टीम एबीएन, रांची। उत्तर प्रदेश की वाराणसी जिला न्यायालय ने ज्ञानवापी मामले पर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए ज्ञानवापी स्थित शृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन और विग्रहों के संरक्षण को निर्देशित किया है। इस फैसला से समस्त सनातन हिंदू समाज आनंदित, उत्साहित व उल्हासित हैं, यह बात विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री डॉ बिरेंद्र साहू ने कहा। प्रांत मंत्री डॉ बिरेंद्र साहू ने कहा जिला न्यायाधीश डॉ.अजय कृष्ण विश्वेश की न्यायालय में पोषणीयता पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि श्रृंगार गौरी-ज्ञानवापी याचिका में आगे सुनवाई होगी। वहीं मुस्लिम पक्ष की याचिका निरस्त कर दी गई है, यह विदेशी आक्रांताओं पर भारतीय हिंदू संस्कृति की विजय है। डॉ साहू ने कहा, गजनी, गोरी, औरंगजेब, तुगलक, अकबर जैसे आक्रांताओं के द्वारा हमारे अनेकों मानबिंदुओं को क्षति पहुंचाने अथवा लूटने का काम किया गया था, इसका पुनरुद्धार करना हम हिंदू समाज का कर्तव्य बनता है। अपने कर्तव्य को समझते हुए विगत 600 वर्षों से अपने मानबिंदुओं को मूल रूप में प्राप्त करने के लिए हिंदू समाज ने संघर्ष करते आ रहे हैं। यह फैसला इसी कर्तव्य के भविष्य का मार्ग को प्रशस्त करने का काम करेगा। उन्होंने कहा कि न्यायालय का यह फैसला साबित कर दिया कि मथुरा के श्रीकृष्ण मंदिर सहित भारत के सैकड़ों प्राचीन सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मान बिंदुओं पर प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट 1991 लागू नहीं होगा, क्योंकि ये पुरातन है, प्राचीन है, जिस पर 15 अगस्त,1947 की स्थिति लागू नहीं हो सकता। डॉ साहू ने फैसला पर अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा भगवान शिव के अन्यतम भक्त भगवान नंदी के प्रतीक्षा का समय अब पूर्ण होने वाला है। (लेखक विहिप के झारखंड प्रांत मंत्री हैं।)
एबीएन सोशल डेस्क। शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी का आज एलान कर दिया गया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिषपीठ बद्रीनाथ और स्वामी सदानंद को द्वारका शारदा पीठ का प्रमुख घोषित किया गया है। दोनों के नाम की घोषणा शंकरचार्य जी की पार्थिव देह के सामने हुई। शंकराचार्य के निज सचिव सुबोद्धानंद महाराज ने उत्तराधिकारियों के नामों की घोषणा की। द्वारका पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का रविवार को मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले में निधन हो गया था। वह 99 वर्ष के थे। शिष्य ने बताया कि वह द्वारका, शारदा एवं ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य थे और पिछले एक साल से अधिक समय से बीमार चल रहे थे। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म 2 सितंबर 1924 को हुआ था : शिष्य दण्डी स्वामी सदानंद ने बताया था, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने तपोस्थली परमहंसी गंगा आश्रम झोतेश्वर में दोपहर 3.30 बजे अंतिम सांस ली। उन्होंने बताया कि ज्योतिष एवं शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म 2 सितम्बर 1924 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में हुआ था। उनके बचपन का नाम पोथीराम उपाध्याय था। स्वामी स्वरूपा नंद सरस्वती 1981 में बने थे शंकराचार्य स्वामी स्वरूपा नंद सरस्वती नौ साल की उम्र में अपना घर छोड़ कर धर्म यात्राएं शुरू कर दी थी और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल में रखा गया था। शंकराचार्य के अनुयायियों ने कहा कि वह 1981 में शंकराचार्य बने थे हाल ही में शंकराचार्य का 99वां जन्मदिन मनाया गया था। शंकराचार्य के एक करीबी व्यक्ति ने बताया कि अपनी धर्म यात्राओं के दौरान वह काशी पहुंचे और वहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्रीस्वामी करपात्री महाराज से वेद-वेदांग एवं शास्त्रों की शिक्षा ली। यह वह समय था जब भारत को अंग्रेजों से मुक्त करवाने की लड़ाई चल रही थी। जब 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगा तो वह भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और 19 साल की उम्र में वह क्रांतिकारी साधु के रूप में प्रसिद्ध हुए।
एबीएन सोशल डेस्क। अयोध्या राममंदिर ट्रस्ट ने परिसर में 10 और मंदिर बनाने का फैसला किया है। मंदिर के बजट में भी 1800 करोड़ का इजाफा किया गया है। वहीं बतयाा गया है कि साल 2024 में 14 जनवरी को मकर संक्राति मौके पर रामलला अपने गर्भगृह में प्रवेश करेंगे। मंदिर निर्माण के लिए गठित संस्था श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने यह जानकारी दी। बता दें कि उच्चतम न्यायालय के आदेश पर राम मंदिर निर्माण के लिए गठित किये गये ट्रस्ट ने यहां चली लंबी बैठक के बाद ट्रस्ट के नियम और कायदों को अनुमोदन दिया ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बताया कि फैजाबाद सर्किट हाउस में आयोजित इस बैठक में ट्रस्ट के सदस्यों ने सर्वसम्मति से यह फैसला किया कि राम जन्मभूमि परिसर में हिंदू धर्म से जुड़ी महान विभूतियों और साधु-संतों की प्रतिमाओं को भी स्थान दिया जायेगा। उन्होंने बताया कि विशेषज्ञों द्वारा पेश की गई रिपोर्ट के आधार पर लगाए गए ट्रस्ट के अनुमान के मुताबिक राम मंदिर निर्माण पर 1800 करोड़ रुपये खर्च होंगे। राय ने बताया कि लंबे अरसे तक सोच विचार और राम मंदिर निर्माण से जुड़े सभी लोगों के तमाम सुझावों पर आज की बैठक में ट्रस्ट से जुड़े नियम कायदों और बाइलॉज को अंतिम रूप दिया गया। उन्होंने बताया कि इस बैठक में ट्रस्ट के 15 में से 14 सदस्यों ने हिस्सा लिया, जिनमें निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र, ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास, कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी, उडुपी पीठाधीश्वर विश्व तीर्थ प्रसन्नाचार्य प्रमुख रूप से शामिल थे।
एबीएन सोशल डेस्क। द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन रविवार को दोपहर में हो गया है। वह 99 वर्ष के थे। उन्हें आज मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में स्थित परमहंसी गंगा आश्रम में समाधि दी जानी है। उनके निधन के बाद अब उनके उत्तराधिकारी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सोमवार को ही उनके उत्तराधिकारी की घोषणा की जानी है। लेकिन इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि उनका उत्तराधिकारी कौन बनेगा? शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी की घोषणा के बाद संत समाज द्वारका पीठ और ज्योतिष पीठ पर फैसला लेगा। इस बीच कहा जा रहा है कि दंडी स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज को द्वारका शारदा पीठ की कमान मिल सकती है। वहीं दूसरी ओर दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज को ज्योतिषपीठ की कमान सौंपी जा सकती है। ये दोनों ही शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्रमुख शिष्य माने जाते हैं। वहीं शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के अंतिम दर्शन के लिए राजनीतिक दलों के नेता भी सोमवार को पहुंचेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ सुबह करीब 11 बजे आश्रम पहुंचकर उनके अंतिम दर्शन करेंगे। वहीं केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल दोपहर 2 बजे झोतेश्वर स्थित परमहंसी आश्रम पहुंच सकते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के भी पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। आश्रम के अनुसार स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती गुजरात स्थित द्वारका-शारदा पीठ एवं उत्तराखंड स्थित ज्योतिश पीठ के शंकराचार्य थे और पिछले एक साल से अधिक समय से बीमार चल रहे थे। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज 99 वर्ष की आयु में हृदय गति के रुक जाने से ब्रह्मलीन हुए। उन्होंने अपनी तपोस्थली परमहंसी गंगा आश्रम झोतेश्वर में दोपहर 3.21 बजे अंतिम सांस ली। दंडी स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज और दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज को कमान मिल सकती है। शंकराचार्य ने सनातन धर्म, देश और समाज के लिए अतुल्य योगदान किया। उनसे करोड़ों भक्तों की आस्था जुड़ी हुई है। इसमें कहा गया है कि वह स्वतन्त्रता सेनानी, रामसेतु रक्षक, गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करवाने वाले तथा रामजन्मभूमि के लिए लम्बा संघर्ष करने वाले, गौरक्षा आंदोलन के प्रथम सत्याग्रही एवं रामराज्य परिषद् के प्रथम अध्यक्ष थे और पाखंडवाद के प्रबल विरोधी थे। आश्रम के सूत्रों ने बताया, उन्हें नरसिंहपुर के गोटेगांव स्थित उनकी तपोस्थली परमहंसी गंगा आश्रम झोतेश्वर में सोमवार दोपहर करीब 3-4 बजे भू समाधि दी जायेगी। उन्होंने कहा कि वह डायलिसिस पर थे और पिछले कुछ महीनों से आश्रम में अक्सर वेंटिलेटर पर रखे जाते थे, जहां उनके इलाज के लिए एक विशेष सुविधा बनाई गई थी। इसके अलावा, वह मधुमेह से पीड़ित थे और वृद्धावस्था संबंधी समस्याओं से भी जूझ रहे थे।
एबीएन सोशल डेस्क। हिंदुओं के सबसे बड़े धर्म गुरू शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया है। 99 साल की उम्र में शंकराचार्य का निधन हुआ है। जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती दो मठों (द्वारका एवं ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य थे। परमहंसी गंगा आश्रम झोतेश्वर जिला नरसिंहपुर में ली आज दोपहर 3.30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। आजादी की लड़ाई में भाग लेकर शंकराचार्य जेल गये थे। राम मंदिर निर्माण के लिए भी उन्होंने लंबी कानून लड़ाई लड़ी थी। हाल ही में तीजा के दिन स्वामी जी का 99वें जन्मदिन मनाया गया था। नौ वर्ष की छोटी सी उम्र में जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने घर का त्याग कर धर्म यात्रायें प्रारम्भ कर दी थीं। इस दौरान वह काशी पहुंचे और यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग और शास्त्रों की शिक्षा ली। ये वो वक्त था जब देश में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई चल रही थी। देश में आंदोलन हो रहे थे। जब 1942 में गांधी जी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया, तो ये भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद गये। उस वक्त इनकी आयु 19 साल की थी। इस उम्र में वह क्रांतिकारी साधु के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इसी दौरान उन्होंने वाराणसी की जेल में नौ महीने और अपने गृह राज्य मध्यप्रदेश की जेल में छह महीने की सजा भी काटी। जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती करपात्री महाराज की राजनीतिक दल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी थे। 1981 में इनको शंकराचार्य की उपाधि मिली। 1950 में शारदा पीठ शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे। राजनीति में भी काफी सक्रिय थे। अक्सर तमाम मुद्दों में सरकार के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाते थे। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जब ईरान यात्रा पर थीं तो सुषमा ने अपना सिर ढक रखा था। चूंकि वहां पर हिजाब का चलन था इसलिए उनको भी ऐसा करना पड़ा था। शंकराचार्य ने इसका विरोध किया था। हरियाली तीज के दिन उनका जन्मदिन मनाया जाता है। कुछ ही दिन पहले उनका जन्मदिन बीता है। कांग्रेस के तमान नेताओं ने उनके जन्मदिन पर बधाई दी थी। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा था कि हमारे पूज्य गुरुदेव सनातन धर्म के ध्वजवाहक, अनन्त श्री विभूषित जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के प्राकट्य दिवस पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं। हम सबके प्रेरणा स्रोत महाराजश्री स्वस्थ्य रहें व दीर्घायु हों यही माता राज राजेश्वरी से प्रार्थना है।
एबीएन सोशल डेस्क। अयोध्या में राम जन्मभूमि परिसर में भगवान श्री राम के भव्य मंदिर का निर्माण तेजी से चल रहा है। दिसंबर 2023 तक मंदिर निर्माण और जनवरी 2024 में मकर संक्रांति पर भगवान श्री रामलला विराजमान होने का अनुमान है। मंदिर निर्माण को लेकर आज राम मंदिर ट्रस्ट की दो दिनों की बैठक होने वाली है। बैठक से पहले मंदिर निर्माण की जानकारी देने वाले एक वीडियो ट्रस्ट की ओर से जारी किया गया है। मंदिर का 40 फीसदी काम पूरा : एक रिपोर्ट के मुताबिक मंदिर का 40 फीसदी से भी ज्यादा का काम पूरा हो चुका है। मंदिर निर्माण ट्रस्ट के मुताबिक, दिसंबर 2023 तक मंदिर निर्माण का कार्य पूरा होने की उम्मीद है। साल 2024 की जनवरी की मकर संक्रांति पर भगवान श्री रामलला विराजमान होंगे। यानी 2024 में भगवान राम के भक्तों के सैकड़ों साल का इंतजार खत्म होने की उम्मीद है। मंदिर निर्माण की इन्हीं तैयारियों को लेकर आज श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की अहम बैठक होने जा रही है। दो दिनों तक होने वाली इस बैठक में मंदिर के गर्भगृह निर्माण के कार्य योजना पर अंतिम मुहर लगाई जायेगी। साथ ही राम जन्मभूमि परिसर में यात्री सुविधा केंद्र बनाये जाने और सुरक्षा के बीच उसके संचालन की व्यवस्था पर मंथन किया जायेगा। वहीं मंदिर निर्माण के साथ श्रद्धालुओं के लिए नए मार्ग का भी निर्माण शुरू हो गया है और आने वाले राम नवमी पर नए मार्ग को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जायेगा। 2024 मकर संक्रांति पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु राम मंदिर गर्भगृह में भगवान श्री रामलला का दर्शन करेंगे। यही कारण है इस बार होने वाली ट्रस्ट की बैठक बेहद अहम मानी जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में लिए गए फैसलों की रिपोर्ट भी पीएमओ को भेजी जायेगी इसलिए पूर्व आईपीएस अधिकारी और निर्माण समिति के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र समेत 11 सदस्य इस बैठक में शामिल होंगे।
टीम एबीएन, लोहरदगा। श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिन पूज्या जया किशोरी जी के कार्यक्रम स्थल व्यास मंच में आगमन होते हीं भक्तों के जयकारों से माहौल भक्तिमय हो गया। राज्यसभा सांसद धीरज प्रसाद साहू ने पूज्या जयाकिशोरी जी को अंगवस्त्र प्रदान कर एवं पगड़ी पहनाकर अभिनन्द किया। साहू परिवार ने ठाकुर जी की पूजा अर्चना और आरती किया। भजन जय जय राधा रमन, हरी बोल, जय जय राधा रमन, हरी बोल, हरी बोल हरी बोल, हरी बोल हरी बोल, हरी बोल हरी बोल, हरी बोल हरी बोल के साथ श्रीमद्भागवत कथा प्रारंभ की गई। भागवत कथा का प्रत्येक प्रसंग मनुष्य के चरित्र और स्वभाव को सुधारता है। जया किशोरी जी ने कथा वाचन करते हुए बतलायी कि कथा श्रवण करने पर श्री कृष्ण के प्रति प्रेम न हो, पाप से घृणा ना जागे, धर्म के प्रति प्रेरित ना हो तो ये समझना कि आपने कथा सुनी ही नहीं। पाप, कर्मों का नाश करती है कथा, प्रेम को बढ़ाती है कथा। पहले हम अपने मन को सुधारें, फिर जगत को सुधारने निकले। अपने चरित्र से यदि अपनी आत्मा को संतोष मिले तभी मानो कि तुम्हारा स्वभाव सुधरा है।भगवान की रासलीला का वर्णन करते हुए उसने कहा कि भगवान की रासलीला भक्त और भगवान का मिलन आत्मा और परमात्मा का मिलन है। इस रासलीला को कामदेव असफल नही कर सका। जिस रासलीला को देखने भगवान शंकर गोपी बनकर के आए हो उस अध्यात्मिकी पराकाष्ठा वाली भगवान की रासलीला का इस भौतिक युग में मजाक उड़ाने वाले हमारी आस्था संस्कृति और देश का मजाक बना रहे है। रासलीला का अर्थ ना जानने वाले मूर्ख है। उसके अर्थ का अनर्थ करने वाले पापी है। परमपिता परमेश्वर ने हजारों सालों से तपस्या करने वाले बड़े-बड़े ऋषियों को वरदान दिया था इस अवतार में वे गोपी बनेगी ओर भगवान के साथ साथ भक्ति, नृत्य अर्थात रासलीला करेंगे। कथा प्रसंग में मथुरा से कृष्ण जी का आमंत्रण, कृष्ण का मथुरा जाना और कुब्जा का उद्धार करना तथा कंस वध करने का वर्णन किया। सांदीपनि आश्रम उज्जैन में शिक्षा अर्जन, वहीं सुदामा से मैत्री का वर्णन करते हुए उसने कहा कि जीवन में दरिद्रता का कारण वही बनता है, किसी के हक को खाना। भगवान के प्रति भक्ति रखने वाले भी छोटे से अपराध का बड़ा दुख प्राप्त करते है तो हम मनुष्य किस गिनती में आते है हमें गोपी की तरह प्रेम, नंद बाबा की तरह दुलार और यशोदा की तरह वात्सल्य रखना होगा। भगवान को किसी भी रूप में मानो परंतु भगवान से प्रेम करो। उद्धव प्रसंग में श्रीकृष्ण ने उद्धव की ज्ञान भक्ति के अंहकार को दूर किया और भगवान कृष्ण के प्रति गोपियों की प्रेम को दिखाया। यही भक्ति अंत में रूक्मणि और श्रीकृष्ण की विवाह प्रसंग का वर्णन करते हुए आपने कहा कि पति तो पति ही होता है, वो पति परमेश्वर तभी बन सकता है जब परमेश्वर जैसा काम करे पत्नी संग सच्ची प्रेम करें। इस दौरान रुक्मणी विवाह की सुंदर सी झांकी प्रस्तुत की गई।जया किशोरी ने कहा श्रीकृष्ण के संग रुक्मिणी विवाह धूमधाम से रचाया गया। इस अवसर पर कथा स्थल में विशेष धुन बजाते गए। पंडाल परिसर में बारात निकली। कथा वाचिका जया किशोरी ने श्रीकृष्ण- रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि महारास में पांच गीत अध्याय हैं। जिसे भागवत के पंच प्राण भी कहते हैं। जो भी ठाकुरजी के इन पांच गीतों को भाव से गाता है, वह भवपार हो जाता है। उन्हें वृंदावन की भक्ति सहज प्राप्त हो जाती है। कथा में भगवान का मथुरा प्रस्थान, कंस का वध, महर्षि संदीपनी के आश्रम में विद्या ग्रहण करना, कालयवन का वध, ऊधो-गोपी संवाद, द्वारका की स्थापना एवं रुक्मिणी विवाह के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। विवाह उत्सव में भगवान कृष्ण की बारात धूमधाम से निकाली। गणेश मंडल के युवाओं ने भगवान कृष्ण की बरात में भजनों पर खूब नृत्य किया। कथा पंडाल में पहुंचकर कृष्ण रुक्मिणी विवाह रचाया गया। श्रीमद्भागवत कथा कार्यक्रम में स्थानीय सांसद सुदर्शन भगत, झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश ठाकुर, मनिका विधायक रामचंद्र सिंह, साहू परिवार से शैफाली साहू, अरुणा साहू, उदय शंकर प्रसाद, धीरज प्रसाद साहू, सरिता साहू, मनु साहू, राहुल साहू, वंदना साहू, दुर्गेश साहु, हर्षित साहू, रुचि साहू, राजश्री साहू, हंसा साहू, सबिता साहु, सौरभ साहु, शेरी मुनी साहू, मिली साहु, रितेश साहू, नवीन गुप्ता, दिनेश साहू, मदन मोहन शर्मा, सचिदा चौधरी, दिल्ली से राजश्री कुमार, अजय महासेठ, शालिनी महासेठ रांची डॉ अनूप साहू, अशोक यादव, सुखैर भगत, राजेन्द्र खत्री, ओमप्रकाश सिंह, मनोज प्रसाद, हनुमान राजगड़िया, संदीप कुमार, अरुण राम, राहुल कुमार, बलवीर देव, कृष्ण मोहन केशरी, कैलाश केशरी, उर्मिला केशरी, सतीश जयसवाल, राकेश सिंह, अनिता पोद्दार गुस्सा में सजा 10,000 से हाथी भागवत प्रेमियों की मौजूदगी और जयकारे ने श्रीमद् भागवत कथा के छठवें को ऐतिहासिक बना दिया।
एबीएन सोशल डेस्क। बिहार की धर्मनगरी गया में विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले की शुरूआत हो गई है। धार्मिक महत्व के कारण गया को श्रद्धालु ‘गया जी’ भी कहते हैं। गया के पितृपक्ष मेले में देश-विदेश से हजारों की संख्या में पिंड दानी अपने पूर्वज का पिंड दान करने गया जी आते हैं और तर्पण के माध्यम से उन्हें तृप्त करते हैं। गया जिसे विष्णु नगरी कहा जाता है वहां के बारे में मान्यता है कि वैदिक परंपरा और हिंदू मान्यताओं के अनुसार पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करने पर उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। गया में इस वर्ष पिंडदान करने आने वाले श्रद्धालु सूखी फल्गू नदी में नहीं बल्कि कल-कल बहती फल्गू के जल से अपने पूर्वजों का तर्पण और आचमन कर सकेंगे। गया में भारत का सबसे बड़ा ‘गया जी’ रबर डैम बनाया गया है। जिसके बाद फल्गू नदी में अब 10 फीट तक पानी है। गुरुवार को सीएम नीतीश कुमार ने इसका उद्गाटन किया। भगवान राम ने भी किया था यहां पिंडदान : कहा जाता है कि भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था। गया में पहले विभिन्न नामों की 360 वेदियां थीं, जहां पिंडदान किया जाता था। इनमें से अब 48 ही बची हैं। इन्हीं वेदियों पर लोग पितरों का तर्पण और पिंडदान करते हैं। पिंडदान के लिए प्रतिवर्ष गया में देश-देश-विदेश से लाखों लोग आते हैं। पितृ पक्ष में पिंडदान पूर्वजों और उनके दिए संस्कारों को याद करने का संकल्प है। इसमें पितरों (पूर्वजों) को तर्पण यानी जलदान और पिंडदान यानी भोजन का दान श्राद्ध कहलाता है। गया पिंडदान के लिए सबसे पवित्र भूमि माना गया है। यहां श्राद्ध व तर्पण से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि मृत्यू के बाद भी भौतिकवादी दुनिया और परिजनों के लगाव की वजह से आत्मा यहीं कहीं रह जाती है इससे आत्मा को कई तरह के कष्ट भोगने पड़ते हैं। तब उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए पिंड दान से कराया जाता है। गयाजी इसके लिए सबसे श्रेष्ठ स्थान है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम और मां सीता ने भी यही राजा दशरथ का पिंडदान किया था।
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