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Published / 2024-09-24 21:03:59
जिउतिया व्रत पर्व 25 सितंबर को

माताएं संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए रखती है निर्जला व्रत : संजय सर्राफ

टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि जितिया पर्व 25 सितंबर दिन बुधवार को है। जितिया व्रत हर वर्ष आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। हिंदू धर्म मे जितिया पर्व को जीवित्पुत्रिका व्रत और जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है। 

हिंदू सनातन धर्म का यह एक  महत्वपूर्ण पर्व है जितिया पर्व  मुख्य रूप से झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश मे बड़े ही उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। यह व्रत माताएं अपने पुत्रों की लंबी उम्र और सुख समृद्धि के लिए करती है। इस दिन महिलाएं 24 घंटे तक निर्जला व्रत उपवास रखती है। जितिया व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त 25 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 12 मिनट तक है।

दूसरे दिन 26 सितंबर को व्रत का पारण किया जायेगा। माताएं संतान की दीर्घायु, सुखी और निरोगी जीवन के लिए जितिया व्रत रखती है, व्रत वाले दिन महिलाएं नये वस्त्र धारण करती है। तथा उपवास के दिन जीमूत वाहन देव की पूजा पूरे विधि विधान से करती है। पूजन पर नारियल, खीरा, चना, खाजा समेत अन्य पूजा सामग्री चढ़ाते हैं। 

इस दिन व्रत करने के साथ जो माताएं पूजा के दौरान व्रत कथा पढ़ती और सुनती है उन्हें कभी भी संतान वियोग नहीं सहना पड़ता है, हिंदू धर्म मे व्रत से पूर्व संतुलित आहार का बहुत महत्व दिया गया है, जितिया व्रत से पूर्व महिलाओं के खान-पान का पूरा ध्यान रखा जाता है इस संतुलित आहार के कारण लंबी अवधि तक शरीर को ऊर्जा मिलती है। 

माना जाता है कि इस व्रत को करने से सभी साधक को सभी प्रकार के कष्टों  से मुक्ति मिलती है। जो माताएं इस व्रत का पालन करती है इस व्रत का फल उनके बच्चों को बुरे स्थिति से बचाता है साथ ही साथ इस व्रत के प्रभाव से संतान की सुखों की प्राप्ति होती है।

Published / 2024-09-22 21:06:40
दीपयज्ञ और महामंत्र की दिव्य आहुतियों से गुंजायमान रही गायत्री परिवार की हटिया शाखा

जन्मदिवस दीपयज्ञ व महामंत्र की दिव्य आहुतियां यज्ञ भगवान को प्रदान कर मनाया गया 

मंगलमय वंदना करते हुए स्वर में गाये 

गायत्री माता व गुरुसत्ता का मिले भरपुर आशीर्वाद व प्यार, 

जिन्दगी में मिले सफलता, साथ ही खुशियां हों अपार 

एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री परिवार महिला मंडल हटिया, ओबरिया रोड शाखा की सदस्य बहनों की प्रतिनिधित्व मंडल की सदस्य बहन मंजू पाण्डे ने अपने पुत्र अभिनव कुमार के पावन जन्मदिवस गायत्री युग तीर्थ शक्तिपीठ सेक्टर टू के साधना कक्ष में दीप श्रृंखला प्रज्ज्वलित कर गायत्री दीपयज्ञ के विधान से विधिवत सोल्लास व उत्साहपूर्वक मनाया। 

इस अवसर पर सभी ने हार्दिक अभिनन्दन व  मंगलमय बधाई में पुत्र को दीघार्युष्य, स्वस्थ-सुखद जीवन, प्रगतिशील वातावरण, ओजस, तेजस पूर्ण, उज्जवल भविष्य भव की मंगलमय आशीर्वचन सहित स्वस्तिवाचन पाठ किए अंत में शुभ कामनाएं एवं प्रज्ञावतारी गुरुसत्ताश्री से उनके उज्जवल भविष्य की मंगलमय वंदना करते हुए गीत के स्वर में गाये। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

Published / 2024-09-19 22:08:31
महानता से नाता जोड़ने की सूझबूझ अपनाया जाये : दीदी

  • गायत्री महिला मंडल का सत्संग, भजन कीर्तन, स्वाध्याय पाठ व संवाद हुआ

एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री युगतीर्थ शक्तिपीठ धूर्वा सेक्टर टू रांची  में गुरुवार को महिला मंडल प्रतिनिधित्व में महामंत्र जप-अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और सत्संग स्वाध्याय पाठ हुआ।

इस दौरान पूज्यवर श्रीगुरुदेव वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ पंडित श्रीरामशर्मा आचार्यजी की अखंड ज्योति पत्रिका का स्वाध्याय पाठ हुआ। दीदी ने पठन-पाठन कर बताया कि पूज्यवर श्रीगुरुदेव की युग निर्माण योजना सत्संकल्प अभियान अनुसार यह आज आवश्यक है कि महानता से नाता जोड़ने की सूझबूझ अपनाया जाये और इस विषय पर स्वाध्याय पाठ किया। 

बताया कि महानता के साथ सम्पर्क, नाता जोड़ने, जुड़ने का अवसर सदा न आता, न मिलता है। कहा कि दैवी प्रयोजनों में यदि क्षुद्र से जीव भी तनिक सा सहयोग करे, तो दैवी सहायता अपरिमित परिमाण में मिलते हैं।यह सुनिश्चित है कि जिस किसी पर भगवत् कृपा बरसती है, वह महानता से अपना नाता जोड़ने की सूझबूझ सत्प्रेरणा के रूप में ही बरसती है। आज की विषम परिस्थितियों में यदि यह तथ्य हम सब भी सीख समझ कर महानता को अपना सकें तो निश्चित ही उस श्रेय को प्राप्त करेंगे जो प्रज्ञावतार की सत्ता इस संधिकाल की विषम बेला में अनायास ही हमें देना चाहती है। 

इस बाबत युगानुकुल अनेकानेक उदाहरण दृष्टांत स्मरण कराये और प्रस्तुत किये गये।जैसे पारस पत्थर से काला- कुरूप, सस्ता लोहा का स्पर्श हो बहुमूल्य धातु में, स्वाति की बूंद सीप में पड़ने पर,पेड़ से लिपटकर बेल को ऊंचाई पाना।इससे महान पक्ष को कोई हानि भी नहीं और दुर्बल पक्ष को अनायास वरदान-स्वरूप लाभ प्राप्त होना भी श्रीहनुमान एवं वानरी सेना को प्रभुश्रीराम सेना में जुड़ समुद्र पुल बनाना, लांघना, लंका जलाना,पर्वत उठाना, पंचायतन का अंग बनना और गिलहरी को पूंछ में बालू लपेटकर समुद्र को पाटने की निष्ठा, पांडवों का श्रीकृष्ण रूपी महान सत्ता से जुड़ने वाली बुद्धिमत्ता ने महाभारत से विराट भारत का नवनिर्माण का श्रेयाधिकारी बना देना है।

बताया कि समर्पण का भाव, सामीप्य, सानिध्य महानता के साथ जुड़ने का जो उदाहरण हैं, बताते हैं व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए क्या वरेण्य है। अंत में शांतिपाठ व सबके लिए स्वस्थ-सुखद जीवन और उज्जवल भविष्य की मंगल स्वस्तिवाचन हुआ। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक जय नारायण प्रसाद ने दी।

Published / 2024-09-18 22:10:11
गायत्री परिवार ने मनाया गुरु माताजी का महाप्रयाण दिवस

  • शक्तिस्वरूपा परम वं गुरुमाताजी के महाप्रयाण दिवस पर गायत्री परिवार ने उनके संदेशों को स्मरणीय, अनुकरणीय बताया

एबीएन सोशल डेस्क। अखिल विश्व गायत्री परिवार की परम पूज्य वंदनीया गुरुमाताजी का आज महाप्रयाण दिवस है। इस अवसर पर शान्तिकुञ्ज तत्वावधान व मार्गदर्शन में विश्व के समस्त इकाई शाखाओं में शिष्य सदस्यों ने कई कार्यक्रम करके उन्हें स्मरण कर श्रद्धापूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित की।

अखिल विश्व स्तरीय आनलाइन आध्यात्मिक स्वाध्याय पाठ-संवाद मंडल, जप-अनुष्ठान समूह प्रतिनिधित्व में रेखा बहिन ने बताया  कि परम पूज्य गुरुदेव प्रज्ञावतार के प्रतीक हैं एवं वंदनीया माताजी उनकी दिव्य शक्ति स्वरूपा हैं। उनके जीवन के विभिन्न आयामों को वर्णन करना सामान्य नहीं है। 

उनका जीवन दिव्यता से ओत-प्रोत था।मातृशक्ति समय समय पर भगवान के अवतार के साथ पृथ्वी पर उनकी सहयोगिनी के रूप में सदा आती रही हैं। गुरुमाता भगवती देवी ने गुरुदेव श्रीप्रज्ञावतार के ज्ञान समुच्चय को अपने हृदय की भक्ति भावना से दिव्य रूप देकर अमृतमय बनाकर अपने शिष्यों को वरदान आशीर्वाद प्रदान कर नवयुग सृजन में युग संजीवनी के दिव्य चिन्तन की बूंदों से शिष्यों को अभिचिंसन किया। 

आज भाद्रपद पूर्णिमा के पावन अवसर सह महाप्रयाण दिवस पर अखिल विश्व स्तरीय गायत्री परिवार सदस्यों शिष्यों ने सुबह से 24 घंटे का अखंड जप-अनुष्ठान, हवन-यज्ञ विधान और सायंकालीन दीपयज्ञ विधान करके सोल्लास संपन्न किया। परम वंदनीय माता जी के व्यक्तित्व से हमें यह गुण सीखने को मिलता है कि एक नारी के अंदर अपार शक्ति का भंडार होता है, उसे बस पहचाने की आवश्यकता होती है। माताजी ने हम सभी को अपने संगठन शक्ति के द्वारा,मातृ शक्ति के द्वारा संपूर्ण अखिल विश्व गायत्री परिवार को एक धागे में पिरोया है।

जब - जब कोई भी कठिनाइयां आती, तो उन्हें वह अपने मातृत्व के आंचल से समेट लेती। उनका यह आंचल किसी भी प्रकार की परेशानियों के लिए छोटा नहीं पड़ा। अतः हम सभी को उनके व्यक्तित्व से नेतृत्व क्षमता की सीख लेनी चाहिए, जिसके माध्यम से उन्होंने विपरीत से विपरीत परिस्थितियों को धैर्य एवं सरलता से हल किया।इस अवसर पर सभी ने उनके अन्नपूर्णा ममतामयी स्वरूप को शत-शत नमन किया गया। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक सह प्रचार-प्रसार प्रमुख जय नारायण प्रसाद ने दी।

Published / 2024-09-18 09:58:25
क्या है पितृ पक्ष, पढ़ें एबीएन की विशेष प्रस्तुति...

एबीएन सोशल डेस्क। बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृपक्ष क्या होता हैं? पितृदोष है क्या? पितृदोष शांति के उपाय क्या हैं, पितृ या पितृगण कौन हैं? आपकी जिज्ञासा को शांत करती abnnews24.com की विस्तृत प्रस्तुति...

पितृपक्ष या पितरपख

16 दिन की वह अवधि (पक्ष/पख) है जिसमें सनातनी लोग अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और उनके लिये पिण्डदान करते हैं। इसे सोलह श्राद्ध, महालय पक्ष, अपर पक्ष आदि नामों से भी जाना जाता है।

जानें कौन हैं पितृगण

पितृगण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है, क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है, पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।

कहां-कहां से होकर गुजरती है आत्मा

आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है, वहां हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढ़ती है।

फिर कहां जाती है आत्मा

वहाँ से आगे, यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेद कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एकआध आत्मा ही ऐसी होती है, जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश, मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।

पितृ दोष क्या होता है

हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं, ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं, जिसे पितृ- दोष कहा जाता है।

क्या-क्या आती हैं बाधाएं

पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है। ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।

ये हैं संकेत

इसके अलावा जिनके घर में प्रेत बाधा हो, घर में सदैव अशांति का रहना, परिवार के लोगों में आपसी मतभेद का होना, बार- बार दुर्घटना का घटित होना, किसी भी सदस्य का हमेशा बीमार रहना, बनते कार्यों में रुकावटें आना, संतान न होना अथवा विकलांग होना, अकाल मृत्यु का होना, मतिभ्रम होना, परिवार में दुख हो, कष्ट हो, आर्थिक परेशानी हो, ऋण का भार हो, विवाह-बाधा व असफलता जैसी अनेक नकारात्मक स्थितियां बन रही हो जीवन भर तो समझ लो 95 पितृदोष का कारण हैं। यदि आपके घर-परिवार में भी इस तरह की परेशानियां है तो समझ लो ये पितृदोष के वजह से हैं।

ये कर सकते हैं

पितृपक्ष चलने वाले पंचबलि कार्यक्रम आप भी आयोजित करवा सकते हैं। ये पंचबलि कार्यक्रम पितरों की आत्मा के शांति, पितृदोष निवारण के लिए ही किया जाता है।

  • पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है
  1. अधोगति वाले पितरों के कारण
    उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण

अधो गति के प्रभाव

अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय। परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।

ऊर्ध्व गति के प्रभाव

उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते, परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह भी पितृदोष उत्पन्न करते हैं।

ये भी बाधा संभव

इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है, फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ, उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है?

इससे पता चलता है पितृ दोष

जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।

इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है। इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है, वंश हीनता, संतानों का गलत संगति में पड़ जाना, परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना, परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं।

इन समस्त दोषों के निवारण हेतु शास्त्रों ने त्रिपिण्डीश्राद्ध का अचूक विधान निर्देशित किया है, जिससे सरलता से पितृदोष से निवृत्ति प्राप्त हो, पितरों की अक्षय कृपा प्राप्त होती है...

त्रिपिण्डी श्राद्ध का परिचय एवं माहात्म्य

अपनी वंशपरम्परा में होने वाले अनेक प्रकार के दैहिक- दैविक भौतिक तापों के उपशमन के लिये त्रिपिण्डी श्राद्ध करने की शास्त्र समर्थित लोकमान्य परम्परा है। वंश में मृत और असद्गतिप्राप्त प्राणियों के द्वारा अनेक प्रकार की शारीरिक मानसिक पीड़ा के साथ ही सन्तान-परम्परा की वृद्धि का न होना इत्यादि अनेक ऐसे उपद्रव हैं, जिन उपद्रयों का कारण कुछ विदित नहीं होता और आश्चर्यजनकरूप से घटित होने वाले उन उपद्रवों की व्यथा और कष्ट को विवश होकर सहना पड़ता है। 

ये उपर्युक्त प्रेत या पितृ बाधाएँ अपने कुल में अथवा अन्य कुल में उत्पन्न असद्गतिप्राप्त प्रेतों द्वारा की गयी होती हैं। यहाँ यह समझना चाहिये कि न केवल अपने कुल के असद्गतिप्राप्त प्राणी भूत-प्रेत-पिशाचादि योनियों में प्रविष्ट होकर ऐसी बाधा करते हैं, प्रत्युत अन्य जातीय वंशपरम्परा में उत्पन्न हुए जीव भी, जिनसे द्वेष-प्रीति तथा धन-धान्यादि का सम्बन्ध होता है, भूत-प्रेत-पिशाचादि योनियों को प्राप्त करके उपर्युक्त उपद्रवों को करते हैं तथा पीड़ाकारी होते हैं। उपर्युक्त पीड़ा पहुंचाने वाले भूत-प्रेतादि वायु रूप में होकर सात्त्विक, राजस तथा तामस-भेद से प्रेत के रूप में होकर द्युलोक, अन्तरिक्ष तथा पृथ्वीलोक में अतृप्त होकर भ्रमण करते रहते हैं। उनमें सत्वगुणप्रधान प्रेतादि विष्णुमय, रजोगुण प्रधान प्रेतादि ब्रह्ममय और तमोगुण प्रधान प्रेतादि रुद्रमय संज्ञा वाले कहलाते हैं।

त्रिपिण्डीश्राद्ध इन्हें उत्तम लोक प्राप्त कराने की विधि है। इस श्राद्ध में सात्विक, राजस तथा तामस प्रेतों के निमित्त विभिन्न द्रव्यों से तीन पिण्ड बनाकर विशेष विधि से श्राद्ध किया जाता है, इसलिये यह श्राद्ध त्रिपिण्डीश्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से उत्तम लोक को प्राप्त हो जाने के पश्चात्पू र्वोक्त भूत-प्रेतादि इष्टप्रतिबन्धक, अर्थात मनोनुकूल इच्छा प्राप्ति में बाधक न होकर कर्ता को सर्वाभीष्ट प्राप्त कराने में सहायक होते हैं। ऐसे प्राणी भी, जो आत्महत्या आदि दुर्मरण से शरीर का त्याग करते हैं अथवा जिनका शास्त्रोक्त विधि से और्ध्वदैहिक संस्कार नहीं किया जाता, वे सब भूत-प्रेतादि योनियों को प्राप्त होते हैं।

  • नारायणबलि तथा त्रिपिण्डी श्राद्ध का उद्देश्य भेद

जिन जीवों का दुर्मरण हो जाता है या जो पितर किसी भी कारणवश असंतुष्ट होते हैं, उनके और्ध्वदैहिकश्राद्ध की सफलता के लिये प्रायश्चित्तरूप से शास्त्रों में नारायणबलि करने का विधान है। अपने कुल में अथवा अपने से सम्बद्ध किसी अन्य कुल में उत्पन्न किसी जीव के प्रेत योनि प्राप्त होने पर उसके द्वारा अपने वंश में सन्तान प्राप्ति में बाधा अथवा अन्य प्रकार के होने वाले अनिष्टों की निवृत्ति के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध त्रिपिण्डी श्राद्ध कहलाता है। 

नारायण बलि में अपने कुल गोत्र के दुर्मरणग्रस्त जीव का उद्धार हो जाये-यह उद्देश्य होता है, जबकि त्रिपिण्डी श्राद्ध में अपनी वंश-परम्परा में होने वाले अनिष्टों की निवृत्ति के उद्देश्य से श्राद्ध किया जाता है। नारायण बलि मुख्यरूप से देवताओं की प्रसन्नता के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध होता है, जिसमें केवल एक प्रेत का ही श्राद्ध किया जाता है, जबकि त्रिपिण्डीश्राद्ध में सात्विक -राजस-तामस प्रेतों के उदेश्य से भी श्राद्ध होता है।

Published / 2024-09-17 19:10:53
रातों रात चमत्कार की आस न रखें युवा

  • बीपीएमएस ने देश के नौ नामी बिजनेस आइकंस को दिया नवरत्न अवार्ड

एबीएन सेंट्रल डेस्क (नई दिल्ली)। देश दुनिया में भिवानी का परचम फहराने वाले विख्यात सामाजिक संगठन भिवानी परिवार मैत्री संघ के मुकुट में एक साथ नौ और बेशकीमती रत्न चस्पां हो गये हैं। विभिन्न क्षेत्रों में कामयाबी की कीर्ति पताका बुलंद करने वाले नौ दिग्गजों को भिवानी परिवार मैत्री संघ ने रोहिणी में आयोजित भव्य समारोह में नवरत्न अवार्ड-2024 से सम्मानित किया।युवा पीढ़ी को इन सभी का संयुक्त रूप से संदेश था कि वे रातों रात किसी चमत्कार की उम्मीद न रखें। सफलता तो प्रयासों की निरंतरता, एकाग्रता और लगातार कड़ी मेहनत से ही मिलती है।

भिवानी परिवार मैत्री संघ के अध्यक्ष राजेश चेतन ने बताया कि लगातार आठ घंटे चले कार्यक्रम में भारी संख्या में मौजूद अतिथिगण इन दिग्गजों के संघर्ष और शिखर तक पहुंचने की गौरवगाथा को सुनते रहे। उन्होंने बताया कि इन नवरत्नों की संघर्ष गाथा के इतने पड़ाव रहे कि किसी एक सत्र में शब्दों में बांधना मुमकिन नहीं है। राजेश चेतन ने बताया कि अपनी प्रतिभा, अनवरत संघर्ष, जीत की जिद और न थकने वाले डीएनए की बदौलत ये सभी नवरत्न आज देश दुनिया में भिवानी का परचम लहरा रहे हैं।

सम्मानित होने वाले आइकंस में राजेश गुप्ता 
(सीएमडी, भारत रसायन फाइनेंस लिमिटेड), सत्य एस गुप्ता (डायरेक्टर गैलेक्सी इंडिया), बृज लाल सराफ (डायरेक्टर प्यारेलाल जगन्नाथ सराफ), नरेश मित्तल (सीएमडी, सिग्नेचर ग्लोबल कोमट्रेड प्राइवेट लिमिटेड), सुरेश गुप्ता  (सीएमडी, गोल्डन ग्रुप आफ कंपनीज), राजकुमार गर्ग (डायरेक्टर, मोविश रियल्टेक प्राइवेट लिमिटेड), बजरंग लाल अग्रवाल (एमडी, स्टोनेक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड), डा प्रेम गर्ग, (चेयरमैन, श्रीलालमहल ग्रुप नेशनल प्रेसीडेंट, इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (आईआरईएफ) और डा आशीष गुप्ता (डायरेक्टर, यूनीक हास्पिटल कैंसर सेंटर) शामिल रहे।

इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित करके किया गया। कार्यक्रम में मंच संचालन अंतरराष्ट्रीय कवि व भिवानी परिवार मैत्री संघ के अध्यक्ष राजेश चेतन, सुनीता जैन, प्रमोद शर्मा ने किया। कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित किया गया। पूजा बंसल को साथियों के साथ देवताओं की पुरानी मूर्तियों को एकत्र करके सम्मान पूर्वक सहजने के लिए सम्मानित किया गया। 

इस अवसर पर अपने संबोधन में अंतरराष्ट्रीय कवि राजेश चेतन व डॉक्टर रमेश गुप्ता ने कहा कि आज हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं जबकि घर में बड़ों से मिलने वाला ज्ञान हमें किसी भी विश्वविद्यालय में नहीं मिल सकता। इसलिए जिस घर में दादा और पोते की जोड़ी साथ में काम करती है उसे घर में किसी चीज की कमी नहीं रह सकती।

इस अवसर पर भिवानी परिवार मैत्री संघ के प्रधान राजेश चेत के अलावा महासचिव दिनेश गुप्ता, कोषाध्यक्ष पवन मोडा, हंसराज रल्हन, विनय सिंघल, मनीष गोयल, प्रमोद कुमार शर्मा, मीनाक्षी गर्ग, संजय गुप्ता, दीपक गुप्ता, संजय जैन, राजकुमार अग्रवाल, सुशील गनोत्रा आदि भी मौजूद रहे।

  • गरीब कन्याओं के विवाह के लिए नरसी का भात योजना

कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण फैसला यह लिया गया कि भिवानी जिले की गरीब, असहाय कन्या की शादी के लिए चुपचाप उसके घ जाकर 51 हजार रुपये नकद बीपीएमएस की ओर से दिये जायेंगे। इस योजना का नाम नरसी का भात रखा गया है। इसके लिए भिवानी में एक स्क्रीनिंग कमेटी बनाई जाएगी ताकि वास्तविक पात्र को ही आर्थिक मदद मिले। इस मेगा अभियान के लिए बीपीएमएस के कार्यक्रम में दानवीर समाजसेवियों ने 70 से अधिक कन्याओं की शादी के लिए धन देने की सहमति दी। अभी योजना भिवानी में चलेगी, फिर इसका विस्तार अन्य शहरों व जिलों में किया जायेगा।

Published / 2024-09-16 18:19:44
पितृपक्ष 18 से, अपने पितरों को प्रसन्न करने के लिए करें ये काम

  • पितृपक्ष श्राद्ध पितरों को प्रसन्न और संतुष्ट करने वाला पर्व : संजय सर्राफ

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि 18 सितंबर से स्नान दान भाद्रपद पूर्णिमा तिथि लगते ही पितृ पक्ष शुरू हो जायेगा। पितृपक्ष 18 सितंबर से शुरू होकर 2 अक्टूबर तक रहेगा। 15 दिनों तक दादा दादी, नाना नानी पक्ष के पूर्वजों का ध्यान स्मरण किया जायेगा। 

उन्हें जल देकर तर्पण की कामना होगी पितृपक्ष शुरू होते हैं शुभ कार्यों की बेला थम जाएगी। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को पितरों को प्रसन्न और संतुष्ट करने वाला पर्व माना जाता है इस दिन उन पूर्वजों के सम्मान में श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु हर महीने की पूर्णिमा के दिन हुई थी।

पितृपक्ष जिसे श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि मृतक पूर्वजों को समर्पित एक महत्वपूर्ण अवधि है यह वह समय होता है जब पूर्वजों की आत्माएं प्रसाद और प्रार्थनाओं के प्रति सबसे अधिक ग्रहणशील होती है। श्राद्ध पक्ष वास्तव में पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रदर्शित करने का अवसर है।

पितरों का श्राद्ध करने से जन्म कुंडली में व्याप्त पितृ दोष से भी हमेशा के लिए छुटकारा मिलता है। पितृपक्ष में पितरों संबंधित कार्य करने से व्यक्ति का जीवन खुशियों से भर जाता है। श्राद्ध तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते है और आशीर्वाद देते हैं। पितर दोष से मुक्ति के लिए इस पक्ष में श्राद्ध तर्पण करना होता है। 

किसी योग्य ब्राह्मण से श्राद्ध कर्म, पिंडदान तर्पण करवाना चाहिए। जिस दिन श्राद्ध हो उस दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए, श्राद्ध कार्य में पूरी श्रद्धा से ब्राह्मणों को तो दान दक्षिणा देना चाहिए,साथ ही यदि किसी गरीब जरूरतमंद की सहायता भी आप कर सके तो बहुत पुण्य मिलता है। 

इसके साथ-साथ ही गाय, कुत्ते, कौवे आदि पशु पक्षियों के लिए भोग का एक अंश जरुर डालना चाहिए। पितृपक्ष मे मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। अगर किसी मृत व्यक्ति की तिथि ज्ञात न हो तो ऐसी स्थिति मे अमावस्या तिथि पर श्राद्ध किया जाता है इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है।

Published / 2024-09-15 15:35:20
दुनिया के पहले इंजीनियर वास्तुकार और ब्रह्मांड के निर्माता हैं भगवान विश्वकर्मा : संजय सर्राफ

विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं राष्ट्रीय सनातन एकता मंच के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भगवान विश्वकर्मा पूजा हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 17 सितंबर दिन मंगलवार को मनाया जाएगा, विश्वकर्मा पूजा को विश्वकर्मा जयंती के नाम से भी जाना जाता है।

हिंदू सनातन धर्म का यह एक महत्वपूर्ण पर्व है। धर्म ग्रंथो में विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी का वंशज माना गया है। ब्रह्मा जी के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव थे। जिन्हें शिल्प शास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तु देव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ। 

अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए विश्वकर्मा भी वास्तु कला के महान आचार्य बने। मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ उनके पुत्र है। इन पांचो पुत्र को वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं में विशेषज्ञ माना जाता है। विश्वकर्मा शिल्प शास्त्र के आविष्कारक और सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता माने जाते हैं। 

विश्वकर्मा पूजा एक ऐसा त्यौहार है जिसे शिल्पकार कारीगर,श्रमिक एवं सभी लोग मानते हैं। यह पर्व ब्रह्मांड के दिव्य वास्तुकार और निर्माता भगवान विश्वकर्मा को समर्पित होता है। विश्वकर्मा एक ऐसे देवता है।

जिन्होंने स्वर्ग और यहां तक की देवताओं के कुछ सबसे बड़े महलों का निर्माण किया, उन्हें कारीगरों शिल्पकारों और इंजीनियरों का देवता के रूप में भी पूजा जाता है। उन्हें सृष्टि का पहला इंजीनियर भी कहा जाता है। भगवान विश्वकर्मा की पूजा जो भी कोई व्यक्ति करता है उसका घर, दुकान, कारोबार, सभी उन्नति करते हैं। 

विश्वकर्मा पूजा के दिन सच्चे मन से दान करने से अच्छे कर्म बढ़ते हैं और समृद्धि, सफलता और खुशी मिलती है विश्वकर्मा पूजा पर विशिष्ट वस्तुओं का दान करके भक्त विश्वकर्मा के साथ एक सानिध्य स्थापित करते हैं और विकास के साथ प्रचुरता के लिए दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

विश्वकर्मा दो शब्दों से विश्व (संसार या ब्रह्मांड) और कर्म (निर्माता) से मिलकर बना है इसलिए विश्वकर्मा शब्द का अर्थ है दुनिया का निर्माता यानी दुनिया का निर्माण करने वाले, इसलिए भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का सबसे पहले इंजीनियर और वास्तु कार माना जाता है।

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