एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दीपावली की पूर्व संध्या यानी नरक चतुर्दशी पर 23 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश में अयोध्या के दीपोत्सव में शामिल होंगे। प्रधानमंत्री शाम करीब पांच बजे भगवान श्री रामलला विराजमान के दर्शन और पूजा करेंगे तथा इसके बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र स्थल का निरीक्षण करेंगे। शाम लगभग 5:45 बजे प्रधानमंत्री प्रतीकात्मक भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक करेंगे और शाम लगभग 6:30 बजे सरयू नदी के न्यू घाट पर आरती देखेंगे। इसके बाद प्रधानमंत्री भव्य दीपोत्सव समारोह की शुरुआत करेंगे। इस वर्ष दीपोत्सव का छठा संस्करण आयोजित किया जा रहा है और यह पहली बार है जब प्रधानमंत्री इस समारोह में व्यक्तिगत रूप से भाग लेंगे। इस अवसर पर 15 लाख से अधिक दीये जलाए जाएंगे। दीपोत्सव के दौरान विभिन्न राज्यों के विभिन्न नृत्य रूपों के साथ पांच एनिमेटेड झांकियां और 11 रामलीला झांकियां भी प्रदर्शित की जायेंगी। श्री मोदी भव्य म्यूजिकल लेजर शो के साथ-साथ सरयू नदी के तट पर राम की पैड़ी में 3-डी होलोग्राफिक प्रोजेक्शन मैपिंग शो भी देखेंगे।
टीम एबीएन, टाटीझरिया (हजारीबाग)। अंतरराष्ट्रीय ब्राह्मण महासंघ के वरिष्ठ सदस्य सह संकट मोचन हनुमान मंदिर पुनाई के मुख्य पुजारी आचार्य गोपाल पांडेय ने कहा कि कार्तिक कृष्णपक्ष अमावस्या मंगलवार 25 अक्टूबर 2022 को भारत में सूर्य ग्रहण का प्रभाव पूर्ण रूप से दिखंगा। ग्रहण काल : स्पर्श- 4:42 से, मध्य- 5:14 से, मोक्ष- 5:22 से। कुल ग्रहण काल- 40 मिनट। सूतक विचार : सूर्य ग्रहण का सूतक स्पर्श से 12 घंटे पूर्व प्रारंभ हो जाता है। अर्थात शाम 4:42 से स्पर्श हैं तो ग्रहण का सूतक प्रात: 4:42 से ही लग जायेगा। सूतक लग जाने पर मंदिर में प्रवेश करना, मूर्ति को स्पर्श करना, किसी प्रकार का धार्मिक अनुष्ठान करना, भोजन करना, यात्रा करना सर्वथा वर्जित होगा। जानें किन राशि नक्षत्रों वाले को नहीं देखना चाहिये सूर्यग्रहण : स्वाती नक्षत्र तुला राशौ ग्रस्तास्त खण्डसूर्य ग्रहणम्! अर्थात स्वाती नक्षत्र, तुला राशि वालों को यह ग्रहण नहीं देखना चाहिए। लक्ष्मी पूजा जहां होती हैं वहां हवन और विसर्जन 26/10/022 को किया जायेगा। गोवर्धन पूजा यथावत 26 को ही किया जायेगा।
टीम एबीएन, रांची। मनुष्य को उसका पाप मारता है। कंस की कथा का अभिप्राय है जो माता-पिता को तड़पाते हैं उनकी अकाल मृत्यु होती है। जो बेटियों को प्रताड़ित करता है उस घर का मुखिया कंस जैसा शक्तिशाली भी क्यों न हो, मारा जाता है। मृत्यु पाता है। रोग, शोक, आधि -व्याधि उस घर में स्थापित हो जाती हैं। कंस के पाप ने उसके ससुराल जरासंध सहित मित्र राष्ट्रों का सर्वनाश करवा दिया। इसलिए हमें धर्म और भक्ति का अनुशरण करना चाहिए। उक्त बातें महिला भक्ति परिषद् रांची यूनिवर्सिटी बरियातू द्वारा आयोजित भागवत कथा के छठे दिन की कथा में पंडित रामदेव पांडेय ने कही। बताते चलें कि कल दो बजे सुदामा चरित की कथा होगी। कल ही कथा का विश्राम होगा। इसके बाद भंडारा का आयोजन तीन बजे से होगा। इस आयोजन को सफल बनाने में राजा दुबे, काली दा, जगदीश पांडेय, संतोष पांडेय, विपिन कुमार सिंह, गायत्री मिश्रा, छवि विश्वकर्मा, मीना चटर्जी, मेघना सिंह, विजया लक्ष्मी, मीरा दुबे, करुणा पांडेय, उपाचार्य मनोज पांडेय, संगीतज्ञ योगेंद्र शुक्ला सहित आसपास के लोगों का भरपूर सहयोग रहा।
एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद के रांची विभाग अंतर्गत 4 जिले क्रमश: रांची महानगर रांची ग्रामीण रामगढ़ एवं खूंटी जिला की बैठक आज दिनांक 19 अक्टूबर, 2022 को पूर्वाहन 11:30 बजे से दो सत्रों में रांची सेवा सदन पथ में स्थित स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर के सभागार में हितचिंतक अभियान की बैठक संपन्न हुई। बैठक में मुख्य वक्ता विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय सहमंत्री एवं विशेष संपर्क केंद्रीय सहप्रमुख अम्बरीष सिंह थे। मुख्य वक्ता अंबरीश सिंह ने कहां संसार में मात्र हिंदू संस्कृति में ही प्रकृति जगत के समस्त जीवो में ईश्वर का वास देखता है, इसलिए पहाड़ों, जंगलों, जीवों को बचाता है, इसलिए यदि प्रकृति को बचाना है तो हिंदुत्व को बचाना आवश्यक है। उन्होंने कहा हिंदू समाज तलवार के चमक एवं पैसों की खनक में पथभ्रष्ट होने वाला नहीं है बल्कि जौहर करने वाले, दीवार में अपने पुत्रों को चुनाकर बलिदान देने वाले पुरखों के वंशज है हिंदू समाज। उन्होंने कहा कि 1969 में उडुपी के संत सम्मेलन में संतों ने कहा था, अस्पृश्यता हमारे शास्त्र सम्मत नहीं है। उन्होंने कहा विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व एवं साधु संतों के मार्गदर्शन में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन, अमरनाथ यात्रा, रामसेतु रक्षा जैसे विषयों में हिंदू समाज को उपलब्धियां प्राप्त हुई है। वहीं आज समाज में जिहाद, धर्मांतरण, घुसपैठ जैसे देशद्रोही गतिविधियों के कारण देश एवं संगठन के लिए चुनौतियां भी है। उन्होंने कहा, विश्व हिंदू परिषद की स्थापना हिंदू जीवन मूल्य, सांस्कृतिक अवधारणाओं पर समाज की श्रद्धा की निरंतरता एवं विश्व के समस्त हिंदुओं के प्रति उत्तरोत्तर विकास की चिंतन को लेकर देश के सभी मत-पंथ के पूज्य साधु-संतों के गरिमामई उपस्थिति में 1964 की गई थी। उन्होंने कहा, कभी दिल्ली में बैठे विधर्मी शासकों द्वारा अयोध्या में भगवान पुरुषोत्तम श्रीराम, मथुरा में श्री कृष्ण, काशी में बाबा विश्वनाथ, गुजरात में सोमनाथ का मंदिर सहित लगभग 30 हजार मंदिरों को क्षति पहुंचाकर भारतीय सांस्कृतिक अवधरणाओं को नष्ट कर हिंदू के आने वाली पीढ़ियों को आस्था से विमुक्त करने की कुचेष्टा की गई थी,आज उसी दिल्ली के शासक ने मंदिरों का निर्माण एवं मंदिरों का कायाकल्प कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करके हिंदुत्व विचारधारा को संसार के पटल में पहुंचा रहा है। उन्होंने कहा 1528 ई में भगवान पुरुषोत्तम श्री राम के मंदिर को विधमीर्यों के द्वारा ढांचा निर्माण करने का दुस्साहस किया था। इसके लिए हमें 76 संघर्ष करना पड़ा, समाज के पौने चार लाख लोगों को अपने बलिदान देने पड़े। आज हमारा संघर्ष का उत्कर्ष काल चल रहा है, हम अपनी आंखों से भव्य श्रीराम का मंदिर देखने वाले हैं। उन्होंने कहा जिस नारी, मंदिर, वेद, संस्कृत, गौ, आस्था, विश्वास, तीर्थ, तीथंर्यात्रा की रक्षा के लिए भगवान स्वयं समय-समय पर अवतरित होते रहें हैं। आज हमें धर्मयोद्धा के रूप में सत्संग एवं मिलन केंद्र के माध्यम से हिंदू में एक नई चेतना जगाकर गोरक्षा, हिंदू कन्या रक्षा सहित अपनी सांस्कृतिक एवं धार्मिक मानबिंदुओं को सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखने का संकल्प लेकर समाज में ईश्वरीय काम करने में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता गौरवान्वित महसूस करते हैं। उन्होंने कहा वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए विश्व हिंदू परिषद अपने हितचिंतक अभियान के माध्यम से हिंदू समाज को सशक्त, संगठित एवं स्वावलंबी बनाएगी। उन्होंने कहा जन्म के आधार पर कोई व्यक्ति छोटा या बड़ा, पावन या अपवित्र नहीं होता है। सभी जाति, पंथ, भाषा, नगरवासी, वनवासी, गिरीवासीवाद से ऊपर उठकर समरस समाज खड़ा करना ही विश्व हिंदू परिषद का लक्ष्य है। उन्होंने कहा भारत माता की जय बोलने वाले सभी भारतीय समाज हिंदू है, सभी आपस में सहोदर भाई है। खान-पान, रहन-सहन, भाषा अलग होते हुए भी सभी भारत माता के सुपुत्र हैं। इसकी झलक हमें वैष्णो देवी यात्रा, अमरनाथ यात्रा, सावन की कांवड़ यात्रा, कुंभ मेला में अनायास हिंदू समूह में दिखती है परंतु हमें इस हिंदू समूह को अपने घर, मोहल्ला, गांव एवं समाज में दिखे ऐसा कार्य करना है। उन्होंने कहा भारत वर्ष वीरों, पराकर्मियों, साधु-संतों, मठ-मंदिरों, ऋषि- मुनियों का देश है, इस देश को मजारों का देश नहीं बनने देंगे। क्षेत्र संगठनमंत्री आनंद कुमार ने कहा प्रत्येक इकाई में संगठन की समिति, प्रत्येक समिति का सत्संग एवं सेवा केंद्र से समाज में एक नई जागरण होगी। समाज के जागरण से ही सामाजिक कुरीतियां दूर हो सकती हैं। उन्होंने कहा संगठन के विस्तार से ही समाज में परिवर्तन संभव है। आज हिंदू के विरोध में कोई बोलने का साहस नहीं करें, ऐसा सशक्त संगठन खड़ा करना भी विश्व हिंदू परिषद का उद्देश्य है। उन्होंने कहा भारतीय सांस्कृतिक एवं धार्मिक अवधारणाओं की सुरक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री डॉ वीरेंद्र साहू ने कहा 30 अक्टूबर एवं 2 नवंबर को हुतात्मा दिवस के अवसर पर सभी जिला केंद्रों में रक्तदान शिविर तथा 6 नवंबर से 20 नवंबर तक हितचिंतक अभियान झारखण्ड प्रांत के सभी गांवों में चलाया जायेगा। उन्होंने कहा झारखंड के 31 हजार गांवों में 5 लाख हितचिंतक बनाए जाएंगे। हमें अपने लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए सभी गांवों की समिति बनानी होगी तथा समय दानी कार्यकर्ता निकलना होगा। डॉ साहू ने कहा 1 दिसंबर से 10 दिसंबर तक शौर्य दिवस पर शौर्य संचलन/यात्रा, 23 दिसंबर को धर्म रक्षा दिवस तथा 15 जनवरी 2023 को समरसता दिवस के रूप में पूरे प्रांत में कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे। उन्होंने कहा, भारतवर्ष को परमवैभवशाली एवं विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठापित करने के लिए हिंदुत्व जागरण एवं हिंदुत्व चिंतन आवश्यक है। हितचिंतक अभियान को सफल बनाने के लिए अभियान जिला संयोजक एवं सहसंयोजकों की घोषणा की गई, जिसमें रांची महानगर के लिए नागेंद्र शुक्ला को संयोजक एवं दीपक साहू व रोहित राज पांडे को सहसंयोजक, रांची ग्रामीण के लिए सुशील पांडेय को संयोजक एवं रोशन चौधरी व विनोद विश्वकर्मा को सहसंयोजक तथा रामगढ़ जिले के लिए छोटू वर्मा को संयोजक एवं अशोक कुमार, अनामिका श्रीवास्तव, व गणेश कुमार सहसंयोजक घोषित किये गये। बैठक में विश्व हिंदू परिषद के प्रांत कार्याध्यक्ष तिलक राज मंगलम उपाध्यक्ष गंगा प्रसाद यादव सुभाष नेत्र गांवकर, प्रांत संगठन मंत्री देवी सिंह, सहमंत्री मनोज पोद्दार, सहमंत्री रंगनाथ महतो सामाजिक समरसता प्रांत प्रमुख मिथिलेश्वर मिश्र, रांची विभाग मंत्री किशुन झा, विभाग सहमंत्री विकास सिंह, विभाग संगठन मंत्री गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रचार प्रसार विभाग प्रमुख अमर प्रसाद, बजरंग दल विभाग सहसंयोजक छोटू वर्मा, रांची महानगर अध्यक्ष कैलाश केसरी, रांची ग्रामीण अध्यक्ष रामेश्वर दयाल, रांची महानगर मंत्री चंद्रदीप दुबे, बजरंग दल महानगर संयोजक प्रकाश रंजन, महानगर सह मंत्री विश्वरंजन कुमार, रांची ग्रामीण मंत्री रोबिन कुमार, रामगढ़ जिला बजरंग दल संयोजक भागीरथ पोद्दार, दुर्गा वाहिनी मातृशक्ति प्रांत प्रमुख दीपा रानी कुंज, धर्म प्रसार परियोजना सहप्रमुख रेनू अग्रवाल, श्वेता सिंह, अनामिका श्रीवास्तव, चंदा कुमारी, नागेंद्र शुक्ला, संतोष सिंह, सुशील पांडे, गुलाब सिंह, प्रवीण सिंह राणा, महानगर उपाध्यक्ष गोपाल पारीक सहित सभी जिला एवं प्रखंड व पंचायत के पदाधिकारी गण उपस्थित थे। उक्त जानकारी रांची विभाग झारखंड के विभाग मंत्री किशुन झा ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
टीम एबीएन, रांची। कृष्ण के जन्म के समय जो राजनीतिक, सामाजिक और पारिस्थितिक स्थिति थी, आज भी वैसी ही स्थिति से हमारा देश गुजर रहा है। महाभारत के सभी राष्ट्र द्वारिका और मथुरा को पाने के लिए लालायित थे। मथुरा में पिता, बहन और जीजा को बंदी बनाने वाला कंस, राजगीर में हजारों राजाओं को बंदी बनाने वाला जरासंध, सोलह हजार युवतियों को कैद रखने वाला भोमासुर गोहाटी में शासक था। नागपुर में शिशुपाल, हिमाचल में मानव खाने वाला राक्षस हिडिंब था। दुर्योधन अपने भाइयों को कभी लाक्षागृह में जलाने की योजना बनाता, तो कभी अज्ञातवास भेजता। राजदरबार में स्त्री हिंसा की पीड़िता द्रौपदी थी। ऐसे स्थिति में कृष्ण ने जन्म लेकर भारत की दुर्दशा से आहत हुए और राजनीति और कूटनीति से धर्म से पुष्ट महाभारत बनाने के लिए हस्तिनापुर को केंद्र बनाकर योद्धाओं को साथ लिया और कुरुक्षेत्र में लड़ाई लड़ी थी। इसी जगह पर पलासी का युद्ध भी हुआ। यह भी संयोग है कृष्ण ने भारत में धर्म की स्थापना की। यह संदेश दिया कि धर्म ही सर्वोपरि है। भले ही कुल का नाश हो जाये। अधर्मी संतान को संरक्षण नहीं देना चाहिए। उक्त बातें भागवत कथा मर्मज्ञ पंडित रामदेव पांडेय ने कही। बताते चलें कि इस कथा का आयोजन महिला भक्ति परिषद् रांची यूनिवर्सिटी कॉलोनी बरियातू के राम मंदिर में हो रहा है। गुरुवार को रूक्मिणी कृष्ण विवाह का प्रसंग होगा।
एबीएन सोशल डेस्क। काला सोना अर्थात काली हल्दी! बुंदेलखंड के खेतों में काले सोने की फसल लहलहा रही है। एमपी के सागर, टीकमगढ़ व यूपी के झांसी, महोबा में किसान ब्लैक गोल्ड कहलाने वाली काली हल्दी की खेती से लखपति बन रहे हैं। बता दें कि काली हल्दी की खेती मूलतः ठंडे प्रदेश और हिमालय के पहाड़ी इलाकों में होती है, लेकिन सागर में मल्टीलेयर फॉर्मिंग से पहचाने जाने वाले युवा किसान आकाश चौरसिया ने सागर सहित बुंदेलखंड में काली हल्दी की खेती शुरु की है। वे काली हल्दी के अलावा सफेद और पीली हल्दी की खेती भी कर रहे हैं। काली हल्दी का उपयोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारी सहित दर्जनों अन्य बीमारियों के इलाज में होता है। आकाश परंपरागत खेती के साथ जैविक खेती, मल्टीलेयर फॉर्मिंग, विष रहित और गो-आधारित खेती के एक्सपर्ट के रूप में पहचाने जाते हैं। काली हल्दी शायद ही आपने देखी हो, हल्दी सामान्यतः पीली होती है। बुंदेलखंड के सागर में मल्टीलेयर फॉर्मिंग करने वाले युवा किसान आकाश चौरसिया अपने खेतों में तीनों प्रकार की हल्दी की फसल लगाये हुए हैं। वे बीते दो साल में 5 एकड़ खेत से 20 लाख रुपए से अधिक की हल्दी बेच चुके हैं। वे पूरे मप्र और यूपी के बुंदेलखंड में किसानों को हल्दी की खेती भी सिखा रहे हैं। परंपरागत खेती की अपेक्षा काली, सफेद और पीली हल्दी की फसल ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही हैं। इसमें देखरेख कम लगती है और मुनाफा ज्यादा होता है। आकाश बताते हैं कि उन्होंने चार साल पहले पीली हल्दी की फसल लगायी थी। इसमें खासा मुनाफा हुआ तो उन्होंने रकबा बढ़ाकर दो गुना कर दिया। अन्य किसानों को भी हल्दी की खेती के लिए प्रेरित किया है। उन्होंने सागर के आसपास के इलाके सहित टीकमगढ़ यूपी के झांसी और महोबा के ऐसे किसान जो जैविक खेती को अपना रहे हैं, उनको हल्दी के खेती के लिए प्रेरित किया है। बुंदेलखंड के कई किसान अब काली और पीली हल्दी की खेती कर रहे हैं। उनको बेहतर क्वालिटी का बीज भी उपलब्ध कराया है। काली हल्दी को औषधि के रूप में उपयोग में लिया जाता है। जबकि पीली हल्दी को भोजन में स्वाद, रंग बढ़ाने व एंटीबायोटिक के रुप में उपयोग किया जाता है। सफेद हल्दी के पाउडर को मेडिसिन के रुप में उपयोग किया जाता है। काली हल्दी गीली स्वरुप में एक हजार से डेढ़ हजार रुपये किलो तक बिकती है, जबकि इसका पाउडर 3 से 4 हजार रुपये प्रति किलो तक बिकता है। सफेद हल्दी के भी अच्छे रेट मिलते हैं जबकि पीली हल्दी गीली में 40 रुपये प्रति किलो बिकती है। इसका पाउडर 300 से 400 रुपये तक में बिकता है। काली हल्दी का तेल भी बनाया जाता है। इसकी बाकायदा एक पूरी प्रक्रिया होती है। इसमें हल्दी के पौधे के पत्तों का भी उपयोग किय जाता है। हल्दी पाउडर और हल्दी का तेल इंसान के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का काम करते हैं। हल्दी का तेल काफी ऊंचे दामों पर बिकता है। हालांकि सागर के स्थानीय बाजार में हल्दी के तेल की खपत नहीं है। इसके लिए सागर और प्रदेश के बाहर के बाजार में बेचना होता है।
एबीएन सोशल डेस्क। दिवाली से दो दिन पहले यानी कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला अत्यंत लोकप्रिय त्योहार धनतेरस धन-धान्य ही नहीं, बल्कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य जगत की भी समृद्ध विरासत का प्रतीक है। दरअसल, यही वह दिन है, जब समुद्र मंथन के दौरान ब्रह्मांड के प्रथम चिकित्सा-विज्ञानी भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इससे पूर्व आश्विन मास की पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय का प्राकट्य समुद्र से हुआ था, जबकि धनतेरस या धनत्रयोदशी के बाद कार्तिक चतुर्दशी को माता काली एवं अमावस्या अर्थात दिवाली को माता लक्ष्मी का अवतरण हुआ था। समुद्र मंथन के दौरान चतुर्भुजधारी भगवान धन्वंतरि एक हाथ में आयुर्वेद शास्त्र, दूसरे में वनस्पति यानी औषधि, तीसरे में शंख, और चौथे हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उनके हाथों में अमृत कलश देखते ही देवता और दानव उसे पान करने हेतु लालायित हुए थे। कहते हैं कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने के बाद भगवान शिव को भगवान धन्वंतरि ने ही अमृत प्रदान किया था, जिसकी की कुछ बूंदें छलक कर काशी नगरी में भी गिर गयी थीं। इसीलिए माना जाता है कि काशी कभी नहीं नष्ट होने वाली कालजयी नगरी बन गयी। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार भगवान धन्वंतरि की छवि अत्यंत मोहक थी। उनका शरीर बादलों-सा प्रदीप्त था। उनके नेत्र कमल के समान सुंदर थे। उनका वक्ष सख्त एवं विशाल था और उनके हाथ लम्बे थे। वे कानों में मगरमच्छ जैसी आकृति वाले कुंडल पहने रहते थे। गले में अनेक प्रकार के रत्नाभूषणों एवं विभिन्न जड़ी-बूटियों से गुंफित वनमाला तथा शरीर पर पीताम्बर धारण करने वाले भगवान धन्वंतरि चिर युवा प्रतीत होते थे। कहते हैं कि इतने भव्य एवं दिव्य रूप वाले भगवान धन्वंतरि को पहली बार देखकर देवता और दानव दोनों आश्चर्य-चकित हुए थे। ग्रंथों में उल्लेखित है कि भगवान धन्वंतरि ने प्रकट होते ही आयुर्वेद का परिचय कराया था। शायद यही कारण है कि देवी-देवताओं के वैद्य भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का प्रवर्तक माना जाता है। हालांकि आयुर्वेद के संबंध में स्थापित सत्य यह है कि सर्वप्रथम ब्रह्मा जी ने एक लाख श्लोकों वाले आयुर्वेद शास्त्र की रचना की। इसीलिए इसका एक नाम ब्रह्म-संहिता भी है। ब्रह्मा जी से आयुर्वेद विद्या का ज्ञान अश्विनी कुमारों ने सीखा और बाद में अश्विनी कुमारों ने इसे देवराज इंद्र को सिखाया। कालांतर में देवराज इंद्र ने भगवान धन्वंतरि को इस विद्या में कुशल बनाया। एक पौराणिक कथानुसार भूलोक में प्राणियों को बीमारियों से पीड़ित एवं मृत्यु का शिकार होते देख भगवान विष्णु को दया आ गयी। तत्पश्चात उन्होंने विशुद्ध नामक ऋषि-पुत्र के रूप में अवतार लिया। चूंकि वे पृथ्वी पर चर की भांति छिपकर आये थे, इसलिए वे चरक कहलाये। उन्होंने बाद में ऋषि-मुनियों द्वारा रचित विविध संहिताओं को परिमार्जित करके चरक संहिता की रचना की। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवराज इंद्र ने भूलोक पर देखा कि बड़ी संख्या में लोग रोगग्रस्त हो रहे हैं। उसके बाद उनकी प्रेरणा से भगवान धन्वंतरि ने काशी के राजा दिवोदास के रूप में अवतार लिया। कालांतर में अपने पिता विश्वामित्र की आज्ञा से महर्षि सुश्रुत अपने साथ एक सौ ऋषि-पुत्रों को लेकर काशी पहुंचे और राजा दिवोदास, जिन्हें काशीराज भी कहा जाता था, से आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण की। बाद में उन ऋषि-मुनियों ने लोक-कल्याणार्थ अपनी-अपनी संहिताओं एवं ग्रंथों की रचना की। महर्षि सुश्रुत द्वारा रचित संहिता का नाम सुश्रुत-संहिता है, जो आयुर्वेद का एक प्रामाणिक ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त उन ऋषि-मुनियों ने सभी पृथ्वी वासियों के रोग-निवारणार्थ उपचार की अनेक चिकित्सकीय पद्धतियां भी विकसित कीं। यही वह कालखंड था, जब महान वैद्य एवं चिकित्सा-विज्ञानी वाग्भट्ट जी ने भी काशीराज यानी भगवान धन्वंतरि से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया। बाद में उन्होंने आष्टांग हृदय नामक ग्रंथ की रचना की, जो आयुर्वेद का एक मानक ग्रंथ है। आयुर्वेद के इन तमाम ग्रंथों में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों एवं वृक्षों इत्यादि की चिकित्सकीय पद्धतियों का भी वर्णन है। उल्लेखनीय है कि काशी के राजा दिवोदास ने काशी में विश्व का पहला शल्य चिकित्सा विद्यालय स्थापित किया और आचार्य सुश्रुत को इसका प्रधानाचार्य नियुक्त किया था। इस प्रकार भगवान धन्वंतरि के माध्यम से ब्रह्मा जी द्वारा प्रदत्त आयुर्वेद के अद्भुत एवं अत्यंत महत्वपूर्ण ज्ञान का पृथ्वी पर प्रचार-प्रसार हुआ।
एबीएन सोशल डेस्क। हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि पर दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। दीपावली के दिन प्रदोष काल में महालक्ष्मी पूजन का विधान होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दीपावली पर मां लक्ष्मी प्रगट हुईं थीं और कार्तिक अमावस्या तिथि पर मां लक्ष्मी पृथ्वीलोक पर भ्रमण करने आती हैं। दिवाली के दिन घरों को दीयों से सजाया जाता है। दीपावली का त्योहार अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होता है। दिवाली की रात को विशेष रूप से मां लक्ष्मी की पूजा होती है। दीपावली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा में सभी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन दिवाली के खास मौके पर कुछ खास चीजें ऐसी भी होती हैं जिसे पूजन में जरूर शामिल किया जाना चाहिए। मान्यता है कि इससे मां लक्ष्मी जल्द प्रसन्न होती हैं। शास्त्रों के अनुसार मां लक्ष्मी सुख-समृद्धि, धन-दौलत और ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी हैं। मां लक्ष्मी के प्रसन्न होने पर व्यक्ति धनवान और समृद्धिशाली हो जाता है और जीवन से धन की कमी हमेशा के लिए दूर हो जाती है। मां लक्ष्मी की पूजा में उनके चरण चिन्ह की पूजा होती है। ऐसे में दिवाली पर देवी लक्ष्मी की पूजा में सोने-चांदी या धातु से बने चरण चिन्ह जरूर रखना चाहिए। अगर सोने-चांदी से बने चरण चिन्ह न रख सकें तो कागज पर बने चरण चिन्ह की जरूर पूजा करनी चाहिए। दक्षिणावर्ती शंख : मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा में शंख का विशेष महत्व होता है। बिना शंख के माता लक्ष्मी की पूजा अधूरी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दिवाली पर माता लक्ष्मी की पूजा में दक्षिणवर्ती शंख की पूजा से सुख-समृद्धि आती है। माता लक्ष्मी और दक्षिणवर्ती शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी इस कारण से दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी जी का भाई माना जाता है। ऐसे में दिवाली पर लक्ष्मी पूजा में दक्षिणावर्ती शंख भी जरूर रखें। श्रीयंत्र : मां लक्ष्मी की पूजा-आराधना श्रीयंत्र के बिना अधूरी होती है। इसलिए दिवाली पर मां लक्ष्मी की पूजा में श्रीयंत्र को जरूर शामिल करें। खीर : दिवाली पर मां लक्ष्मी को भोग में खीर भी शामिल करें। खीर मां लक्ष्मी का प्रिय भोजन है। ऐसे में दिवाली पर मिठाई के अलावा घर पर मेवे से बनी खीर जरूर चढ़ाएं। तोरण/ वंदनवार : ऐसी मान्यता है कि मां लक्ष्मी उन्हीं घरों में अपने अंश रूप में विराजमान होती हैं जहां पर साफ-सफाई सबसे ज्यादा होती है। दिवाली पर मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए घर के मुख्य द्वार पर आम,पीपल और अशोक के नए कोमल पत्तों की माला पिरोकर वंदनवार लगाएं। मुख्यद्वार पर वंदनवार लगाने से मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न होती हैं। कौड़ी : पीली कौड़ियों को धन और माता लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। दिवाली पर पीली कौड़ियों को मां लक्ष्मी की पूजा के दौरान जरूर शामिल करना चाहिए। पूजा के बाद इन कौड़ियों को तिजोरी में रखा जाता है। पान : हिंदू धर्म में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान में पान को जरूर शामिल किया जाता है। दिवाली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा में पान के पत्ते के ऊपर स्वस्तिक का निशान बनाएं। गन्ना : मां लक्ष्मी की सवारी ऐरावत हाथी है इसलिए मां लक्ष्मी को गजलक्ष्मी भी कहा जाता है। ऐरावत हाथी को गन्ना खाना बहुत ही प्रिय होता है। इसलिए मां लक्ष्मी की पूजा में गन्ने को जरूर शामिल करें। धनिया के बीज : बहुत से लोग धनिया के बीज खरीदकर घर में रखते हैं। इसे सौभाग्य व सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता है।दीपावली पर लक्ष्मी पूजा की थाली में इसे रखते हैं। कमल का फूल : माता लक्ष्मी हमेशा कमल के फूल पर विराजमान होती हैं और उन्हें कमल का फूल बहुत ही प्रिय होता है। इसलिए दिवाली के दिन मां लक्ष्मी की पूजा में कमल के फूल को जरूर शामिल करना चाहिए।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse