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Published / 2026-04-22 22:38:04
25 अप्रैल को धूमधाम से मनायी जायेगी सीता नवमी

  • सीता नवमी 25 अप्रैल को 
  • सीता नवमी त्याग, पवित्रता धर्म, धैर्य और आदर्श नारीत्व का पावन उत्सव : संजय सर्राफ

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि सीता नवमी जिसे जानकी नवमी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र पर्व है। यह पर्व माता सीता के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष सीता नवमी 25 अप्रैल दिन शनिवार को मनायी जायेगी। 

यह तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को पड़ती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन मिथिला बिहार के जनकपुर क्षेत्र में राजा जनक के खेत से माता सीता का प्राकट्य हुआ था। माता सीता को त्याग, पतिव्रता धर्म, सहनशीलता और आदर्श नारीत्व की प्रतिमूर्ति माना जाता है। उनका जीवन हर युग की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। 

सीता नवमी के दिन श्रद्धालु विशेष रूप से माता सीता और भगवान श्रीराम की पूजा-अर्चना करते हैं तथा व्रत रखकर सुख-समृद्धि और पारिवारिक कल्याण की कामना करते हैं।सीता नवमी का मुख्य उद्देश्य समाज में नारी के सम्मान, शक्ति और सहनशीलता के गुणों को जागृत करना है। माता सीता ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए भी धर्म और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। 

उनका जीवन यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और मर्यादा बनाये रखना ही सच्चा धर्म है। यह पर्व हमें पारिवारिक मूल्यों, निष्ठा और त्याग की भावना को सुदृढ़ करने की प्रेरणा देता है। पौराणिक कथा के अनुसार, मिथिला के राजा जनक एक बार अपने राज्य में यज्ञ की तैयारी कर रहे थे। यज्ञ स्थल की भूमि को शुद्ध करने के लिए जब वे स्वयं हल चला रहे थे, तभी धरती से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई। 

राजा जनक ने उस कन्या को ईश्वर का आशीर्वाद मानकर अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उनका नाम सीता रखा, क्योंकि वे हल की नोंक (सीत) से प्रकट हुई थीं। आगे चलकर माता सीता का विवाह भगवान श्रीराम से हुआ और उन्होंने अपने जीवन में आदर्श पत्नी और नारी धर्म का पालन करते हुए अनेक कठिन परीक्षाओं को सहन किया। इस दिन मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। महिलाएं व्रत रखती हैं और कथा श्रवण करती हैं। 

विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए माता सीता का पूजन करती हैं। कई स्थानों पर रामायण पाठ और भजन-कीर्तन का आयोजन भी किया जाता है। अंतत:, सीता नवमी केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि यह नारी शक्ति, त्याग और मर्यादा का जीवंत प्रतीक है, जो समाज को सदैव सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

Published / 2026-04-21 20:27:06
राजस्थान : सीकर में रोका गया दो बहनों का बाल विवाह

कानून को धता बताने की कोशिश नाकाम, सीकर में निषेधाज्ञा से रोका गया दो बहनों का बाल विवाह 

एबीएन सोशल डेस्क। राजस्थान के सीकर जिले के श्रीमाधोपुर में कानून को धता बताकर गुपचुप तरीके से दो बहनों के बाल विवाह को अदालती आदेशों के जरिए रोक दिया गया। जिले में यह पहला मामला है जब बाल विवाह रोकने के लिए अदालत ने निषेधाज्ञा जारी की। बाल विवाह की रोकथाम के लिए काम कर रहे नागरिक समाज संगठन गायत्री सेवा संस्थान को अपने एक सदस्य के जरिए सूचना मिली थी कि दो बहनों के बाल विवाह की तैयारी की जा रही है।

इस पर त्वरित कार्रवाई करते हुए गायत्री सेवा संस्थान, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण एवं श्रीमाधोपुर थाना पुलिस की संयुक्त टीम मौके पर पहुंची। बच्चियों के परिजनों को बाल विवाह के कानूनी पहलुओं की जानकारी देते हुए उन्हें समझाया गया और इस विवाह को रोकने के लिए नोटिस दिया गया। 
पुलिस व प्रशासनिक टीम के मौके से लौटने के बाद बच्चियों के परिजन कानून को धता बता कर गुपचुप तरीके से विवाह के प्रयास में जुटे रहे। 

अक्षय तृतीया के दिन यानी 19 अप्रैल को सूचना मिली कि दोनों बच्चियों का बाल विवाह होने जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अगले दिन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण एवं बाल अधिकारिता विभाग के सहयोग से अदालत में अर्जी दी गयी, जिस पर श्रीमाधोपुर न्यायालय के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने परिजनों को अदालत में तलब किया और निषेधाज्ञा जारी कर इस बाल विवाह को रोकने का आदेश दिया। 

दोनों बच्चियों की उम्र 15 व 17 साल है और वे स्थानीय विद्यालय में पढ़ रही हैं। इस पूरी कार्रवाई में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव डॉ. शालिनी गोयल, सीताराम जाखड़, बाल अधिकारिता विभाग से सहायक उपनिदेशक डॉ. गार्गी शर्मा, गायत्री सेवा संस्थान से नरेश कुमार सैनी, अभिषेक बगड़िया, चाइल्ड हेल्पलाइन से राकेश कुमार, राहुल दानोदिया और श्रीमाधोपुर थाना पुलिस टीम सक्रिय रूप से शामिल रही। 

बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी संगठन गायत्री सेवा संस्थान के निदेशक व राजस्थान बाल आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. शैलेंद्र पंड्या ने कहा कि यह आदेश जिले में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (पीसीएमए) 2006 के तहत पहली न्यायिक निषेधाज्ञा है जो भविष्य में ऐसे मामलों में एक नजीर पेश करेगी। 

यह न केवल दो बालिकाओं के जीवन को सुरक्षित करने की दिशा में एक ठोस कदम है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि अब बाल विवाह जैसे अपराधों के विरुद्ध कानूनी हस्तक्षेप और प्रभावी एवं सख्त हो रहा है।  जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने अदालती आदेश की प्रशंसा करते हुए कहा कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए हमारे देश में कानून हमेशा से सख्त और प्रगतिशील रहे हैं। जरूरत इन कानूनों पर गंभीरता से अमल की है। 

इस तरह की निषेधाज्ञाएं एक स्पष्ट संदेश देती हैं कि कानून के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता और बाल विवाह किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में जिस तरह से सरकार, समाज व न्यायपालिका बाल विवाह के खिलाफ एकजुटता व दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं, उससे उम्मीद जगी है कि हम जल्द ही बाल विवाह मुक्त राजस्थान के सपने को पूरा होते देखेंगे। इस खबर से संबंधित और जानकारी के लिए जितेंद्र परमार (8595950825) से संपर्क करें।

Published / 2026-04-21 12:03:38
भारतीय संस्कृति में साहस, ऊर्जा और अनुशासन का प्रतीक है मंगलवार

  • भारतीय संस्कृति में साहस, ऊर्जा और अनुशासन का प्रतीक है मंगलवार

एबीएन सोशल डेस्क। मंगलवार का दिन भारतीय संस्कृति में साहस, ऊर्जा और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व का संतुलन काफी गहरा है।

आध्यात्मिक महत्व

अध्यात्म में मंगलवार को मङ्गल यानी शुभता और कल्याण का कारक माना गया है।

  1. हनुमान जी और मंगल देव: यह दिन मुख्य रूप से हनुमान जी और मंगल देव (Mars) को समर्पित है। हनुमान जी संकटमोचन हैं, इसलिए इस दिन उनकी पूजा जीवन से बाधाओं और भय को दूर करने के लिए की जाती है।
  2. शक्ति और साहस का प्रतीक: मंगलवार को नई शुरुआत और कठिन कार्यों को संपन्न करने के लिए उपयुक्त माना जाता है। यह दिन मानसिक दृढ़ता और आत्म-नियंत्रण (Self-discipline) का प्रतीक है।
  3. ऋण मुक्ति: ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस दिन ऋण मोचक मंगल स्तोत्र का पाठ करने से पुराने कर्जों से मुक्ति मिलने की धारणा है।

वैज्ञानिक और खगोलीय महत्व

प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान (ज्योतिष शास्त्र) के अनुसार, हर दिन का नाम एक विशेष खगोलीय पिंड (Planet) के प्रभाव पर आधारित है।

  1. मंगल ग्रह (Planet Mars): इस दिन का स्वामी मंगल ग्रह है। खगोलीय दृष्टि से मंगल को लाल ग्रह कहा जाता है। इसमें आयरन ऑक्साइड की अधिकता के कारण यह उग्र और ऊर्जावान दिखता है।
  2. ऊर्जा का प्रवाह: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, सप्ताह के दिनों का वर्गीकरण हमारे शरीर के भीतर के ऊर्जा चक्रों (Energy Centers) से भी जुड़ा है। मंगलवार को शरीर में रक्त संचार और पित्त (Metabolic energy) की सक्रियता अधिक मानी जाती है।
  3. मनोवैज्ञानिक प्रभाव: मंगल नाम स्वयं सकारात्मकता का संचार करता है। जब हम किसी दिन को शुभ मानकर कार्य करते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में डोपामाइन का स्तर बेहतर होता है, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है।

संक्षेप में प्रभाव

श्रेणी प्रभाव 

  • तत्व अग्नि (Fire) 
  • गुण पराक्रम और अनुशासन 
  • रंग लाल (ऊर्जा और रक्त का प्रतीक) 

मंगलवार हमें यह सिखाता है कि शक्ति का सही उपयोग और मन पर विजय प्राप्त करना ही वास्तविक मंगल है। यथार्थ शिक्षा सेवा जय हो।

Published / 2026-04-20 22:44:46
सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए जन जन में गौरवशाली परंपरा एवं स्व का बोध आवश्यक : अंबरीष सिंह

  • सनातन संस्कृति की रक्षा  के लिए जन जन में गौरवशाली परंपरा एवं स्व का बोध आवश्यक : अंबरीष सिंह

टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद रांची महानगर द्वारा रांची के ग्रीन होरिजन में प्रबुद्ध जन विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय मंत्री एवं केंद्रीय विशेष संपर्क प्रमुख अंबरीष सिंह ने उपस्थित विशिष्ट जनों को संबोधित करते हुए  प्राचीन भारत की ऋषि  परंपरा का उल्लेख किया।धर्म व समाज रक्षा हेतु सर्वस्व समर्पण की सनातन परंपरा की चली आ रही श्रृंखला का स्मरण कराया। भारत के हिंदू मान बिंदुओं की रक्षा के लिए सतत लड़ते रहे यह जानते हुए भी कि तोपों के सामने तलवारें कितनी देर टिक पायेंगी लड़ते रहे, बलिदान होते रहे।

महापुरुषों एवं संतों ने धर्म एवं मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर किये।  उन्होंने बताया कि रामजन्मभूमि मन्दिर निर्माण जो अपने जीवन काल मे हम देख पा रहे है। उसकी शौर्य गाथा हमे कभी नही भूलना चाहिए। सैकड़ो वर्षों की प्रतीक्षा 76 बार के  युद्ध में हमारा पराक्रम, पौने चार लाख रामभक्तो का बलिदान जिसके कारण हिन्दू गौरव का परिचय हमने विश्व को कराया है।

हमने कभी भी  विदेशी आक्रांताओं को चैन की नींद नही लेने दी, कभी चन्द्रगुप्त मौर्य कभी छत्रपति शिवाजी तो कभी महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह जैसे अपने महान योद्धाओं के नेतृत्व में शौर्य का परिचय देकर अनेको बार उन्हें उखाड़ फेंका है। सनातन की गौरवशाली परंपरा को बचाए रखने के लिए हिंदुत्व का बोध होना आवश्यक है। रामायण महाभारत एवं अन्य पौराणिक ग्रंथो को मात्र पढ़ना नहीं बल्कि अपने दैनिक जीवन एवं आचरण में भी उतारना आवश्यक है। 

सनातन की रक्षा एवं संवर्धन के लिए प्रत्येक हिंदू में स्व  का बोध हो, परिवारों में संस्कार की रक्षा हो, सामाजिक समरसता का भाव विकसित हो। इसके पूर्व विश्व हिंदू परिषद के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत रायपत ने उपस्थित विद्वत जनों का स्वागत एवं कार्यक्रम की भूमिका रखी। प्रांत मंत्री मिथिलेश्वर मिश्र ने कार्यक्रम का संचालन किया धन्यवाद ज्ञापन महानगर अध्यक्ष कैलाश केसरी ने किया।

कार्यक्रम में भारत सेवाश्रम संघ के स्वामी भूतेशानंद जी महाराज, गुवाहाटी और पटना क्षेत्र के धमार्चार्य संपर्क प्रमुख वीरेंद्र विमल, क्षेत्र मंत्री डॉ वीरेंद्र साहू, क्षेत्र संगठन मंत्री आनंद पांडे, प्रांत उपाध्यक्ष गंगा प्रसाद यादव, प्रांत संगठन मंत्री चितरंजन कुमार, संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सिद्धनाथ सिंह, भारत के रक्षा राज्य मंत्री एवं रांची के सांसद संजय सेठ, रेखा जैन, प्रांत संयोजक रंगनाथ महतो, मदन बगड़िया, मनोज पांडे, प्रकाश रंजन, दीपा रानी कुंज, अनिमा पांडे, कीर्ति गौरव, रवि शंकर राय, अमर प्रसाद, अशोक अग्रवाल, श्रीदेव सिंह, डॉक्टर सुष्मिता पांडे, अमरेंद्र विष्णुपुरी, अमरनाथ ठाकुर, शंकर दुबे, ललन सिंह पंकज सहित अनेक प्रबुद्ध जन उपस्थित थे। उक्त जानकारी विश्व हिंदू परिषद, झारखंड के प्रचार-प्रसार प्रांत प्रमुख प्रकाश रंजन ने दी।

Published / 2026-04-20 21:19:41
ऐतिहासिक रामनगरी चुटिया हुई शिवमय

सुरेश्वर महादेव मंदिर के वार्षिकोत्सव पर कलश यात्रा में शामिल हुई हजारों महिलाएं 

दस हजार से ज्यादा शिव भक्तों ने भंडारा में ग्रहण किया प्रसाद  

टीम एबीएन, रांची। रामनगरी चुटिया सोमवार को पूरी तरह शिवमय हो गया। स्वर्ण रेखा घाट स्थित सुरेश्वर महादेव मंदिर के चतुर्थ स्थापना दिवस पर आयोजित वार्षिकोत्सव के मौके पर निकाली गयी कलश यात्रा में हजारों की संख्या में माताएं बहने और शिव भक्तों ने भाग लिया। 

मौके पर रामनगरी चुटिया पूरी तरह शिवमय हो गयी। कलश यात्रा में ढोल नगाड़ा मांदर तुरही के बीच ओम नम: शिवाय और हर हर महादेव के नारे से पूरी चुटिया गूंजती रही। कलश यात्रा के शामिल शिव भक्तों का स्वागत करने के लिए रास्ते के दोनों और श्रद्धालु उनकी अगवानी के लिए खड़े थे। यात्रा में शामिल शिव भक्तों पर कई स्थानों पर पुष्प वर्षा की गयी। 

कलश यात्रा में  यजमान के रूप में मंदिर के संस्थापक अध्यक्ष सुरेश साहू पत्नी रेणु, आलोक कुमार अपनी पत्नी सरिता कुमार, रामशरण तिर्की अपनी पत्नी डॉक्टर चिंतामणि सांगा और रुपेश केसरी अपनी पत्नी शशि केसरी के साथ कलश लिए सबसे आगे चल रहे थे। चुटिया के कमलू तालाब से जल लेकर महिलाएं वापस मंदिर परिसर लौटकर आये और बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक किया। सुबह दस बजे से रूद्राभिषेक किया गया जो कि लगभग एक बजे तक चला पूरा मंदिर शिवमय हो गया। 

कलश यात्रा  कलश में जल भरने के पूर्व शांतेश्वर पुरोहित शशिकांत पांडे और पुरोहित सच्चिदानंद बाबा ने मंत्रोच्चार  के साथ जल भरने की विधि संपन्न कराई। कलश में जल भरने के पश्चात कलश यात्रा वापस मंदिर परिसर पहुंचा, जहां पूरे विधि विधान के साथ उपरोक्त पुरोहितों ने  धूमधाम के साथ पूजा अर्चना की। पूजा के बाद महाभंडारा का आयोजन हुआ जिसमें हजारों की संख्या में शिव भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया। 

कार्यक्रम के आयोजन में मंदिर कमेटी के महासचिव संतोष कुमार, युवा अध्यक्ष विक्रम साहू, मीडिया  प्रभारी रतन लाल, कृष्णा साहू, गुजा तिर्की, केशव केसरी, रणजीत रामृ, रूपेश केसरी, कलेश्वर साहू, संजय कुमार, नंदकिशोर ठाकुर, विक्रम साहू, संजय कुमार, कृष्णा कुमार, रितिक राज, धनंजय सिंह, मनपूरन नायक, ललिता महतो, सरिता देवी, किरण देवी, शत्रु नायक, राकेश साहू, किशोर नायक, मुकेश केसरी, केशव केसरी, गौतम साहू, निक्की साहू, बबलू साहू आदि ने अहं भूमिका निभायी।

Published / 2026-04-19 20:38:53
अक्षय तृतीया पर गायत्री सेवा संस्थान और प्रशासन के प्रयासों से रुके 13 बाल विवाह

  • अक्षय तृतीया पर गायत्री सेवा संस्थान और प्रशासन के प्रयासों से रुके 13 बाल विवाह

एबीएन सेंट्रल डेस्क। राजस्थान में बाल अधिकारों की सुरक्षा व बाल विवाहों की रोकथाम के लिए कार्यरत नागरिक समाज संगठन गायत्री सेवा संस्थान ने प्रशासन के सहयोग से अक्षय तृतीया के मौके पर होने जा रहे 13 बाल विवाह रुकवाए। इनमें से उदयपुर जिले में नौ, प्रतापगढ़ जिले में दो और सीकर जिले में दो बाल विवाह रोके गए।

बाल कल्याण समिति, उदयपुर की कार्यकारी अध्यक्ष यशोदा पणिया ने बताया कि संस्थान की सूचना के बाद प्रशासन एवं उदयपुर की डबोक थाना पुलिस ने एक गांव में छह बाल विवाह रुकवाए। साथ ही पटवारी, ग्राम सचिव व सरपंच को थाने में बुलाकर उन्हें राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले के बारे में जानकारी दी गई। 

हाई कोर्ट ने बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम कर रहे नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसले में किसी भी गांव में बाल विवाह को रोकथाम में विफलता के लिए ग्राम पंचायतों की जवाबदेही तय करते हुए कहा था कि इसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाएगा। संगठन ने सुरक्षा के दृष्टिगत एक बालक व बालिका को आश्रय गृह भी भेजा।

इस मौके पर बाल कल्याण समिति के साथ उदयपुर में गायत्री सेवा संस्थान के जिला समन्वयक नितिन पालीवाल,काउंसलर पायल कनेरिया, चाइल्ड हेल्प लाइन से शंकर भोई, डबोक पुलिस थाने से बाल कल्याण अधिकारी मुकेश खटीक, प्रतापगढ़ में संस्थान के रामचंद्र मेघवाल व सीकर जिले में नरेश सैनी पूरी टीम के साथ मौजूद थे।

गायत्री सेवा संस्थान के निदेशक डॉ. शैलेन्द्र पंड्या ने बताया कि संस्थान ने प्रदेश के पांच जिलों में अक्षय तृतीया पर बाल विवाहों के बारे में सूचना देने वाले को 1100 रुपए का पुरस्कार देने का एलान किया था। साथ ही कहा था कि सूचना देने वाले की पहचान को गोपनीय रखा जाएगा।

 संस्थान ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बाल कल्याण समिति और चाइल्ड हेल्प लाइन के साथ मिलकर पूरे एक महीने तक यह अभियान चलायाl संस्थान ने बाल विवाहों की रोकथाम के लिए सूचना देने वालों के लिए एक नंबर भी जारी किया था।

उन्होंने बताया कि गायत्री सेवा संस्थान बाल विवाह के लिहाज से संवेदनशील अक्षय तृतीया जैसे विशेष रूप से संवेदनशील मौकों पर प्रशासन व सरकार के सहयोग से इसकी रोकथाम के लिए विशेष अभियान चलाता रहा है। 

साथ ही, संगठन ने भारत सरकार के बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के 100 दिवसीय गहन जागरूकता अभियान में सहयोग देने के लिए बाल विवाह मुक्ति रथ भी निकाला था। इस रथ ने पांच जिलों में हजारों किलोमीटर की यात्रा की और आम जन तक बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता का संदेश पहुंचाया। उन्होंने कहा कि इन अभियानों से जागरूकता बढ़ी है और हालात बदले हैं। अब लोग बाल विवाहों की सूचना दे रहे हैं और प्रशासन तुरंत इसकी रोकथाम के लिए कार्रवाई कर रहा है।

गायत्री सेवा संस्थान, उदयपुर देश में बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन का सहयोगी संगठन है। इसने हाल ही में अदालती लड़ाई के बाद दो बाल विवाह खारिज करवाए हैंl 

डॉ. पंड्या ने बताया कि उनके प्रयासों से जनजातीय अंचल में बाल विवाह की रोकथाम के लिए राज्य में पहली बार अदालत से निषेधाज्ञा भी जारी करवाई गई। साथ ही संस्थान जिला प्रशासन, पंचायतों, स्कूलों और धर्मगुरुओं के साथ मिलकर जिले को बाल विवाह मुक्त बनाने के लिए स्कूलों, पंचायतों और गांवों में बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता अभियान चला रहा है और जिले में हजारों लोगों को बाल विवाह के खिलाफ शपथ दिलाई है।

Published / 2026-04-19 20:33:46
झारखण्ड चित्रांश विचार मंच ने किया चित्रांश मंजूषा-3 का भव्य विमोचन

  • झारखण्ड चित्रांश विचार मंच ने किया चित्रांश मंजूषा-3 का भव्य विमोचन

टीम एबीएन, रांची। झारखण्ड चित्रांश विचार मंच द्वारा प्रकाशित चित्रांश मंजूषा-3 स्मारिका का भव्य विमोचन समारोह आज पलाश ऑडिटोरियम, वन भवन, डोरंडा में आयोजित किया गया। इस अवसर पर साहित्य, कला एवं संस्कृति के विविध आयामों का संगम देखने को मिला।

कार्यक्रम में 12 वर्षीय बाल कलाकार अबीर दयाल सत्संगी ने अपने मधुर स्वर में सांसों की माला भजन की प्रस्तुति देकर उपस्थित दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

कार्यक्रम के दौरान चित्रांश मंच के योगदान एवं समाज में उसकी भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया। कहा गया कि मंच का उद्देश्य ऐसे व्यक्तित्वों को प्रोत्साहित करना है, जो दूसरों के दुख को अपना समझते हैं, सच्चाई एवं सेवा के मार्ग पर चलते हैं और समाज में भलाई का वातावरण स्थापित करते हैं, वही सच्चे अर्थों में “चित्रांश” कहलाते हैं।

झारखण्ड चित्रांश विचार मंच के उपाध्यक्ष सह पत्रिका संपादक राजीव सहाय ने कहा कि चित्रांश मंजूषा-3 केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि समाज की संवेदनाओं, संस्कारों और सृजनशीलता का दस्तावेज है। हमारा प्रयास है कि मंच के माध्यम से साहित्य, कला और सामाजिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। आज का यह आयोजन उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें कलाकारों एवं साहित्यकारों ने अपनी प्रतिभा से इसे सफल बनाया है। कार्यक्रम के अंत में सभी कलाकारों, साहित्यकारों एवं उपस्थित अतिथियों का आभार व्यक्त किया गया।

कार्यक्रम में सांसद (राज्यसभा) दीपक प्रकाश, गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष राजीव रंजन प्रसाद मुख्य रूप से उपस्थित थे। कार्यक्रम को सफल बनाने में मंच के सदस्य डॉ राघव शरण, प्रेमचंद श्रीवास्तव, अध्यक्ष संजय पीपरवाल , सचिव प्रखर जयपुरियार, पंकज पियूष, आनंद श्रीवास्तव, दिवाकर, कोषाध्यक्ष साकेत बिहारी शरण, उपाध्यक्ष साकेत शरण ने मुख्य भूमिका निभाई। मंच संचालन श्वेता सिन्हा ने किया। इस अवसर पर काफी संख्या में मंच के सदस्य एवं शहर के गणमान्य उपस्थित थे। उक्त जानकारी झारखण्ड चित्रांश विचार मंच के उपाध्यक्ष राजीव सहाय ने दी।

Published / 2026-04-18 21:01:38
परशुराम जयंती धर्म, सत्य, पराक्रम और न्याय के प्रतीक का पावन पर्व : संजय सर्राफ

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में भगवान परशुराम को न्याय, पराक्रम और धर्म की स्थापना का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष परशुराम जयंती 20 अप्रैल को मनायी जायेगी। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आता है, जो कि अत्यंत शुभ और पुण्यदायी मानी जाती है। 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम का जन्म अत्याचार और अधर्म के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के लिए हुआ था। वे महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, जिन्होंने पृथ्वी पर अन्याय करने वाले क्षत्रियों का नाश कर धर्म की पुन: स्थापना की। उनके हाथ में धारण किये गये फरसे (कुल्हाड़ी) के कारण उनका नाम परशु-राम पड़ा। 

परशुराम जयंती केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि सत्य, साहस और न्याय के प्रति अडिग रहने की प्रेरणा देने वाला पर्व है। यह दिन हमें सिखाता है कि जब समाज में अन्याय और अत्याचार बढ़े, तो उसका डटकर सामना करना चाहिए। भगवान परशुराम का जीवन त्याग, तपस्या और कर्तव्यनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण है। वे एक ऐसे योद्धा ब्राह्मण थे, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र और शास्त्र दोनों का संतुलन बनाए रखा। 

इस पर्व का मुख्य उद्देश्य समाज में नैतिकता, धर्म और कर्तव्य के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। साथ ही, यह दिन ब्राह्मण समाज के लिए विशेष महत्व रखता है, जो भगवान परशुराम को अपना आराध्य मानते हैं। परशुराम जयंती के दिन श्रद्धालु प्रात: स्नान कर व्रत रखते हैं और भगवान परशुराम की पूजा-अर्चना करते हैं। 

मंदिरों में विशेष भजन-कीर्तन, हवन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। कई स्थानों पर शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं, जिनमें भगवान परशुराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों का चित्रण किया जाता है। दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता करना भी इस दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।

परशुराम जयंती हमें धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा में आगे बढ़ाने का संदेश भी देता है। आज के समय में, जब नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, भगवान परशुराम का जीवन हमें साहस, संयम और कर्तव्य परायणता का मार्ग दिखाता है। यही इस पावन पर्व की सबसे बड़ी सार्थकता है।

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