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Published / 2025-09-30 16:01:09
10 दिवसीय योग शिविर में नवरात्र काल में योग का आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया : योगाचार्य महेश

एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री मंदिर में चल रहे 10 दिवसीय योग शिविर में योगाचार्य महेश पाल ने योग के आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया  जिसमें उन्होंने कहा कि नवरात्र, भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख और पवित्र पर्व है, जिसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना की जाती है। यह समय केवल धार्मिक आस्था और भक्ति का प्रतीक ही नहीं, बल्कि साधना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर भी प्रदान करता है। 

योग, जो कि शरीर, मन और आत्मा के सामंजस्य का मार्ग है, नवरात्र के दिनों में विशेष महत्व रखता है। नवरात्र के दौरान योग का अभ्यास साधक को न केवल शारीरिक और मानसिक शांति देता है, बल्कि साधना की गहराई को भी बढ़ाता है नवरात्र को साधना, उपवास और आत्मसंयम का पर्व माना जाता है। इस दौरान व्यक्ति बाहरी आकर्षणों और भौतिक इच्छाओं से दूर होकर आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की ओर अग्रसर होता है। 

योग का अभ्यास इस साधना को सशक्त बनाता है क्योंकि योग व्यक्ति को अंतर्मुखी होने और आत्मा से जुड़ने की दिशा में प्रेरित करता है। नवरात्र में उपवास का विशेष महत्व है। उपवास शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालकर उसे शुद्ध करता है। योगासन और प्राणायाम इस प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बना देते हैं। प्राणायाम उपवास के दौरान मन और भावनाओं को नियंत्रित करता है। ध्यान साधक को भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ता है। 

योगासन शरीर को हल्का, सक्रिय और संतुलित बनाए रखते हैं, योग के अनुसार मानव शरीर में सात चक्र होते हैं, जो ऊर्जा के मुख्य केंद्र हैं। नवरात्र में नौ दिनों की साधना धीरे-धीरे साधक की ऊर्जा को ऊपर की ओर ले जाती है। पहले दिन से लेकर नवें दिन तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना चक्रों की शुद्धि और जागरण का प्रतीक मानी जाती है। ध्यान और मंत्र जप से मूलाधार से सहस्रार तक की ऊर्जा सक्रिय होती है, जो साधक को गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। 

नवरात्र में योग का अभ्यास व्यक्ति को नकारात्मक विचारों, तनाव और असंतुलन से दूर करता है। जब साधक प्राणायाम और ध्यान करता है तो उसकी चेतना शुद्ध होती है। यह शुद्ध चेतना माँ दुर्गा की भक्ति और दिव्य शक्ति को आत्मसात करने में सहायक होती है। नवरात्र काल को शक्ति की उपासना का समय माना गया है। योग साधना इस शक्ति को भीतर से जाग्रत करती है। 

विशेष रूप से कुंडलिनी योग से साधक अपनी सुप्त ऊर्जा को जागृत कर सकता है।ध्यान और जप से साधक ईश्वर के साथ आत्मिक संबंध को अनुभव करता है। सात्विक आहार और योग से शरीर-मन दोनों में शुद्धता आती है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति सरल हो जाती है। 

नवरात्र भक्ति का पर्व है और योग साधना का मार्ग। जब भक्ति और योग मिल जाते हैं तो साधक को सर्वोच्च आनंद की प्राप्ति होती है।योग साधना भक्ति को स्थिर करती है, और भक्ति योग साधना को भावनात्मक गहराई प्रदान करती है, नवरात्र में साधारण, सहज और शांति देने वाले आसनों का अभ्यास करना श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इस समय उपवास और साधना के कारण शरीर हल्का रहता है। 

  1. पद्मासन (Lotus Pose): ध्यान और मंत्र जप के लिए सर्वोत्तम आसन। 
  2. वज्रासन-(Thunderbolt Pose): भोजन या फलाहार के बाद बैठने के लिए उत्तम, पाचन में सहायक। 
  3. सुखासन- (Easy Pose): लंबी साधना और ध्यान हेतु आरामदायक।
  4. भुजंगासन- (CobraPose): ऊर्जा और जागरूकता बढ़ाता है।
  5. त्रिकोणासन - (Triangle Pose): शरीर में संतुलन और लचीलापन लाता है।
  6. शवासन - (Corpse Pose): मानसिक शांति और विश्रांति हेतु अनिवार्य, नवरात्र के दिनों में प्राणायाम से साधक का मन स्थिर और चेतना निर्मल होती है। 
  7. अनुलोम-विलोम: नाड़ी शुद्धि और मानसिक संतुलन के लिए। भ्राम
  8. प्राणायाम: तनाव और चंचलता दूर कर ध्यान में गहराई लाता है। 
  9. कपालभाति: शरीर से विषैले तत्व निकालकर ऊर्जा प्रदान करता है
  10. नाड़ी शोधन प्राणायाम: शरीर और मन दोनों को शुद्ध करता है। 

ऊँ जप के साथ श्वास अभ्यास: आध्यात्मिक कंपन को बढ़ाता है और भक्ति भाव को गहन करता है। प्रतिदिन माँ दुर्गा के मंत्र (जैसे ॐ दुं दुर्गायै नमः) का जप ध्यान मुद्रा में बैठकर करना चाहिए। प्रत्येक दिन माता के नौ रूपों का ध्यान चक्र साधना के साथ जोड़कर करने से साधक को गहरी आध्यात्मिक अनुभूति होती है।

नवरात्र के पावन अवसर पर योगासन, प्राणायाम और ध्यान साधक की साधना को सशक्त और गहन बना देते हैं। उपवास के साथ योग का संयोजन न केवल शरीर को शुद्ध करता है बल्कि साधक को देवी शक्ति के साथ आत्मिक रूप से जोड़ता है। यही कारण है कि नवरात्र काल में योग का अभ्यास विशेष रूप से आध्यात्मिक महत्व रखता है।

Published / 2025-09-30 13:51:00
10 दिवसीय योग शिविर में नवरात्र काल में योग का आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया : योगाचार्य महेश

एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री मंदिर में चल रहे 10 दिवसीय योग शिविर में योगाचार्य महेश पाल ने योग के आध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया  जिसमें उन्होंने कहा कि नवरात्र, भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख और पवित्र पर्व है, जिसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना की जाती है। यह समय केवल धार्मिक आस्था और भक्ति का प्रतीक ही नहीं, बल्कि साधना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर भी प्रदान करता है। 

योग, जो कि शरीर, मन और आत्मा के सामंजस्य का मार्ग है, नवरात्र के दिनों में विशेष महत्व रखता है। नवरात्र के दौरान योग का अभ्यास साधक को न केवल शारीरिक और मानसिक शांति देता है, बल्कि साधना की गहराई को भी बढ़ाता है नवरात्र को साधना, उपवास और आत्मसंयम का पर्व माना जाता है। इस दौरान व्यक्ति बाहरी आकर्षणों और भौतिक इच्छाओं से दूर होकर आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की ओर अग्रसर होता है। 

योग का अभ्यास इस साधना को सशक्त बनाता है क्योंकि योग व्यक्ति को अंतर्मुखी होने और आत्मा से जुड़ने की दिशा में प्रेरित करता है। नवरात्र में उपवास का विशेष महत्व है। उपवास शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालकर उसे शुद्ध करता है। योगासन और प्राणायाम इस प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बना देते हैं। प्राणायाम उपवास के दौरान मन और भावनाओं को नियंत्रित करता है। ध्यान साधक को भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ता है। 

योगासन शरीर को हल्का, सक्रिय और संतुलित बनाए रखते हैं, योग के अनुसार मानव शरीर में सात चक्र होते हैं, जो ऊर्जा के मुख्य केंद्र हैं। नवरात्र में नौ दिनों की साधना धीरे-धीरे साधक की ऊर्जा को ऊपर की ओर ले जाती है। पहले दिन से लेकर नवें दिन तक माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना चक्रों की शुद्धि और जागरण का प्रतीक मानी जाती है। ध्यान और मंत्र जप से मूलाधार से सहस्रार तक की ऊर्जा सक्रिय होती है, जो साधक को गहन आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है। 

नवरात्र में योग का अभ्यास व्यक्ति को नकारात्मक विचारों, तनाव और असंतुलन से दूर करता है। जब साधक प्राणायाम और ध्यान करता है तो उसकी चेतना शुद्ध होती है। यह शुद्ध चेतना माँ दुर्गा की भक्ति और दिव्य शक्ति को आत्मसात करने में सहायक होती है। नवरात्र काल को शक्ति की उपासना का समय माना गया है। योग साधना इस शक्ति को भीतर से जाग्रत करती है। 

विशेष रूप से कुंडलिनी योग से साधक अपनी सुप्त ऊर्जा को जागृत कर सकता है।ध्यान और जप से साधक ईश्वर के साथ आत्मिक संबंध को अनुभव करता है। सात्विक आहार और योग से शरीर-मन दोनों में शुद्धता आती है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति सरल हो जाती है। 

नवरात्र भक्ति का पर्व है और योग साधना का मार्ग। जब भक्ति और योग मिल जाते हैं तो साधक को सर्वोच्च आनंद की प्राप्ति होती है।योग साधना भक्ति को स्थिर करती है, और भक्ति योग साधना को भावनात्मक गहराई प्रदान करती है, नवरात्र में साधारण, सहज और शांति देने वाले आसनों का अभ्यास करना श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इस समय उपवास और साधना के कारण शरीर हल्का रहता है। 

  1. पद्मासन (Lotus Pose): ध्यान और मंत्र जप के लिए सर्वोत्तम आसन। 
  2. वज्रासन-(Thunderbolt Pose): भोजन या फलाहार के बाद बैठने के लिए उत्तम, पाचन में सहायक। 
  3. सुखासन- (Easy Pose): लंबी साधना और ध्यान हेतु आरामदायक।
  4. भुजंगासन- (CobraPose): ऊर्जा और जागरूकता बढ़ाता है।
  5. त्रिकोणासन - (Triangle Pose): शरीर में संतुलन और लचीलापन लाता है।
  6. शवासन - (Corpse Pose): मानसिक शांति और विश्रांति हेतु अनिवार्य, नवरात्र के दिनों में प्राणायाम से साधक का मन स्थिर और चेतना निर्मल होती है। 
  7. अनुलोम-विलोम: नाड़ी शुद्धि और मानसिक संतुलन के लिए। भ्राम
  8. प्राणायाम: तनाव और चंचलता दूर कर ध्यान में गहराई लाता है। 
  9. कपालभाति: शरीर से विषैले तत्व निकालकर ऊर्जा प्रदान करता है
  10. नाड़ी शोधन प्राणायाम: शरीर और मन दोनों को शुद्ध करता है। 

ऊँ जप के साथ श्वास अभ्यास: आध्यात्मिक कंपन को बढ़ाता है और भक्ति भाव को गहन करता है। प्रतिदिन माँ दुर्गा के मंत्र (जैसे ॐ दुं दुर्गायै नमः) का जप ध्यान मुद्रा में बैठकर करना चाहिए। प्रत्येक दिन माता के नौ रूपों का ध्यान चक्र साधना के साथ जोड़कर करने से साधक को गहरी आध्यात्मिक अनुभूति होती है।

नवरात्र के पावन अवसर पर योगासन, प्राणायाम और ध्यान साधक की साधना को सशक्त और गहन बना देते हैं। उपवास के साथ योग का संयोजन न केवल शरीर को शुद्ध करता है बल्कि साधक को देवी शक्ति के साथ आत्मिक रूप से जोड़ता है। यही कारण है कि नवरात्र काल में योग का अभ्यास विशेष रूप से आध्यात्मिक महत्व रखता है।

Published / 2025-09-28 18:58:02
शताब्दी वर्ष को स्थापना दिवस को मनाने वाले सौभाग्यशाली स्वयंसेवक हैं हम : डॉ बीरेंद्र साहू

विश्व की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, आर्थिक व बौद्धिक स्तर को मजबूत करता रहा है सनातन परंपरा 

टीम एबीएन, रांची। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाल्मीकि नगर ने शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर पथ संचलन व शस्त्र पूजन के साथ स्थापना दिवस उत्सव मनाया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विश्व हिंदू परिषद, झारखंड - बिहार के क्षेत्र मंत्री डॉ बिरेन्द्र साहु व बाल्मीकि नगर सहसंचालक अभिनव शाह ने शस्त्र पूजन किये। 

मौके पर डॉ बीरेंद्र साहू ने कहा भारतीय संस्कृति अनंत काल से विश्व मानव समुदाय के साथ-साथ समस्त जड़-चेतन जीव का कल्याण के कार्य करते हुए विश्व को सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, आर्थिक व बौद्धिक स्तर को मजबूत करने में सहयोग करता रहा है। भारतवर्ष सदैव से विश्व गुरु रहा है और आज भी विश्व कल्याण के अनेक कार्यों में अपना योगदान दे रहा है। 

डॉ साहु ने कहा संपूर्ण यूरोप व एशिया जो जम्मूद्वीप से विख्यात भू-धारा में एक ओर विगत 2025 वर्ष पूर्व यूरोप से तो दूसरी ओर 1425 वर्ष पूर्व अरब से दो मतों का संक्रमण के कारण सनातन परंपरा को सदैव क्षति पहुंचती रही है, जिसका परिणाम जम्मूद्वीप विखंडित होकर आज अनेक मुस्लिम एवं ईसाई देश बन गये। 1947 के बचे हुए भूभाग भी आज इस संक्रमण से प्रभावित हो रहा है, जो सनातन परंपरा के लिए चिंतनीय विषय है। 

डॉ साहू ने कहा कि स्वाधीनता के पूर्व देश में अंतिम शासक के रूप में अंग्रेजों ने बचे हुए भू-धरा को 1876 में अफगानिस्तान के रूप में अलग कर प्रारंभ किया, जो निरंतर 1947 तक अलग करने का कार्य चलाता रहा। स्वाधीनता संग्राम सेनानी के बल पर जब भारत स्वाधीन होने की स्थिति में दिखाई पड़ने लगा तब तक संक्रमण काल में समाज के अंदर अनेक कुरीतियां व्याप्त हो चुकी थी। 

इन कुरीतियों को दूर करने एवं हिंदू राष्ट्र के स्वाभिमान को जगाए रखने के उद्देश्य को लेकर परम पूज्य डॉ केशव बलीराव हेडगेवार ने 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के पावन दिवस में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। आज यह संगठन विश्व स्तरीय संगठन बन चुका है। देश में 68000 शाखाएं चल रही हैं। शताब्दी वर्ष में 100000 पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया है। 

डॉ साहू ने कहा मनुष्य का 100 वर्ष पूर्ण होना जीवन समाप्ति की परिचायक होता है अपितु संगठन का 100 वर्ष पूर्ण होना उसकी परिपक्वता को दिखाता है। हम शताब्दी वर्ष की स्थापना दिवस को मनाने वाले सौभाग्यशाली स्वयंसेवक हैं। आज संघ के विभिन्न आयाम एवं अनुसांगिक घटकों के साथ मिलकर देश के स्वर्णिम इतिहास को दोहराने का कार्य कर रही है। अयोध्या जी में भगवान पुरुषोत्तम श्रीरामलला का भव्य व दिव्य मंदिर निर्माण होना इसका एक उदाहरण है। 

डॉ साहू ने कहा प्रत्येक स्वयंसेवक को शताब्दी वर्ष के लिए दिये गये पंचपरिवर्तन विषय क्रमश: कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण, स्व का जागरण तथा नागरिक कर्तव्य में से किसी एक पर गहनता पूर्वक कार्य करना है। स्थापना दिवस के पश्चात आगामी गृह संपर्क, हिंदू सम्मेलन, सद्भाव बैठक, युवा प्रेरणा कार्यक्रम के साथ-साथ शाखा विस्तार के कार्यक्रम में अग्रणी भूमिका निभाना है। 

कार्यक्रम में संतोष सोनी, मनीष साहू, प्रेम कुमार सहित दर्जनों कार्यकर्ता उपस्थित थे। उक्त जानकारी बाल्मीकि नगर, रांची निवासी सह पूर्व सह कार्यवाह मनीष साहू (8084123065) ने दी।

Published / 2025-09-28 18:51:38
महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण मातारानी कहलायीं कात्यायनी

दुर्गा पूजा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 

एबीएन सोशल डेस्क। मां कात्यायनी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से छठी हैं और नवरात्रि के छठे दिन इनकी पूजा की जाती है। इन्हें देवी पार्वती का एक उग्र रूप माना जाता है, जिन्होंने महिषासुर राक्षस का वध किया था, जिस कारण इन्हें महिषासुरमर्दिनी भी कहते हैं।  

पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने पुत्री की इच्छा से देवी भगवती की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। उसी समय, महिषासुर नामक राक्षस के अत्याचार बढ़ रहे थे। 

तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से मां कात्यायनी प्रकट हुईं और महर्षि कात्यायन के यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया। महर्षि कात्यायन ने उनका पालन-पोषण किया, जिसके बाद वे कात्यायनी कहलायीं। 

मां कात्यायनी ने महिषासुर का संहार करके संसार को उसके आतंक से मुक्त कर दिया। उनका रूप भव्य और ऊर्जावान है। मां कात्यायनी को वीरता, न्याय और धर्म की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। इनकी कृपा से भक्तों को साहस, आत्मबल और शत्रुओं पर विजय मिलती है। 

मान्यता है कि इनकी उपासना से भक्तों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—इन चारों फलों की प्राप्ति होती है। यह भी माना जाता है कि जिन लोगों के विवाह में बाधा आ रही हो, उन्हें मां कात्यायनी की पूजा से लाभ होता है।  

मंत्र 

कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी 

नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नम:।। 

या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता।।  

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

Published / 2025-09-27 21:11:05
रांची : पागल कुत्तों के आतंक से तबाह हैं राजधानीवासी

रांची में खून का प्यासा बना कुत्ता! देखते ही लोगों पर कर देता है हमला, अब तक 17 लोगों को काट चुका 

टीम एबीएन, रांची। देश भर में कुत्ते के आतंक से हर कोई दहशत में है। आए दिन कुत्ते इंसानों पर हमला बोलते ही रहते हैं। वहीं, झारखंड के रांची में एक पागल कुत्ते ने 17 लोगों को काट लिया। मामला जिले के तमाड़ का है। बताया जा रहा है कि यहां एक पागल कुत्ता घूम रहा है। 

इस पागल कुत्ते ने अब तक 17 लोगों को काट लिया। घायलों में ज्यादातर स्कूली बच्चे शामिल हैं। यह स्कूली बच्चे इस रास्ते से स्कूल से अपने घर लौटते हैं। इसी क्रम में वह कुत्ते का शिकार हो गए। 

घायलों का अस्पताल में इलाज चल रहा है। वहीं, घटना के बाद से लोग दहशत में आ गए हैं। डर के मारे लोग सड़क पर नहीं निकल रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से कार्रवाई की मांग की है।

Published / 2025-09-26 19:42:12
नवरात्रि शक्ति की आराधना का पर्व, नारी ही शक्ति का स्वरूप : संजय सर्राफ

  • श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर में हुआ नारी शक्ति को समर्पित तलवार वितरण का कार्यक्रम

टीम एबीएन, रांची। पुंदाग स्थित श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर में नवरात्रि के पावन अवसर पर श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें नारी शक्ति को सशक्त बनाने के उद्देश्य से 50 तलवारों का वितरण किया गया।यह आयोजन समाज में महिलाओं की भूमिका को सम्मान देने तथा आत्मरक्षा व शक्ति के प्रतीक स्वरूप एक सकारात्मक संदेश देने के लिए किया गया।

 कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चारण और माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना से हुई। सभी महिलाओं को तलवार का वितरण ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ, पुजारी अरविंद पांडे, नंदकिशोर चौधरी, विशाल जालान तथा ट्रस्ट के अन्य सदस्यों द्वारा किया गया। इस अवसर पर ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि नवरात्रि शक्ति की आराधना का पर्व है और नारी ही शक्ति का स्वरूप है। 

आज की नारी केवल सहनशीलता की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपने और समाज की रक्षा के लिए शस्त्र भी उठा सकती है। तलवारें सिर्फ एक प्रतीक हैं, जो आत्मविश्वास, साहस और सम्मान का प्रतिनिधित्व करती हैं इस मौके पर क्षेत्र की कई महिलाओं ने बड़े उत्साह के साथ कार्यक्रम में भाग लिया। तलवार वितरण के दौरान उपस्थित महिलाओं को आत्मरक्षा, इतिहास में नारी शौर्य, तथा सामाजिक जागरूकता पर आधारित संक्षिप्त भाषण भी दिए गए। 

यह कार्यक्रम केवल एक प्रतीकात्मक पहल नहीं था, बल्कि समाज में नारी जागृति और सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश था। ट्रस्ट के सदस्यों ने यह भी घोषणा की कि विजयादशमी के दिन श्री कृष्ण प्रणामी मंदिर परिसर में विशाल अस्त्र-शस्त्र पूजन का आयोजन किया जाएगा। 

उस दिन विशेष रूप से 200 तलवारों का और वितरण किया जाएगा, जिसमें अधिक से अधिक महिलाओं को शामिल कर उनके आत्मबल और सुरक्षा की भावना को और सशक्त किया जाएगा। यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और नारी सशक्तिकरण की दिशा में भी एक सराहनीय पहल रहा।

इस अवसर पर- नृत्य श्री डांस स्टूडियो की संयोजिका पिंकी सिंह, श्री राम सोनी,विद्या देवी अग्रवाल, अमिता जालान, सुमन चौधरी, अनुराधा सर्राफ, रेखा पोद्दार, ललिता पोद्दार, रिंकी पांडे, अनीता अग्रवाल, अंशु अग्रवाल, सृष्टि पांडे, रजत अग्रवाल, पवन पोद्दार, श्रेष्ठ पांडे, आशीष कुमार, धीरज गुप्ता, सूरज कुमार, हरीश कुमार, सुधीर कुमार, सत्यम कुमार, मुरली कुमार सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित थे। उक्त जानकारी श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।

Published / 2025-09-25 20:52:36
पंच परिवर्तन के लिए संघ का राष्ट्रव्यापी आह्वान

सह सरकार्यवाह आलोक कुमार का विजयादशमी पर ऐतिहासिक संबोधन 

टीम एबीएन, कोकर (शिवाजी नगर) रांची। रांची महानगर, दिनांक 25.09.2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह आलोक कुमार ने विजयादशमी उत्सव समारोह के अवसर पर कोकर नगर में उपस्थित सैकड़ों स्वयंसेवकों एवं नागरिकों को संबोधित करते हुए एक दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन का आह्वान किया। 

उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष (2025-2030) को ध्यान में रखते हुए अगले 15 से 20 वर्षों तक स्वयंसेवक समाज में पंच परिवर्तन के पांच प्रमुख क्षेत्रों में समर्पित रूप से कार्य करें। 

पंच परिवर्तन की दिशा में संघ का मार्गदर्शन 

आलोक कुमार ने समाज को सशक्त, स्वावलंबी और समरस बनाने हेतु पांच परिवर्तनकारी कदमों का सूत्रपात किया, जिन्हें हर स्वयंसेवक को अपने जीवन का लक्ष्य बनाना चाहिए: 

  1. सामाजिक समरसता : छुआछूत का पूर्ण उन्मूलन : जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसी कुरीतियों को न केवल व्यवहार से, बल्कि मन और आत्मा से समाप्त करने का आह्वान किया गया। उन्होंने कहा कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक समानता का अनुभव नहीं पहुंचेगा, तब तक समरस राष्ट्र की कल्पना अधूरी रहेगी। 
  2. पर्यावरण संतुलन : प्रकृति के प्रति संवेदना का विकास : आलोक जी ने बढ़ते पर्यावरण असंतुलन पर चिंता व्यक्त करते हुए शुद्ध वायु, शुद्ध पेयजल, पौधरोपण और अन्न की बर्बादी रोकने जैसे अभियानों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बतायी। उन्होंने कहा कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकार की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। 
  3. कुटुम्ब प्रबोधन : परिवार संस्था का सशक्तिकरण : परिवार को समाज की मूल इकाई बताते हुए उन्होंने संबंधों में सम्मान, आपसी संवाद और संयुक्तता को बनाये रखने की अपील की। संवेदनशील, सुसंस्कृत और सशक्त परिवार ही राष्ट्र की नींव को मजबूत करते हैं, उन्होंने कहा। 
  4. स्वदेशी : आत्मनिर्भरता की भावना को मजबूत करना : स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर जोर देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि वोकल फॉर लोकल केवल नारा नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक स्वतंत्रता की कुंजी है। जो वस्तुएं भारत में बन सकती हैं, उन्हें विदेश से मंगाना आत्मघाती है, उन्होंने कहा। 
  5. नागरिक कर्तव्य : अधिकारों से पहले कर्तव्यों की चेतना : उन्होंने बताया कि एक जागरूक नागरिक वह होता है जो अपने कर्तव्यों का पालन पहले करता है, अधिकार अपने आप फलस्वरूप मिलते हैं। हमें शिक्षा, सुरक्षा, स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में अपने दायित्व समझने होंगे। 

विजयादशमी का संदेश : बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक 

अपने सारगर्भित उद्बोधन में आलोक कुमार ने विजयादशमी के ऐतिहासिक संदर्भ को जोड़ते हुए बताया कि जैसे मां दुर्गा ने महिषासुर और भगवान राम ने रावण के अहंकार का विनाश किया, वैसे ही हमें अपने अंदर के अहंकार, अज्ञान और नकारात्मकता का अंत कर, ज्ञान, शक्ति और धन को समाजहित में प्रयोग करना चाहिए। 

घर-घर संपर्क अभियान : समाज जागरण का अगला चरण 

उन्होंने घोषणा की कि संघ के स्वयंसेवक समाज में जाकर शिक्षा, देशप्रेम, आपदा प्रबंधन और समाज जागरण के लिए घर-घर संपर्क करेंगे। जन-जन तक पहुंच कर राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करना ही संघ का उद्देश्य है, उन्होंने कहा। 

शस्त्र पूजन और पथ संचलन : परंपरा और अनुशासन का संगम 

मौके पर मूसलाधार वर्षा के बीच सैकड़ों स्वयंसेवकों ने कोकर नगर में अनुशासित रूप से पथ संचलन किया। इसके साथ ही परंपरागत शस्त्र पूजन किया गया, जो शक्ति और मर्यादा के संतुलन का प्रतीक है। 

उपस्थित गणमान्यजन 

समारोह में अनेक प्रमुख कार्यकर्ता एवं सामाजिक प्रतिनिधि उपस्थित रहे, जिनमें विशेष रूप से प्रांत प्रचारक गोपाल जी, विभाग संघचालक विवेक भसीन, नगर संघचालक विजय राज,  शशिकांत जी, मुकेश कपूर, मदन राजभर, आनंद दूबे, सच्चिदानंद, राजेंद्र, संजीव विजयवर्गीय पूर्व डिप्टी मेयर, रांची म्युनिसिपल कारपोरेशन सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।

Published / 2025-09-25 20:41:20
एलेविटा मिसिज इंडिया वर्ल्ड 2025 के फाइनल में झारखंड की बेटी तृप्ति कुमारी लकड़ा चयनित

टीम एबीएन, रांची। झारखंड की गौरवशाली आदिवासी महिला, उद्यमी और डिजाइनर तृप्ति कुमारी लकड़ा ने एक बार फिर अपने जज्बे और मेहनत से राज्य का नाम रोशन किया है। तृप्ति का चयन एलेविटा मिसिज इंडिया वर्ल्ड 2025 के अंतिम चरण के लिए हुआ है। यह वही मंच है, जिसे मिसिज वर्ल्ड जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य प्रतियोगिता का आधिकारिक भारतीय चयन द्वार माना जाता है। 

संघर्ष से सफलता तक 

अठारह वर्ष की आयु में पिता को खोने का गहरा आघात झेलने के बावजूद तृप्ति ने हार नहीं मानी। उन्होंने जीवन को एक नए उद्देश्य और दृष्टिकोण के साथ जीना शुरू किया। कठिन परिस्थितियों से गुजरते हुए भी अपने सपनों को थामे रखना उनकी सबसे बड़ी ताकत रही। 

पालतू पशुओं के लिए ब्रांड डर्टी पॉज 

पशु-पक्षियों, विशेषकर कुत्तों के प्रति उनके गहरे लगाव ने उन्हें डर्टी पॉज नामक ब्रांड की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया। यह ब्रांड न सिर्फ पालतू जानवरों के लिए आभूषण और एक्सेसरीज बनाता है, बल्कि सड़क पर रहने वाले कुत्तों के लिए रिफ्लेक्टिव कॉलर भी तैयार करता है, ताकि वे रात के समय सड़क दुर्घटनाओं से सुरक्षित रह सकें। यह पहल तृप्ति के सामाजिक सरोकारों को भी उजागर करती है। 

प्राणिक हीलिंग से जीवन में संतुलन 

तृप्ति प्राणिक हीलिंग की साधक भी हैं। उनका कहना है कि इस साधना ने उन्हें स्वास्थ्य, प्रेम, समृद्धि और आत्मा के बीच संतुलन साधना सिखाया। तृप्ति का मानना है कि सौंदर्य केवल बाहरी रूप में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, व्यक्तित्व और उद्देश्य में भी निहित होता है। 

व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन का संतुलन 

हाल ही में विवाह के बाद भी तृप्ति ने अपने सपनों को रुकने नहीं दिया। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि एक महिला अपने व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के बीच संतुलन बनाकर दोनों में सफलता हासिल कर सकती है। अपनी उपलब्धि पर तृप्ति कहती हैं कि यह मंच केवल सौंदर्य का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, व्यक्तित्व और उद्देश्य का है। मैं चाहती हूं कि मेरी यात्रा से हर महिला यह महसूस करे कि वह असीमित है।  

झारखंड के लिए गर्व का क्षण 

एलेविटा मिसिज इंडिया वर्ल्ड 2025 का भव्य समापन आगामी महीनों में होगा। तृप्ति पूरे समर्पण और मेहनत के साथ तैयारी कर रही हैं। उनका यह कदम न केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि झारखंड की हर उस महिला के लिए प्रेरणा है, जो अपने सपनों को साकार करने की राह में संघर्षरत है। झारखंड के लिए यह गर्व का क्षण है कि यहां बेटी अब राष्ट्रीय मंच पर अपनी चमक बिखेरने जा रही है।

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