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Published / 2025-10-30 13:27:39
गोपाष्टमी पर्व पर श्री कृष्ण प्रणामी गौशाला में श्रद्धा और उल्लास का संगम

  • गौसेवा और गौसंवर्धन से जीवन में समृद्धि, शांति और सुख की होती है प्राप्ति : संजय सर्राफ

टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित पुंदाग स्थित श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवा धाम में स्थित श्री कृष्ण प्रणामी गौशाला मे गोपाष्टमी पर्व श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। 

प्रातः 8 बजे मंदिर के पुजारी पं. अरविंद पांडे द्वारा गौमाता की विधिवत पूजा-अर्चना वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न की गई। पूजा के उपरांत गौमाता को विशेष भोग लगाया गया तथा उपस्थित श्रद्धालुओं ने पारंपरिक रूप से गोसेवा करते हुए गायों एवं बछड़ों को गुड़, हरा चारा, दाना और अन्य सामग्री खिलाई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने गौमाता को फूल-मालाएं पहनाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। 

पूजा-अर्चना के पश्चात श्री राधा कृष्ण मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण में भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। मधुर भजनों से संपूर्ण परिसर भक्तिरस में सराबोर हो उठा। इसके उपरांत प्रसाद वितरण का आयोजन हुआ, जिसमें सभी भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया। 

इस पावन अवसर पर सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम में रह रहे दिव्यांग, निराश्रित और असहायजनों एवं सेवादारों को विविध प्रकार के व्यंजनों का स्नेहपूर्वक भोजन कराया गया। ट्रस्ट के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि गोपाष्टमी का पर्व हमें गौमाता की महिमा और संरक्षण के प्रति जागरूक करता है। 

उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय न केवल अन्नदाता है, बल्कि धार्मिक, सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी अमूल्य है। गौसेवा और गौसंवर्धन से जीवन में समृद्धि, शांति और सुख की प्राप्ति होती है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य अनुसार गौसेवा में योगदान दे। गोपाष्टमी उत्सव में ट्रस्ट के सदस्यगण, क्षेत्र के अनेक श्रद्धालु, सेवादार और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। 

सभी ने इस दिव्य आयोजन की सराहना की और कहा कि ऐसे धार्मिक पर्व समाज में सेवा, प्रेम और एकता की भावना को सशक्त करते हैं। अंत में सामूहिक आरती और गौमाता की जयघोष के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। उक्त जानकारी श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।

Published / 2025-10-30 10:32:22
इयं तत्वमसि...

त्रिवेणी दास

एबीएन सोशल डेस्क। उपनिषद में एक शब्द तत्वमसि का उल्लेख आता है। इस शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। प्रकृति के प्रत्येक अवयव में वही एक तत्व विराजमान है जो तत्व मनुष्य भीतर विराजमान होता है। पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश/अंतरिक्ष के प्रकृति (गुण) में वही एक तत्व है। उपनिषद कहता है मनुष्य वही तत्व है। 

एक फल के पौधे के जीवन चक्र के ऊपर विचार करने से पाया जाता है कि जड़, तना और पत्ता उसकी जीवन शक्ति है। समय पर फूल और फल उत्पन्न करता है। फूलों में सुगंध एवं फल के अंदर आवश्यक जीवन-शक्ति के तत्व होते हैं। किसी कारणवश वृक्ष से मूल तत्व बाहर निकला तो वृक्ष मृत होकर सूख जाता है। 

मनुष्य के अंदर का मूल तत्व जैसे ही शरीर का परित्याग करता है तत्क्षण शरीर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वह तत्व और कुछ नहीं परमात्मा का अंश आत्मा के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रकृति में रचा-बसा हुआ है और वह सत्य अनंत शक्तिशाली है जो सृजन तथा जीवन चक्र का कारण है। 

जिसने भी उस तत्व को पहचाना तथा उसे संपर्क स्थापित किया उसने अपने कार्यों में अतिरिक्त असाधारण परिणाम उत्पन्न करने में सफलता अर्जित की तथा परम शांति में स्वयं को स्थापित किया।

Published / 2025-10-28 20:17:20
देशभर में 30 अक्टूबर को मनायी जायेगी गोपाष्टमी

गोपाष्टमी गौ-सेवा, श्रद्धा और संस्कृति का पावन पर्व : संजय सर्राफ

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत की सनातन संस्कृति में गाय को माता का स्थान प्राप्त है। गोपाष्टमी वही पावन पर्व है जो गाय और गोवंश की महिमा को समर्पित है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष गोपाष्टमी 30 अक्टूबर दिन गुरुवार को मनाया जायेगा। 

गोपाष्टमी उत्सव अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ देशभर में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन पहली बार गोपालक (गाय चराने वाले) के रूप में गौवंश की सेवा की थी। नंद बाबा ने उन्हें बछड़ों के बजाय गायों को चराने की अनुमति दी थी। 

इसी कारण यह दिन गोपालक रूप में श्रीकृष्ण की आराधना का प्रतीक माना जाता है। इस दिन से ही व्रज में गौ-सेवा का शुभारंभ होता है। इसके अतिरिक्त, यह पर्व गौमाता की पवित्रता, पालन और संरक्षण के प्रति आस्था का प्रतीक है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में भी गोपाष्टमी का उल्लेख मिलता है। 

कहा गया है कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धापूर्वक गौ-सेवा करता है, उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। गोपाष्टमी के दिन सुबह स्नान कर लोग गायों को स्नान कराते हैं, उनके सींगों और गले में फूल-मालाएं, रोली, गुलाल और कपड़ों से सजावट की जाती है। इसके बाद गाय की आरती उतारी जाती है और घास, गुड़, रोटी, चना, और फल अर्पित किए जाते हैं। 

गौ-सेवा करने वाले गोपालक, गौशालाओं के गौ सेवक और किसान इस दिन विशेष रूप से सम्मानित किए जाते हैं। कई स्थानों पर गौ-पथ यात्रा या गौ-पूजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा गोवंश की रक्षा की कामना करती हैं। 

मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण और गोपालक रूप की मूर्तियों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। गोपाष्टमी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय ग्राम्य संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। गाय भारतीय कृषि, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण से गहराई से जुड़ी हुई है। 

गौमाता से प्राप्त दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र पंचगव्य के रूप में जीवनोपयोगी माने गए हैं। इनसे न केवल पोषण मिलता है बल्कि खेती और औषधि के क्षेत्र में भी इनका महत्व अपार है। गोपाष्टमी हमें यह संदेश देती है कि गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति है, जिसका संरक्षण हर व्यक्ति का धर्म है। 

आज जब पर्यावरण असंतुलन और रासायनिक खेती की समस्या बढ़ रही है, तब गोसंवर्धन और गोपालन हमारे लिए समाधान का मार्ग प्रस्तुत करते हैं। गोपाष्टमी का पर्व गौमाता के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक है। यह हमें भारतीय संस्कृति के उस मूल सिद्धांत की याद दिलाता है जिसमें सर्वभूत हित को सर्वोपरि माना गया है। 

इस पावन दिन पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम गौवंश की रक्षा, गौशालाओं के विकास और स्वदेशी संस्कृति के संरक्षण में अपना योगदान देंगे। गोपाष्टमी केवल पूजा नहीं, बल्कि गौ-सेवा और धरती मां की रक्षा का दिव्य संदेश है, जो युगों-युगों तक भारतीय आस्था का आधार बना रहेगा।

Published / 2025-10-28 09:25:11
आस्था का चमत्कार...

  • न कोई थकान, न किसी प्रकार का आलस्य और ना ही किसी प्रकार का शारीरिक मानसिक तथा भावनात्मक अपवित्रता.. स्वत: स्फूर्त कठोर अनुशासन

त्रिवेणी दास

एबीएन सोशल डेस्क। ना शांति समिति की बैठक, न कोई दंगा-फसाद, न इंटरनेट कनेक्शन को बाधित करना, ना कोई शंका ना ही कोई डर, श्रद्धा एवं स्वेच्छा से घाटों की सफाई, पूजा सामग्री को नि:शुल्क उपलब्ध कराना, शराब की दुकानों को बंद करने की आवश्यकता नहीं है ।

ठेकुआ का प्रसाद प्रत्येक घर में स्वयं ही निर्माण करना, छठ व्रतियों के आने जाने वाले मार्ग का सफाई पानी से पवित्र करना, छठ घाट में ऊंच नीच जाति पाति का भेद मिट जाना, कोई फिल्मी गीत नहीं केवल और केवल छठ के लोकगीत ; यह सब कुछ आस्था का चमत्कार है। 

सूर्य भगवान को अर्घ्य का समर्पण और संपूर्ण अनुष्ठान में कोई पंडित नहीं कोई पुजारी नहीं मंत्र के रूप में श्रद्धा, भक्ति एवं विश्वास का निरंतर जाप; आस्था की शक्ति चमत्कृत करती है।

चार दिनों तक चलने वाला छठ के अनुष्ठान में न कोई तामझाम, ना कोई दिखावा और न ही निमंत्रण का इंतजार बस केवल जिसे जितना बन पड़े सहयोग ही सहयोग। प्रमाणित होता है कि हमारे अंदर आस्था के अनुपात से कई गुना अधिक परिणाम हमारे प्रत्येक कार्यों में उत्पन्न किया जा सकता है; यदि हमने आस्था के महत्व को व्यक्तिगत जीवन में अंगीकार कर लिया हो।

Published / 2025-10-27 12:15:16
छठ महापर्व के तीसरे दिन अस्तगामी सूर्य को दिया जायेगा अर्घ्य

  • आज छठ पूजा का तीसरा दिन, अस्तगामी सूर्य को दिया जाएगा अर्घ्य — जानें शुभ मुहूर्त और विधि

एबीएन सोशल डेस्क। छठ पर्व का आज तीसरा दिन है, जिसे संध्या अर्घ्य  के रूप में जाना जाता है। आज श्रद्धालु अस्तगामी सूर्य  को अर्घ्य देकर छठी मैया और सूर्यदेव का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। यह पर्व सूर्य उपासना, प्रकृति और मातृत्व की शक्ति को समर्पित है। मान्यता है कि छठी मैया देवी कात्यायनी का अवतार हैं और सूर्यदेव की बहन मानी जाती हैं। इसलिए यह व्रत सूर्य-षष्ठी  के नाम से भी प्रसिद्ध है।

छठ पूजा के तीसरे दिन का महत्व 

छठ पूजा के तीसरे दिन भक्तजन डूबते हुए सूर्य को जल अर्पित करते हैं। यह एकमात्र पर्व है जिसमें Setting Sun को अर्घ्य दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शाम के समय सूर्यदेव अपनी पत्नी प्रत्युषा के साथ होते हैं, इसलिए इस समय अर्घ्य देना अत्यंत शुभ माना जाता है। 

भक्त सूर्यदेव को धन्यवाद देते हैं दिनभर की ऊर्जा, रोशनी और जीवन प्रदान करने के लिए। इस दौरान माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की कामना करती हैं।

अर्घ्य देने से पहले करें सूर्य कवच का पाठ 

संध्या अर्घ्य से पहले करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। मान्यता है कि सूर्य कवच का पाठ करने से हेल्थ, कैरियर, वेल्थ और विल पॉवर में सुधार होता है। यह आंख, त्वचा, हृदय और हड्डियों से जुड़ी बीमारियों से भी रक्षा करता है। छठ पूजा के दौरान हर दिन इसका पाठ शुभ फल देता है।

तीन शुभ योगों में दिया जाएगा संध्या अर्घ्य 
इस साल छठ पूजा का संध्या अर्घ्य बेहद खास है क्योंकि यह रवि योग, हंसा राजयोग और रुचक राजयोग जैसे तीन शुभ योगों में संपन्न होगा।

Published / 2025-10-26 17:18:43
श्री राधा-कृष्ण मंदिर में छठ के खरना पर 101 किलो खीर का लगा भोग

हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया 

टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित पुंदाग में श्री कृष्ण प्रणामी मंगल राधिका सदानंद सेवा धाम श्री राधा कृष्ण प्रणामी मंदिर में 235 वां श्री कृष्ण प्रणामी अन्नपूर्णा सेवा महाप्रसाद  का आयोजन किया गया। आज का श्री कृष्ण प्रणामी अन्नपूर्णा सेवा प्रणामी ट्रस्ट के सदस्यों ने आयोजित किया। आज छठ महापर्व खरना पूजा के अवसर पर 101 किलो दूध का खीर का भोग लगाया गया।

श्री राधा कृष्ण जी का दिव्य अलौकिक श्रृंगार किया गया। खीर महाप्रसाद का विधिवत भोग दोपहर 12 बजे मंदिर के पुजारी अरविंद कुमार पांडे ने लगायी। तत्पश्चात मंदिर परिसर में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। तत्पश्चात भजन- संध्या के कार्यक्रम में ट्रस्ट के भजन गायकों के मनमोहक सुमधुर भजनों में अमृत गंगा का रसपान कराते हुए श्रोताओं को खूब झुमाया तथा श्री राधा कृष्ण के जयकारा से पूरा वातावरण कृष्णमय एवं भक्तिमय बन गया। 

तत्पश्चात सामूहिक रूप से महाआरती की गयी। ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि आज श्री राधा कृष्ण मंदिर में 4 हजार से अधिक श्रद्धालुओं में दर्शन किये। उन्होंने कहा कि छठ महापर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सूर्य ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता का भी प्रतीक है। छठ पूजा भारतीय संस्कृति की उस अनमोल परंपरा का उत्सव है जो मनुष्य और प्रकृति के अटूट बंधन को दशार्ता है। यह पर्व श्रद्धा शुद्धता और समर्पण का प्रतीक है। 

मौके पर ट्रस्ट के अध्यक्ष डूंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, निर्मल जालान, शिव भगवान अग्रवाल, मधुसूदन जाजोदिया, ज्ञान शर्मा, निर्मल छावनिका, पूरणमल सर्राफ, संजय सर्राफ, विष्णु सोनी, बिजय अग्रवाल, मनीष सोनी, मुरली प्रसाद, हरीश कुमार, परमेश्वर साहू, बसंत वर्मा सहित बड़ी संख्या में महिलाएं, पुरुष उपस्थित थे।

Published / 2025-10-25 20:26:55
मुरुम बारह पाड़हा सोहराई जतरा हर्षोल्लास के साथ संपन्न

जतरा हमारी पारंपरिक सांस्कृतिक धरोहर है : सुरेश बैठा 

प्रकृति ही हमारे आराध्यदेव है जो हमें जीवन देता है : नारायण उरांव  

झारखंडी संस्कृति का आत्मा है जतरा : डॉ बिरेन्द्र साहु 

टीम एबीएन, रांची। कांके के मुरुम बारह पाड़हा सोहराई जतरा आज हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। जतरा में मुरुम, रोल, होचर, इचापिरी, रेंडो- पतरातु सहित कई गांवों के खोड़हा अपने पारंपरिक परिधान के साथ ढोल-ढाक-नगाड़ा बजाते एवं नृत्य दान करते हुए मुरूम मुख्य अखाड़ा पहुंचे, जहां घंटों लोग जतरा नृत्य-गान किये। रात्रि में नागपुरी गीत आर्केस्ट्रा का आयोजन किया गया। 

मुख्य अतिथि के रूप में कांके के विधायक सुरेश कुमार बैठा ने कहा हमारी परंपरा व संस्कृति को बोलचाल व वेशभूषा ही जीवित रखा है। युवा पीढ़ी इस परंपरा रूपी धरोहर को जतरा के रूप में आयोजित कर बचा रहे हैं। 

जतरा के उद्घाटनकर्ता सरना समिति के नारायण उरांव ने हमारे पुरखों ने पुरातन काल से ही समाज को ठीक रखने के लिए पाड़हा रूपी न्यायिक व्यवस्था बना करके रखा है, जहां हम किसी भी प्रकार के मामला का निपटारा करते रहे हैं। उन्होंने कहा प्रकृति ही हमारा आराध्य देव है जो हमें जीवन देता है। जल जंगल जमीन ही हमारी पहचान है जो पर्यावरण को सुरक्षित रखने का सूत्र प्रदान करता है। 

डॉ बिरेन्द्र साहु ने कहा कि झारखंड के लोगों का बोलना ही गीत एवं चलना ही नृत्य के समान होता है। झारखंडी संस्कृति का आत्मा गांव गांव में लगने वाला जतरा है। 

कार्यक्रम को सफल बनाने में जतरा के संरक्षक सधन उरांव, अध्यक्ष साधो उरांव, कार्य अध्यक्ष गुड्डू उरांव, कोषाध्यक्ष संदीप उरांव, एतवा उरांव, अजीत टोप्पो, सुधीर उरांव, राहुल तिर्की आदि मुख्य थे। उक्त जानकारी समिति के साधो उरांव ने दी।

Published / 2025-10-24 20:42:22
दो नवंबर को लगेगा बड़ागांई बुटी देवोत्थान जतरा मेला

टीम एबीएन, रांची। बड़ागाई-बुटी के सीमा पर स्थित देवोत्थान धाम (बूढ़ा महादेव मंदिर) परिसर में विनोद महतो की अध्यक्षता में एक बैठक की गयी। जिसमें ग्राम बड़ागाई, लेम, किशुनपुर, खिजुर टोला, महुरम टोली सहित अन्य कई गांव के लोग उपस्थित थे।

बैठक में सर्वसम्मति से देवोत्थान एकादशी (देवों के जगने) के उपलक्ष्य में 02 नवंबर, 25 (द्वादशी) को देवोत्थान जतरा मेला आयोजन करने का निर्णय लिया गया। ज्ञात हो कि यह मेला 1931 से लगातार लगाया जा रहा है। यह ऐतिहासिक जतरा मेला सुबह 10 बजे से संध्या 05:30 तक लगेगी।

मेला में कई गांव के खोड़हा (नृत्य टोली) अपने पारंपरिक वाद्ययंत्र एवं वेशभूषा के साथ उपस्थित होकर नृत्य-गान करेंगे। मेला को सफल संचालन के लिए मुख्य पहान के रूप में रवि पहान होंगे। 

वहीं मुख्य संरक्षक डॉ रूद्र नारायण महतो व बनु पहान, संरक्षक डॉ बिरेन्द्र साहु, बलशाय महतो, रमेश लोहरा, महेन्द्र मुंडा, विनोद महतो, अध्यक्ष नेपाल महतो, सचिव  प्रेम लोहरा, कोषाध्यक्ष अजय कुमार महतो, उपाध्यक्ष संदीप पहान, बबलु पहान, अमित पहान होंगे। उक्त जानकारी देवोत्थान जतरा मेला समिति, बड़ागांई- बुटी, रांची के सचिव प्रेम लोहरा (98354 25981) ने दी।

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