपरांत आश्रम में रह रहे निराश्रित जनों, दिव्यांगों एवं सेवादारों के बीच अबीर-गुलाल के साथ होली खेली गई।
होली के पारंपरिक गीतों और भजनों की मधुर धुन पर सभी ने एक-दूसरे को रंग लगाकर प्रेम और भाईचारे का परिचय दिया। आश्रम परिसर रंगों से सराबोर हो उठा और हर चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। विशेष रूप से निराश्रित एवं दिव्यांग प्रभुजनों के चेहरे पर उत्साह और आत्मीयता की झलक ने कार्यक्रम को भावुक और प्रेरणादायक बना दिया।
इस अवसर पर ट्रस्ट के अध्यक्ष डूंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने उपस्थित सभी लोगों को होली की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सद्भाव और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के साथ पर्व मनाना ही सच्ची सेवा और मानवीयता है।कार्यक्रम के अंत में सभी के बीच स्वादिष्ट व्यंजनों का वितरण किया गया, जिसका सभी ने आनंद लिया। इस प्रकार सेवा, श्रद्धा और सौहार्द के वातावरण में होली का यह उत्सव यादगार बन गया। यह जानकारी ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने दी।
एबीएन सोशल डेस्क। फाल्गुन मास के पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ संवत काटते हुए नव वर्ष का स्वागत एवं अपने आनंद की अभिव्यक्ति चैत्र मास के प्रथम दिवस को होली के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है, जिसमें विभिन्न रंगों के रंग एवं अबीर गुलाल लगाकर एक दूसरे के प्रति शुभकामनाओं का आदान प्रदान करते हैं। हमारी प्रकृति विभिन्न रंगों से सजी हुई है और रंगों का व्यापक प्रभाव हमारी चेतना, भावना, संवेदना तथा बुद्धि के ऊपर होती है
लाल रंग क्रोध का, भगवा सामूहिकता का, हरा समृद्धि का, पीला ज्ञान विज्ञान कला साहित्य विवेक का, गुलाबी प्रेम का, नीला शांति एवं विस्तार का तथा श्वेत रंग तप एवं त्याग का, और रंगों का सूक्ष्म प्रभाव हमारे व्यक्तित्व कृतित्व के ऊपर सीधा पड़ता है। विभिन्न रंगों से युक्त यह जीवन एक उत्सव ही है और उत्सव का रंगों के साथ शुभारंभ हमारे मनोविज्ञान में संतुलन स्थापित करता है।
होली के पर्व के बाद वसंत ऋतु का पवित्र एवं शक्ति साधना नवरात्र के साथ नव वर्ष आरंभ हो जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में हम प्रकृति से सानिध्य स्थापित करते हुए उसकी सूक्ष्म शक्तियों को धारण करने का अनुष्ठान करते हैं और आने वाले वर्ष भर के लिए स्वयं को अपने भीतर संकल्प एवं चरित्र की शक्ति से अभिसिंचित करते हैं।
होली का त्यौहार मात्र औपचारिकता न रह जाए। सतही शुभकामनाओं के आदान-प्रदान भर से काम चलने वाला नहीं है। अपने विभिन्न रंगों की भावनाओं को खुलकर बहने दें जिसकी सुखद फुहार की अनुभूति सबको मिल पाये।
टीम एबीएन, रांची। रांची सहित झारखंड के विभिन्न शहरों में मारवाड़ी समाज की महिलाओं ने परंपरा, आस्था और उत्साह के साथ होली पर्व का शुभारंभ किया। झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि समाज की महिलाओं ने राजस्थानी पारंपरिक वेशभूषा, विशेष रूप से रंग-बिरंगी ओढ़नी धारण कर विधि-विधानपूर्वक डांडा रोपण की रस्म निभाई। इसके पश्चात ठंडी होली की पूजा श्रद्धा और भक्ति भाव से संपन्न की गयी।
उन्होंने कहा कि डांडा रोपण मारवाड़ी समाज की प्राचीन परंपरा है, जो होली पर्व के शुभारंभ का प्रतीक मानी जाती है। महिलाएं पारंपरिक गीतों का गायन करते हुए परिवार और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। ठंडी होली की पूजा के दौरान विशेष रूप से मंगलकामना, सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है।
3 मार्च को प्रात: लगभग 5 बजे पूरे विधि-विधान के साथ होलिका दहन किया गया। इस अवसर पर समाज के गणमान्य लोग एवं बड़ी संख्या में परिवार उपस्थित रहे। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय तथा नकारात्मकता के दहन का प्रतीक है।
श्रद्धालुओं ने अग्नि की परिक्रमा कर नयी ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लिया। संजय सर्राफ ने कहा कि इस प्रकार के धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन समाज को एकजुट करने के साथ-साथ नयी पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं।
टीम एबीएन, रांची। रांची के चुटिया नगरी की ऐतिहासिक होली के अवसर पर बीते रविवार को परंपरा के अनुसार होलिका दहन फगुआ का रस्म पूरी करने की तैयारी है। लगभग 500 वर्षों से होलिका दहन और होली उत्सव की एक अनूठी परंपरा निभायी जा रही है, जो झारखंड में सबसे पहले होलिका दहन के लिए जानी जाती है।
देर रात मुहूर्त के अनुसार सर्वप्रथम ग्राम पाहन स्नान कर नये वस्त्र पहन एक लोटा जल व फरसा लेकर डोल जतरा मैदान में फगुआ काटने के लिए आये और एक ही वार में अरंडी की डाल काट कर बिना पीछे मुड़े घर प्रस्थान किया। इसके बाद श्रीराम मंदिर के महंत ने पूजा अर्चना कर होलिका प्रज्ज्वलित कर आरती की। इससे पूर्व रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये।
राजधानी रांची का ऐतिहासिक स्थल चुटिया, जो कभी नागवंशी राजाओं की राजधानी रही। आज भी अपनी समृद्ध परंपराओं और आस्था की विरासत को संजोए हुए है। वर्ष 1685 में स्थापित राम मंदिर, जिसे राधाबल्लभ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, यहां की धार्मिक पहचान का केंद्र है। इसी मंदिर परिसर के पास लगभग 500 वर्षों से होलिका दहन और होली उत्सव की एक अनूठी परंपरा निभायी जा रही है, जो झारखण्ड में सबसे पहले होलिका दहन के लिए जानी जाती है।
चुटिया में होलिका दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। मान्यता है कि नागवंशी राजाओं के समय से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है। जैसे ही यहां होलिका दहन संपन्न होता है, पूरे क्षेत्र में होली के उत्सव की शुरूआत मानी जाती है। आज होलिका दहन किया गया जिसमें सैकड़ों श्रद्धालु इस पावन क्षण के साक्षी बनने के लिए एकत्र हुए।
राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य कैलाश कुमार केसरी ने बताया कि 16वीं शताब्दी में महाराजा उदयनाथ प्रताप सहदेव चुटियागढ़ के राजा हुआ करते थे और चुटिया नागवंशी राजा की राजधानी हुआ करती थे। उस समय की प्रथा थी कि होली के दो दिन पहले दूसरे राज्यों के राजाओं को होली का न्यौता भेजा जाता था। राजा पहले फगुआ काटेंगे उसके बाद ही अन्य लोग फगुआ काटेंगे। वहीं मान्यता अब भी चलती आ रही है कि यहां होली से दो दिन पहले ही राम मंदिर अगजा कटती है और यह अगजा पाहन काटते हैं। पाहन मुंडा समाज से आते हैं।
पाहन के अगजा काटने के बाद राम मंदिर के महंत पूजा पाठ करके आरती होलिका का करते हैं। वहीं चार मार्च को फगडोल जतरा यात्रा निकाली जायेगी। साहू ने बताया कि चार मार्च को लोग सुबह से ही रंगोंवाली होली खेलेंगे। दोपहर एक बजे के बाद नहा-धोकर नये वस्त्र पहनकर लोग फग डोल जतरा यात्रा के लिए निकलेंगे। दिन के लगभग दो बजे प्राचीन राम मंदिर से भगवान के विग्रहों को डोली में बिठाकर निकाला जायेगा।
राम मंदिर के पास स्थित डोल जतरा मैदान में विग्रहों को चबूतरा में रखा जायेगा। चुटिया के अन्य प्राचीन मंदिर जैसे लोअर चुटिया स्थित राधा कृष्ण मंदिर, साहू टोली स्थित राम मंदिर व हनुमान मंदिर से भी भगवान के विग्रहों को डोली में बिठाकर डोल जतरा मैदान में लाया जायेगा। साहू ने बताया कि चुटिया में फग डोल जतरा यात्रा वृंदावन की तर्ज पर होता है। यहां यह परंपरा वर्ष 1685 से चली आ रही है।
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