एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में गुरु नानक देव जी का स्थान अत्यंत ऊँचा है।
वे न केवल सिख धर्म के संस्थापक थे, बल्कि एक ऐसे संत, समाज सुधारक और मानवतावादी थे जिन्होंने पूरे विश्व को सत्य, करुणा और समानता का संदेश दिया। गुरु नानक देव जी की जयंती, जिसे गुरुपर्व या प्रकाश पर्व भी कहा जाता है, हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। इस वर्ष यह पावन पर्व 5 नवंबर दिन बुधवार को मनाया जाएगा।
इस साल गुरु नानक देव जी की 556वीं जयंती होगी गुरु नानक देव जी का जन्म सन् 1469 ईस्वी में पंजाब के तलवंडी गाँव (अब पाकिस्तान में ननकाना साहिब) में हुआ था। उनके पिता का नाम मेहता कालू और माता का नाम माता तृप्ता था। बचपन से ही वे अत्यंत बुद्धिमान, सत्यनिष्ठ और करुणामयी थे। सांसारिक वैभव से दूर, वे हमेशा ईश्वर की भक्ति और मानवता की सेवा में लीन रहते थे। यह जयंती गुरु नानक देव जी के जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है।
इस दिन सिख समुदाय और उनके अनुयायी उनकी शिक्षाओं को स्मरण करते हुए कीर्तन, भजन, लंगर और सेवा के माध्यम से प्रेम, समानता और भाईचारे का संदेश फैलाते हैं। गुरु नानक देव जी ने समाज में फैले भेदभाव, अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया तथा एक ओंकार सतनाम का उपदेश दिया-अर्थात् ईश्वर एक है और वह सबमें विद्यमान है।
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ तीन मूल सिद्धांतों पर आधारित थीं-नाम जपना-ईश्वर का स्मरण करना,किरत करना-ईमानदारी से जीवनयापन करना,वंड छकना- दूसरों के साथ बाँटकर खाना, उनके विचारों ने न केवल सिख धर्म की नींव रखी, बल्कि पूरी मानवता को सत्य, करुणा और समानता का मार्ग दिखाया।
गुरुपर्व से दो दिन पहले नगाड़ा कीर्तन यात्रा निकाली जाती है, जिसमें नगर की गलियाँ गुरुवाणी से गूंज उठती हैं। गुरुद्वारों को पुष्पों और दीपों से सजाया जाता है। अखंड पाठ (48 घंटे का निरंतर गुरुग्रंथ साहिब पाठ) आयोजित होता है। जयंती के दिन प्रभात फेरी, भजन-कीर्तन, गुरु का लंगर और सेवा का माहौल अद्भुत शांति और सौहार्द का अनुभव कराता है।
लंगर में सभी धर्मों और वर्गों के लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं, जो समानता का प्रतीक है। कहा जाता है कि एक दिन नानक देव जी स्नान के लिए नदी में गए और तीन दिन तक लापता रहे। जब वे लौटे तो बोले, ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान। इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। इसी अनुभव के बाद उन्होंने संसार में प्रेम, सच्चाई और सेवा का संदेश फैलाना शुरू किया।
गुरु नानक देव जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानवता, समानता और सत्य का उत्सव है। उनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी 500 वर्ष पूर्व थीं। उन्होंने हमें सिखाया कि ईश्वर की सच्ची उपासना सेवा, प्रेम और सत्य के मार्ग पर चलने में है।इसलिए हर वर्ष यह पर्व हमें याद दिलाता है-मानव सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है।
टीम एबीएन, रांची। बड़ागाँई देवोत्थान धाम परिसर में आयोजित देवोत्थान जतरा मेला हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर सैकड़ो श्रद्धालुओं ने सुबह से ही पंक्तिबद्ध होकर भगवान शिव का पूजा अर्चना कर अपनी मनोकामना पूर्ण होने का आशीष प्राप्त किये।
देवोत्थान जतरा मेला का शुभारम्भ बड़ागाँई के ग्राम पुजारी रवि पहान, पूर्व सांसद रामटहल चौधरी, विश्व हिंदू परिषद झारखण्ड-बिहार के क्षेत्र मंत्री व मेला के संरक्षक डॉ बिरेन्द्र साहू, मुख्य संरक्षक डॉ रुद्र नारायण महतो, संरक्षक बनु पहान व बालसाय महतो, अध्यक्ष नेपाल महतो, सचिव प्रेम लोहार, कोषाध्यक्ष अजय महतो सहित कई आगंतुक अतिथियों के द्वारा विधि- विधान से भगवान शिव का पूजन-अर्चन कर किया गया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व सांसद राम टहल चौधरी ने कहा बड़ागांई -बूटी देवोत्थान धाम पर जहां एक और अपने ऐतिहासिक विरासत को दर्शाती है वहीं दूसरी ओर इस स्थल पर श्रद्धालुओं का अटूट श्रद्धा बसती है।
उन्होंने कहा जतरा मेला वर्ष में एक बार परिवार मिलन का पुरातन परंपरागत व्यवस्था है। झारखंड की संस्कृति संपूर्ण देश में नहीं अपितु विश्व को पर्यावरण संरक्षण के सार्थक पहल के लिए जाना जाता है। झारखंडी संस्कृति को बचाए रखने के लिए युवाओं का विशेष भागीदारी होना चाहिए। विश्व हिंदू परिषद झारखण्ड-बिहार के क्षेत्र मंत्री व मेला के संरक्षक डॉ बिरेन्द्र साहू ने कहा जतरा मेला हमारी प्राचीन परम्परा व संस्कृतिक धरोहर है।
पारंपरिक नृत्य-गान व वेशभूषा से झारखंड की संस्कृति झलकती है। उन्होंने कहा यह जतरा देवोत्थान/ प्रबोधिनी एकादशी को भगवान विष्णुजी के जगने को लेकर 1931 में जूठन कविराज के नेतृत्व में निर्मित बूढ़ा महादेव / देवोत्थान धाम परिसर में मनाने का परंपरागत धरोहर है। इस पावन स्थल पर लोग शिवरात्रि पूजन, शादी- विवाह, मुंडन संस्कार के साथ साथ प्रत्येक माह अनेक कार्यक्रम करते रहते हैं, जो इस स्थल की महत्ता को बढ़ाती है।
जतरा मेला में बड़ागांई पहान टोली, बड़ागांई मुंडा टोली, बेड़ो, बाँधगाडी, खिजूरटोला, बूटी, किशुनपुर, महुरम टोली, लेम, लापुंग, आरा बाड़ाम आदि गांवों के खोड़हा ( नृतक दल) अपने-अपने पारंपरिक वेशभूषा एवं वाद्य यंत्रों के साथ भगवान शिव का आराधना करते हुए अलग-अलग स्थान पर नृत्यगान प्रस्तुत कर मेले में आए सैकड़ो गांवों के लगभग 50 हजार से अधिक लोगों का मनोरंजन किये।
लोगों ने पारंपरिक नचनी नृत्य का भी आनंद लिया। युवा- युवतियों ने आधुनिक आर्केस्ट्रा एवं नागपुरी गीत कलाकारों के द्वारा गाए हुए गीतों पर भी घंटों झूमते रहे। बच्चों ने झूला का भरपूर आनंद लिया वही पारंपरिक मिठाई, खिलौना, गुपचुप, आइसक्रीम, ईख, सौंदर्य प्रसाधनों इत्यादि की जमकर खरीदारी हुई।
मेला में मुख्य संरक्षक डॉ रुद्रनारायण महतो व बनु पहान, संरक्षक डॉ बिरेन्द्र साहु, अध्यक्ष नेपाल महतो, सचिव प्रेम लोहार, कोषाध्यक्ष अजय कुमार महतो, बालसाय महतो, विनोद महतो, रवि पाहन, बबलू पहान, संदीप मुंडा, रणधीर चौधरी, अंतू तिर्की, रणधीर रजक, संजय महतो, रमेश तिर्की, दशरथ महतो, अशोक खलखो, सदर थाना प्रभारी कुलदीप कुमार, डॉ हेमलाल महतो, सुनील टोप्पो, अवधेश बैठा सुरेंद्र मुंडा, अमित पहान, महावीर मुंडा, दिलीप पहान आदि की मुख्य भूमिका रही। उक्त जानकारी देवदेवोत्थान जतरा मेला समिति, बड़ागांई-बूटी के सचिव प्रेम लोहार (9835425981) ने दी।
एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि इस वर्ष कार्तिक पूर्णिमा का पर्व 5 नवंबर दिन बुधवार को मनाया जाएगा। हिंदू धर्म मे कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यह दिन धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस वर्ष कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि 4 नवंबर को प्रातः काल 10:36 बजे से प्रारंभ होकर अगले दिन 5 नवंबर को सायं काल 6:48 बजे तक रहेगी ऐसे में उदया तिथि के अनुसार इस साल कार्तिक पूर्णिमा का पावन पर्व 5 नवंबर को मनाया जाएगा। कार्तिक पूर्णिमा का पर्व इस दिन को देव दीपावली, त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण कर सृष्टि की रक्ष की थी। साथ ही यह भी कहा जाता है कि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक तीन राक्षसों का संहार कर धर्म की पुनर्स्थापना की थी, इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमा कहा जाता है। यही कारण है कि यह तिथि भगवान विष्णु, भगवान शिव और देवी लक्ष्मी-तीनों की आराधना के लिए विशेष फलदायी मानी जाती है।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान, विशेषकर पवित्र नदियों जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा या किसी तीर्थ सरोवर में स्नान करने का विशेष महत्व है। इसे कार्तिक स्नान कहा जाता है। स्नान के उपरांत भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी का पूजन कर दीपदान किया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन दीप जलाने से पिछले सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
कार्तिक पूर्णिमा का व्रत रखने और इस दिन लक्ष्मी नारायण की विधिवत पूजा करने से घर में सुख, संपत्ति और खुशहाली बनी रहती है।इस दिन किया गया दान-पुण्य, तुलसी पूजन, हवन और दीपदान सामान्य दिनों की तुलना में अनेक गुना अधिक फलदायी होता है। कई स्थानों पर रात्रि में दीपावली की भाँति दीप प्रज्वलित कर देव दीपावली मनाई जाती है।
वाराणसी में गंगा घाटों पर हजारों दीपों की रौशनी से सुसज्जित दृश्य अद्भुत और दिव्य प्रतीत होता है। कार्तिक पूर्णिमा केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव का भी प्रतीक है। यह पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर और असत्य से सत्य की ओर अग्रसर होने का संदेश देता है।
इस दिन समाज में दया, दान और करुणा की भावना जागृत होती है। तीर्थ स्थलों, मेलों और घाटों पर भक्तों का अपार जनसैलाब उमड़ता है, जिससे यह पर्व लोक-आस्था और एकता का प्रतीक बन जाता है। कार्तिक पूर्णिमा का पर्व भारतीय संस्कृति में शुद्धता, त्याग, प्रकाश और भक्ति का संगम है। यह दिन मानवता को यह सिखाता है कि जीवन में भक्ति, सेवा और सच्चे कर्म का प्रकाश ही सबसे बड़ा दीपक है।
गंगा स्नान, दीपदान और दान-पुण्य के माध्यम से व्यक्ति अपने मन, वचन और कर्म को पवित्र कर परम आनंद की अनुभूति करता है। इस प्रकार कार्तिक पूर्णिमा केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि आस्था, अध्यात्म और सांस्कृतिक चेतना का उज्ज्वल पर्व है, जो हर हृदय में दिव्यता का दीप प्रज्वलित करता है।
टीम एबीएन रांची। सेवा भारती, रांची महानगर भाग - 3 के तत्वावधान में मेन रोड, रांची के कडरू मोड़ स्थित कुजारा भवन में सिलाई प्रमाण पत्र वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर क्षेत्र के तीन स्वावलंबन केदों से प्रशिक्षित 45 प्रशिक्षुओं को सिलाई-कटाई का प्रमाण पत्र प्रदान किया गया।
इस अवसर पर सेवा भारती, रांची महानगर के अध्यक्ष चंद्रकांत रायपत ने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि सेवा भारती के माध्यम से अभावग्रस्त, सेवा बस्तियों की महिलाओं को स्वावलंबन का प्रशिक्षण देकर आर्थिक-सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का प्रेरणादायक कार्य किया जा रहा है।
समाज में सेवा भारती स्वालंबन की लौ जला रही है। महिलाएं परिवार एवं राष्ट्र की एक शक्ति है। मौके पर सेवा भारती की न्यासी श्रीमती पूनम आनंद ने कहा कि आत्मनिर्भर महिलाएं समाज को दिशा देने का कार्य करती है। आज के इस भौतिक युग में महिलाओं की आत्मनिर्भरता ही उनकी ताकत है।
सिलाई प्रमाण पत्र वितरण कार्यक्रम में सेवा भारती की सह प्रांत महिला प्रमुख श्रीमती नीतू सिन्हा ने महिलाओं का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि महिलाओं को कहीं नौकरी करने के बजाय हाथ का कोइ न कोई हुनर लेकर हमें स्वरोजगार से जुड़ना चाहिए।
मौके पर प्रशिक्षणार्थियों ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि सेवा भारती केवल स्वावलंबन प्रशिक्षण ही नहीं देती है, यहां संस्कार, कुशल व्यवहार एवं सामाजिक दायित्व निर्वहन सम्बन्धित ज्ञान भी मिलता है।
कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन देते हुए सेवा भारती, रांची महानगर के सचिव श्याम टोरका ने कहा कि संस्था की ओर से रांची नगर में प्रतिवर्ष 300 महिलाएं सिलाई- कटाई का प्रशिक्षण लेती हैं, उनमें से लगभग 225 महिलाएं स्वरोजगार से जुड़कर अपने परिवार को आर्थिक संबल प्रदान कर रही है। इस कार्यक्रम में परमानंद कुजारा, प्रदीप केडिया, मदन सेन, रश्मि मिश्रा, पुष्पा देवी, चंद्रमनी देवी, शोभा देवी, फूलमनी देवी, सुशीला शर्मा सहित 55 महिलाओं की उपस्थिति रही।
एबीएन सोशल डेस्क। अग्रसेन पथ स्थित श्री श्याम मन्दिर में दिनांक 01 नवम्बर 2025 को कार्तिक शुक्ला देवोत्थान एकादशी के पावन दिन कलयुग अवतारी श्री श्याम प्रभु का जन्मोत्सव अत्यन्त धूमधाम के साथ भक्तिभाव के वातावरण में आयोजित किया गया। ज्ञातत्व हो कि द्वापर में माता मोर्वी के आंगन में कार्तिक शुक्ला एकादशी को श्री श्याम प्रभु ने अवतार लिया और शिशदान के पश्चात श्री कृष्ण से वर पाकर कलयुग में खाटू धाम में प्रगट हुए।
मौके पर सर्व प्रथम प्रात: 10:30 श्री लक्ष्मी वेंकटश्वर अन्नपूर्णा सेवा तिरुपति मंदिर द्वारा संचालित अन्नपूर्णा सेवा में श्री श्याम मंडल द्वारा अन्नपूर्णा सेवा का कार्यक्रम का किया गया। साथ ही आज के एकादशी के उपलक्ष्य में पूरे मन्दिर परिसर को विद्युत की रंगीन लड़ियों, रंगीन बैलून व फूलों से अत्यन्त कलात्मक ढंग से सजाया गया।
अहले प्रात: काल में श्री श्याम प्रभु को नवीन वस्त्र (बागा) पहनाकर स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत कर 21 प्रजातियों विशेष कर गुलाब, जूही, बेला, मोगरा, जरबेरा, आर्किड, गैंदा के ताजे फूलों से अद्भुत मनभावन श्रृंगार किया गया साथ ही मंदिर में विराजमान बजरंगबली एवं शिव परिवार का भी इस अवसर पर विशेष श्रृंगार किया गया।
मुख्य कार्यक्रम रात्रि 9 बजे श्री श्याम प्रभु के जय जयकारों के बीच अखण्ड ज्योत प्रज्वलित की गई और उपस्थित भक्तगण श्री श्याम प्रभु के जयकारों से मन मयूर नाच उठा। श्री श्याम मंडल के सदस्यों द्वारा सर्वप्रथम गणेश वन्दना के साथ संगीतमय संकीर्तन प्रारम्भ किया गया।
ग्यारस चांदण की आई भगता मिल ज्योत जगाई झांझ मजीरा बाजे आंगणे इत्यादि भजनों की लय पर श्याम भक्तगण श्याम मस्ती में झूम रहे थे। इस अवसर पर श्री श्याम प्रभु को श्री श्याम प्रभु का प्रिय खीर चूरमा का भोग, छप्पन भोग अर्पित कर विभिन्न प्रकार के मिष्ठान, फल, मेवा, केसरिया दूध, मगही पान का भोग अर्पित किया गया।
रात्रि 1 बजे महाआरती व प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया साथ आज के इस कार्यक्रम का श्याम मंडल, रांची के अपने यूट्यूब चैनल पर सीधा प्रसारण किया गया। आज के कार्यक्रम को सफल बनाने में रमेश सारस्वत, गोपी किशन ढांढनीयां, चंद्र प्रकाश बागला, धीरज बंका, बालकिशन परसरामपुरिया, प्रदीप अग्रवाल, प्रमोद बगड़िया, अमित जलान, विकास पाड़िया, नितेश केजरीवाल, ज्ञान प्रकाश बागला, प्रियांश पोद्दार, महेश सारस्वत का विशेष सहयोग रहा।
उक्त जानकारी श्री श्याम मंडल श्री श्याम मंदिर, अग्रसेन पथ रांची के मीडिया प्रभारी सुमित पोद्दार (9835331112) ने दी। नोट- कल दिनांक 2 नवंबर को द्वादशी के उपलक्ष में संध्या 5 बजे श्याम बाबा को खीर चूरमा का भोग अर्पित कर भक्तों के बीच वितरण किया जायेगा।
टीम एबीएन, रांची। परमहंस डा० संत शिरोमणी श्री श्री 108 स्वामी सदानंद महाराज के सान्निध्य में श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के तत्वावधान में संचालित विगत 22 माह से चल रहे पीड़ित मानव सेवा के पावन तीर्थ स्थल मंगल राधिका सदानंद सेवाधाम पुंदाग के प्रांगण में सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम (सत्य-प्रेम सभागार) रांची में आज देव उठानी एकादशी के पावन अवसर पर दोपहर का भोजन ऋषभ कुमार एवं कनिष्क कुमार तथा रात का भोजन कनिष्क नारायण के सौजन्य से आश्रम में रह रहे 42 मंदबुद्धि दिव्यांग निराश्रित प्रभु जी एवं आश्रम में रहकर उनकी सेवा करने वाले सेवादार साथियों के बीच विभिन्न व्यंजनों के साथ अन्नपूर्णा सेवा भोजन प्रसादी का विधिवत आश्रम के किचन में भोजन बनवाकर भोजन खिलाया गया।
अपना घर आश्रम के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि 7 अक्टूबर से 1 नवंबर तक 26 दिनों मे 5340 निराश्रित प्रभुजी एवं उनकी देखभाल करने वाले सेवादार साथियों के बीच अन्नपूर्णा सेवा भोजन प्रसाद का वितरण किया गया। मंगल राधिका सदानंद सेवाधाम सदगुरू कृपा अपना घर (सत्य-प्रेम सभागार) में-रिलायंस क्लब, अद्वित झा, निशि शरण, आशा श्रेष्ठ, शिवा सिंह, सुनीता चौधरी, विकास पटानी जयपुर, संजय साहू, शंकर लाल मोदी, अमरेश आर्य, ज्ञानचंद शर्मा, दिलीप गुप्ता, पीआर मोदी, विजय कुमार अग्रवाल, कविता वेंकट, अलका रंजन, राहुल आनंद, सुजीत गोस्वामी, राकेश दास, निर्मल छावनिका, संजय अग्रवाल, स्व० रामचंद्र रुंगटा, स्व० सुरेश पोद्दार, सुरेखा साहू के सौजन्य से सभी निराश्रित प्रभुजी को भोजन प्रसादी खिलाकर सेवा की गयी। सभी ने ट्रस्ट के सदस्यों को बहुत बहुत धन्यवाद एवं अपना अमूल्य आशीर्वाद दिया।
प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि ठंड के मौसम को देखते हुए ब्लेयर अपार्टमेंट सुपर 9 ग्रुप के सौजन्य से 51 कंबल, तथा दिनेश सर्राफ के सौजन्य से 50 ट्रैक सूट आश्रम में रह रहे सभी निराश्रित, मंदबुद्धि, दीनबंधुओं को प्रदान किया गया। उन्होंने कहा कि सेवा कार्यों को समाज के हर वर्ग का सहयोग और प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
अन्नपूर्णा सेवा के पुनीत कार्य में ट्रस्ट के अध्यक्ष डुंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल, निर्मल जालान, मनोज कुमार चौधरी, निर्मल छावनिका, सज्जन पाड़िया, पुजारी अरविंद पांडे, पुरणमल सर्राफ, शिव भगवान अग्रवाल, सुरेश अग्रवाल, नंद किशोर चौधरी, संजय सर्राफ, विशाल जालान, सुनील पोद्दार, मधुसूदन जाजोदिया,पवन कुमार पोद्दार, विष्णु सोनी सहित अन्य सदस्यगण उपस्थित थे। उक्त जानकारी सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम और श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।
एबीएन सोशल डेस्क। भारत के हृदय स्थल के रूप में प्रसिद्ध मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस हर वर्ष 1 नवंबर को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि 2025 हम 70वां स्थापना दिवस मना रहे हैं, यह दिवस केवल एक प्रदेश की स्थापना का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐसी धरती के गौरव, संस्कृति, सामाजिक एकता और निरंतर प्रगति की कहानी है जिसने स्वतंत्र भारत के राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
भारत का हृदय मध्य प्रदेश देश के भौगोलिक केंद्र में स्थित है। इसका क्षेत्रफल लगभग 3,08,000 वर्ग किलोमीटर है, जो इसे भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बनाता है। यह प्रदेश उत्तर में उत्तर प्रदेश, दक्षिण में महाराष्ट्र, पूर्व में छत्तीसगढ़, और पश्चिम में गुजरात व राजस्थान से घिरा है। नर्मदा, ताप्ती, बेतवा, चंबल और सोन जैसी नदियाँ यहाँ की जीवन रेखा हैं, जो प्रदेश की उपजाऊ धरती को सिंचित करती हैं।
वन क्षेत्र की दृष्टि से भी यह प्रदेश समृद्ध है — कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, सतपुड़ा और पन्ना जैसे राष्ट्रीय उद्यान इसकी जैव विविधता को दर्शाते हैं मध्य प्रदेश की पहचान उसकी सांस्कृतिक एकता में निहित विविधता से है। यहाँ गोंड, भील, बैगा, कोरकू, सहरिया जैसी जनजातियाँ अपनी पारंपरिक संस्कृति, नृत्य, गीत और जीवन शैली के माध्यम से प्रदेश की लोकधारा को समृद्ध करती हैं।
खजुराहो के मंदिर, सांची का स्तूप, भीमबेटका की गुफाएँ और उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि भारत की प्राचीन कला और स्थापत्य के उत्कृष्ट प्रतीक हैं। भोजपुर, मांडू, ग्वालियर, चंदेरी और बुरहानपुर जैसे नगर अपने ऐतिहासिक गौरव की झलक आज भी प्रस्तुत करते हैं। मध्य प्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था, जब मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल राज्य को मिलाकर एक नया राज्य बना।
भोपाल को राजधानी घोषित किया गया और प्रदेश का नाम पड़ा मध्य प्रदेश अर्थात भारत का हृदय प्रदेश। राजनीतिक रूप से यह राज्य देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सशक्त उदाहरण है। यहाँ की राजनीति में स्थायित्व, जनभागीदारी और विकासोन्मुख नीति-निर्माण देखने को मिलता है। प्रदेश ने कई राष्ट्रीय स्तर के नेता और नीतिनिर्माता दिए हैं जिन्होंने देश के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श को दिशा दी है। आर्थिक और सर्वांगीण विकास की दिशा में मध्य प्रदेश कृषि प्रधान राज्य है।
यहाँ गेहूं, सोयाबीन, दालें और चना मुख्य फसलें हैं। प्रदेश को सोया स्टेट और पल्स कैपिटल ऑफ इंडिया भी कहा जाता है। सिंचाई, ग्रामीण उद्योग, सड़क निर्माण, और ऊर्जा क्षेत्र में तीव्र प्रगति ने राज्य को आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर किया है। इंदौर, जो देश का सबसे स्वच्छ शहर है, प्रदेश के शहरी प्रबंधन और नागरिक भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण बन चुका है।
उद्योग और निवेश के क्षेत्र में पीथमपुर, मंधीदीप, सिंगरौली, जबलपुर जैसे क्षेत्र औद्योगिक शक्ति केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में AIIMS भोपाल, IIT इंदौर जैसी संस्थाएँ प्रदेश को ज्ञान और तकनीकी उन्नति की दिशा में अग्रसर कर रही हैं। मध्य प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का जीवंत प्रतीक है। यहाँ की जनजातीय संस्कृति ने भारतीय सभ्यता की जड़ों को सहेजा है, जबकि आधुनिक उद्योग और शिक्षा ने राष्ट्र को नई दिशा दी है। प्रदेश ने कृषि, रक्षा, खेल, कला, संस्कृति, साहित्य और विज्ञान — हर क्षेत्र में देश को उत्कृष्ट प्रतिभाएँ दी हैं।
हर खेत में पानी, हर हाथ में काम की नीति के साथ यह प्रदेश आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को साकार करने में लगा है।मध्य प्रदेश स्थापना दिवस हमें यह संदेश देता है कि एकता, परिश्रम और विकास के माध्यम से कोई भी प्रदेश न केवल अपने लोगों का बल्कि पूरे राष्ट्र का गौरव बन सकता है। भारत का यह दिल आज भी अपनी जीवंत संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और विकासशील दृष्टिकोण के साथ राष्ट्र की धड़कन बना हुआ है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर 2014 से मनाया जाता है, 31 अक्टूबर 2025 को हम 150 वी जयंती मना रहे हैं, बही इस बार 14 वा राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जायेगा, योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि भारत विविधताओं का देश है, यहां हर क्षेत्र, भाषा, धर्म और संस्कृति में भिन्नता होने के बावजूद एक भाव समान है, राष्ट्र की एकता का भाव।
यही एकता हमारे देश की आत्मा है। इसी भावना को सशक्त बनाने और उसके रक्षक रहे सरदार वल्लभभाई पटेल की स्मृति में हर वर्ष 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2014 में भारत सरकार ने इस दिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य देश की अखंडता, सुरक्षा और एकजुटता के महत्व को दोहराना है।
सरदार पटेल ने स्वतंत्र भारत के राजनीतिक एकीकरण में जो योगदान दिया, वह अभूतपूर्व था। उन्होंने रियासतों के विलय के माध्यम से भारत को एक सूत्र में पिरोया और आधुनिक भारत की नींव रखी।1875 में गुजरात के नाडियाड में जन्मे वल्लभ भाई पटेल वकालत के पेशे से जुड़े, लेकिन महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े स्वतंत्रता के पश्चात देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी 562 रियासतों को एक राष्ट्र में समाहित करना।
सरदार पटेल की दृढ़ इच्छाशक्ति, संवाद कौशल और दूरदर्शिता के कारण यह संभव हो सका। उन्होंने हैदराबाद, जूनागढ़ और अन्य रियासतों को शांतिपूर्ण तरीके से भारत का हिस्सा बनाया। इसी महान कार्य के लिए उन्हें भारत का लौह पुरुष और राष्ट्रीय एकता का शिल्पकार कहा गया। 31 अक्टूबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात के केवड़िया में 182 मीटर ऊंची स्टैच्यू आफ यूनिटी का उद्घाटन किया गया।
यह विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है, जो सरदार पटेल के साहस, नेतृत्व और देशभक्ति का जीवंत प्रतीक है।यह स्मारक न केवल सरदार पटेल को श्रद्धांजलि है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि एकता से ही राष्ट्र की शक्ति जन्म लेती है। इस अवसर पर पूरे देश में रन फॉर यूनिटी जैसे कार्यक्रमों का आयोजन होता है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी व गैर-सरकारी संस्थानों में एकता प्रतिज्ञा दिलायी जाती है।
निबंध, भाषण, सांस्कृतिक कार्यक्रम, और चित्रकला प्रतियोगिताओं के माध्यम से युवाओं में राष्ट्रप्रेम और एकता की भावना जगायी जाती है। पुलिस, रक्षा बल और नागरिक संगठन इस दिन को देशभक्ति परेड और जनभागीदारी कार्यक्रमों से मनाते हैं।आज के डिजिटल और विचारधारात्मक विभाजन के दौर में राष्ट्रीय एकता का अर्थ केवल सीमाओं की सुरक्षा नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं की एकता भी है।
हमारे समाज में विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। हमारी विविधता ही हमारी पहचान है; जब तक हम एक साथ हैं, कोई भी शक्ति हमें विभाजित नहीं कर सकती। सरदार पटेल ने दिखाया कि सच्चा नेतृत्व नारेबाजी से नहीं, बल्कि कर्तव्य, अनुशासन और समर्पण से बनता है। युवाओं को उनके जीवन से यह सीख लेनी चाहिए कि राष्ट्रीय हित व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर होता है।
एकता, सेवा और राष्ट्रभक्ति के भाव से ही एक भारत, श्रेष्ठ भारत का निर्माण संभव है। राष्ट्रीय एकता दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत की शक्ति उसकी एकता में निहित है। यह दिन केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति हमारी सामूहिक निष्ठा का प्रतीक है। जब हर नागरिक मैं भारत हूं और भारत मुझमें है का भाव अपनाएगा, तभी सच्चे अर्थों में सरदार पटेल के सपनों का भारत साकार होगा। एकता ही भारत की पहचान है, और इस पहचान की रक्षा ही हमारा राष्ट्रधर्म।
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