एबीएन सेंट्रल डेस्क। विश्व के सबसे बड़े सर्च इंजन ‘गूगल’ ने भारत की मौसम महिला अन्ना मणि की 104वीं जयंती पर विशेष डूडल बनाकर उन्हें समर्पित किया। भौतिक विज्ञानी और मौसम विज्ञानी अन्ना मणि को भारत की मौसम महिला के तौर पर जाना जाता है। गूगल ने मंगलवार को अपने डूडल में वर्ष 1918 में केरल में एक सीरियाई ईसाई परिवार में जन्मीं महान मौसम वैज्ञानिक को समर्पित डूडल में प्रकृति के सुंदर दृश्यों के साथ उन्हें पुस्तकों के बीच शोध में व्यस्त दिखाया है। चित्रों में रंगों का मिश्रण काफी आकर्षक और सौम्य है। श्रीमती अन्ना ने भौतिकी और मौसम विज्ञान के क्षेत्र में कई बहुमूल्य योगदान दिया है। उनके शोध ने भारत के लिए सटीक मौसम पूवार्नुमान करना संभव बनाया और राष्ट्र के लिए अक्षय ऊर्जा का उपयोग करने के लिए आधार तैयार किया। उन्होंने भौतिक विज्ञानी एवं प्रोफेसर सी वी रमन के जूनियर के रूप में भी काम किया। प्रोफेसर रमन उस समय माणिक और हीरे के आॅप्टिकल गुणों पर शोध कर रहे थे। श्रीमती मणि ने वर्ष 1939 में चेन्नई के पी पचैयप्पा कॉलेज से भौतिकी और रसायन विज्ञान में बीएससी आॅनर्स में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने पांच शोध पत्र प्रकाशित किए। इसके बाद वह वर्ष 1945 में भौतिकी में स्नातक की पढ़ाई करने के लिए लंदन चली गईं थी। उन्होंने वहां इंपीरियल कॉलेज से पढ़ाई की थी। वह वर्ष 1948 में लंदन से लौटने के बाद पुणे में भारत मौसम विज्ञान विभाग में शामिल हो गईं। उनकी वहां मौसम संबंधी उपकरणों की व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी थी। श्रीमती मणि बाद में भारत मौसम विज्ञान विभाग के उप महानिदेशक बनी और संयुक्त राष्ट्र विश्व मौसम विज्ञान संगठन में कई प्रमुख पदों पर काम किया। उन्हें वर्ष 1987 में विज्ञान में उल्लेखनीय योगदान के लिए आईएनएस के आर रामनाथन पदक से नवाजा गया था।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड की राजधानी रांची के प्रख्यात ज्योतिर्विद पंडित रामदेव पांडेय (8877003232) ने abnnews24.com से बताया है कि इस वर्ष अक्टूबर त्योहारों का महीना होने वाला है। क्योंकि अक्टूबर 2022 में सनातन धर्म के सबसे बड़े टीफार दशहरा, दीवाली और छठ सब के सब इसी महीने मनने वाली है। इस वर्ष 30/8/22- मंगलवार - हरितालिका तीज, पूरी दिन और रात -तृतीया दिन 2.32तक, हस्ता - रात 11.52 तक, पारण- बुधवार सुबह 5.45बाद होगा। 31- अगस्त -बुधवार - श्री गणेश चतुर्थी। सितंबर 2022- में 1- सितंबर-गुरुवार- ऋषि पंचमी, 2 -सितंबर- शुक्रवार - लोलार्क षष्ठी, 3- सितंबर- शनिवार- राधा अष्टमी, 4- सितंबर - महा रविवार, 6- सितंबर - मंगल वार - कर्मा एकादशी, 8- सितंबर-गुरूवार -प्रदोष, 9- सितंबर -शुक्रवार - अन्नत चतुर्दशी, व्रताय पूर्णिमा, 10- सितंबर- शनिवार- महाल्या आरंभ, स्नान दान पूर्णिमा। पितृपक्ष 2022 : 11 सितंबर-रविवार- प्रतिपदा श्राद्ध, 12-सितम्बर- द्वितीया श्राद्ध, 13- सितंबर- तृतीय श्राद्ध , चन्द्र। उदय रात 8.07 में, 14- सितंबर- चतुर्थी श्राद्ध, उतरा फाल्गुनी में सूर्य आएंगे। अच्छी बारिश होगी।15- सितंबर- पंचमी श्राद्ध, 16- सितम्बर- षष्ठी श्राद्ध, 17-सितम्बर - सप्तमी श्राद्ध, विश्वकर्मा पूजा। 18- सितंबर- अष्टमी श्राद्ध, जीवित्पुत्रिका व्रत, जिउतिया, अष्टमी दिन 4.39तक कन्या राशि में सूर्य आएंगे। 19- सितंबर- सोमवार- जितिया पारण, सुबह 6 बजे बाद मातृ नवमी श्राद्ध। 20- सितंबर- दशमी श्राद्ध, 21- सितंबर- इन्दिरा एकादशी, श्राद्ध, 22- सितंबर- द्वादशी श्राद्ध, 23- सितंबर- प्रदोष, त्रयोदशी श्राद्ध,24- सितंबर-चतुर्दशी श्राद्ध, 25- सितंबर- पितृ विसर्जन, अमावस्या। शारदीय नवरात्रि 2022 - कार्यक्रम 10 दिन का नवरात्रि है।26 सितंबर 2022- सोमवार - कलश स्थापना, दिनभर, अभिजीत मुहूर्त दिन, 11:36 से 12:44 तक ( प्रतिपदा सोमवार सुबह 3-32 तक) ध्वजारोपन, दिनभर - शैल पुत्री पूजन, 27 सितंबर मंगल वार - ब्रह्मचारिणी पूजन। आज हथिया में सूर्य होंगे, तेज हवा तुफान आयेगा। 28 सितंबर बुधवार - चंद्र घण्टा पूजन, 29 -सितंबर -गुरुवार - गणेश चतुर्थी , कुष्माडा पूजन, 30 सितंबर - शुक्रवार - स्कन्ध माता पूजन, सर्वार्थ सिद्धि योग। अक्टूबर 2022- 1- अक्टूबर -शनिवार - कात्यायनी पूजन । बेल बोधन, देवी बोधन, आमंत्रण, अधिवासन। 2 अक्टूबर-रविवार - नवपत्रिका प्रवेश, सप्तमी शाम 6.22तक। 3 अक्टूबर-सोमवार- महाष्टमी दिन 4.24 तक, सन्धि पूजा लदिन 4.24 बजे ही होगा। रात्रि में महानिशा पूजा, महागौरीपूजन, 4 अक्टूबर मंगल वार - सिद्धिदात्री पूजन, नवमी तिथि दिन 1.32 तक, नवरात्र हवन दिन 1.32 बाद से, 5 अक्टूबर बुधवार - विजया दशमी विजया दशमी तिथि दिन 11.10 तक, नवरात्र पारण (नोट - देवी का आगमन सप्तमी रविवार होने से हाथी पर आयेंगी)। फल- बरसा से जन जीवन को लाभ होगा। गमन- विजया दशमी बुधवार को है इसलिए चरणायुद्ध यानि मुर्ग़ा पर है जो अशुभ फल कारक है। 9 अक्टूबर 2022 -रविवार- कोजागरी, शरद पूर्णिमा। करवा चौथ -13/10/2022 चन्द्र उदय 7.53, धनतेरस- 22 अक्टूबर 2022, दीपावली- 24 अक्टूबर, सोमवार, प्रदोष और रात में सुबह 5.05 तक अमावस्या तिथि रहने से दीपावली पूजन, काली पूजा सोमवार को ही होगा। खण्ड ग्रास सूर्य ग्रहण -दीपावली के दूसरे दिन मंगलवार को 25/10/2022 को स्वाति नक्षत्र तुला राशि में सूर्य ग्रहण लगेगा, शाम 4.29 से शाम 5.42 तक भारत में दिखेगा, इसके 15 दिन बाद पूर्णिमा को भी ग्रहण है वह भी भारत में दिखेगा। गोवर्धन पूजा, - 26 अक्टूबर, कलम दवात, चित्रगुप्त पूजा, भइया दूज - 27 अक्टूबर, गुरुवार, छठ का नहाय खाय- 28 अक्टूबर 2022, शुक्रवार, छठ खरना- 29 अक्टूबर शनिवार, छठ पहला अर्घ्य- 30/10/ 2022, शाम 5.34, छठ का दूसरा अर्घ्य -31/10/22 सोमवार, सुबह 6.27, पारण। नवंबर 2022- गोपाष्टमी- 1/11/2022, अक्षय नवमी- 2/11/2022, देवठान एकादशी, हरि प्रबोधिनी, एकादशी- 4/11/2022, शनि प्रदोष- 5/11/22, श्री बैकुंठ चतुर्दशी- 6/11/2022, रविवार- इस रात 12 बजे को शिवलिंग पर तुलसी मंजरी और विष्णु विग्रह पर बेलपत्र चढ़ता है, जो आयोजन झारखंड में पहली बार -राम जानकी मन्दिर हाउसिंग सोसाइटी बरियातु, रांची सामने डीएवी स्कूल में आयोजित होगी और रात्रि भण्डारा होगा। व्रताय पूर्णिमा- 7/11/22, कार्तिक पूर्णिमा, गुरु नानक देव जी जयंती, देव दीपावली - 8/11/2022- खग्रास चंद्रग्रहण होगा जो भारत में दृश्य होगा। जो शाम 5.09 से शाम 6.19 तक होगा, भरणी नक्षत्र के मेष राशि में होगा। विवाह लग्न- 24 नवंबर से 16 दिसंबर 2022 तक।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सम्पूर्ण विश्व कभी भूल नहीं सकता 27 फरवरी 2002 की वह कालिखमयी भोर, जब गुजरात के गोधरा स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रेस की एक बोगी धू धू कर जल रही थी और अन्दर फंसे स्त्री, पुरुष, बच्चे व बुजुर्ग चीत्कार रहे थे। सोते हुए राम भक्तों से भरी रेल की उस बोगी को षडयंत्र पूर्वक जलाकर उसमें सवार 59 निर्दोष कारसेवकों की किस तरह नृशंस हत्या की गई, कौन नहीं जानता। वे सभी कार सेवा करके अयोध्या से लौट रहे थे। हिंदू समाज के रोष, या यूं कहें कि क्रिया की प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप गुजरात में कुछ घटनाएं हुईं और संपूर्ण हिंदू समाज उसमें उठ खड़ा हुआ। उसी दौरान की घटना है जिसके तहत बिलकिस बानो नामक एक महिला से बलात्कार और कुछ लोगों की हत्या के आरोप में 11 हिंदुओं को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उस सजा की अवधि पूरी होने से पूर्व, सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने, उनके आचरण के आधार पर, कारावास की अवधि को कम करके, उनको जाने की अनुमति दे दी। कहा कि सरकार चाहे तो उनको सामान्य जीवन जीने दे सकती है। माननीय न्यायालय ने यह भी कहा यदि सरकार इस बारे में नहीं सुनती तो आप हमारे पास वापस आ सकते हैं। राज्य सरकार ने निर्णय लिया और उन सभी लोगों को जेल से बाहर करने की प्रक्रिया, जो माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय अनुसार थी, पूरा किया। जेल से बाहर आते ही, जैसा कि स्वाभाविक है उनके परिजन, पडौसी, मित्र, रिश्तेदार, स्वागत के लिए पहुंच गए। कुछ ने प्रसाद/ मिठाई भी खिलाई होंगी। किंतु, उस पर जिहादी व सेक्युलर ब्रिगेड तथा उसके साथियों को तीखी मिर्ची लग गई। कहने लगे कि जो लोग जेल से छूटे हैं वे तो बलात्कारी हैं, हत्यारे हैं। ऐसा कैसे हो गया, वे बाहर कैसे आ सकते हैं, स्वागत कैसे हो सकता है.. इत्यादि बातें उन सभी को पुनः दोषी सिद्ध करने के लिए प्रारंभ हो गईं। यह बात भी स्मरणीय है कि जिन लोगों ने मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार, राज्य पुलिस, और राज्य शासन-प्रशासन पर भरोसा व्यक्त ना करते हुए मामले की सुनवाई पास के राज्य महाराष्ट्र में किए जाने की जिद पकड़ी थी, उनकी बात मानी भी गई, वे फिर भी आज उसी राज्य सरकार को कोसने लगे हैं। मामले की पूरी सुनवाई महाराष्ट्र में हुई, मुंबई उच्च न्यायालय ने फैसला दिया। मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा और वहां से अंतिम निर्णय मिला। अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर राज्य सरकार की आम माफी योजनांतर्गत ही उन्हें छोड़ा गया है। ऐसे में, सेक्युलर ब्रिगेड को नहीं पच रहा कि कोई गुजराती हिंदू शांति और स्वाभिमानी जीवन जी सके। एक बार फिर, वे, उन सबके लिए फांसी का फंदा लेकर खड़े हैं। प्रश्न उठता है कि न्यायालय द्वारा दिया गया यह समाधान क्या पहली बार था। नहीं, देश में अनेक बार इससे भी ज्यादा गंभीर अपराधों के लिए न्यायालय ने क्षमादान दिए है। हजारों ऐसे लोगों को पूर्व में भी जेलों से विभिन्न्य राज्यों में छोड़ा जा चुका है। इस बार भी 15 अगस्त को ही हजारों कैदियों को आम माफी योजना के अंतर्गत विभिन्न राज्य सरकारों ने छोड़ा है। किन्तु, किसी ने आज तक नहीं पूछा कि उनमें कितने मुसलमान थे, बलात्कारी थे, हत्यारे थे... इत्यादि! स्वयं राजीव गांधी के हत्यारों को भी छोड़ा जा चुका है। वे तो देश के प्रधानमंत्री थे। राज-नेताओं ने अनेक आतंकियों तक को छुड़वा दिया। पूर्व की उत्तर प्रदेश की सरकार ने तो दुर्दांत आतंकवादियों के केस भी खुलेआम वापस ले लिए थे, क्योंकि वे सब मुस्लिम थे! जो लोग इस घटना पर महिला सम्मान या नारी सशक्तिकरण के प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं, वे उस समय चुप थे जब नूपुर शर्मा को सरे आम बलात्कार की धमकीयां दी जा रहीं थीं, सर तन से जुदा के नारे लगा कर सरे आम नृशस हत्या को अब भी उतारू हैं, वे तब भी चुप थे जब अजमेर शरीफ का फारुख चिश्ती सैंकड़ों नाबालिग बेटियों के साथ कितने ही दिनों तक अनवरत बलात्कार करता रहा व करवाता रहा। वह तो यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष था। होठ तब भी सिले थे, जब 1995 के कुख्यात "तंदूर कांड" में कांग्रेस के ही यूथ लीडर ने युवती के टुकड़े-टुकड़े कर दिल्ली में एक पाँच सितारा होटल के तंदूर में भून दिया था। वह भी तो रिहा हो गया था। कश्मीर घाटी से उठी हिन्दू बहिन-बेटियों की चीत्कार व मस्जिदों से उनके बलात्कार की घोषणाएं तो इन को कैसे याद हो सकती हैं! अंतर यही है न कि ये सभी हिन्दू बेटियां थीं। अरे! यहां तो विमान अपहर्ताओं को भी विधायक बना दिया जाता है तब भी कोई चूं तक नहीं करता। लालू प्रसाद यादव जैसे नेता, जो सजा काट रहे हैं, अनेक मामलों में आरोपी भी हैं, उनको तो फूल देने के लिए स्वयं मुख्यमंत्री आते हैं, तब भी सब के मुंह में दही जमा रहता है। किसी को ध्यान भी नहीं होगा कि जिहादियों द्वारा गोधरा में जिंदा जलाए गए रामभक्त कार्-सेवकों में कितनी मासूम बेटियां, बेटे, महिलाएं व बुजुर्ग थे। 11 लोगों की जेल से मुक्ति को लेकर जिन लोगों के पेट में दर्द हो रहा है उससे उनकी हिंदू विरोधी मानसिकता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। दूसरा प्रश्न है सत्कार का। इतने लंबे काल की सजा काटने के बाद, जेलमुक्त हुए लोगों के परिजनों को क्या माला पहनाने का या प्रसाद /मिठाई खिलाने का भी अधिकार नहीं है! माला नहीं तो क्या वे अपने परिजनो के लिए जेल के बाहर फांसी के फंदे लेकर खड़े होते! कुल मिला कर, जब किसी एक्शन का रिएक्शन होता है उस पर सारे आसमान सिर पर उठा लेते हैं जबकि गोधरा जैसे पाशविक व नरसंहारी कुकृत्य पर गहरी चुप्पी साध जाते हैं! हालांकि, इस स्वागत की बात में किसी हिंदू संगठन का कोई हाथ नहीं है, फिर भी मीडिया का एक वर्ग भ्रामक व झूठी खबरें फैला कर विश्व हिंदू परिषद जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन को बदनाम करने पर तुला है। उससे उसे बाज आना होगा। इस मामले में जो लोग नैतिकता का हवाला देते हैं, वे भूल जाते हैं यह हिंदू समाज ही है जो यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता... के सिद्धांत पर चलकर मुस्लिम नारियों को भी तीन तलाक और हलाला जैसी अमानवीय कुप्रथा से मुक्ति दिलाने के लिए आगे बढ़ता है। किंतु ये लोग नैतिकता के मापदंड भी सांप्रदायिक रूप से अलग अलग करते हैं। हमने देखा कि गुजरात दंगों के बाद राज्य के मुख्यमंत्री और वहां के हिंदूवादी नेताओं के पीछे दशकों तक यह सेक्युलर ब्रिगेड और जिहादियों के रिश्तेदार लगातार हमले करते रहे। राज्य के मुख्यमंत्री को तो विदेश जाने के लिए वीजा तक में ये षड्यंत्रकारी रोडे डालते रहे। पूरी सरकार और हिंदू समाज को गुजरात दंगों के नाम पर कटघरे में खड़ा करने का कुत्सित प्रयास विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर दशकों तक जारी रहा। लेकिन सच्चाई आखिर छुप नहीं सकती। माननीय न्यायालयों ने प्रत्येक मामले की निष्पक्ष सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय तक मामले को ले गए और सच्चाई की विजय हुई। लेकिन, अब जब लोग सजा भी काट आए तब भी उनको अपराधी सिद्ध करने के लिए पुनः प्रयास हो रहे हैं। उनके सामने फांसी के फंदे लेकर लोग घूम रहे हैं। वे अभी भी उन सभी के लिए बलात्कारी, हत्यारे, अपराधी, हिंसक और समाज के लिए खतरा जैसे बेहूदा शब्दों का प्रयोग करके मुस्लिम समाज को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं। अब यह सब रुकना चाहिए और जिन लोगों को भारत की न्याय व्यवस्था और शासन प्रशासन के तंत्र में विश्वास नहीं, उन्हें कोई अन्य विकल्प ढूंढ़ लेना चाहिए। गुजराती हिन्दू समाज के दोहन और उसके साथ दोगला व्यवहार अब और नहीं सहा जा सकेगा। इन सब लोगों को समझना पड़ेगा कि गुजराती हिंदू समाज जिसे ये बार-बार अपराधी साबित करने पर तुले हैं, उस समाज ने गंभीर आपदाओं से लड़ते हुए भी स्वयं के साथ संपूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में बड़ा योगदान दिया है। ये गुजरात के लाल ही हैं जिन्होंने देश के प्रधानमंत्री के रूप में विश्व पटल पर भारत की छवि को चमकाने में अप्रतिम योगदान किया है। अब बहुत हो चुका, हिंदू द्रोही मानसिकता पर विराम लगना ही चाहिए और गुजराती हिंदुओं को भी अपनी सीधी सपाट और न्याय पूर्ण जिंदगी जीने का अवसर मिलना ही चाहिए। (लेखक विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)
टीम एबीएन, रांची। शनिवार को श्रीकृष्ण प्राकट्य दिवस में नक्षत्र की प्रधानता को देखते हुए शास्त्र अनुमोदित श्रीसंप्रदायाचार्यों की परंपरा के अनुसार श्रीलक्ष्मीवेंकटेश्वर (तिरुपति बालाजी) मंदिर में व्रत- महोत्सव मना। श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव में तिथि की प्रधानता न होकर नक्षत्रकी प्रधानता है। चंद्रवंश में श्रीभगवान प्रकट हुए, चंद्रमा की प्रिय पत्नियों में से एक रोहिणी है, इसलिए श्रीभगवान ने रोहिणी नक्षत्र का चयन किया है। जन्माष्टमी -व्रत समस्त व्रतों में उत्तम माना गया है। यह जय और पुण्य प्रदान करने वाली है। इस अवसर पर ब्रह्ममुहूर्त में परात्परब्रह्म परमात्मा श्रीलक्ष्मीवेंकटेश्वर का विश्वरूपदर्शन, सुप्रभातम और मंगलाशासन हुआ। फिर नित्याराधन के बाद दूध, दही, हल्दी, चंदन, शहद डाभयुक्त जल और गंगाजल से महाभिषेक हुआ। इसके बाद महाआरती और श्रुति स्मृति एवं उपनिषद के मंत्रों से स्तुति की गई। फिर नैवेद्य भोग लगा। दिव्य सुवासित पुष्पों से सजे हुए पालने पर भगवान श्रीवेंकटेश- कृष्ण रूपमें, श्रीश्रीदेवी रुक्मिणी के रूप में और श्रीभूमिदेवी राधिका स्वरूप में सज- धज कर झूला झूल रहे थे। रात्रि 8 बजे से श्रीकृष्णनाम संकीर्तनम्, भजन और श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का सामूहिक पाठ हुआ तथा रात्रि 9 बजे आराधना, महाआरती एवं भांति -भांति के स्तोत्रों से स्तवन हुआ। सूजी हलवा, फल और मेवा का भोग चढ़ा। महाभिषेक के यजमान : प्रदीप कुमार- उमा नारसरिया जबकि खिचड़ी महाप्रसाद निवेदन किया : ओम प्रकाश -मंजू गाड़ोदिया दोनों ही यजमान रांची निवासी हैं। अर्चक : सत्यनारायण गौतम, गोपेश आचार्य और नारायण दास ने महानुष्ठान को विधिवत सुसंपन्न कराया। इसके पूर्व झारखंड निवासियों के लिए सुख- शांति, आयु-आरोग्य और समृद्धि की कामना की। कार्यक्रम में मंदिर संचालन समिति के कार्यकारी अध्यक्ष श्रीराम अवतार नारसरिया, अनूप अग्रवाल, प्रदीप नारसरिया, विनय धरनीधरका, रंजन सिंह, सुशील लोहिया, राजेश सुलतानिया आदि का मुख्य भूमिका रहा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ वीरेंद्र साहू)। भारतीय संस्कृति अनादि काल से विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की उद्धार विचारधारा को जन-जन में प्रतिष्ठित करने का कार्य करते रही है, इसी कारण प्राचीन काल से ही भारत के प्रति विश्व समुदाय का आदर और श्रद्धा का भाव रहा है। हिंदू समाज समरस एवं समृद्ध था अपितु मुस्लिम आक्रांताओं के आगमन के बाद हिन्दू समाज की एकता व अखंडता को तार-तार कर उसे जातिवादी, क्षेत्रवादी, भाषावादी व मत-पंथ-संप्रदाय वादी विभेदों में बांट कर पहले मुगलों (मुस्लिमों) ने और फिर अंग्रेजों (ईसाइयों) ने भारत पर शासन किया। विपत्ति चाहे अनगिनत आईं, किंतु यहां के हिंदू समाज में न तो ज्ञान की, न वीरता व पौरुष की, न धैर्य की और न धर्म की कभी न्यूनता हुई। हिंदू समाज ने विधर्मियों के विरुद्ध क्षमता से भी अधिक प्रतिकार व वीरता का परिचय दिया, फिर भी आक्रांताओं के दमन से अपने आपको नहीं बचा पाए एवं सैकड़ों वर्ष तक पराधीनता का दंश झेलते रहे। 1925 में परम पूज्य डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार ने समाज को एक सूत्र में बांधने के लक्ष्य को लेकर शाखा प्रारंभ की। इन शाखाओं में कर्मठ कार्यकतार्ओं का निर्माण होता रहा। भारत 1947 में स्वाधीन भी हुआ। हमें भौतिक स्वाधीनता तो मिली परंतु सांस्कृतिक स्वाधीनता नहीं मिल पाई। परिणामत: देश के अंदर हिंदू एवं हिंदुत्व पर कई प्रकार की विपत्तियां आते रही है। आक्रमण के कारण मानबिंदुओं पर लगे कलंक हिंदू समाज को उद्वेलित करता रहा, परंतु इसके लिए एक नेतृत्वकर्ता संगठन की आवश्यकता थी। 29 अगस्त, 1964 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर पवई, मुम्बई स्थित पूज्य स्वामी चिनमयानन्द जी के आश्रम सांदीपनि साधनालय में बुलाई एक बैठक गई। बैठक में पूज्य स्वामी चिनमयानन्द, राष्ट्रसंत तुकडो जी महाराज, सिख सम्प्रदाय से माननीय मास्टर तारा सिंह, जैन सम्प्रदाय से पूज्य सुशील मुनि, गीता प्रेस गोरखपुर से हनुमान प्रसाद पोद्दार, के एम मुंशी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक के द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्य माधव सदाशिव राव गोलवलकर श्री गुरुजी सहित 40-45 अन्य विशिष्टजन एवं साधु-संत गण उपस्थित थे। महापुरुषों के सानिध्य में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की गई। विश्व हिंदू परिषद स्थापना का मुख्य उद्देश्य हिन्दू समाज को संगठित और जागृत करने, उसके स्वत्वों, मानबिन्दुओं तथा जीवन मूल्यों की रक्षा व संवर्धन करने तथा विदेशस्थ हिंदुओं से संपर्क स्थापित कर उन्हें सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ बनाने व उनकी सहायता करना था। विश्व हिंदू परिषद का प्रथम सम्मेलन 22 से 24 जनवरी 1966 को कुम्भ के अवसर पर प्रयाग में आयोजित किया गया, जिसमें 12 देशों के 25 हजार प्रतिनिधियों के साथ, 300 प्रमुख संतों की सहभागिता रही। पहली बार भारत के प्रमुख शंकराचार्य भी एक साथ आए और धर्मांतरण पर रोक तथा परावर्तन (घर-वापसी) का संकल्प लिया गया। मैसूर के महाराज मा० चामराज जी वाडियार को अध्यक्ष व दादासाहब आप्टे को पहले महामंत्री के रूप में घोषित कर विहिप की प्रबंध समिति की घोषणा भी हुई। इस सम्मेलन में जहां परावर्तन को मान्यता देने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ वहीं विहिप के बोधवाक्य ‘धर्मो रक्षति रक्षित:’ और बोध चिह्न अक्षय वटवृक्ष तय हुआ। हिन्दू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता समाज के सामने एक बड़ी चुनौती थी। इस चुनौती को स्वीकारते हुए एक समरस समाज के पुन: निर्माण हेतु विहिप ने अपनी व्यापक कार्ययोजना बनाई। इस दुर्गम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु संगठन ने अपने 58 वर्षों की तपश्चर्या में अनेक कार्य किए, जो तत्कालीन परिस्थियों में बेहद दुरूह कहे जा सकते थे, किन्तु उनकी सफलता ने आज हिन्दू समाज की दशा व दिशा दोनों को बदलने में अभूतपूर्व योगदान किया है। 13-14 दिसम्बर, 1969 के उडुपी (कर्नाटक )धर्म संसद में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरूजी के विशेष प्रयासों के परिणाम स्वरूप, भारत के प्रमुख संतों ने एकस्वर से ‘हिन्दव: सोदरा सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्’ के उद्घोष के साथ सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया। सभी ने ‘मम दीक्षा हिंदू रक्षा, मम मंत्र समानता’ का संकल्प लिया। 27 से 29 जनवरी 1979 को प्रयाग में सम्मेलन हुआ जिसमें 18 देशों के 60 हजार प्रतिनिधि सहभागी हुए। इस सम्मेलन का उद्घाटन पूज्य दलाई लामा जी ने किया। उनका स्वागत पूज्य ज्योतिष पीठ के शंकराचार्यजी ने किया,यह एक ऐतिहासिक प्रसंग है। 1982 में श्री अशोक सिंघल जी विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी बने। व्यापक जनजागरण के कार्यक्रम होने लगे। हिन्दू समाज को एकाकार करने वाली 1983 में हुई एकात्मता यात्रा में तो देश के लाखों गांव में संपर्क हुए। इस यात्रा में 6 करोड़ लोग सहभागी हुए। अप्रैल 1984 में नई दिल्ली में प्रथम धर्म संसद का अधिवेशन संपन्न हुआ, जिसमें लगभग 125 संप्रदायों के हजारों साधु-संतों सहभागी हुए। इसी वर्ष श्री राम जन्मभूमि आंदोलन भी प्रारंभ हुआ। 8 अक्टूबर 1984 को का युवा शाखा बजरंग दल के रूप में स्थापना किया गया। 1994 में काशी में हुई धर्म संसद का निमंत्रण डोम राजा को देने पूज्य संत न सिर्फ स्वयं चलकर गए बल्कि उनके घर का प्रसाद ग्रहण किया तथा अगले दिन डोम राजा धर्म संसद के अधिवेशन में संतों के मध्य बैठे और संतों ने उन्हें पुष्प हार पहनाकर स्वागत किया। इस धर्म संसद में 3500 संत उपस्थित थे। वनवासी, जनजाति, अति पिछड़ी व पिछड़ी जाति के हजारों लोगों को ग्राम पुजारी के रूप में प्रशिक्षण देकर मंदिरों में पुरोहित के रूप में दायित्व सौंपा गया। 1996 में जब आतंकियों ने बाबा अमरनाथ की यात्रा को बंद करने की धमकी देते हुए यह कहा कि यदि कोई आएगा तो वापस नहीं जाएगा। बजरंगदल के आह्वान पर 51 हजार बजरंगी व एक लाख अन्य शिव भक्तों ने जय भोले की हुंकार भरते हुए उस दुर्गम यात्रा की ओर जब कूच किया तो उस यात्रा को रोकने का कोई आज तक दुस्साहस नहीं कर पाया। 1984 में प्रारंभ हुए श्री राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन ने देश के 3 लाख गाँवों के 16 करोड़ लोगों को जोडा। विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व एवं साधु संतों के मार्गदर्शन में 1992 में गीता जयंती के पावन दिवस पर राम जन्मभूमि पर हिंदुओं के कलंक के रूप में खड़ा बाबरी ढांचा को कारसेवकों ने हटा दिया एवं भगवान श्री राम लला के लिए टाट का छत बना दिया। सड़क से संसद व सर्वोच्च न्यायालय तक अपनी आवाज बुलंद कर 492 वर्षों के संघर्ष के उपरांत, देश के स्वाभिमान की पुन: प्रतिष्ठा करते हुए, 5 अगस्त 2020 के अयोध्या में भूमि पूजन के ऐतिहासिक दिवस को स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा दिया। अगले वर्ष तक रामलला अपने भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित हो जाएंगे। विहिप की युवा शाखा बजरंग दल तथा दुर्गा वाहिनी देश-धर्म संस्कृति व राष्ट्र-रक्षा व समरस समाज के निर्माण हेतु अग्रणी भूमिका निभाई है। सेवा, सुरक्षा व संस्कार इनके मूल मंत्र रहे हैं। पूंछ जिले के सीमांत क्षेत्र को हिन्दू विहीन करने के जिहादी षड्यंत्र को भांपते हुए बजरंग दल ने 2005 में बाबा बूढ़ा अमरनाथ की यात्रा को जब पुन: प्रारम्भ कराया तो वहां से हिन्दुओं का पलायन भी रुका और समाज व सुरक्षा कर्मियों का आत्मविश्वास भी बढ़ा। 2007 में रामसेतु रक्षा आंदोलन का प्रारंभ हुआ तथा अद्वितीय चक्का जाम के साथ दिल्ली में महारैली हुई, रामस्वरूप आज भगवान श्री रामसेतु सुरक्षित है। हरियाणा के मेवात में गत वर्ष पुन: प्रारंभ हुई बृजमण्डल (मेवात) जलाभिषेक यात्रा भी समरस भारत की दिशा में एक अनुपम प्रयास है। देशभर में भगवान वाल्मीकि, संत रविदास तथा संविधान निमार्ता डॉ भीमराव अम्बेडकर इत्यादि महापुरुषों, जिन्होंने देश की समरसता में योगदान दिया, की जयन्तियां व्यापक रूप से मनाई जा रही हैं। इन सब कार्यक्रमों के परिणाम स्वरूप अब संत समाज सहज रूप से कमजोर समाज की बस्तियों में प्रवास, प्रवचन व सह-भोज करते हैं। समग्र ग्राम विकास अभियान जिसे एकल अभियान के रूप में भी जानते हैं, के अंतर्गत एक पंचमुखी परियोजना से अब तक 55 लाख से अधिक बच्चे लाभान्वित हो चुके है तथा लगभग 30 लाख विद्यार्थी अभी भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उन्हें एक साथ दी जा रही प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, ग्राम विकास (गौ-पालन, जैविक कृषि, कौशल विकास), संस्कार (हरिकथा व सत्संग) व जागरण शिक्षा (ग्रामीण विकास योजनाओं की जानकारी व उनका उपयोग) के माध्यम से देश के सुदूर क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन देखने को मिले हैं। इसमें आने वाले अधिकांश विद्यार्थी कमजोर समाज से ही आते हैं। 26 फरवरी 2019 को भारत के राष्ट्रपति माननीय श्री रामनाथ कोविंद एवं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस एकल अभियान को ‘गांधी शांति पुरस्कार-2017’ द्वारा राष्ट्रपति भवन में सम्मानित कर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। देश के मठ-मंदिरों में पुरोहित प्रशिक्षित हों तथा ऊनमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी हो। इस संबंध में विहिप के प्रयास अनुकरणीय हैं। देश भर में अब तक हजारों अर्चक-पुरोहित या पुजारियों को धार्मिक कर्मकांडों की शिक्षा-दीक्षा देकर विभिन्न मठ-मंदिरों में भगवान की सेवार्थ लगाया गया है। 50 हजार प्रशिक्षणार्थियों में से लगभग 60% अनुसूचित जाति के तथा 15% अनुसूचित जनजाति के बंधु -भगिनियां हैं, जो आज भी अनेक छोटे बड़े मंदिरों के माध्यम से समाज में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ‘एक गांव, एक मंदिर, एक कुआं व एक शमसान’ का नारा भी विहिप ने ही दिया था। विश्व हिंदू परिषद द्वारा समाज के सहयोग से देश भर में 90 हजार से अधिक अन्य सेवा प्रकल्प भी चलाए जा रहे हैं। इनमें से लगभग 70 हजार संस्कार केंद्र, दो हजार से अधिक शिक्षा केंद्र, 1800 स्वास्थ्य केन्द्र, 1500 स्वावलंबन केंद्र तथा शेष लगभग 15 हजार केन्द्रों में आवासी छात्रावास, अनाथालय, चिकित्सा केंद्र, कम्प्यूटर, सिलाई, कढ़ाई प्रशिक्षण केंद्र, विवाह केंद्र, महा-विद्यालय, कॉलेज इत्यादि प्रमुख हैं। सामाजिक चेतना के जागरण कर विहिप ने अभी तक लगभग 63 लाख हिन्दुओं के धर्मांतरण को रोकने के साथ-साथ लगभग 9 लाख की घर-वापसी भी कराई है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, वनवासी व गिरिवासी समाज के बीच सेवा, समर्पण व स्वावलंबन के मंत्र के साथ देश दर्जन भर राज्यों में छल-बल पूर्वक धर्मान्तरण के विरुद्ध कठोर दण्ड की व्यवस्था वाले कानून विहिप के सतत प्रयासों के कारण ही बन पाए हैं। भारत धर्म यात्राओं का देश है जिसकी आत्मा तीर्थों में वास करती है। इन यात्राओं के माध्यम से ही देश, धर्म व समाज की एकता, अखण्डता और समरसता प्रतिबिम्बित होती है। बात चाहे कांवड़ यात्रा की हो या कैलाश मान सरोवर की, अमर नाथ यात्रा हो या गोवर्धन परिक्रमा, जगन्नाथ की नव कलेवर यात्रा हो या सिन्धु यात्रा, श्रीराम जानकी विवाह बारात यात्रा हो या बाबा अमरनाथ की यात्रा, इन सभी को सस्ती, सफल, सुखद, संस्कारित व आध्यात्मिक स्वरूप देने में विश्व हिंदू परिषद की अहम भूमिका रही है। (लेखक विश्व हिंदू परिषद के प्रांत प्रभारी हैं।)
टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद के युवा इकाई बजरंग दल, रांची महानगर के तत्वधान में आज दिनांक 14 अगस्त 2022 को बुटी स्थित गोविंदम पैलेस में अखंड भारत दिवस कार्यक्रम किया गया। कार्यक्रम में भारत माता की महाआरती भी की गई। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री डॉ वीरेंद्र साहू ने कहा भारतवर्ष पुरातन संस्कृति का हृदय स्थल है। भारत का कल्पना मात्र भारत वर्ष तक ही सीमित नहीं है बल्कि हमारी कल्पना जंबूद्वीप है। जंबूद्वीप का तात्पर्य यूरोप और एशिया है। हमारी पुरातन संस्कृति संपूर्ण जंबूद्वीप में था। 2000 वर्ष पूर्व ईसा मसीह के जन्म के पश्चात एक नई संस्कृति का जन्म हुआ, जिसका केंद्र यूरोप रहा। वहीं दूसरी ओर लगभग 1400 वर्ष पूर्व हजरत मोहम्मद के जन्म के पश्चात दूसरी प्रकार की संस्कृति का जन्म हुआ, जिसका केंद्र अरब रहा। कुरान के अनुसार 1400 वर्ष पूर्व अरब में 360 मंदिरों में की पूजा हुआ करती थी, उसे नष्ट करके वहां पर मुस्लिम धर्म स्थापना का कार्य प्रारंभ हुआ। छोटे-छोटे कबीले में रहने वाले सनातन परंपराओं के लोगों को तलवार के बल परास्त करते हुए जंबूद्वीप को खंडित कर छोटे-छोटे देश बनाते चले गए। परिणामस्वरूप आज 2000 साल से सनातन परंपरा को नष्ट करने की सिलसिला के कारण एक ओर लगभग 50 से 60 ईसाई देश, तो वहीं दूसरी ओर 50 के लगभग में मुस्लिम देश बन गये। यह सिलसिला अंग्रेजों के आने के बाद भी चलता रहा 1876 में अफगानिस्तान से शुरू होकर 1947 तक नेपाल, भूटान, म्यांमार, तिब्बत, श्रीलंका, पूर्वी पाकिस्तान, पश्चिम पाकिस्तान जैसे देशों का बनना होता रहा। मुस्लिम एवं ईसाईकरण के प्रभाव क्षेत्र सदैव जंबूद्वीप से कटते रहे। वर्तमान का भारतवर्ष आज भी धर्मांतरण के दंश झेल रहा है। कई क्षेत्रों में अलगाववाद पनप रहे हैं, जिससे भारत की आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ पुनः खंडित होने का संकेत भी मिलता रहता है। डॉ साहू ने कहा समस्त सनातन हिंदू समाज को सोचना है कि समाज को कैसे समरस एवं सशक्त बना सकते हैं। हर नागरिक को समाज को सशक्त एवं समृद्ध बनाने के लिए आगे आना होगा तभी हमारा सनातन परंपरा बचा रहेगा। सनातन परंपरा बचने से मात्र सनातन परंपरा के लोगों को ही लाभ नहीं है बल्कि इसी परंपरा से ही विश्व का कल्याण हो सकता है, क्योंकि सर्वे संतु निरामया की कल्पना सिर्फ हिंदू सनातन संस्कृति ही कर सकता है। अखंड भारत संकल्प दिवस का कार्यक्रम बाल्मीकि नगर श्री राम नगर चाणक्य नगर माधव नगर बिरसा नगर केशव नगर एवं गुरु गोविंद सिंह नगर में भी कार्यक्रम आयोजन किया गया। मौके पर विश्व हिंदू परिषद के प्रांत सहमंत्री रंगनाथ महतो, अध्यक्ष कैलाश केसरी, मंत्री चंद्रदीप दुबे, उपाध्यक्ष गोपाल पारीक, बजरंग दल संयोजक प्रकाश रंजन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महानगर सह कार्यवाह दीपक पांडे, महानगर बौद्धिक प्रमुख शशिकांत झा, आगाशे नगर के अध्यक्ष उदित नारायण सिंह, चैती दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष रवि कुमार पिंकू, कार्यक्रम के संयोजक कुंदन कुमार, दुर्गा वाहिनी विभाग सहप्रमुख काजल सोनी, पंचरतन देवी, भोलानाथ विश्वास, सत्येंद्र सिंह, युगल किशोर, अमन कुमार, अशोक बबलू, मंटू दुबे, डॉ जीवाधन प्रसाद, संजय सिंह, संजीव रंजन सहित कई कार्यकर्ता उपस्थित थे। उक्त जानकारी बजरंग दल, रांची महानगर के संयोजक प्रकाश रंजन (9334433338) ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
एबीएन सोशल डेस्क। अमरनाथ की पवित्र गुफा में शुक्रवार को प्रतीक छड़ी मुबारक की स्थापना के साथ ही धार्मिक तौर पर अमरनाथ यात्रा सम्पन्न हो गई। हालांकि, आधिकारिक तौर पर 5 अगस्त से अमरनाथ यात्रा को रोक दिया गया था। अधिकारियों ने बताया कि शुक्रवार तड़के ढाई बजे महंत दीपेंद्र गिरि के नेतृत्व में छड़ी मुबारक पवित्र गुफा पहुंची। सुबह सूर्य उदय के साथ श्रावण पूर्णिमा के मुहूर्त में पवित्र गुफा में दर्शन किए गए। इसके बाद पूजा अर्चना की गई। वहीं, सुबह राजभवन, श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने वार्षिक श्री अमरनाथ यात्रा की समापन पूजा की। उन्होंने लोगों के लिए शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए प्रार्थना की। अंतिम दिन करीब डेढ़ सौ श्रद्धालुओं ने गुफा के दर्शन किए जबकि 29 जून को शुरू हुई अमरनाथ यात्रा के 43 दिनों के भीतर 3.10 लाख श्रद्धालुओं ने हिमलिंग के दर्शन किए हैं। इस बार अमरनाथ यात्रा में 63 श्रद्धालुओं की मौत भी हो गई। इस यात्रा की प्रतीक पावन पवित्र छड़ी मुबारक को भी पवित्र गुफा में स्थापित किया गया जिसे लेकर साधुओं का एक दल श्रीनगर के दशनामी अखाड़े से चला था और इस दल का नेतृत्व दशनामी अखाड़े के महंत दीपेंद्र गिरि ने किया था। पूजा प्रतिष्ठा के बाद इस छड़ी मुबारक को पुनः उसी अखाड़े में स्थापित कर दिया जाएगा। महंत दीपेन्द्र गिरि के नेतृत्व में सुबह पंजतरणी से शुरू हुई छड़ी मुबारक की यात्रा में बड़ी संख्या में सिर्फ साधुओं ने हिस्सा लिया। बम बम भोले और हर हर महादेव जैसे नारों की गूंज के साथ छड़ी मुबारक को पवित्र गुफा में लाया गया। छड़ी मुबारक के यहां पहुंचने के बाद शुरू हुई पूजा दिनभर चली व शाम को छड़ी मुबारक को रात्रि विश्राम के लिए पंजतरणी ले जाया गया। कल रात तक छड़ी मुबारक पहलगाम पहुंचेगी। पहलगाम के ही लिद्दर नदी पर पूजा और विसर्जन के बाद साधु-संतों के लिए पारंपरिक कढ़ी-पकौड़ा का भंडारा होगा।
एबीएन सोशल डेस्क। पवित्र छड़ी मुबारक बुधवार को चंदनबाड़ी से शेषनाग की ओर रवाना हुई। शेषनाग में रात को विश्राम होगा। इसके बाद वीरवा र तड़के महंत दीपेंद्र गिरि साधुओं के समूहों के साथ छड़ी मुबारक को लेकर पवित्र गुफा पहुंचेंगे और श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर बाबा अमरनाथ की पूजा-अर्चना करेंगे। उसके बाद वार्षिक अमरनाथ यात्रा के आखिरी दर्शन होंगे। बाबा अमरनाथ की गुफा में धार्मिक अनुष्ठान और दर्शनों के पश्चात शाम को छड़ी वापस पहलगाम के लिए रवाना होगी। इसके उपरांत 12 अगस्त के दिन लिद्दर नदी के किनारे पूजन तथा विसर्जन होगा। इसके साथ ही श्री अमरनाथ यात्रा समाप्त हो जाएगी। वहीं, शेषनाग पहुंचने पर छड़ी मुबारक की पूजा-अर्चना की गई। दशनामी अखाड़े के महंत दीपेंद्र गिरि सहित देशभर से आए साधु-संत जत्थे में शामिल हैं।
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