एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्रीय कैबिनेट ने तीनों कृषि कानूनों को वापस करने वाले बिल को मंजूरी दी है। सरकार की ओर से कहा गया कि तीनों कृषि कानूनों को रद्द करना संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में उसकी प्राथमिकता होगी। कैबिनेट की बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने बुधवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को भी मार्च 2022 तक बढ़ाने का फैसला लिया गया है। कोरोना काल में गरीबों को हर महीने सस्ते दामों पर अनाज इस योजना के तहत दिया जाता है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना नवंबर माह तक थी और कई राज्यों की ओर से इसे बढ़ाने की मांग की जा रही थी। ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक ने भी इस मसले पर पीएम मोदी को लेटर लिखा था। संसद का शीतकालीन सत्र 29 नवंबर से प्रारंभ हो रहा है। सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि मंत्रिमंडल ने तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने का फैसला किया है। गौरतलब है कि पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रकाश पर्व के मौके पर देश के नाम अपने संबोधन में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान करके हर किसी को चौंका दिया था। हालांकि, पीएम की ओर से कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के ऐलान के बावजूद किसान फिलहाल अपने आंदोलन को खत्म करने के लिए तैयार नहीं हैं। लखनऊ में हुई किसान महापंचायत में किसानों ने कहा कि खेती के काले कानून वापस करना ही काफी नहीं है, जब तक एमएसपी गारंटी कानून नहीं बनता और पहले से तैयार किसान विरोधी विधेयक रद्द नहीं किए जाते तब तक उनका आंदोलन चलता रहेगा।
रांची। विश्व हिंदू परिषद के झारखंड प्रांत मंत्री डॉ बिरेन्द्र साहू ने डॉ करमा उरांव के विचार पर आपत्ति प्रकट करते हुए कहा कि हिंदू शब्द देखने में जितना सरल लगता है, व्याख्या तथा अर्थ में उतना ही व्यापक, कठिन तथा गंभीर है। समय-समय पर अनेक ऋषियों, महात्माओं, महापुरुषों ने हिंदू शब्द की व्याख्या करते रहे हैं। सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन ने कहा है। हिंदू वह है, जो हिंदू दिखता है। मदन मोहन मालवीय ने कहा है मैं हिंदू हूं, क्योंकि मुझे जीवन का यही सही मार्ग दिखाता है। वृहत विश्वकोष के अनुसार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष वेदों के विचारों के आधार पर बने अचार, विचार, रीति-नीति, समाज व्यवस्था आदि में किसी न किसी रूप में विश्वास करने और उनपर चलने वाले भारतीय को हिंदू कहा गया है। भिन्न-भिन्न संप्रदायों में कुछ अंतर होते हुए भी हिंदू समाज धार्मिक सिद्धांतों, सम्यक संस्कृति व जीवन पद्धति जातीय नियमों का पालन और एकता से बंधे हुए हैं। स्वाधीनता के पश्चात हिंदू शब्द की व्यापकता को कानूनी परिधि में बांधने का प्रयास किया गया। भारतीय संविधान के 25 में अनुच्छेद में हिंदू किसे माना जाए, इसे समझाने का प्रयास हुआ। इसी तरह 1956 में हिंदू कोड बिल में कहा गया कि मुसलमान, ईसाई, पारसी छोड़कर यहां के सनातनी, आर्य समाज, सिख, जैन और जितने भी अन्य बंधु हैं, वह सब हिंदू हैं। डॉ बिरेन्द्र ने कहा भारतीय संस्कृति अनादिकाल से विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर सर्वे भवंतु सुखिन: की उदात्त विचारधारा को जन-जन में सुप्रतिष्ठित करने का कार्य कर रही है। इसी कारण प्राचीन काल से ही भारत के प्रति विश्व समुदाय का आदर और श्रद्धा का भाव रहा है, इतिहास इस बात का साक्षी है। किंतु ईसाइयत और इस्लाम अपने घोषित लक्ष्य के अनुसार क्रूसेड और जिहाद के माध्यम से समस्त विश्व को पदाक्रांत करते हुए अपने साम्राज्य की स्थापना का अभियान चलाते रहे। करोड़ों हिंदू इस्लाम की बर्बरतापूर्ण अमानवीय अत्याचार के शिकार हुए। ईसाइयों ने सेवा के नाम का कुश्चक्र तथा मुस्लिमों का जिहाद के नाम पर तांडव के कारण आज देश में 15 से 20% हिंदू मुस्लिम बन चुके हैं तथा लगभग 5% हिंदू ईसाई बन चुके हैं। उन्होंने कहा ईसाइयों के चंगुल में आए हुए डॉ करमा उरांव जैसे विद्वान भी अपने मूल संस्कार को भूल कर पद्मभूषण कड़िया मुंडा जैसे बरगद के समान खड़ा व्यक्तित्व पर कुल्हाड़ी चलाने का कार्य कर रहे हैं, जो अति निदंनीय है। उन्होंने कहा, हमें ज्ञात होना चाहिए सनातन अथवा हिंदू का विस्तार जम्बुद्वीप हुआ करता था। जम्बुद्वीप अर्थात आज का यूरेशिया। एक विशाल भूखंड में प्रकृति का पूजा करने वाले तथा प्रकृति पर अपना विश्वास एवं सर्वस्व निछावर करने तथा उसके संरक्षण करने का एक विशाल मन लेकर समाज में चलने वाला व्यक्तित्व ही हिंदू था और आज भी है और आने वाले समय में भी रहेगा। हिंदू का अभिन्न अंग जनजातीय समाज है। जाति व्यवस्था में यदि हम जातिविज्ञान का अध्ययन करने पर जातियों का उद्भव उनके लगातार पैतृक कर्मों के कारण हुआ है। साधारणतया मिट्टी का कार्य करने वाला को कभी भी लोहार अथवा तेली नहीं कहा जाता है उसे कुम्हार ही कहा जाता है। कोई लोहा के काम करने वाला को बढ़ई अथवा चमार नहीं कहा जाता है उसे लोहार ही कहा जाता है। ऐसे एक लंबे कालखंड तक अपने - अपने कार्यों को संपादित करने के लिए जो सामाजिक व्यवस्था बनी तथा कालान्तर में जाति प्रथा का उदय हुआ है। हम जातियों में बंटकर अपने संस्कृति और समाज को छोड़े नहीं क्योंकि हम बंट रहे हैं तो कहीं ना कहीं घट रहे हैं। उन्होंने कहा हिंदू में 16 संस्कार करने की परंपरा है। इन संस्कारों का पालन जनजातीय समाज भी करते आ रहे हैं। हिंदू में गोत्र परंपरा रही है। गोत्र किसी न किसी ऋषि मुनि के नाम पर चलता है। हम उन ऋषि के वंशज है ऐसा मानते हैं। समान गोत्र में विवाह वर्जित है चाहे वह सनातन परंपरा हो या जनजतिय परंपरा। डॉ० करमा उरांव जैसे व्यक्ति को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, वनवासी कल्याण केंद्र जैसे संस्थाओं के लिए अनुचित शब्दों का प्रयोग करना शोभा नहीं देती है क्योंकि ये संस्थाएं समस्त भारतीय रुढ़िवादि विचारधारा व प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखने हेतु निरंतर कार्य कर रहे हैं। उक्त जानकारी विहिप के प्रांत मंत्री डॉ बिरेंद्र साहू ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
एबीएन डेस्क (सन्तोष पांडेय "सोनू")। पूरे देश में महापर्व छठ की धूम है। जब विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता की स्त्रियां अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ सज-धज कर अपने आंचल में फल लेकर निकलती हैं, तो लगता है जैसे संस्कृति स्वयं समय को चुनौती देती हुई कह रही हो, "देखो! तुम्हारे असंख्य झंझावातों को सहन करने के बाद भी हमारा वैभव कम नहीं हुआ है। हम सनातन हैं, हम भारत हैं। हम तबसे हैं जबसे तुम हो, और जबतक तुम रहोगे तबतक हम भी रहेंगे।" जब घुटने भर जल में खड़ी व्रती की सुपली में बालक सूर्य की किरणें उतरती हैं तो लगता है जैसे स्वयं सूर्य बालक बनकर उसकी गोद में खेलने उतरे हैं। स्त्री का सबसे भव्य, सबसे वैभवशाली स्वरूप वही है। इस धरा को "भारत माता" कहने वाले बुजुर्ग के मन में स्त्री का यही स्वरूप रहा होगा। कभी ध्यान से देखिएगा छठ के दिन जल में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ दे रही किसी स्त्री को, आपके मन में मोह नहीं श्रद्धा उपजेगी। छठ वह प्राचीन पर्व है जिसमें राजा और रंक एक घाट पर माथा टेकते हैं। एक ही देवता को अर्घ देते हैं, और एक बराबर आशीर्वाद पाते हैं। धन और पद का लोभ मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है, पर धर्म उनके बीच की खाई को पाट कर उन्हें साथ लाता है। अपने धर्म के साथ होने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि आप अपने समस्त पुरुखों के आशीर्वाद की छाया में होते हैं। छठ के दिन नाक से माथे तक सिंदूर लगा कर घाट पर बैठी स्त्री अपनी हजारों पीढ़ी की आजीसास-नानी सास की छाया में होती है, बल्कि वह उन्हीं का स्वरूप होती है। उसके दउरे में केवल फल नहीं होते, समूची प्रकृति होती है। वह एक सामान्य स्त्री सी नहीं, अन्नपूर्णा सी दिखती है। ध्यान से देखिये! आपको उनमें कौशल्या दिखेंगी, उनमें मैत्रेयी दिखेंगी, उनमें सीता दिखेंगी, उनमें अनुसुइया दिखेंगी, सावित्री दिखेंगी... उनमें पद्मावती दिखेंगी, उनमें लक्ष्मीबाई दिखेंगी, उनमें भारत माता दिखेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके आंचल में बंध कर ही यह सभ्यता अगले हजारों वर्षों का सफर तय कर लेगी। छठ डूबते सूर्य की आराधना का पर्व है। डूबता सूर्य इतिहास होता है, और कोई भी सभ्यता तभी दीर्घजीवी होती है जब वह अपने इतिहास को पूजे। अपने इतिहास के समस्त योद्धाओं को पूजे और इतिहास में अपने विरुद्ध हुए सारे आक्रमणों और षड्यंत्रों को याद रखे। छठ उगते सूर्य की आराधना का पर्व है। उगता सूर्य भविष्य होता है, और किसी भी सभ्यता के यशश्वी होने के लिए आवश्यक है कि वह अपने भविष्य को पूजा जैसी श्रद्धा और निष्ठा से संवारे... हमारी आज की पीढ़ी यही करने में चूक रही है, पर उसे यह करना ही होगा... यही छठ व्रत का मूल भाव है। मैं खुश होता हूं घाट जाती स्त्रियों को देख कर। मैं खुश होता हूं उनके लिए राह बुहारते पुरुषों को देख कर। मैं खुश होता हूं उत्साह से लबरेज बच्चों को देख कर... सच पूछिए तो यह मेरी खुशी नहीं, मेरी मिट्टी, मेरे देश, मेरी सभ्यता और हमारी संस्कृति की खुशी है। मेरे देश की माताओं! अर्घ्य के दिन जब आदित्य आपकी सुपली में उतरें, तो उनसे कहिएगा कि इस देश, इस संस्कृति पर अपनी कृपा बनाये रखें, ताकि हजारों वर्ष बाद भी हमारी पुत्रवधुएं यूं ही सज-धज कर गंगा के जल में खड़ी हों और कहें- उगs हो सुरुज देव, भइले अरघ के बेर...
एबीएन डेस्क। लोक आस्था का महापर्व छठ को लेकर देश भर में उत्साह का माहौल है। नहाय-खाय के साथ सोमवार से इस चार दिवसीय महापर्व की शुरुआत हो गयी है। इसमें व्रतियां 36 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं। छठ पूजा हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। दीपावली के बाद छठ पूजा, हिंदुओं का छठ सबसे बड़े त्योहार है। इस व्रत को छठ पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा और डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है। इस बार छठ पूजा 8 से 11 नवंबर तक है। उत्तर भारत और खासतौर से बिहार, यूपी, झारखंड में इस त्योहार का बेहद खास महत्व होता है। 8 नवंबर को नहाय खाय : छठ पर्व के पहले दिन घर में जो भी छठ का व्रत करने का संकल्प लेता है, वह स्नान कर साफ या नए वस्त्र धारण करता है। फिर व्रती शाकाहारी भोजन ग्रहण करते हैं। आमतौर पर इस दिन कद्दू की सब्जी बनाई जाती है। इस वर्ष नहाय-खाय 8 नवंबर ( सोमवार ) को है। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 02 मिनट पर और सूर्यास्त 5 बजकर 04 मिनट पर होगा। नहाय-खाय का विधि-विधान : सबसे पहले घर की साफ-सफाई कर लें। किसी नदी-तालाब में नहाकर शुद्ध वस्त्र पहनें। नहाय-खाय पर भी गंगास्नान संभव हो तो करें। अगर गंगा स्नान सम्भव नहीं हो, तो अपने स्नान के जल में गंगाजल डाल लें। ऐसा करना शुभ माना जाता है। छठ करने वाली व्रती महिलाएं या पुरुष चने की दाल और लौकी की सब्जी बनाएं। खाने में सेंधा नमक का प्रयोग करें। भगवान गणेश और सूर्यनारायण को भोग लगाकर व्रती भोजन को प्रसाद के रुप में ग्रहण करें और घर के सभी सदस्य भी यही खाएं। नहाय-खाय और छठ पर्व के दौरान घर के सदस्य मांस-मदिरा का सेवन न करें। रात को भी घर के सदस्य छना हुआ खाना ही खाएं। व्रत रखने वाली महिला या पुरुष को जमीन पर सोना चाहिए। 9 नवंबर को खरना : खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 03 मिनट पर और सूर्यास्त 5 बजकर 04 मिनट पर होगा। 10 नवंबर को डूबते सूर्य को अर्घ्य : बुधवार शाम को सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सूर्यादय 6 बजकर 03 मिनट पर और सूर्यास्त 5 बजकर 03 मिनट पर होगा। 11 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य : छठ पूजा का अंतिम दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि होती है। इस दिन सूर्योदय के समय सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। उसके बाद पारण कर व्रत को पूरा किया जाता है। इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 04 मिनट पर और सूर्यास्त 5 बजकर 03 मिनट पर होगा। (नोट : सूर्योदय और सूर्यास्त का समय पटना के अनुसार दिया गया है, शहर के अनुसार इसमें बदलाव सम्भव है।)
एबीएन डेस्क। दीपोत्सव पर राम नगरी अयोध्या रोशनी से पहले से ही नहायी हुई है। लेकिन आज रात एक साथ जलते हुए 12 लाख दीये अमावस्या की रात को चुनौती देते नजर आयेंगे। विकास के नये आयाम गढ़ने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दीपावली पर भी रिकॉर्ड बनाने वाले हैं। आज छोटी दीवाली के मौके पर अयोध्या राम की पैड़ी पर 12 लाख दिये जलाए जलाकर योगी यह रिकॉर्ड बनाने वाले हैं। 12 लाख दीयों में 9 लाख दीये सरयू किनारे स्थित राम की पैड़ी और 3 लाख दीये अयोध्या के मठ मंदिरों को रोशन करेंगे। इस आयोजन का गवाह होगा गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड की टीम अयोध्या नगरी में मौजूद रहेगी और विश्व रिकॉर्ड बनते हुए देखेगी। बता दें, विश्व रिकॉर्ड कायम करने के लिए मिट्टी के दीये को कम से कम 5 मिनट तक जलना होगा। अयोध्या में इस समय पांच दिवसीय दीपोत्सव कार्यक्रम चल रहा है। चूंकि राम मंदिर के कारण अयोध्या विशिष्ट नगरी में शुमार है, इसलिए यहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। चप्पे-चप्पे पर पुलिस के जवान तैनात हैं। मुख्यमंत्री के आयोजन के कारण नया घाट से राम की पैड़ी तक जाने वाले रास्ते को बंद कर दिया गया है। यहां दोनों तरफ बैरिकेडिंग लगाई गई है। सरयू पर बने पुराने पुल पर भी आवागमन बंद किया गया है।सीएम योगी आदित्यनाथ ने 2017 में अयोध्या में पहली बार दीपोत्सव की शुरुआत की थी। सर्वप्रथम दीपोत्सव का आयोजन 51 हजार दीयों के साथ हुआ था। इसके बाद 2019 में 4 लाख मिट्टी के दीयों को रौशन कर दीपोत्सव मनाया गया था। वहीं 2020 में 6 लाख दीये सरयू के तट पर जलाये गये थे। अब एक बार फिर साल 2021 में योगी आदित्यनाथ सरकार विश्व रिकॉर्ड कायम करने के लिए दीपोत्सव में 12 लाख से ज्यादा दिये रोशन करने जा रही है।
एबीएन डेस्क। एक नंवबर 2021 से आपकी जिंदगी से जुड़े कई बड़े बदलाव होने वाले हैं। जिसका आपकी जेब पर सीधा असर पड़ने वाला है। ये बदलाव LPG, रेलवे और बैंक के अलावा कई चीज़ों से जुड़े हैं, जिसे जानना आपके लिए बेहद जरूरी है, क्योंकि इन नियमों में बदलाव से आपकी जेब प्रभावित होगी। इसका प्रभाव आपके घर के बजट पर भी पड़ेगा। आइए इन महत्वपूर्ण बदलावों के बारे में विस्तार से जानते हैं। नवंबर के पहले सप्ताह में एलपीजी सिलेंडर के दाम बढ़ सकते हैं, क्योंकि हर महीने की पहली तारीख को एलपीजी सिलेंडर की नई कीमत जारी होती हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा माना जा रहा है कि नवंबर में एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी की जा सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक एलपीजी के मामले में लागत से कम मूल्य पर बिक्री से होने वाला नुकसान (अंडररिकवरी) 100 रुपये प्रति सिलेंडर पर पहुंच चुका है। इस वजह से इसकी कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। इस समय दिल्ली और मुंबई में रसोई गैस सिलेंडर का दाम 899.50 रुपये है। अब बैंकों को अपना पैसा जमा करने और निकालने पर चार्ज देना होगा। बैंक ऑफ बड़ौदा ने इसकी शुरुआत की है। अगले महीने से निर्धारित सीमा से अधिक बैंकिंग करने पर अलग से शुल्क लगेगा। 1 नवंबर से ग्राहकों को लोन खाते के लिए 150 रुपए चुकाने होंगे। खाताधारकों के लिए तीन बार तक जमा करना मुफ्त होगा, लेकिन अगर ग्राहक चौथी बार पैसा जमा करते हैं, तो उन्हें 40 रुपए का भुगतान करना होगा। वहीं जनधन खाताधारकों को इसमें कुछ राहत मिली है, उन्हें जमा करने पर कोई शुल्क नहीं देना होगा, बल्कि निकासी पर 100 रुपए देने होंगे। एक नवंबर से स्टेट बैंग ऑफ इंडिया (एसबीआई) एक नई सुविधा की शुरुआत करने जा रहा है। इसके तहत पेंशनर्स को जीवन प्रमाण पत्र जमा करने के लिए बैंक नहीं जाना होगा। अब कोई भी पेंशनभोगी वीडियो कॉल के जरिए अपना जीवन प्रमाणपत्र जमा कर सकेगा।बएक नवंबर से मैसेजिंग एप व्हाट्सएप कई स्मार्टफोन पर काम करना बंद कर देगा। अगर आपका फोन आउटडेटेड ऑपरेटिंग सिस्टम पर चल रहा है तो व्हाट्सऐप चलना बंद हो सकता है। इन फोन में Apple से सैमसंग और सोनी जैसी बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं। अगर आप नवंबर महीने में बैंक से जुड़े कामकाज निपटाना चाहते हैं तो छुट्टियों का हिसाब-किताब समझना होगा। दरअसल, नवंबर में दिवाली, छठ आदि की वजह से देश के अलग-अलग राज्यों में कुल 17 दिन बैंक नहीं खुलेंगे। दिवाली और छठ त्योहार को देखते हुए रेलवे ने कई नई स्पेशल ट्रेन शुरू की है। कुछ ट्रेनों का संचालन नवंबर महीने में अलग-अलग तारीखों पर शुरू होगा। ये ट्रेनें देश के अलग-अलग रूट से चलेंगी। इनका रूट मुख्य तौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश केंद्रित होगा।
एबीएन डेस्क। देश के कई हिस्सों में आज यानी 24 अक्टूबर को करवा चौथ मनाया जा रहा है। कार्तिक माह की चतुर्थी तिथि यानि आज सुहागिनों ने सूर्योदय के साथ करवा चौथ के व्रत की शुरुआत की है। ये व्रत पति की लंबी आयु के लिए रखा जाता है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ये व्रत पूरा होता है। इसलिए चांद निकलने का व्रत रखने वाली सभी महिलाओं को बेसब्री से इंतजार रहता है। हालांकि इस साल चांद का दीदार पिछले साल की अपेक्षा थोड़ा जल्दी होगा। इस वर्ष करवा चौथ पूजन के लिए शुभ मुहूर्त शाम 06:55 से लेकर 08:51 तक रहेगा। वहीं करवा चौथ पर चंद्रोदय का समय रात 8 बजकर 11 मिनट है, लेकिन अलग-अलग स्थानों के हिसाब से चंद्रोदय का समय भी भिन्न है। कुछ शहर में इसका दीदार पहले हो जाता है, तो कहीं पर ये थोड़ा वक्त लेता है।देखिए आपके शहर में चंद्रमा कितने बजे निकलेगा : दिल्ली: 08 बजकर 08 मिनट, मुंबई 08 बजकर 47 मिनट, बेंगलुरु 08 बजकर 39 मिनट, लखनऊ: 07 बजकर 56 मिनट, आगरा : 08 बजकर 07 मिनट, अलीगढ़: 08 बजकर 06 मिनट, मेरठ 08 बजकर 05 मिनट, नोएडा 08 बजकर 07 मिनट, गोरखपुर 07 बजकर 47 मिनट, मथुरा 08 बजकर 08 मिनट, सहारनपुर 08 बजकर 03 मिनट, बरेली: 07 बजकर 59 मिनट, रामपुर : 8 बजे, फर्रुखाबाद: 08 बजकर 1 मिनट, इटावा : 8 बजकर 05 मिनट, जौनपुर : 07 बजकर 52 मिनट, कोलकाता: 07 बजकर 36 मिनट, जयपुर: 08 बजकर 17 मिनट, देहरादून: 8 बजे, पटना: 07 बजकर 42 मिनट।
रांची (डॉ ललन शर्मा)। इस पंक्ति को हम सबने अपने पाठ्यक्रमों में जरूर पढ़ा होगा एवं बार-बार पढ़ कर गर्व की अनुभूति भी की होगी। परंतु शायद ही किसी को पता होगा कि 14-15वीं सदी में सुदूर जंगल क्षेत्र की एक आदिवासी राजकुमारी ने केवल महिलाओं को संगठित कर तुर्कों की एक बड़ी सेना को तीन-तीन बार पराजित किया था। भारत का आधुनिक इतिहास इन जैसी वीरांगनाओं को भले ही भूल जाए, पर वो समाज जिसके संपूर्ण अस्तित्व के रक्षण का काम ही जिसने किया हो, वह समाज उसे कैसे भूल सकता है! यही कारण रहा है कि आज भी संपूर्ण उरांव समाज चाहे वह भारत के किसी भी कोने में क्यों ना बसा हो हर 12 वर्ष पर उस उरांव राजकुमारी की वीरता को याद करने एवं उनके प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करने हेतु जनी शिकार का उत्सव मनाता है। महीने भर अपनी अपनी सुविधा से हर गांव की छोटी से बड़ी आयु की सभी स्त्रियां पुरुष वेश में जंगल को शिकार करने निकलती हैं, सब के हाथ में कोई ना कोई अस्त्र-शस्त्र यथा तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, फरसी, दौवली, बलुआ, हँसुआ आदि अवश्य ही होता है। 14-15वीं शताब्दी के करीब रोहतासगढ़, जो वर्तमान में बिहार के सासाराम के करीब मौजूद है, वहां पर उस समय उरगन ठाकुर (रूईदास) नामक एक उरांव राजा हुआ करते थे, लोगों का मानना है कि वे लोग सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के वंशज थे। सुरक्षा की दृष्टि से रोहतास गढ़ का किला घने जंगलों के बीच एक ऊंची पहाड़ी पर अवस्थित था परन्तु नीचे समीप में सोन नदी बहती थी इस कारण पशुपालन एवं खेती अच्छी थी, फलस्वरूप उस समय का उरांव साम्राज्य काफी समृद्ध था जिसकी ख्याति दूर दूर तक फैली हुई थी। तुर्कों की बुरी नजर तो उनके साम्राज्य पर बहुत पहले से थी, उन्होंने कई बार रोहतासगढ़ पर आक्रमण भी किया, पर राजा उरगन ठाकुर के कुशल नेतृत्व और सैन्य शक्ति के कारण तुर्कों को हर बार मूँह की खानी पड़ी। थक हार कर तुर्कों ने भेदनीति का सहारा लिया एवं लुन्दरी नामक एक महिला से, जो राजा के यहां दूध पहुंचाने जाती थी, के माध्यम से तुर्कों ने राज्य की कमजोरियों का भेद लिया। लुन्दरी ने तुर्कों को बताया कि बैसाख माह में हर वर्ष विशु सेंदरा का आयोजन होता है एवं उस दिन राज्य के राजा अपनी प्रजा और सैनिकों के साथ शिकार पर जाते हैं एवं खान-पान और नाच-गान के कार्यक्रम में व्यस्त रहतें हैं, तो यह एक सही मौका हो सकता है आक्रमण कर रोहतासगढ़ किले पर जीत हाशिल करने का। यह सुन कर तुर्कों ने रोहतासगढ़ किले पर आक्रमण करने की रणनीति बनाई एवं विशु सेंदरा के दिन अपने सैनिको के साथ हमला करने रोहतासगढ़ पहुंचे। जब तुर्क की सेना वहां पहुंची तो आश्वस्त थी कि वहां पर उनका सामना निहत्थे एवं विशु सेंदरा के उल्लास में नाचते-गाते-झूमते हुए सैनिको से होगा, पर वहां पहुंचने पर किले के अंदर से बड़े-बड़े पत्थरों एवम् तीर-धनुष से उनपर जोरदार आक्रमण हुआ। तुर्की सेना को इस तरह की किसी भी जवाबी कारवाई का जरा भी पूर्वाभास नहीं था, और इससे घबरा कर वे भाग खड़े हुए। इस प्रकार वे लगातार तीन बार मार खा - खा कर पराजित हुए। सिनगी दई के नेतृत्व में रोहतास गढ़ की सेना पहाड़ी से नीचे उतरकर सोन नदी के उसपार तक तुर्कों को खदेड़ चूकी थी, अबतक उनकी सेना की कमर टूट चूकी थी एवं हताश सैनिक वापसी की तैयारी करने लगे थे।
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