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Published / 2024-08-21 20:31:14
माहेश्वरी समाज के लिए खास कजली तीज 22 अगस्त को

एबीएन सोशल डेस्क। हिंदी कैलेंडर के अनुसार भादो तृतीय कजली / सातूड़ी तीज माहेश्वरी समाज के लिए खास त्यौहार हरियाली तीज से सुहागन महिला एवं कुवारी लड़कियां हाथो में मेहंदी रचा, झूला सजा, तीज के गीत, डांस के साथ शुरू करती है सिंधारा का प्रोग्राम। 

गेहूं आटा, बेसन, चावल आटा, मैदा से बनाकर ड्राई फ्रूट्स से सजा कर घर में ही मिठाई बनायी जाती है, जिससे सत्तू या पिंडा कहा जाता है। तीज के पहले दिन नवविवाहित के लिए पहली तीज स्पेशल होती है। इस दिन पीहर ससुराल से गिफ्ट्स मिलते हैं। 

तीज को दिन भर उपवास कर शाम को महिलाएं सोलह श्रृंगार कर एकत्रित होकर नीमरी माता जो कि मिट्टी की पाल बनाकर नीम की डाली लगाकर बनायी जाती है। पूजा कर सुहागन पति की लंबी आयु, घर परिवार की सलामती और कुमारी लड़कियां अच्छे घर वर की कामना कर चंद्रमा को अर्घ्य देकर सिर्फ फ्रूट्स और मिठाई वाली सत्तू प्रसाद रूप ग्रहण करती है। उक्त जानकारी मीडिया प्रभारी रश्मि कोठारी मालपानी ने दी।

Published / 2024-08-20 18:26:42
श्रावण पूर्णिमा को हुई एडब्लूजीपी विश्वस्तरीय महिला मंडल की सामूहिक चांद्रायाण मास पारायण साधना की महापूणार्हूति

एबीएन सोशल डेस्क। गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर प्रारंभ हुई गायत्री परिवार के संकल्पित साधक-शिष्यों की विश्वस्तरीय चंद्रायाण व्रत उपवास साधना जो 19 जुलाई (गुरु-पूर्णिमा) से शुभारंभ होकर 19 अगस्त को श्रावणी पूर्णिमा को संपन्न होनी थी, वह श्रावण पूर्णिमा को संपन्न हुई। 

साधना का मुख्य लक्ष्य ऊर्जा में आकर्षण, मनोबल, आत्मबल प्रदान करने वाले चंद्रमा का ध्यान, वरिष्ठ परिजनों के साथ छोटे-छोटे बच्चों के द्वारा भी किया जाना रहा। साधक सामूहिक जप, गायत्री मंत्र-लेखन भी रहा। विश्वस्तरीय सामूहिक अनुष्ठान में सभी ने प्रतिदिन गृहे गृहे व शक्तिपीठों में सामूहिक साधना, स्वाध्याय साधना, चंद्र ध्यान साधना की थी।

देश विदेश से जुड़े सभी वरिष्ठ भी साधक-साधिका एवं नन्हें मुन्ने साधक परिजनों ने सामूहिक साधना से उत्पन्न ऊर्जा शक्ति को गुरुसत्ता के चरणों में नवयुग सृजन हेतु एवं विश्वकल्याण हेतु समर्पित किया। सोमवार सावन पूर्णिमा को इस उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनात्मक चंद्रायण जप-अनुष्ठान अभियान की महापूणार्हुति ब्रह्मा विष्णु महेश एवं चन्द्रदेव सहित सर्वदेवों की विधिवत वैदिक विधान से विस्तृत रूप से संपन्न हुई। 

इस अवसर पर शांतिकुंज से आदरणीया शैल जीजी के प्राप्त शुभकामना व बधाई संदेश को यज्ञाचार्य ने बताया। व्रतधारियों ने इस अवसर पर देवकन्या पूजन-अर्चन, नमन-वंदन व अभिनंदन सहित भोजन प्रसाद ग्रहण कराया। 

फिर रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहनों ने रक्षासूत्र बंधाकर सोल्लास संपन्न किया और सबके लिए स्वस्थ-सुखद, आनंदमय मंगलमय वातारणपूर्ण जीवन के स्वस्तिवाचन पाठ किये। इसके अतिरिक्त इस अवसर पर मासिक पूर्णिमा पर अखंड जप-अनुष्ठान करने वाले समूह भी 24 घंटे के आनलाइन जप-अनुष्ठान में शामिल हैं। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने दी।

Published / 2024-08-18 23:22:15
जानें रक्षाबंधन का इतिहास, क्यों बांधी जाती है राखी...

राजकुमारी पाण्डेय

एबीएन सोशल डेस्क। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार श्रावण माह की पूर्णिमा को रक्षा बंधन या कहें कि राखी का त्योहार मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस बार यह पर्व 19 अगस्त 2024 सोमवार को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं इस त्योहार को मनाए जाने की पौराणिक मान्यताएं।

भविष्य पुराण में कहीं पर लिखा है कि सबसे पहले इंद्र की पत्नी शचि ने वृत्तसुर से युद्ध में इंद्र की रक्षा के लिए रक्षा सूत्र बांधा था। इसलिए जब भी कोई युद्ध में जाता है तो उसकी कलाई पर कलाया, मौली या रक्षा सूत्र बांधकर उसकी पूजा की जाती है। देवी लक्ष्मी ने राजा बलि को अपना भाई बनाकर हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था और अपने बंधक पति श्रीहरि विष्णु को अपने साथ ले गई थी। हमें स्कंद पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में मिलती है। 

क्या है कथा

कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने अदिति के गर्भ से वामन अवतार लिया और ब्राह्मण के वेश में असुरराज राजा बली के द्वार भिक्षा मांगने पहुंच गए। चूंकि राजा बली महान दानवीर थे तो उन्होंने वचन दे दिया कि आप जो भी मांगोगे मैं वह दूंगा। भगवान ने बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि  मांग ली। बली ने तत्काल हां कर दी, क्योंकि तीन पग ही भूमि तो देना था। लेकिन तब भगवान वामन ने अपना विशालरूप प्रकट किया और दो पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नाप लिये। फिर पूछा कि राजन अब बताइये कि तीसरा पग कहां रखूं? 

तब विष्णुभक्त राजा बली ने कहा, भगवान आप मेरे सिर पर रख लीजिए और फिर भगवान ने राजा बली को रसातल का राजा बनाकर अजर-अमर होने का वरदान दे दिये। लेकिन बली ने इस वरदान के साथ ही अपनी भक्ति के बल पर भगवान से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन भी ले लिये। भगवान को वामनावतार के बाद पुन: लक्ष्मी के पास जाना था लेकिन भगवान ये वचन देकर फंस गयें और वे वहीं रसातल में बली की सेवा में रहने लगे। उधर, इस बात से माता लक्ष्मी चिंतित हो गई। ऐसे में नारदजी ने लक्ष्मीजी को एक उपाय बताया। 

तब लक्ष्मीजी ने राजा बलि के पास जाकर राजा बली को राखी बांध अपना भाई बनाई और अपने पति को अपने साथ ले आई। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। तभी से यह रक्षा बंधन का त्योहार प्रचलन में हैं।
माना जाता है कि राजसूय यज्ञ के समय जब श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध कर दिया था तो तब उनकी अंगुली से खून बहने लगा था। इसे देखकर द्रौपदी ने तुरंत ही अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी अंगुली पर बांध दी थी। 

इस कर्म के बदले श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को आशीर्वाद देकर कहा था कि एक दिन मैं अवश्य तुम्हारी साड़ी की कीमत अदा करूंगा। इन कर्मों की वजह से श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के चीरहरण के समय उनकी साड़ी को इस पुण्य के बदले ब्याज सहित इतना बढ़ाकर लौटा दिया और उनकी लाज बच गई। कहते हैं कि इसी के बाद रक्षा बंधन पर बहन द्वारा राखी बांधने की परंपरा की शुरुआत हुई थी।

क्या है दूसरी कहानी

दूसरी कहानी यह है कि जब महाभारत का युद्ध शुरू हो रहा था, तब युधिष्ठिर कौरवों से युद्ध करने जा रहे थे। इस दौरान उन्हें सिर्फ यही चिंता थी कि युद्ध को कैसे जीता जाए? इस बात का निवारण जब भगवान श्री कृष्ण से पूछा गया तो उन्होंने सभी सैनिकों के हाथों में रक्षा सूत्र बंधवाने को कहा। श्रीकृष्ण के कहते ही सभी सैनिकों के हाथ में रक्षासूत्र बांध दिए गए और महाभारत में उनको जीत हासिल हुई। इसलिए भी रक्षा बंधन पर बांधे जाने वाले रक्षा सूत्र का काफी ज्यादा महत्व माना गया है।

Published / 2024-08-18 22:03:00
तेरापंथ युवक परिषद रांची ने दो जगह लगाया रक्तदान शिविर, 117 यूनिट रक्त संग्रह

एबीएन सोशल डेस्क। अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद  के निर्देशन में मेगा ब्लड डोनेशन ड्राइव के अंतर्गत तेरापंथ युवक परिषद रांची के द्वारा मोशन क्लासेस, आईआईएम राँची में रक्तदान शिविर लगाया गया। जिसमें सदर अस्पताल ब्लड बैंक और हेल्थ पॉईंट ब्लड बैंक का सहयोग रहा। 

दोनों जगह कुल मिलाकर 141 इच्छुक  लोगों ने अपना रेजिस्ट्रेशन करवाया जिसमे से मोशन क्लासेस में 29 यूनिट तथा आईआईएम राँची में 88 यूनिट रक्त संग्रहित किया गया। शिविर को अपने संस्थान में लगाने में  मोशन क्लासेस, के निदेशक कृष्णा अग्रवाल, आईआईएम रांची के निदेशक दीपक श्रीवास्तव का महत्वपूर्ण सहयोग रहा।

तेरापंथ युवक परिषद के  द्वारा हर वर्ष एमएमबीडी के तहत रक्तदान शिविर विभिन्न जगह पर, संस्थानों के सहयोग से एवं ब्लड बैंक के सहयोग से लगाया जाता हैं! अभी तक 2 शिविर लगाए गए है, ओर भी शिविर लगायें जाएंगे। तेयुप राँची को ब्लड बैंक के द्वारा मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया। 

तेरापंथ युवक परिषद रांची के अध्यक्ष अमित बैंगानी ने बताया कि ओर भी शिविर लगाने हेतु संस्थानों के साथ बात चल रही है, शीघ्र ही आने वाले दिनों में 4-5 शिविर ओर लगायें जाएंगे। दोनों जगह के शिविर का मुख्य प्रबंधन विशाल दस्सानी के द्वारा किया गया। 

शिविर के संयोजन में तेयुप अध्यक्ष अमित बैंगानी, मंत्री आकाश बेंगानी, कोषाध्यक्ष विवेक बैंगानी, ललित सेठिया, अरिहंत सिंघवी, पंकज बोहरा, विकाश नाहटा, अमन सेठिया, मंयक कोठारी , महिला मंडल मंत्री पूजा नाहटा, नेहा बैंगानी, रिद्धि बांठिया, प्रिया कोठारी आदि ने सहयोग दिया।

Published / 2024-08-18 22:02:05
सर्वेश्वरी वृक्षारोपण अभियान - वर्ष 2024 के पाँचवें चरण में 436 पौधौं का रोपण सह वितरण

टीम एबीएन, रांची। रविवार को श्री सर्वेश्वरी समूह - शाखा राँची (औघड़ भगवान राम आश्रम, अघोर पथ, लेक रोड पश्चिम, राँची) के द्वारा सर्वेश्वरी वृक्षारोपण अभियान : वर्ष - 2024 का पाँचवें चरण का आयोजन ग्राम - दुबलिया, प्रखण्ड - कांके,  जिला - रांची में किया गया जिसमें 436 पौधों का रोपण सह वितरण किया गया। 

ग्राम - दुबलिया के अखड़ा मैदान में ग्रामीण बंधुओं के बीच एक लघु गोष्ठी कर श्री सर्वेश्वरी समूह का संक्षिप्त परिचय दिया गया तथा समूह द्वारा किये जा रहे जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के बारे में भी ग्रामीण बंधुओं को अवगत कराया गया।  साथ ही वृक्षों के कमी से हो रहे दुष्परिणामों के बारे में अवगत करते हुए वृक्षों के बचाव के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया गया।  

गोष्ठी के बाद ग्रामीण बंधुओं के बीच आम, अमरूद, मोहगनी, सागवान, अर्जुन, सीसम, मौलसरी, दालचीनी इत्यादि के 400 पौधों का वितरण किया गया। इसके उपरान्त स्थानीय ग्रामीण बंधु श्री अजय कुजूर एवं अन्य ग्रामीण बंधुओं के बागान में लगभग 36 पौधों का रोपण भी किया गया। 

ज्ञात हो कि अभी तक सर्वेश्वरी वृक्षारोपण अभियान - वर्ष 2024 के अंतर्गत पांच चरणों में लगभग 1416 पौधों का वित्रण एवं रोपण किया जा चुका है। यह वृक्षारोपण अभियान पूरे वर्षा ऋतु में चलाया जाएगा। कार्यक्रम में दुबलिया ग्राम से ग्राम प्रधान सतीश तिग्गा, संदीप उरांव एवं अजय कुजूर शामिल हुए एवं सहयोग किया। समस्त कार्यक्रम के आयोजन में आशुतोष नाथ शाहदेव ने विशेष एवं सराहनीय सहयोग प्रदान किया। 

श्री सर्वेश्वरी समूह - शाखा रांची की ओर से नवल किशोर सिंह, सुनील सिंह, उदय नारायण पाण्डेय, गंगाधर नाथ शाहदेव, अंजनी कुमार सिंह, द्वेद नाथ शाहदेव, श्री सौरभ राज, उदित सिंह, नागदमनी नाथ शाहदेव, राधा मोहन मिश्रा, बद्रीनाथ शाहदेव, ऋषभ सिंह, राजेन्द्र साहु, सोमेश्वर नाथ शाहदेव, मानवेन्द्र नाथ शाहदेव, यदुनाथ शाहदेव के साथ शाखा के लगभग 20 सदस्यगण शामिल हुए।

Published / 2024-08-16 20:08:34
गायत्री परिवार ने धुर्वा में किया गायत्री मंत्र का सामूहिक जप-अनुष्ठान

टीम एबीएन, रांची। अखिल विश्व गायत्री परिवार युगतीर्थ शक्तिपीठ सेक्टर टू धूर्वा रांची में गायत्री महिला मंडल प्रतिनिधित्व में गायत्री महामंत्र का समूह जप- अनुष्ठान, सत्संग, भजन हुआ। फिर युग निर्माण योजना पत्रिका का स्वाध्याय पाठ हुआ। इस क्रम में वरिष्ठ-साधिका दीदी ने बताया कि स्वाध्याय एक उच्चस्तरीय सत्संग है और ज्ञान ही प्रगति की आधारशिला है।

ज्ञान रहित मनुष्य मानवीय जीवन व उसकी गरिमा का अर्थ नहीं समझ पाता है।आज मनुष्य जितनी प्रगति कर सका है, उसके महत्वपूर्ण आधारों में एक बौध्दिक संपदा भी है ,जिसका पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षण व संवर्द्धन भी है।आध्यात्मिक ज्ञान में इसके संशोधन, संवर्धन व परिमार्जन के लिए विचारों को ठीक  दिशा में गतिशील व विकसित होना चाहिए। बताया कि विचारों का विकास एवं उनकी निर्विकारिता दो बातों पर निर्भर है... सत्संग व स्वाध्याय।

सकारत्मक सोच को बढ़ाने के लिए स्वाध्याय करना चाहिए। नकारात्मक सोच से बाहर निकलना हो तो सकारात्मक सोच को बढ़ाने के लिए स्वाध्याय करना चाहिए। कहा कि स्वाध्याय से मन शुभ व सद्विचारों की ऊर्जा से भर जाता है। मनन एवं चिन्तन से मन की क्रियाशीलता बढ़ती है तथा श्रेष्ठ विचारों को आकर्षित करने का माध्यम बन जाता है।  

कल स्वतंत्रता-दिवस पर शक्तिपीठ में गायत्री परिवार शिष्य-साधकों और  युग निर्माण कन्या विद्यालय के छात्र छात्राओं और आचार्यों ने बड़ी धूमधाम व उत्साहपूर्वक ध्वजारोहण किया और अनेकानेक उत्कृष्ट एवं सराहनीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में यह महोत्सव हर्षोल्लास पूर्वक प्रदर्शित किया। 

धूर्वा बस स्टैंड पास गायत्री प्रज्ञापीठ मंदिर परिसर में भी हर्षोल्लास पूर्वक विशिष्ट अतिथियों सहित स्वतंत्रता-दिवस मनाया गया। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

Published / 2024-08-10 21:12:31
जानिये कैसे हुई भद्रा की उत्पत्ति, क्यों भद्रा से भय खाते हैं लोग...

राजकुमारी पाण्डेय 

एबीएन सोशल डेस्क। ऐसा माना जाता है कि दैत्यों को मारने के लिए भद्रा गर्दभ (गधा) के मुख और लंबे पूंछ और 3 पैरयुक्त उत्पन्न हुई। पौराणिक कथा के अनुसार भद्रा भगवान सूर्य नारायण और पत्नी छाया की कन्या व शनि की बहन है। 

भद्रा काले वर्ण, लंबे केश, बड़े दांत वाली तथा भयंकर रूप वाली कन्या है। इसका स्वभाव भी शनि की तरह ही कड़क बताया गया है। जन्म लेते ही भद्रा यज्ञों में विघ्न-बाधा पहुंचाने लगी और मंगल कार्यों में उपद्रव करने लगी तथा सारे जगत को पीड़ा पहुंचाने लगी।

क्या है भद्रा और क्यों इसे अशुभ माना जाता है

उसके दुष्ट स्वभाव को देखकर सूर्यदेव को उसके विवाह की चिंता होने लगी। वे सोचने लगे कि इस दुष्ट कुरूपा कन्या का विवाह कैसे होगा? सभी ने सूर्यदेव के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब सूर्यदेव ने ब्रह्माजी से उचित परामर्श मांगा। 

ब्रह्माजी ने तब विष्टि से कहा कि भद्रे! बव, बालव, कौलव आदि करणों के अंत में तुम निवास करो तथा जो व्यक्ति तुम्हारे समय में गृह प्रवेश तथा अन्य मांगलिक कार्य करे, तो तुम उन्हीं में विघ्न डालो। जो तुम्हारा आदर न करे, उनका कार्य तुम बिगाड़ देना। इस प्रकार उपदेश देकर ब्रह्माजी अपने लोक चले गये। 

तब से भद्रा अपने समय में ही देव-दानव-मानव समस्त प्राणियों को कष्ट देती हुई घूमने लगी। इस प्रकार भद्रा की उत्पत्ति हुई और यही कारण है कि भद्राकाल में किये गये कार्यों में वह विघ्न-बाधा उत्पन्न करती है।

Published / 2024-08-08 21:01:33
नाग पंचमी पर नाग देव की पूजा-अर्चना से जीवन में सुख-समृद्धि

राजकुमारी पाण्डेय

एबीएन सोशल डेस्क। नाग पंचमी को हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया गया है। ब्रह्म पुराण में वर्णन मिलता है कि ब्रह्मा जी ने सांपों को नाग पंचमी के दिन पूजे जाने का वरदान दिया था। इस तिथि को लेकर कई मान्यताएं मौजूद हैं जिनमें से एक यह भी है कि इस तिथि पर रोटी नहीं बनानी चाहिए।  

हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर नाग पंचमी मनाई जाती है। इस साल नाग पंचमी का पर्व शुक्रवार, 09 अगस्त को मनाया जायेगा। इस तिथि भगवान शिव के साथ-साथ नाग देवता की पूजा का भी विधान है। रोटी भारतीय व्यंजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन नाग पंचमी के दिन रोटी बनाना शुभ नहीं माना जाता। चलिए जानते हैं इसका कारण...

नाग पंचमी का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा-अर्चना से साधक के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। साथ ही इस दिन खेतों में फसलों की रक्षा के लिए भी नाग देवता की पूजा की जाती है। नाग पंचमी के दिन नाग देव की आराधना से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

इसलिए नहीं बनती रोटी

नाग पंचमी के दिन लोहे से बनी चीजों का इस्तेमाल करना वर्जित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रोटी बनाने के लिए जिस तवे का इस्तेमाल किया जाता है उसे नाग के फन से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में नाग पंचमी पर चूल्हे पर तवा रखने से नाग देवता नाराज हो सकते हैं। 

साथ ही तवे को राहु के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है और नाग पंचमी पर इसके इस्तेमाल से कुंडली में राहु ग्रह का प्रभाव बढ़ सकता है। ऐसे में नाग पंचमी पर तवे पर रोटी बनाने से व्यक्ति को जीवन में कई तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है।

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