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Published / 2022-04-07 12:56:49
अब लीजिये... फिर बढ़ेंगे अमूल दूध के दाम!

एबीएन सोशल डेस्क। डेयरी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी अमूल का मानना है कि आगे जाकर बिजली, लॉजिस्टिक्स और पैकेजिंग लागत के बढ़ते दबाव के कारण दूध कीमतों में मजबूती बनी रहेगी। दूध की कीमतों के बारे में दृष्टिकोण को लेकर पूछे जाने पर अमूल के प्रबंध निदेशक (एमडी) आर एस सोढ़ी ने कहा, कीमतें मजबूत रहेंगी, मैं यह नहीं कह सकता कि कितनी। वे यहां से घट नहीं सकतीं, केवल ऊपर जा सकती हैं। सोढ़ी ने कहा कि अमूल सहकारी कंपनी ने पिछले दो वर्षों में कीमतों में आठ प्रतिशत की बढ़ोतरी की है, जिसमें पिछले महीने दूध की कीमतों में प्रति लीटर दो रुपए की वृद्धि भी शामिल है। मुख्य मुद्रास्फीति बड़ी चिंता का विषय है, जिससे नीति निमार्ता जूझ रहे हैं। बिजली, लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग सब हुआ महंगा : सोढ़ी ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि उनके उद्योग में मुद्रास्फीति चिंता का कारण नहीं है, किसान को उनके उत्पाद के लिए उच्च कीमतों के माध्यम से लाभ मिल रहा है। उन्होंने कहा कि अमूल और व्यापक डेयरी क्षेत्र द्वारा की गई बढ़ोतरी दूसरों की तुलना में विशेषकर लागत में हुई वृद्धि की तुलना में बहुत कम है। उन्होंने कहा कि बिजली की बढ़ी कीमतें कोल्ड स्टोरेज के खर्च को बढ़ाती हैं, जो लगभग एक-तिहाई से अधिक बढ़ गई हैं। लॉजिस्टिक्स लागत भी बढ़ी है और पैकेजिंग के मामले में भी ऐसा ही है। इन दबावों के कारण दूध कीमत में 1.20 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि महामारी के दौरान किसानों की प्रति लीटर आय भी चार रुपए तक बढ़ गई है। यह भी कहा कि अमूल इस तरह के दबावों से बेफिक्र है क्योंकि इस सहकारिता संस्था के लिए मुनाफा मुख्य उद्देश्य नहीं है। सोढ़ी ने कहा कि यूक्रेन में युद्ध जैसे वैश्विक घटनाक्रम भारतीय डेयरी क्षेत्र के लिए अच्छे हैं। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, वे भारतीय निर्यात में मदद करते हैं। उन्होंने कहा कि युद्ध के बिना भी अकेले महामारी से संबंधित व्यवधानों ने अमूल के निर्यात राजस्व को एक वर्ष में तीन गुना बढ़कर 1,400 करोड़ रुपए से अधिक करने में मदद की है। अमूल जैविक खाद्य व्यवसाय में प्रवेश करने के लिए तैयार है और वर्तमान में उसी का परीक्षण चल रहा है। उन्होंने कहा कि कंपनी हर उस गतिविधि में रुचि रखती है जो खेती और कृषि से संबद्ध है।

Published / 2022-04-06 17:38:28
राम कहानी से जीवन प्रबंधन के गुर सिखायेगा स्कूल आॅफ राम

एबीएन सोशल डेस्क। रामकथा क्या है... जैसे प्रश्न का उत्तर किताबों से ज्यादा लोक व्यवहारों में खोजा जाना चाहिए। ऐसा मानना है भगवान श्रीराम के जीवन पर शुरू हुए विश्व के पहले वर्चुअल विद्यालय स्कूल आॅफ राम का। स्कूल आॅफ राम, राम कहानी से जीवन प्रबंधन के गुर सिखाएगा। रामकथा का रिश्ता सीधे लोकमानस से है, उसके सुख-दु:ख, आस-निरास से है। रामकथा क्या है जैसे प्रश्न का उत्तर किताबों से ज्यादा लोक व्यवहारों में खोजा जाना चाहिए। ऐसा मानना है भगवान श्रीराम के जीवन पर शुरू हुए विश्व के पहले वर्चुअल विद्यालय स्कूल आॅफ राम का। स्कूल आॅफ राम, राम कहानी से जीवन प्रबंधन के गुर सिखाएगा। स्कूल आॅफ राम के संस्थापक, संयोजन काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अध्यनरत, विद्या भारती के पूर्व छात्र प्रिंस तिवाड़ी का कहना है की पहले लोग एक-दूसरे का अभिवादन, प्रणाम और नमस्कार की जगह राम-रामजी या जै रामजी की जय सियाराम कहकर किया करते थे। अभिवादन में जै रामजी और कुशलक्षेम के रूप में अपनी-अपनी राम कहानी का अर्थ समझ आता है। इसका मतलब यह होता है कि राम स्मरणीय है, इस हद तक कि दो जन जब आपस में मिलें या भेंट करें तो उनकी मुलाकात की शुरूआत रामनाम से हो। दूसरा अर्थ यह होता है कि राम की कोई कहानी है- ऐसी कहानी जिससे व्यक्ति की आपबीती का कोई अनोखा रिश्ता है। ऐसा रिश्ता कि राम की कहानी कहने का मतलब किसी से अपनी आपबीती कहना हो जाता है। 16 जनवरी से प्रारंभ होने वाले इस कोर्स में 13 जनवरी तक आवेदन संभव : प्रिंस ने कोर्स के सबंध में बताया कि रामायण की इन्हीं लोककथाओं को जीवन प्रबंधन का आधार बनाकर स्कूल आॅफ राम ने एक कोर्स का प्रारूप तैयार किया है। जिसमें प्रतिदिन रामायण से जुड़ी किसी एक प्रेरणादायक कहानी से जीवन प्रबंधन का एक गुर लोगों को सिखने को मिलेगा। इस कोर्स का हिस्सा कोई भी बन सकता है। कोर्स 16 जनवरी से शुरू होगा, जिसके लिए आवेदन प्रक्रिया 13 जनवरी से शुरू हो रही है। यह कोर्स 101 दिन तक वर्चुअल ही संचालित होगा।

Published / 2022-04-05 17:05:52
चैत प्रतिपदा : प्राकृतिक साम्य से पुनर्जीवन का पर्व...

एबीएन डेस्क (हेमंत शर्मा)। चैत्र प्रतिपदा, यानी गुड़ी पड़वा, अपना न्यू ईयर, नवीनता का पर्व। हम यह मानते हैं कि दुनिया इसी रोज बनी थी। यह हमारा नया साल है, लेकिन अपना यह नववर्ष रात के अंधेरे में नहीं आता। हम नववर्ष पर सूरज की पहली किरण का स्वागत करते हैं जबकि पश्चिम में घुप्प अंधेरे में नए साल की अगवानी होती है। हमारे नए साल का तारीख से उतना संबंध नहीं है, जितना मौसम से है। उसका आना सिर्फ कैलेंडर से पता नहीं चलता। प्रकृति झकझोरकर हमें चौतरफा फूट रही नवीनता का अहसास कराती है। पुराने पीले पत्ते पेड़ से गिरते हैं। नई कोंपलें फूटती हैं। प्रकृति अपने शृंगार की प्रक्रिया में होती है। लाल, पीले, नीले, गुलाबी फूल खिलते हैं। ऐसा लगता है कि पूरी-की-पूरी सृष्टि नई हो गई है। नव गति, नव लय, ताल, छंद, नव; सब नवीनता से लबालब। जो कुदरत के इस खेल को नहीं समझते, वे न समझें। जो नहीं समझे, उनके लिए फरहत शहजाद की एक गजल भी है, जिसे मेंहदी हसन ने गाया था—कोंपलें फिर फूट आईं, शाख पर कहना उसे/ वो न समझा है, न समझेगा मगर कहना उसे। हम दुनिया में सबसे पुरानी संस्कृति के लोग हैं। इसलिए समझते हैं कि ऋतु चक्र का घूमना ही शाश्वत है, जीवन है। तभी हम इस नए साल के आने पर वैसी उछल-कूद नहीं करते, जैसी पश्चिम में होती है। हमारे स्वभाव में इस परिवर्तन की गरिमा है। हम साल के आने और जाने दोनों पर विचार करते हैं। पतझड़ और बसंत साथ-साथ। इस व्यवस्था के गहरे संकेत हैं। आदि-अंत, अवसान-आगमन, मिलना-बिछुड़ना, पुराने का खत्म होना, नए का आना। सुनने में चाहे भले यह असगंत लगे। पर हैं साथ-साथ, एक ही सिक्के के दो पहलू। जीवन का यही सार हमारे नए साल का दर्शन है। काल को पकड़ उसे बांटने का काम हमारे पुरखों ने सबसे पहले किया। काल को बांट दिन, महीना, साल बनाने का काम भारत में ही शुरू हुआ। जर्मन दार्शनिक मैक्समूलर भी मानते हैं— आकाश मंडल की गति, ज्ञान, काल निर्धारण का काम पहले-पहल भारत में हुआ था। ऋग्वेद कहता है, ऋषियों ने काल को बारह भागों और तीन सौ साठ अंशों में बांटा है। वैज्ञानिक चिंतन के साथ हुए इस बंटवारे को बाद में ग्रेगेरियन कैलेंडर ने भी माना। आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त ने छोटी से छोटी और बड़ी-से-बड़ी काल की इकाई को पहचाना। बारह महीने का साल और सात रोज का सप्ताह रखने का रिवाज विक्रम संवत से शुरू हुआ। वीर विक्रमादित्य उज्जयिनी का राजा था। शकों को जिस रोज उसने देश से खदेड़ा, उसी रोज से विक्रम संवत बना। इतिहास देखने से लगता है कि कई विक्रमादित्य हुए। बाद में यह पदवी हो गई। पर लोकजीवन में उसकी व्याप्ति न्यायपाल के नाते ज्यादा है। उसकी न्यायप्रियता का असर उस सिंहासन पर भी आ गया था, जिस पर वह बैठता था। जो उस सिंहासन पर बैठा, गजब का न्यायप्रिय हुआ। लोक में शकों से विक्रमादित्य के युद्ध की कथा नहीं, उसके सिंहासन की चलती है। विक्रम संवत से 6667 ईसवी पहले सप्तर्षि संवत यहां सबसे पुराना संवत माना जाता था। फिर श्रीकृष्ण जन्म से कृष्ण कैलेंडर, उसके बाद कलि संवत आया। विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसा पूर्व में हुई। इसके बाद 78 ईसवी में शक संवत शुरू हुआ। भारत सरकार ने शक संवत?् को ही माना है। विक्रम संवत की शुरूआत सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से मानी जाती है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही चंद्रमा का ट्रांजिशन शुरू होता है। इसलिए चैत्र प्रतिपदा चंद्रकला का पहला दिन होता है। मानते हैं कि इस रोज चंद्रमा से जीवनदायी रस निकलता है, जो औषधियों और वनस्पतियों के लिए जीवनप्रद होता है। इसीलिए वर्ष प्रतिपदा के साथ ही वनस्पतियों में जीवन भर आता है। चंद्रवर्ष 354 दिन का होता है। यह भी चैत्र से शुरू होता है। सौरमास में 365 दिन होते है। दोनों में हर साल दस रोज का अंतर आ जाता है। ऐसे बढ़े हुए दिनों को ही मलमास या अधिमास कहते हैं। कागज पर लिखे इतिहास से नहीं, परंपरा से हमारी दादी वर्ष प्रतिपदा से ही नया वर्ष मानती थीं। यही संस्कार मुझमें हैं। जिस कारण मैं अपने बच्चों को आज भी तिथि-ज्ञान देता रहता हूं। हमारी परंपरा में नया साल खुशियां मनाने का नहीं, प्रकृति से मेल बिठा खुद को पुनर्जीवित करने का पर्व है। तभी तो नए साल के मौके पर नीम की कोंपलें काली मिर्च के साथ चबाने का खास महत्व था। ताकि साल भर हम संक्रमण या चर्मरोग से मुक्त रहें। इस बड़े देश में हर वक्त, हर कहीं, एक सा मौसम नहीं रहता। इसलिए अलग-अलग राज्यों में स्थानीय मौसम में आने वाले बदलाव के साथ नया साल आता है। वर्ष प्रतिपदा भी अलग-अलग जगह थोड़े अंतराल पर मनाई जाती है। कश्मीर में इसे नवरोज तो आंध्र और कर्नाटक में उगादि, महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, केरल में विशु कहते हैं। सिंधी इसे झूलेलाल जयंती के रूप में चेटीचंड के तौर पर मनाते हैं। तमिलनाडु में पोंगल, बंगाल में पोएला बैसाख और गुजरात में दीपावली पर नया साल मनाते हैं। कहते हैं—ब्रह्मा ने चैत्र प्रतिपदा के दिन ही दुनिया बनाई। भगवान?राम का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था। महाराज युधिष्ठिर भी इसी दिन गद्दी पर बैठे थे। छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदू पद पादशाही की स्थापना इसी दिन की। परंपरा से धड़कते पोएला वैशाख की महिमा लाल से लाल मार्क्सवादी भी मानते हैं। बंगाल की संस्कृति में रचे-बसे इस पर्व के रास्ते में कभी मार्क्स ने बाधा नहीं डाली। सैकड़ों सालों तक भारत में विभिन्न प्रकार के संवत प्रयोग में आते रहे। इससे काल निर्णय में अनेक भ्रम हुए। अरब यात्री अलबरुनी के यात्रा वृत्तांत में पांच संवतों का जिक्र है। श्रीहर्ष, विक्रमादित्य, शक, वल्लभ और गुप्त संवत। प्रो पांडुरंग वामन काणे अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में लिखते हैं—विक्रम संवत के बारे में कुछ कहना कठिन है। वे विक्रमादित्य को परंपरा मानते हैं। पर कहते हैं, यह जो विक्रम संवत है, वह ईपू 57 से चल रहा है और सबसे वैज्ञानिक है। अगर न होता तो पश्चिम के कैलेंडर में यह तय नहीं है कि सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण कब लगेंगे, पर हमारे कैलेंडर में तय है कि चंद्रग्रहण पूर्णिमा को और सूर्यग्रहण अमावस्या को ही लगेगा। जो भी हो—परंपरा, मौसम और प्रकृति के मुताबिक वर्ष प्रतिपदा नए सृजन, वंदन और संकल्प का उत्सव है। मौसम बदलता है, शाम सुरमई होती है, रात उदार होती है। जीवन का उत्सव मनाते कहीं रंग होता है, कहीं उमंग। इसलिए इस नए साल की परंपरा, नूतनता और इसकी पवित्रता का स्वागत कीजिए।

Published / 2022-04-05 16:55:03
हाय रे महंगाई : लोगों के दांत खट्टे कर रहे नींबू के दाम, तीन गुना हुआ रेट

एबीएन सोशल डेस्क। गर्मी बढ़ने के साथ ही नींबू की मांग में इजाफा हो गया है। मांग बढ़नी शुरू हुई तो इसके दाम भी आसमान छूने लगे। कहीं 150 तो कहीं 200 रुपये किलो का दाम चल रहा है। इसकी बिक्री करने वालों का कहना है कि कभी नींबू का इतना दाम नहीं हुआ। मुंबई के दादर सब्जी मंडी में अच्छी क्वालिटी के एक नींबू की कीमत 10 रुपये है। गर्मियों में दाम में तेजी आती थी लेकिन इतना इजाफा कभी नहीं होता था। इस समय मुंबई के बाजारों में प्रति किलो नींबू की कीमत गुणवत्ता के हिसाब से 150 से 220 रुपये तक है। हालात ये हैं कि बाजारों में अब अच्छी क्वालिटी के नींबू कम दिखाई दे रहे हैं। उत्पादन में कमी के कारण मार्केट में आवक कम हो गई है। गर्मियों में नींबू की मांग आमतौर पर बढ़ जाती है। लोग गर्मी से बचने के लिए नींबू पानी खूब पीते हैं। लेकिन इस बार दाम में रिकॉर्ड तेजी ने उपभोक्ताओं के दांत खट्टे कर दिए हैं। नींबू औषधीय गुणों से भरपूर होता है। विटामिन-सी अच्छा स्रोत होता है। गर्मियों में खासतौर पर इसकी डिमांड बढ़ जाती है। लेकिन ऐसा नहीं होता है कि दाम तीन गुना अधिक हो जाए। महाराष्ट्र, राजस्थान, एमपी, आंध्र प्रदेश, बिहार और हरियाणा में नींबू का खूब उत्पादन होता है। लेकिन इस बार बेमौसम बारिश और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्याओं के कारण उत्पादन में भारी गिरावट हुई है। जिसकी वजह से कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। व्यापारियों का कहना है कि चूंकि उत्पादन कम है तो गर्मी में इसका दाम तेज ही रहने का अनुमान है। मुंबई के दादर मंडी में लोग नींबू के भाव सुनकर ही आश्चर्य में पड़ जा रहे हैं। सब्जियां खरीदने आए संतोष पाटिल ने कहा कि पहले 10 रुपये में तीन नींबू मिलता था और आज 10 रुपये का एक नींबू मिल रहा है। गर्मियों में नींबू बहुत जरूरी चीज है। ऐसे में कोई कैसे घर चलाएगा। पहले 70 से 80 रुपये किलो वाला नींबू तीन गुना दाम पर बिक रहा है। दूसरी और फल और सब्जियों के दाम भी इतने महंगे हो गए हैं कि खरीदने से पहले हमें सौ बार सोचना पड़ रहा है।

Published / 2022-04-04 08:27:07
आदिवासियों के प्रकृति प्रेम का प्रतीक है सरहुल

टीम एबीएन, रांची। आदिवासियों के प्रकृति प्रेम के प्रतीक के रुप में सरहुल पर्व पूरे झारखंड में मनाया जाता है। पिछले 2 सालों से कोरोना के कारण शोभा यात्री नहीं निकाली जा सकी थी, लेकिन इस बार 4 अप्रैल को भव्य जुलूस निकाला जाएगा। प्रकृति को समर्पित है सरहुल पर्व : इस त्योहार के दौरान प्रकृति की पूजा की जाती है। आदिवासियों का मानना है कि इस त्योहार को मनाए जाने के बाद ही नई फसल का उपयोग शुरू किया जा सकता है। चूंकि यह पर्व रबी की फसल कटने के साथ ही शुरू हो जाता है, इसलिए इसे नए वर्ष के आगमन के रूप में भी मनाया जाता है। सर" और "हुल" से मिलकर बना है सरहुल : सर का मतलब सरई या सखुआ फूल होता है। वहीं, हुल का मतलब क्रांति होता है। इस तरह सखुआ फूलों की क्रांति को सरहुल कहा गया है। सरहुल में साल और सखुआ वृक्ष की विशेष तौर पर पूजा की जाती है। महिलाएं लाल पैड की साड़ी पहनती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सफेद शुद्धता और शालीनता का प्रतीक है, वहीं लाल रंग संघर्ष का प्रतीक है। सफेद सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा और लाल बुरु बोंगा का प्रतीक है। इसलिए सरना का झंडा भी लाल और सफेद होता है।

Published / 2022-04-03 15:04:54
सरहुल : उत्साहित आदिवासी समाज ने उपवास के साथ शुरू किया पूजा-पाठ

टीम एबीएन, रांची। प्रकृति पर्व सरहुल की शुरुआत चैत माह के आगमन से होती है। इस समय साल के वृक्षों में फूल लग जाते हैं, जिसे आदिवासी प्रतीकात्मक रूप से नए साल का सूचक मानते हैं और पर्व को बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं। सरहुल आदिवासियों का त्योहार में से एक है। आदिवासी समुदाय के लोग इस पर्व को इतना महत्वपूर्ण मानते हैं कि अपने सारे शुभ कार्य की शुरुआत इसी दिन से करते हैं। रांची में बसने वाले आदिवासियों की सरलता और प्रकृति के प्रति अनोखा प्रेम इसकी झलक इनकी परंपरा में देखने को मिलती है, जो किसी और सभ्यता संस्कृति में देखने को नहीं मिलती। यही कारण है कि आदिवासियों को प्रकृति का पूजक कहा जाता है। इस बार तीन दिवसीय महापर्व पूजा की शुरुआत रविवार से उपवास के साथ शुरू हो गयी है। 5 अप्रैल को फुलखोंसी के साथ इसका समापन होगा। आदिवासियों का त्योहार सरहुल को लेकर गांव के पहान विशेष अनुष्ठान करते हैं, जिसमें ग्राम देवता की पूजा की जाती है और कामना की जाती है कि आने वाला साल अच्छा हो। इस क्रम में पहान सरना स्थल में मिट्टी के घड़े में पानी रखते हैं पानी के स्तर से ही आने वाले साल में बारिश का अनुमान लगाया जाता है। पूजा समाप्त होने के दूसरे दिन गांव के पाहन घर-घर जाकर फूलखोंसी करते हैं ताकि उस घर और समाज में खुशी बनी रहे। झारखंड में सरहुल महापर्व बहुत ही बड़े स्तर पर मनाया जाता है। जिसमें राज्य के विभिन्न हिस्सों में बसने वाले आदिवासी समाज के लोग बड़े ही उत्साह के साथ भाग लेते हैं। इस दौरान पूजा के बाद शोभा यात्रा में विभिन्न टोला मोहल्ला से जुलूस निकाले जाते हैं, जिसमें आदिवासियों की सभ्यता और संस्कृति को झांकियों में दर्शाया जाता है।

Published / 2022-04-02 15:36:43
इंसानों को कैसे लगी शराब की लत, जानें अमेरिकी वैज्ञानिकों का दावा...

एबीएन नॉलेज डेस्क। देश में साल-दर-साल शराब यानी अल्कोहल लेने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है। कभी सोचा है कि इंसान को शराब की लत क्यों लग रही है। वैज्ञानिकों ने इसका जवाब दिया है। उन्होंने अपनी रिसर्च में इसकी वजह बताई है। यह रिसर्च करने वाली यूनिवर्सिटी आॅफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं का कहना है, इंसान में शराब की लत का एक कनेक्शन बंदरों से रहा है। साइंस डेली की रिपोर्ट में शोधकर्ताओं का कहना है, इस बात को समझने के लिए पनामा में ब्लैक-हैंडेड स्पाइडर मंकी पर रिसर्च की गई। रिसर्च के दौरान उनके खाए गए फलों और पेशाब के सैम्पल को इकट्ठा किया गया। इनकी जांच की गई। जांच में सामने आया कि बंदर ऐसे फलों को खाते हैं जो थोड़ा सड़ गए हों। इनमें 1 से 2 फीसदी तक शराब की मात्रा रहती थी। शोधकर्ताओं के मुताबिक, प्राकृतिक फर्मेंटेशन की प्रक्रिया से गुजरने वाले फल में कम मात्रा में अल्कोहल होती है। यही अल्कोहल बंदरों से लिए गए सैम्पल में मिला है। बंदर ऐसा क्यों करते हैं इसे समझने की कोशिश की गई। रिपोर्ट में सामने आया कि शराब पीने के बाद उन्हें एनर्जी मिलती है। इस एनर्जी को पाने के लिए वो बार-बार ऐसा करने की कोशिश करते हैं। शोधकर्ता क्रिस्टीना कैम्पबेल का कहना है, रिसर्च में यह साबित हो चुका है कि इंसान की तरह बंदर अल्कोहल वाली चीजें लेना पसंद करते हैं। हमारी रिसर्च साबित करती है कि ड्रंकन मंकी हाइपोथेसिस में सच्चाई है। हालांकि रिसर्च के दौरान अभी यह नहीं पता चल पाया है कि बंदर कितने ऐसे फल खाते हैं और उनके बिहेवियर में इससे कितनी तरह का बदलाव आता है। ड्रंकन मंकी हाइपोथेसिस क्या है, अब इसे भी समझ लीजिए। बर्कले की यूनिवर्सिटी आॅफ कैलिफोर्निया के बायोलॉजिस्ट रॉबर्ट डुडले 25 सालों से इंसानों में शराब की लत क्यों लगी, इस विषय पर रिसर्च कर रहे हैं। 2014 में उन्होंने इस विषय पर एक किताब लिखी। किताब में उन्होंने लिखा कि शराब के प्रति इंसानों का प्यार बंदरों और लंगूरों की देन है। इसे ड्रंकन मंकी हाइपोथेसिस कहा गया।

Published / 2022-04-01 08:57:00
लॉकडाउन में गईं पर्यटन क्षेत्र में 2.1 करोड़ से अधिक नौकरियां

एबीएन सेंट्रल डेस्क। कोविड -19 वैश्विक महामारी के प्रकोप ने देश में यात्रा और पर्यटन उद्योग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया क्योंकि ये सेवाएं लॉकडाउन के दौरान बुरी तरह से प्रभावित हुई थी। जिसके परिणामस्वरूप अप्रैल-दिसंबर 2020 की अवधि के दौरान देश में 2.1 करोड़ अर्थात 21.5 मिलियन लोगों को नौकरियां छूट गई का नुकसान हुआ। सरकार ने गुरुवार को राज्यसभा में इसकी जानकारी दी है। राज्यसभा सांसद अजय प्रताप सिंह के एक सवाल के जवाब में पर्यटन मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा कि पर्यटन क्षेत्र में कुल रोजगार में 60% से अधिक की कटौती हुई थी। देश में कोरोना वायरस महामारी के दौरान पर्यटन में लगे परिवारों के लिए आर्थिक नुकसान और वसूली की नीतियों के शीर्षक के तहत किए गए एक अध्ययन के आंकड़ों का हवाला देते हुए मंत्री ने कहा कि तालाबंदी के दौरान पर्यटन क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों की प्रत्यक्ष नौकरियां गईं। देश में अत्यधिक संक्रामक SarS-CoV-2 वायरस के कम्युनिटी प्रसार को रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2020 में तीन महीने के पूर्ण राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाया था। तीन माह के बाद सरकार ने धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था को खोलना शुरू कर दिया था, परंतु यात्रा प्रतिबंधित थी। हालांकि कोविड वायरस के संक्रमण के डर से भी लोग यात्रा नहीं कर रहे थे और होटल और आतिथ्य उद्योग बुरी तरह प्रभावित रहे। अध्ययन के अनुसार साल 2020 की पहली तिमाही में 14.5 मिलियन प्रत्यक्ष नौकरियां, दूसरी तिमाही में 5.2 मिलियन और तीसरी तिमाही में 1.8 मिलियन लोगों ने प्रत्यक्ष नौकरियां गंवाई। वित्तीय वर्ष 2020-21 के पहले नौ महीनों के दौरान संचयी नौकरी का नुकसान 21.5 मिलियन प्रत्यक्ष नौकरियों पर आंका गया है, जो कि पूर्व-महामारी अवधि के दौरान क्षेत्र में कुल प्रत्यक्ष नौकरियों का 61% से ज्यादा थी। जब इस क्षेत्र में लगभग 34.8 मिलियन प्रत्यक्ष नौकरियां थीं। पर्यटन क्षेत्र को हुए नुकसान का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि वित्तीय वर्ष 2020-21 के दौरान समग्र आर्थिक मंदी के कारण पर्यटन अर्थव्यवस्था या पर्यटन प्रत्यक्ष सकल मूल्य वर्धित में पहली तिमाही में 42.8 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, दूसरी तिमाही में 15.5 प्रतिशत और तीसरी तिमाही में 1.1 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली। पर्यटकों के आवागमन में आयी गिरावट के कारण, जो महामारी के दौरान पर्यटन संबंधी व्यय में कटौती करता है, यह अनुमान है कि पर्यटन प्रत्यक्ष सकल मूल्य वर्धित द्वारा मापी गई पर्यटन अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही में 93.3 प्रतिशत तक गिर गई है। 21 साल दर साल आधार पर जब पूरा देश पूर्ण तालाबंदी के अधीन था।

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