टीम एबीएन, रांची। रांची सहित झारखंड के विभिन्न शहरों में मारवाड़ी समाज की महिलाओं ने परंपरा, आस्था और उत्साह के साथ होली पर्व का शुभारंभ किया। झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि समाज की महिलाओं ने राजस्थानी पारंपरिक वेशभूषा, विशेष रूप से रंग-बिरंगी ओढ़नी धारण कर विधि-विधानपूर्वक डांडा रोपण की रस्म निभाई। इसके पश्चात ठंडी होली की पूजा श्रद्धा और भक्ति भाव से संपन्न की गयी।
उन्होंने कहा कि डांडा रोपण मारवाड़ी समाज की प्राचीन परंपरा है, जो होली पर्व के शुभारंभ का प्रतीक मानी जाती है। महिलाएं पारंपरिक गीतों का गायन करते हुए परिवार और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। ठंडी होली की पूजा के दौरान विशेष रूप से मंगलकामना, सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है।
3 मार्च को प्रात: लगभग 5 बजे पूरे विधि-विधान के साथ होलिका दहन किया गया। इस अवसर पर समाज के गणमान्य लोग एवं बड़ी संख्या में परिवार उपस्थित रहे। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय तथा नकारात्मकता के दहन का प्रतीक है।
श्रद्धालुओं ने अग्नि की परिक्रमा कर नयी ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लिया। संजय सर्राफ ने कहा कि इस प्रकार के धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन समाज को एकजुट करने के साथ-साथ नयी पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं।
टीम एबीएन, रांची। रांची के चुटिया नगरी की ऐतिहासिक होली के अवसर पर बीते रविवार को परंपरा के अनुसार होलिका दहन फगुआ का रस्म पूरी करने की तैयारी है। लगभग 500 वर्षों से होलिका दहन और होली उत्सव की एक अनूठी परंपरा निभायी जा रही है, जो झारखंड में सबसे पहले होलिका दहन के लिए जानी जाती है।
देर रात मुहूर्त के अनुसार सर्वप्रथम ग्राम पाहन स्नान कर नये वस्त्र पहन एक लोटा जल व फरसा लेकर डोल जतरा मैदान में फगुआ काटने के लिए आये और एक ही वार में अरंडी की डाल काट कर बिना पीछे मुड़े घर प्रस्थान किया। इसके बाद श्रीराम मंदिर के महंत ने पूजा अर्चना कर होलिका प्रज्ज्वलित कर आरती की। इससे पूर्व रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये।
राजधानी रांची का ऐतिहासिक स्थल चुटिया, जो कभी नागवंशी राजाओं की राजधानी रही। आज भी अपनी समृद्ध परंपराओं और आस्था की विरासत को संजोए हुए है। वर्ष 1685 में स्थापित राम मंदिर, जिसे राधाबल्लभ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, यहां की धार्मिक पहचान का केंद्र है। इसी मंदिर परिसर के पास लगभग 500 वर्षों से होलिका दहन और होली उत्सव की एक अनूठी परंपरा निभायी जा रही है, जो झारखण्ड में सबसे पहले होलिका दहन के लिए जानी जाती है।
चुटिया में होलिका दहन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। मान्यता है कि नागवंशी राजाओं के समय से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है। जैसे ही यहां होलिका दहन संपन्न होता है, पूरे क्षेत्र में होली के उत्सव की शुरूआत मानी जाती है। आज होलिका दहन किया गया जिसमें सैकड़ों श्रद्धालु इस पावन क्षण के साक्षी बनने के लिए एकत्र हुए।
राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य कैलाश कुमार केसरी ने बताया कि 16वीं शताब्दी में महाराजा उदयनाथ प्रताप सहदेव चुटियागढ़ के राजा हुआ करते थे और चुटिया नागवंशी राजा की राजधानी हुआ करती थे। उस समय की प्रथा थी कि होली के दो दिन पहले दूसरे राज्यों के राजाओं को होली का न्यौता भेजा जाता था। राजा पहले फगुआ काटेंगे उसके बाद ही अन्य लोग फगुआ काटेंगे। वहीं मान्यता अब भी चलती आ रही है कि यहां होली से दो दिन पहले ही राम मंदिर अगजा कटती है और यह अगजा पाहन काटते हैं। पाहन मुंडा समाज से आते हैं।
पाहन के अगजा काटने के बाद राम मंदिर के महंत पूजा पाठ करके आरती होलिका का करते हैं। वहीं चार मार्च को फगडोल जतरा यात्रा निकाली जायेगी। साहू ने बताया कि चार मार्च को लोग सुबह से ही रंगोंवाली होली खेलेंगे। दोपहर एक बजे के बाद नहा-धोकर नये वस्त्र पहनकर लोग फग डोल जतरा यात्रा के लिए निकलेंगे। दिन के लगभग दो बजे प्राचीन राम मंदिर से भगवान के विग्रहों को डोली में बिठाकर निकाला जायेगा।
राम मंदिर के पास स्थित डोल जतरा मैदान में विग्रहों को चबूतरा में रखा जायेगा। चुटिया के अन्य प्राचीन मंदिर जैसे लोअर चुटिया स्थित राधा कृष्ण मंदिर, साहू टोली स्थित राम मंदिर व हनुमान मंदिर से भी भगवान के विग्रहों को डोली में बिठाकर डोल जतरा मैदान में लाया जायेगा। साहू ने बताया कि चुटिया में फग डोल जतरा यात्रा वृंदावन की तर्ज पर होता है। यहां यह परंपरा वर्ष 1685 से चली आ रही है।
एबीएन सोशल डेस्क। आज प्रातःकालीन वंदनीय वाणी में गुरुदेव ने जैन दर्शन के मूल तत्व सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र की महिमा का अत्यंत सरल और गूढ़ विवेचन किया। पहले दर्शन, फिर ज्ञान, फिर चरित्र, मुनी श्री ने स्पष्ट कहा - आध्यात्मिक उन्नति का क्रम उल्टा नहीं होता पहले सम्यक दर्शन होता है सही दृष्टिकोण, सही श्रद्धा। उसके बाद सम्यक ज्ञान प्रकट होता है। वस्तु को जैसी है वैसी जानना। जब ज्ञान शुद्ध हो जाता है, तब चरित्र स्वतः सम्यक बन जाता है।
यदि दृष्टि ही विकृत हो, तो ज्ञान भी विकृत होगा और आचरण भी असंतुलित रहेगा। इसलिए जैन धर्म में सबसे पहले श्रद्धा की शुद्धि पर बल दिया गया है। उन्होंने दर्पण का उदाहरण से बताया की आत्मा का स्वभाव किस प्रकार का होता हैं। गुरुदेव ने अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया दर्पण का कार्य छवि को झलकाना नहीं है, बल्कि उसका स्वभाव ही ऐसा है कि जो उसके संपर्क में आता है, वह प्रतिबिंबित हो जाता है।
इसी प्रकार आत्मा का स्वभाव शुद्ध, चेतन और ज्ञानमय है। परंतु जब वह कर्मों के संपर्क में आती है, तो उसकी शुद्धता ढँक जाती है। दर्पण स्वयं गंदा नहीं होता, उस पर धूल जम जाती है। आत्मा अशुद्ध नहीं होती, उस पर कर्मों का आवरण आ जाता है। इसलिए हमें दर्पण को तोड़ना नहीं, बल्कि धूल हटानी है। उसी प्रकार आत्मा को बदलना नहीं, कर्मों को क्षीण करना है।
यह देह नहीं, यह नाम नहीं, यह संबंध नहीं, इन सब से परे जो चेतना है, वही आत्मा स्वरूप मैं हूँ। फिर प्रश्न आता है मैं कौन हूँ? क्या मैं शरीर हूँ? क्या मैं पद-प्रतिष्ठा हूँ? या मैं शुद्ध, अनंत ज्ञान-स्वरूप आत्मा हूँ? जब यह विवेक जागता है, तब तीसरा प्रश्न उठता है मुझे क्या करना है? और यहीं से साधना प्रारंभ होती है । जैन आगमों में कहा गया है कि मोक्ष का मार्ग सम्यक्त्रय से ही प्रशस्त होता है।
सही श्रद्धा, सही ज्ञान, सही आचरण। यदि श्रद्धा दृढ़ है, तो ज्ञान प्रकाशित होगा। यदि ज्ञान प्रकाशित है, तो आचरण पवित्र होगा। और जब आचरण पवित्र होगा, तब आत्मा का स्वभाव स्वतः प्रकट होगा। आज के प्रवचन का सार यही है हम बाहर की दुनिया को बदलने में लगे हैं, परंतु वास्तविक साधना भीतर की है।
दर्पण को साफ कीजिए, प्रतिबिंब स्वयं उज्ज्वल होगा। आत्मा को कर्म मल से मुक्त कीजिए, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और अनंत सुख स्वयं प्रकट हो जाएगा। प्रवचन के दौरान मंत्री जीतेन्द्र छाबड़ा, अध्यक्ष प्रदीप बाकलीवाल, प्रमोद झाँझरी, विनोद झाँझरी , धर्मचन्द पाटोदी, के अलावा कई श्रद्धालु उपस्थित थे।यह जानकारी मीडिया प्रभारी राकेश काशलीवाल ने दी।
टीम एबीएन, रांची। श्रीराम नगर, चुटिया स्थित श्री राम मंदिर परिसर में विराट हिंदू सम्मेलन का भव्य आयोजन श्रद्धा, उत्साह और व्यापक जनभागीदारी के साथ संपन्न हुआ। सम्मेलन में शहर एवं आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग उपस्थित हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में एकता, समरसता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रभाव को सुदृढ़ करना बताया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ चुटिया स्थित्त राममंदिर के प्रांगण से कलश यात्रा निकली गयी, जिसमें बड़ी संख्या में मत्री शक्ति ने बढ़ चढ़ कर भाग लियो एवं इस शोभा यात्रा में हनुमान गाढ़ी में महंत एवं राम मंदिर के महंत जी को रथ पर बिठाकर कार्यक्रम स्थल तक गाजे बजे के साथ लाया गया। कार्यक्रम वैदिक मंत्रोच्चार एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
प्रारंभिक संबोधन में श्री राम मंदिर, चुटिया के महंत ने कहा कि सम्मेलन में उपस्थित जनसमूह केवल संख्या नहीं, बल्कि जागृत और संगठित समाज की प्रतीक शक्ति है। उन्होंने वेद मंत्र संगच्छध्वं संवदध्वं का उल्लेख करते हुए कहा कि साथ चलना, साथ बोलना और एक लक्ष्य के लिए संगठित होना ही समाज की वास्तविक शक्ति है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सनातन समाज को संगठित करने की आवश्यकता पहले से अधिक है और ऐसे सम्मेलन समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं।
अयोध्या के हनुमान गढ़ी के महंत श्री राजू दास जी ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के संदर्भ में आयोजित इस सम्मेलन के व्यापक उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पिछले 100 वर्षों में संघ ने समाज को संगठित करने, राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करने का निरंतर प्रयास किया है। उन्होंने प्रश्न रखा कि देश सुरक्षित कैसे रहे, आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान और परंपरा से जुड़ी कैसे रहें और भारत पुन: किसी प्रकार की दासता का शिकार न हो—इन सभी विषयों पर संघ ने निरंतर चिंतन और कार्य किया है।
उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए हुए दीर्घकालिक संघर्ष और लाखों रामभक्तों के त्याग एवं बलिदान का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल मंदिर निर्माण का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ऐसे ऐतिहासिक संघर्षों की स्मृति हमें संगठित रहने और अपनी आस्था व परंपराओं की रक्षा करने की प्रेरणा देती है। उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष के अवसर पर देश के लगभग एक लाख गांवों में हिंदू सम्मेलन आयोजित किये जा रहे हैं, जिनमें करोड़ों लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है।
संघ के सह-सरकार्यवाह आलोक जी ने अपने विस्तृत संबोधन में संगठन की शक्ति और एकता के महत्व को महाभारत के प्रसंग के माध्यम से स्पष्ट किया। उन्होंने देवताओं और असुरों के युद्ध की कथा का उदाहरण देते हुए कहा कि बिखराव पराजय का कारण बनता है, जबकि एकता विजय का मार्ग प्रशस्त करती है। संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम् मंत्र का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि जब लोग साथ चलते और साथ बोलते हैं, तो उनके मन भी एक हो जाते हैं और यही एकता किसी भी चुनौती का सामना करने की वास्तविक शक्ति है।
उन्होंने कहा कि हिंदू समाज अपनी विविधता और उदारता के लिए जाना जाता है। अलग-अलग उपासना पद्धतियां, देवी-देवताओं के प्रति अलग-अलग आस्थाएं और विभिन्न परंपराएं हमारी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक हैं। किंतु समय-समय पर एक नाम और एक उद्देश्य के लिए संगठित होना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने सामाजिक समरसता पर बल देते हुए छुआछूत की भावना समाप्त करने का आह्वान किया। संत रविदास, मीराबाई और महर्षि वाल्मीकि जैसे महापुरुषों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में जन्म नहीं, बल्कि कर्म और भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
उन्होंने पंच परिवर्तन की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि समाज में समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी भावना और नागरिक कर्तव्य का पालन ये सभी परिवर्तन आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि परिवार भारतीय समाज की मूल इकाई है और परिवार में संवाद, संस्कार एवं सामूहिकता की परंपरा को पुनर्जीवित करना समय की आवश्यकता है। भारत ने अनेक आक्रमणों और चुनौतियों के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को इसलिए सुरक्षित रखा क्योंकि परिवारों ने अपने मूल्यों को जीवित रखा।
पर्यावरण संरक्षण पर बोलते हुए उन्होंने रांची की बदलती पर्यावरणीय स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित किया और कहा कि जो शहर कभी स्वच्छ वातावरण के लिए प्रसिद्ध था, वहां आज वायु गुणवत्ता चिंताजनक स्तर पर पहुंच रही है। इसे संतुलित करने के लिए सामूहिक जागरूकता और प्रयास आवश्यक हैं। साथ ही उन्होंने संविधान के अनुरूप नागरिक कर्तव्यों के पालन, सामाजिक सद्भाव और सकारात्मक आचरण को समाज की प्रगति का आधार बताया। कार्यकम मे बच्चों द्वारा रानी लक्ष्मीबाई की वीरता एवं लव जेहाद पर प्रस्तुत किये गये लघु नाटिका आकर्षण का केंद्र रही।
सम्मेलन में संत समाज के प्रतिनिधियों, मातृ शक्ति, गायत्री परिवार, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू जागरण मंच, मंदा पूजा समिति चुटिया तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की सक्रिय उपस्थिति रही। कार्यक्रम में गिरधारीलाल महतो, विशाल जी, गोपाल शर्मा, मिथिलेश्वर मिश्र, अशोक प्रधान, राजीव बिट्टू, विजय कुमार, राजू शर्मा, शिवम केशरी, शंकर सिंह, रत्न केशरी, शैलेंद्र कुमार, अरुण कुमार, विक्रम शर्मा, महेंद्र जी एवं विभाग प्रचारक मंटू जी सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत एवं सामूहिक संकल्प के साथ हुआ, जिसमें समाज की एकता, समरसता और राष्ट्रभक्ति को सुदृढ़ करने का आह्वान किया गया। सम्मेलन ने उपस्थित जनसमूह में संगठन, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को और अधिक प्रगाढ़ करने का संदेश दिया।
टीम एबीएन, रांची। श्री जैन श्वेतांबर ओसवाल संघ का होली मिलन समारोह आज धूमधाम से डोरंडा कन्या पाठशाला में संपन्न हुआ। आज के कार्यक्रम में सभी ने एक- दूसरे को रंग लगाकर उनका स्वागत किया! बच्चों एवं बच्चियों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ साथ होली के नृत्य पेश किया।
रिद्धि बांठिया ने नवकार महामंत्र के साथ नृत्य प्रस्तुत करते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की। राजस्थान से पधारे कलाकार पंकज दोजख, रवि दोजख एवं उनके साथी कलाकारों ने चंग, ढ़ोल बजाते हुए होली के मन भावन गीतों को प्रस्तुत किया तथा मनोहर नृत्य प्रस्तुत किये गये।
होली के पारंपरिक गीतों में मुख्य रूप से बाईसा रा वीरा... जयपुर आता तों लाज्यो... तारा री चुनरी, थारे साथे कोनी चालू... ओ रे बालम रसिया, रंग बरसे... भीगे चुनर वाली..., झीनी-झीनी उड़े रे गुलाल आज म्हारे आंगन में... आदि मधुर गीत कलाकारों ने प्रस्तुत किये।
साथ ही बच्चों में आयशा, दर्शिका, दिविषा, एलीना, जयेश, लाव्या, ईशा, रूही, वेदिका, शिवानी, दीपिका, ट्विंकल, पूजा आदि ने भी मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया। मंच का संचालन सोनू पारख, ज्योति दस्सानी ने संयुक्त रूप से किया।
रांची मंडल के अध्यक्ष बालबीर बोथरा तथा मंत्री संजय कोठारी ने बताया कि होली में हर वर्ष कि भांति मधुबन शिखर जी, पारसनाथ में आयोजित समारोह में होली कल सुबह 6 बजे बस से भारी संख्या में रांची संघ के लोग प्रस्थान करेंगे। ओसवाल संघ के अध्यक्ष सुभाष चंद बोथरा, सचिव विमल दस्साणी ने समाज के सभी लोगों को कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए धन्यवाद दिया।
आज के कार्यक्रम को सफल बनाने में छोटे लाल चोरड़िया, घेवर चंद नाहटा, अशोक सुराणा, लब्धि जैन, प्रकाश चंद नाहटा, अमर चंद बैंगानी, विनय नाहटा, राजेश पींचा, अक्षय सेठिया आदि ने मुख्य रूप से योगदान दिया। उक्त जानकारी मीडिया प्रभारी सुरेश जैन ने दी।
एबीएन सोशल डेस्क। अखिल विश्व गायत्रीपरिवार शान्तिकुञ्ज तत्वावधान व मार्गदर्शन में भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा पुरस्कार, प्रशस्ति पत्र वितरण समारोह सह प्रमाण पत्र वितरण कार्यक्रम संत माइकल स्कूल छोटा मुरी, सिल्ली प्रखंड में किया गया। साथ ही सिल्ली प्रखंड के दो और स्कूल चिराग नर्सरी काशीडीह और मां वैष्णवी विद्या मंदिर छोटा मुरी में भी पुरस्कार वितरण समारोह सह प्रमाण पत्र वितरण किया गया।
जिसमें विद्यालय के प्रिसिंपल छोटे लाल प्रजापति, दिनेश महतो, कंचन पांडे के साथ विद्यालय के शिक्षक ममता गोस्वामी, वी के वेंकट सर, मंजू कुमारी, मनीषा कुमारी, श्रेया कुमारी ने भी साथ दिया।गायत्री परिवार की बहनों में कोशिला महतो, अनीता ठाकुर, लक्ष्मी देवी, संगीता देवी ने युग कल्याण, नव निर्माण, समाज कल्याण और शताब्दी समारोह के साथ परम पूज्य गुरुदेव के सत्संकल्प तथा भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा की आवश्यकता, शिक्षा के साथ विद्या का सार्थक समन्वय, साधना, स्वाध्याय, स्वावलंबन विषय पर प्रकाश डाला गया।
गायत्री परिवार के प्रतिनिधि मंडल ने अध्यापक है युग निर्माता-छात्र राष्ट्र के भाग्य विधाता पर प्रकाश डाला। विद्यार्थियों में पुन: भारतीय संस्कृति का गौरव बोध कराना, वैज्ञानिक आध्यात्मवाद को प्रतिपादित करने एवं समस्त विश्व की पीड़ित,अशांत मानवता को जागृत करने तथा स्थाई शांति एवं खुशहाली के लिए यह परीक्षा मील का पत्थर सिद्ध होगी।
विद्यार्थियों में दूरदर्शी-विवेकशीलता एवं उच्चस्ततरीय संवेदनशीलता को जागृत करने, साथ, प्रेम एवं न्याय का पाठ पढ़ाना, समय और प्रतिभा का उचित उपयोग सिखाना तथा जीवन जीने की कला में प्रवीणता लाने हेतु यह परीक्षा सार्थक है। कीर्ति दीदी ने बताया कि तीनों विद्यालय के कुल करीबन दो सौ विद्यार्थी शामिल हुए थे। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के जय नारायण प्रसाद ने दी।
टीम एबीएन, रांची। विश्व हिंदू परिषद झारखंड सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होलिका दहन भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पवित्र पर्व है। यह अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का दिव्य प्रतीक है। इस दिन संध्या समय विधि-विधान से होलिका दहन किया जाता है और भक्तजन अपने जीवन से नकारात्मकता, पाप और अहंकार को दूर करने का संकल्प लेते हैं।
इस वर्ष होली पर्व पर भद्रा एवं खग्रास चंद्र ग्रहण का दुर्लभ संयोग बन रहा है, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि की शुरूआत 2 मार्च को शाम 5:18 बजे से हो रही है होलिका दहन 2 मार्च को रात 12:50 बजे के बाद होगा, अगले दिन 4 मार्च को धुलेंडी पर रंगों का त्योहार मनाया जायेगा। होलिका दहन की कथा का वर्णन श्रीमद् भागवत और अन्य पुराणों में मिलता है।
हिरण्यकशिपु नामक अत्याचारी असुरराज ने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया था। उसका पुत्र भक्त प्रह्लाद भगवान श्रीहरि विष्णु का परम भक्त था। यह बात हिरण्यकशिपु को स्वीकार नहीं थी। उसने कई बार प्रह्लाद को मृत्यु के मुख में धकेलने का प्रयास किया, किंतु हर बार भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे। अंतत: हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था) से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने को कहा। लेकिन भगवान के कृपा आगे होलिका को प्राप्त वरदान निष्फल हो गया।
होलिका अग्नि में भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आये। यही घटना होलिका दहन के रूप में आज भी मनाई जाती है। होलिका दहन को पापों के दहन और नव जीवन के आरंभ का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि हमारे भीतर जो भी नकारात्मक भाव जैसे क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, अहंकार आदि हैं, उन्हें इस अग्नि में समर्पित कर देना चाहिए। अग्नि देवता को साक्षी मानकर जब हम होलिका की परिक्रमा करते हैं, तो यह हमारे आत्मशुद्धि का संकल्प होता है।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोग सूखी लकड़ियां और उपले अग्नि में अर्पित करते हैं। जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और समृद्धि की प्रार्थना का प्रतीक है। होलिका दहन स्थल को शुद्ध करके वहां लकड़ियों या उपलों का ढेर सजायें। रोली, अक्षत, पुष्प, जल, गुड़, हल्दी, मूंग, गेहूं की बालियां आदि से पूजन करें। कच्चा सूत (मौली) होलिका के चारों ओर लपेटे। भक्तजन श्रद्धा से परिक्रमा करते हुए सुख-समृद्धि और संतानों की रक्षा हेतु कामना करें। होलिका की अग्नि की राख को माथे पर लगाएं। इससे नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।
होलिका दहन धार्मिक त्यौहार के साथ ही सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। इस दिन लोग अपने मतभेद भुलाकर एक साथ एकत्रित होते हैं। गांवों और मोहल्लों में सामूहिक रूप से होलिका दहन किया जाता है, जिससे भाईचारा और एकता की भावना प्रबल होती है। यह पर्व हमें बताता है कि अहंकार का अंत निश्चित है। हिरण्यकशिपु का अभिमान नष्ट हुआ और अंतत: भगवान श्रीनृसिंह ने उसका वध कर धर्म की स्थापना की, होलिका दहन हमें सदैव विनम्रता, करुणा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
होलिका दहन की ज्वाला केवल बाहर की लकड़ियों को नहीं जलाती, बल्कि हमारे भीतर के अज्ञान को भी भस्म करने का संकेत देती है। यदि हम इस पर्व को आत्ममंथन का अवसर समझें, तो इसका वास्तविक लाभ प्राप्त होगा। होलिका दहन भारतीय संस्कृति का एक दिव्य उत्सव है, जो हमें यह संदेश देता है कि धर्म की विजय निश्चित है और ईश्वर अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं। यह पर्व हमें आत्मशुद्धि, सकारात्मकता और समाज में प्रेम-एकता स्थापित करने का संदेश देता है।
टीम एबीएन, रांची। कवि सम्मेलन आयोजन समिति द्वारा आगामी 01 मार्च 2026 (रविवार) को स्थानीय मारवाड़ी भवन, हरमू रोड, रांची परिसर में भव्य कवि सम्मेलन कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा। यह आयोजन पूर्णत: नि:शुल्क है, जिसमें शहर के सभी वर्ग के आम जनता सादर आमंत्रित है। उपरोक्त जानकारी महाराजा अग्रसेन भवन में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में मुख्य संयोजक पवन शर्मा ने दी।
कहा कि आयोजन की सफलता हेतु विभिन्न उपसमितियों का गठन किया गया है, जिसमें क्रमश: मंच सभागार एवं सुरक्षा व्यवस्था- अनिल अग्रवाल एवं निर्भय शंकर हरित, स्वागत सत्कार- किशोर मंत्री एवं कमल जैन, अर्थ संग्रह- ललित पोद्दार एवं प्रकाश धेलिया, प्रशासनिक कार्य- अशोक नारसरिया एवं किशोर मंत्री, अल्पाहार- विनोद जैन एवं अनुप अग्रवाल, प्रेस एवं मीडिया प्रवक्ता मनोज बजाज को मनोनीत किया गया।
समिति में प्रवक्ता सह कोषाध्यक्ष मनोज बजाज ने कहा कि इस कवि सम्मेलन में देश के सुप्रसिद्ध व प्रख्यात कवि-कवित्रियों का आगमन होगा जिसमें अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कवियों- श्रृंगाररंस विष्णु सक्सेना (यू.पी), हास्यरस आदित्य जैन (कोटा), सुनील जोेगी (नई दिल्ली) हास्यरस श्री ख्याली शरण (राजस्थान) हास्यरस श्रद्धया सोर्या पीपुल (नागपुर), वीररस पार्थ नवीन (प्रतापगढ़) से पधार रहे है। हास्यरस, वीररस एवं श्रृंगाररस की त्रिवेणी गंगा के प्रवाह से श्रोताओं को रंसपान करायेगें एवं शहरवासी होली के रंग में रंगकर, लोटपोट होगे एवं हास्यरस में डुबकी लगायेंगे।
समिति के अध्यक्ष पवन पोद्दार ने कहा कि होली के पावन अवसर पर हास्य कवि सम्मेलन आयोजन का इंतजार रांची शहरवासियों को सालभर से रहता है। आयोजन समिति की व्यवस्था व कवियों का चयन व आतिथ्य देखते ही बनती है। आयोजन समिति के मंत्री अंजय सरावगी ने जानकारी देते हुए कहा कि कुछ खास अंदाज में मंच सजाया गया है। शहर में प्रचार-प्रसार के लिए होर्डिग, पोस्टर, एस.एम.एस, सोशल मिडिया व समाचार पत्रों से लोगों को सूचना प्रेषित किया जा रहा है।
आयोजन समिति में मुख्यत: अध्यक्ष पवन पोद्दार, सचिव अंजय सरावगी, कार्यक्रम संयोजक पवन शर्मा, पूर्व अध्यक्ष सुरेश चन्द्र अग्रवाल, ललित पोद्दार, विनोद जैन, अशोक नारसरिया, कोषाध्यक्ष मनोज बजाज, कार्यकारिणी सदस्य रतन मोर, किशोर मंत्री, अनिल अग्रवाल, हरि कानोडिया, कमल जैन, पुनीत पोद्दार, निर्भय शंकर हारित, प्रकाश धेलिया, राजेश भरतीया, पुनीत अग्रवाल, अनुप अग्रवाल आदि आयोजन को मूर्त रूप दे रहे है। उक्त जानकारी प्रवक्ता सह कोषाध्यक्ष मनोज बजाज (94311 01240) ने दी।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse