भगवान शिव के अवतार ऋषि दुर्वासा
भारत के पौराणिक इतिहास में अनेक ऐसे ऋषियों, मुनियों का जिक्र है, जिनके पास अलौकिक शक्तियां थीं। वह अपनी इसी शक्ति के कारण चाहे तो श्राप देकर सामने वाले को भस्म कर सकते थे या फिर वरदान के द्वारा किसी का जीवन खुशियों से भर देते थे। यह सब उन्हें क्रोधित करने व प्रसन्न करने से जुड़ा था।
ऐसे ही एक महर्षि थे दुर्वासा ऋषि, जो अपने क्रोध के लिए जाने जाते थे। ऋषि दुर्वासा को शिव का अवतार कहा जाता था लेकिन जहां भोले शंकर को प्रसन्न करना बेहद आसान माना जाता है वहीं ऋषि दुर्वासा को प्रसन्न करना शायद सबसे मुश्किल काम था। उनका ज्ञान एवं तपोबल था। वे एक सिद्ध योगी हैं। उन्हें क्रोध और श्राप देने के कारण जाना जाता है।
इनके पिता महर्षि अत्रि और माता सती अनुसूइया जी थीं। महर्षि अत्रि जी ब्रह्मा के मानस पुत्र थे और उनकी पत्नी अनुसूया जी पतिव्रता थीं, जिस कारण उनके पातिव्रत धर्म की परीक्षा लेने हेतु देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती ने भगवन ब्रह्मा, विष्णु और महेश को उनके सतीत्व की परीक्षा लेने आग्रह किया।
माता सती अनुसूइया ने अपने तपोबल से उन्हें शिशुओं के रूप में बदल दिया। माता सरस्वती, माँ लक्ष्मी और माँ पार्वती के अनुरोध पर सती अनुसूया ने उन्हें मुक्त कर दिया। त्रिदेव ने उन्हें अपने समान पुत्रों की प्राप्ति का वरदान दिया। भगवान् ब्रह्मा जी चंद्रमा के रूप में, भगवान् विष्णु दत्तात्रेय जी के रूप में और भगवान् शिव जी दुर्वासा के रूप में अपने-अपने अंश से माता सटी अनुसूया के पुत्र के रूप में प्रकट हुए।
पूर्वकाल में महर्षि अत्रि ने संतान की प्राप्ति के लिए भगवान् ब्रह्मा से प्रार्थना की तो उन्होंने ऋषि अत्री को अपनी पत्नी सती अनुसूइया सहित ऋक्षकुल पर्वत पर पुत्र कामना के लिए कठोर तपस्या करने का आदेश दिया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर त्रिदेव ने प्रकट होकर वरदान दिया कि त्रिदेव उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे।
दुर्वासा ऋषि ने अपनी साधना एवं तपस्या द्वारा अनेक सिद्धियों को प्राप्त किया और अष्टांग योग का अवलम्बन कर अनेक महत्वपुर्ण उपलब्धियां प्राप्त कीं। ऋषि दुर्वासा जीवन-भर भक्तों की परीक्षा लेते रहे अपने महा ज्ञानी स्वरूप होने तथा सभी सिद्धियों के बावजूद भी ऋषि दुर्वासा अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर पाते थे। उन्हें कभी-कभी अकारण ही भयंकर क्रोध भी आ जाता था और अपने क्रोधवश वे किसी को भी श्राप दे देते थे। उनके श्राप के कारण शकुन्तला को अनेक कष्ट झेलने पड़े।
एक बार कुंती के अतिथ्य सत्कार से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे एक मंत्र प्रदान करते हैं जिसके द्वारा वह किसी भी देवता का आहवान कर सकती थी। इसी वरदान स्वरुप कुंती ने सूर्यदेव का आवाहन किया जिससे परिणाम स्वरूप कुँवारेपन में ही उन्हें कर्ण की प्राप्ति हुई। बाद में पाण्डु के शापग्रस्त होने पर उन्होंने और माद्री ने युधिष्टर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की प्राप्ति की।
दुर्वासा ऋषि ने भगवान् श्री कृष्ण की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अपनी जूठी खीर को शरीर पर मलने को कहा। भगवान् श्री कृष्ण ने ऐसा ही किया। ऋषि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर भगवान् श्री कृष्ण को वरदान दिया कि सृष्टि का जितना प्रेम अन्न में होगा उतना ही उनमें भी होगा।
ऋषि दुर्वासा महाराज अम्बरीष के राजभवन में पधारे। उस दिन राजा अंबरीष निर्जला एकादशी उपरांत द्वादशी व्रत पालन में थे। पूजा पाठ करने के पश्चात राजा ने ऋषि दुर्वासा को प्रसाद ग्रहण करने का निवेदन किया ताकि वे अपना व्रत पूर्ण कर सकें। परंतु ऋषि दुर्वासा यमुना स्नान करके ही कुछ ग्रहण करने की बात कहकर चले गए। इधर पारण का समय समाप्त हो रहा हो रहा था; अतः ब्राह्मणों के परामर्श के अनुसार राजा ने प्रसाद के रूप में चरणामृत ग्रहण कर लिया।
ऋषि दुर्वासा ने यह जान कर राजा अम्बरीश को भस्म करने के लिए अपनी जटा से क्रत्या नामक राक्षसी को उत्पन्न किया। राजा ने बिना विचलित हुए भगवान विष्णु का स्मरण किया। सुदर्शन चक्र राजा अंबरीष करते थे।
कृत्या जैसे ही राजा पर झपटी उसे सुदर्शन चक्र ने नष्ट कर दिया और अब दुर्वासा ऋषि आगे आगे और सुदर्शन चक्र उनके पीछे पीछे। दुर्वासा जी को अपना पिंड छुड़ाना भारी पड़ गया। तीनों लोकों में भागने के बाद वे भगवान् शिव की शरण में गए तो भगवान् शिव ने अपने असमर्थता प्रकट की और भगवान् विष्णु की शरण में जाने को कहा।
भगवान् विष्णु ने उन्हें राजा अम्बरीश से क्षमा मांगने को कहा। ऋषि दुर्वासा राजा अम्बरीश की शरण में गए और अपने आचरण के लिए क्षमा माँगी। महर्षि दुर्वासा की यह दशा देखकर राजा अम्बरीश ने सुदर्शन चक्र की स्तुति कर उन्हें लौट जाने का आग्रह किया।
दुर्योधन ने ऋषि दुर्वासा के आगमन पर उनकी बहुत आवभगत की जिससे वे खुश हो गए। उन्हें प्रसन्न कर दुर्योधन ने उन्हें युधिष्टर का आथित्य स्वीकार करने को कहा और ऐसे वक्त जाने का आग्रह किया जब वे भोजन कर चुकें। ऐसा ही हुआ। द्रौपदी ने सूर्यदेव द्वारा दी गई दिव्य बटलोई को माँज दिया था। ऋषि अपने शिष्यों सहित स्नान ध्यान को तत्पर हुए तो द्रौपदी ने भगवान् श्री कृष्ण का स्मरण किया।
भगवान् श्री कृष्ण प्रकट हो गए। द्रौपदी ने अपनी समस्या बताई तो उन्होंने बटलोई को माँगा और उसे अन्दर से देखा तो एक साग का पत्ता उन्हें लगा हुआ मिल गया और उन्होंने उसे ही खा लिया। उनके साग के पत्ते को खाते ही दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों की भूख खत्म हो गई और वे सब युधिष्टर के श्राप के भय से वहाँ लौट कर ही नहीं आये।गुरु नानक देव दुर्वासा ऋषि के अंश रूप में पैदा हुए थे।
एबीएन सोशल डेस्क। वास्तु शास्त्र में पक्षियों के घोंसले और उनके रहने के स्थान के बारे में बताया गया है। इसके साथ ही वास्तु शास्त्र सार और समरांगण सूत्रधार जैसे ग्रंथों में भी पक्षियों के घर पर आने के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों का वर्णन किया गया है। अगर बात करें कबूतर की, तो गरुड़ पुराण में इसको पितरों का प्रतीक माना गया है। वहीं, बृहत संहिता में भी कबूतर का बार-बार घर में घोंसला बनाना शनि या पितृ दोष से जोड़ा जाता है। यहां शुभ
कुछ मान्यताओं के अनुसार कबूतर को शांति, प्रेम और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। अगर यह घर के बाहरी हिस्से, छत या बालकनी में घोंसला बनाता है तो इसे शुभ माना जाता है। कुछ मान्यताओं में इसे पितरों का आशीर्वाद भी माना गया है। कई जगहों पर माना जाता है कि घर में कबूतर का घोंसला बनना या अंडा देना शुभ घटना घटने का संकेत होता है।
अगर कबूतर का घोंसला उत्तर या पूर्व दिशा में हो यह भी धन, सुख और पॉजिटिव एनर्जी लाने वाला माना जाता है। इन दिशाओं को बेहद ही शुभ माना गया है और यहां पक्षियों का वास घर की उन्नति का संकेत हो सकता है।
शास्त्रों के अनुसार अगर कबूतर घर के मेन गेट या खिड़की के पास घोंसला बना ले या अंडा दे तो इसे नकारात्मक संकेत माना जाता है। इससे घर के कार्यों में बाधाएं आने लगती हैं। इसके साथ ही परिवार के दुखों का कारण बनता है।
अगर कबूतर ने रसोईघर या फिर घर के अंदर घोंसला बना लिया है या अंडे दिये हैं तो इससे स्वास्थ्य समस्याओं और आर्थिक हानि के योग बनते हैं। वहीं, अगर घर में काफी कबूतर इकट्ठे हो जायें तो यह शनि और राहु दोष को बढ़ाता है और घर में अनचाही परेशानियां आने की संभावना बढ़ जाती है।
टीम एबीएन, रांची। माहेश्वरी महिला समिति, रांची आप सभी के लिए लेकर आई है गणगौर सिँझारा। समिति अध्यक्ष भारती चितलांगिया एवं सचिव विमला फलोर ने बताया आगामी 24 मार्च शाम 4बजे लक्ष्मी नारायण मंदिर के हॉल मे मारवाड़ी समाज कि महिला, युवतियाँ को सोलह श्रृंगार कर आना है, अगर कोई अपने घर से गणगौर लाना चाहे तो ला सकते हैं।
सिँझारा सयोजक पूनम राठी, रितिका लाखोटिया, रश्मि मालपानी, सीमा मालपानी के अनुसार प्रोग्राम मे मारवाड़ी गाने पे डांस और नाटक के साथ, हौज़ी एवं अन्य कई तरह के के गेम्स का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम पास की कीमत 350/- है। गणगौर सिझारा में भाग लेने के लिए पहले से महिला समिति सदस्य से या फिर माहेश्वरी भवन के ऑफिस से पास लेना अनिवार्य है।
DATE - 24TH March 2025
Time - 4pm onward
Place - Laxminarayan mandir hall
PREBOOK PASSES NECESSARY 350/ -
CALL ON GIVEN NO.
poonam Rathi 80848 85853
Ritika Lakhotia 8002837778
Rashmi Malpani 7549099833
Seema Malpani 8603653882
*धन्यवाद*
*मीडिया प्रभारी*
*रश्मि मालपानी*
*प्रेस विज्ञप्ति*
*हुटुप गौशाला धाम में श्री राम कथा महायज्ञ के दूसरे दिन सुश्री संगीता किशोरी जी ने शिव पार्वती विवाह की मार्मिक कथा सुनाई*
*मनुष्य अपने जीवन में ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम और श्रद्धा से जुड़े रहे तो उसे जीवन के कठिन राह पर भी सुख और शांति प्राप्त होगी: संगीता किशोरी*
रांची के प्रसिद्ध हुटुप गौशाला धाम में चल रहे नौ दिवसीय श्री राम कथा महायज्ञ के दूसरे दिन सुप्रसिद्ध कथा वाचक सुश्री संगीता किशोरी जी ने श्रद्धालुओं को श्री शिव पार्वती विवाह की अद्भुत और मार्मिक कथा सुनाई। इस कथा ने श्रद्धालुओं के हृदय को गहरे तरीके से छुआ और भगवान शिव तथा माता पार्वती के अद्भुत प्रेम और त्याग की गाथा को बताया। कथा में सुश्री संगीता किशोरी जी ने भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शिव पार्वती का विवाह केवल एक सांसारिक मिलन नहीं था, बल्कि यह एक आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक है, जो भक्तों को सच्चे प्रेम, समर्पण और भक्ति का मार्ग दिखाता है। कथा में उन्होंने विस्तार से वर्णन किया कि कैसे भगवान शिव, जो संन्यासियों के परम प्रतीक माने जाते हैं, ने माता पार्वती से विवाह करके संसारिकता का पालन किया, जबकि पार्वती जी ने अपने कठिन तपस्या और भक्ति से भगवान शिव को प्रसन्न किया।कथा में विशेष रूप से यह बात कही गई कि शिव और पार्वती का विवाह, एक ओर जहां संसारिक जीवन की नश्वरता और त्याग का संदेश देता है, वहीं दूसरी ओर यह एक आदर्श प्रस्तुत करता है कि सच्चे प्रेम और विश्वास से कोई भी बाधा पार की जा सकती है। सुश्री संगीता किशोरी जी ने यह भी बताया कि शिव पार्वती के विवाह से यह सिखने को मिलता है कि अगर मनुष्य अपने जीवन में ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम और श्रद्धा से जुड़ा रहे, तो उसे जीवन के कठिन रास्तों पर भी सुख और शांति प्राप्त होती है। कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के हर एक प्रसंग को बड़े ध्यान और श्रद्धा से सुना। कथा में भगवान शिव के अद्वितीय व्यक्तित्व और माता पार्वती के सच्चे प्रेम को दर्शाया गया, जिससे पूरे माहौल में भक्तिमय ऊर्जा का संचार हुआ।इस कथा ने न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यधिक संदेश दिया। सुश्री संगीता किशोरी जी के शब्दों ने यह स्पष्ट किया कि केवल भक्ति से ही नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण से ही जीवन में सच्ची शांति और सफलता प्राप्त की जा सकती है। रांची के हुटुप गौशाला धाम में चल रहे इस महायज्ञ में भक्तों का भारी जनसमूह उपस्थित है, जो इस दिव्य कथा का हिस्सा बनकर अपने जीवन को धर्म और भक्ति की राह पर चलने के लिए प्रेरित हो रहा है। उक्त जानकारी देते हुए कार्यक्रम के मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने बताया कि इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक बासुदेव भाला एवं मुकेश काबरा, बनवारी भाला अशोक सोढ़ानी, किशन साबू, नरेंद्र लखोटिया, उदय शर्मा कपिल भाला, सहित बड़ी संख्या में आसपास के क्षेत्रों से सैकड़ो महिलाएं पुरुष उपस्थित थे। 19 मार्च तीसरे दिन श्री राम जन्मोत्सव पर कथा होगा।
मुकेश काबरा
संजय सर्राफ
*प्रेस विज्ञप्ति*
*सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम मे दिव्यांग मंदबुद्धि निराश्रित प्रभु जी के बीच मना होली का उत्सव*
परमहंस डा० संत शिरोमणी श्री श्री 108 स्वामी सदानंद महाराज के सानिध्य मे श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के तत्वाधान मे विगत 1 वर्ष से चल रहे पीडित मानव सेवा के पावन तीर्थ स्थल मंगल राधिका सदानंद सेवाधाम पुंदाग के प्रांगण में सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम (सत्य-प्रेम सभागार) मे श्रद्धालुओ एव ट्रस्ट के सदस्यों ने आश्रम में रह रहे 37 मंदबुद्धि दिव्यांग निराश्रित प्रभु जी एवं आश्रम में रहकर उनकी सेवा करने वाले सेवाधारी यो के साथ श्री कृष्ण- राधा मंदिर के परिसर में होली खेली गई। होली के मधुर गानों में लोग खूब थरके एवं खूब मस्ती की, सबों ने आपस में अबीर- गुलाल लगाकर गले लगकर होली की शुभकामनाएं दी एवं आशीर्वाद लिया। सबों ने साथ में मिलकर स्वादिष्ट व्यंजनों, पकवानों एवं ठंडाई का भी खूब लुफ्त उठाया।
मंदिर के पुजारी अरविंद पांडे ने कहा कि होली का त्यौहार रंगों का त्यौहार है जो प्रेम, सौहार्द और जीवन की खुशियों का प्रतीक है। इसके संदेश को हम सबों को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। सद्गुरु कृपा अपना घर के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा की होली का पर्व सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। यह त्यौहार हमें बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है। इस अवसर पर अध्यक्ष डुंगरमल अग्रवाल, उपाध्यक्ष निर्मल जालान, राजेन्द्र प्रसाद अग्रवाल सचिव मनोज कुमार चौधरी पुर्णमल सर्राफ, चिरंजीलाल खण्डेलवाल, सुरेश अग्रवाल, सज्जन पाड़िया,नन्द किशोर चौधरी, संजय सर्राफ, विशाल जालान,पवन कुमार पोद्दार,सेवा साथी मुरली प्रसाद, मनोज कुमार,सत्यम कुमार,सुधीर कुमार,परमेश्वर साहु,महेश वर्मा, चन्द्रदीप साहु,हरीश कुमार सहित अन्य सदस्यगण उपस्थित थे।
प्रेस प@उक्त जानकारी सद्गुरु कृपा अपना घर आश्रम के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने दी।
टीम एबीएन, रांची। मारवाड़ी समाज में होलिका दहन की एक विशेष परंपरा है। समाज की महिलाओं द्वारा पूरे विधि विधान के साथ होलिका दहन की परंपरा को पूरा किया जाता है। प्रत्येक घर में महिलाओं के द्वारा गोबर से बना बड़कुला तैयार की जाती है, जिसे पूरे धार्मिक रीति के साथ समाज की कुरीतियों को दूर करने के संकल्प के साथ दहन किया जाता है।
मारवाड़ी महिलाएं होलिका दहन के पूर्व ठंडी होली की पूजा करती है। घर के सभी सदस्य होलिका दहन से पूर्व घर पर पूजा करने के बाद होलिका दहन के लिए प्रस्थान करते हैं। किसी के हाथ में पूजा की थाल, किसी के हाथ में बड़कुल्ला की माला, किसी के हाथ में चना गेहूं की बाली वाला डंडा होता है।
भक्त प्रहलाद के रूप में केले के छोटे थम को लड़कियों के बीच रखा जाता है, जहां स्त्रियां कच्चे धागे से उसका फेरी लेती है। होलिका दहन से पूर्व इस केले की गांछी को निकालने के बाद अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है।
शास्त्र संवत वैदिक मंत्रोंचार व पूजा के उपरांत भक्त प्रहलाद के जयकारे के साथ अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है। अग्नि प्रवेश होते ही लोग बाग इसकी परिक्रमा शुरू कर देते हैं। समाज के लोग सुखा गिरी गोला चढ़ाते हैं एवं साथ में लाए गए जो चना गेहूं आदि की बाली को सेंक कर प्रसाद के रूप में घर लेकर लौट जाते हैं। लौटते समय साथ में ले किसी बर्तन में जेल कंडे को ले जाते हैं, जिसमें गूगल डालकर उसके धुएं से घर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करते है।
मारवाड़ी समाज में नवविवाहितों महिलाओं के लिए अपने मायके में पहली होलिका दहन की पूजा विशेष व महत्व रखती है। होलिका दहन की पूजा के बाद बेटियां अपने सुख में दांपत्य जीवन हेतु इसकी चार परिक्रमा करती है तथा दूसरे दिन इस राख में से थोड़ी राख को एकत्रित कर गणगौर की पूजा आरंभ करती है जो 16 दिनों तक चलती है। गणगौर देवी पार्वती और भगवान शिव के दिव्य प्रेम को प्रदर्शित करने वाला त्यौहार है।
होली हिंदुओं का एक बड़ा महान पर्व है जो असत्य पर सत्य के विजय का प्रतीक है। हर साल फागुन मास की पूर्णिमा पर होलिका दहन और अगले दिन होली मनाई जाती है। उक्त जानकारी कांके रोड के वरिष्ठ समाजसेवी किशन गोयल ने दी।
टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा-धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि होली हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने गिले शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं और गले मिलकर होली की शुभकामनाएं देते हैं, होली से एक दिन पहले होलिका दहन मनाया जाता है, इस वर्ष होलिका दहन 13 मार्च को होगा।
होली 14 एवं 15 मार्च को मनाया जाएगा। होली का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है,कथा के अनुसार होली का त्योहार भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की जीत का प्रतीक है प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को भगवान विष्णु की पूजा करने से रोकने की कोशिश की लेकिन प्रह्लाद ने अपनी भक्ति नहीं छोड़ी।
हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को प्रह्लाद को आग में जलाने के लिए कहा लेकिन भगवान विष्णु ने प्रह्लाद की रक्षा की और होलिका को आग में जला दिया इस जीत की खुशी मनाने के लिए होली का त्यौहार मनाया जाता है। होली का त्योहार रंगों का त्यौहार है जो प्रेम, सौहार्द और जीवन की खुशियों का प्रतीक है। राधा- कृष्ण के प्रेम का प्रतीक मानी जाने वाली होली की शुरुआत बरसाने में हुई थी।
कहा जाता है कि जब राधा और कृष्ण बचपन में थे, तो वे अपने दोस्तों के साथ मिलकर रंगों से खेलते थे। यह खेल उनके प्रेम और स्नेह का प्रतीक था, जो आज भी होली के रूप में मनाया जाता है।शिवपुराण के अनुसार,पार्वती ने शिव से विवाह के लिए कठोर तपस्या की। इंद्र ने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजा।
कामदेव ने शिव पर अपने पुष्प बाण से प्रहार किया, जिससे शिव की समाधि भंग हो गयी। क्रुद्ध होकर, शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में, देवताओं ने शिव को पार्वती से विवाह के लिए राजी किया। इस घटना को याद करते हुए, फाल्गुन पूर्णिमा को होली के रूप में मनाया जाता है।
होली के रंगों का विशेष महत्व होता है यह रंग जीवन में खुशियां समृद्धि और ऊर्जा का प्रतीक है। हरा रंग का अपना एक विशेष अर्थ होता है लाल रंग प्रेम और शक्ति का, हरा रंग समृद्धि और नई शुरुआत का, पीला रंग ज्ञान और बुद्धि का, और नीला रंग शांति और विश्वास का प्रतीक है।
होली के रंग न केवल हमारे जीवन को रंगीन बनाते हैं बल्कि यह हमें जीवन की विभिन्न रंगीन पहलुओं को भी सिखाते हैं। होली का त्योहार हमारे जीवन में रंगो, खुशियों और प्रेम की महत्व को दर्शाता है यह त्यौहार हमें बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है और हमें एक दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान का भाव रखने की प्रेरणा देता है।
होली का पर्व सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है जो हमारे समाज को और भी मजबूत और खुशहाल बनाता है इसलिए हमें इस त्यौहार को पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाना चाहिए और इसके संदेश को अपने जीवन में अपनाना चाहिए।
टीम एबीएन, रांची। श्री श्याम मंडल, रांची द्वारा आयोजित तीन दिवसीय फाल्गुन सतरंगी महोत्सव का आज तीसरे दिन अग्रसेन पथ स्थित श्याम मंदिर में भव्य समापन हुआ।
इस अवसर पर राजत सिंहासन पर विराजमान श्री श्याम प्रभु का भव्य एवम नैनाभीराम श्रृंगार किया गया। अहले सुबह से ही श्री श्याम प्रभु का द्वादशी दर्शन के लिए अपार जनसमूह उमड़ पड़ा। संपूर्ण दिवस भक्तगण कतारबद्ध होकर श्री श्याम प्रभु का दर्शन कर ज्योत में आहुति प्रदान कर रहे थे।
इस अवसर पर श्री श्याम प्रभु का प्रिय खीर चूरमा का भोग अर्पित किया गया जो सम्पूर्ण दिवस प्रसाद रूपी मंदिर प्रारंग से भक्तगण के बीच वितरण किया गया। साथ ही संपूर्ण दिवस श्री श्याम मंदिर का परिसर श्याम प्रभु के जयकारों से गूंजता रहा। साथ ही भक्तों द्वारा 401 सवामणि का भोग श्याम प्रभु को निवेदित किया गया। साथ ही श्याम मंडल के सदस्यों द्वारा रात्रि 8 बजे से संगीतमय संकीर्तन पूरे मंदिर परिसर को श्याममय बना दिया।
जैसे भावपूर्ण भजनों पे श्याम भक्त झूमने पे मजबूर हो गये। रात्रि 10 बजे महाआरती एवं प्रसाद वितरण के पश्चात तीन दिवसीय श्री श्याम सतरंगी मोहत्सव का समापन किया गया।
आज के इस कार्यक्रम को सफल बनाने में राजेश सारस्वत, बालकिशन परसरामपुरिया, राकेश सारस्वत, चंद्र प्रकाश बागला, धीरज बंका, पप्पी शर्मा, अजय रूंगटा, सुदर्शन चितलंगिया, प्रदीप अग्रवाल, विकास पाड़िया का विशेष सहयोग रहा। उक्त जानकारी श्री श्याम मण्डल श्री श्याम मंदिर, अग्रसेन पथ रांची के मीडिया प्रभारी सुमित पोद्दार (9835331112) ने दी।
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