एबीएन न्यूज नेटवर्क, सिमडेगा/ रांची। झारखंड के सिमडेगा जिले के कोलेबिरा ब्लॉक के तैसेरा गांव की लाली देवी ने अपनी मेहनत, हौसले और दृढ़ इच्छाशक्ति से एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो न केवल उनके समुदाय बल्कि पूरे राज्य की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गयी है। एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली लाली देवी ने सब्जी उत्पादन, विक्रय और ट्रैक्टर चालक के रूप में अपनी पहचान बनाई है। उनके पति बल्केश्वर सिंह और दो बच्चों के साथ रहने वाली लाली ने अपने नाम की सार्थकता को सिद्ध करते हुए आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिखी है।
लाली देवी की कहानी तब रंग लायी, जब वे वर्ष 2014 में ईश्वर आजीविका महिला स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। इससे पहले वे अपनी एक एकड़ जमीन पर पारंपरिक खेती-बाड़ी करती थीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने नियमित बैठकों में हिस्सा लिया और झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) के कैडर से गुणवत्तापूर्ण सब्जी उत्पादन की आधुनिक तकनीक सीखी। इस प्रशिक्षण ने उनके जीवन को नई दिशा दी।
लाली ने समूह से विभिन्न अंतरालों में कुल 2 लाख रुपये का ऋण लिया और स्थानीय बाजार में एक सब्जी की दुकान शुरू की। उनकी मेहनत और ईमानदारी का नतीजा यह रहा कि दुकान जल्द ही चल निकली। धीरे-धीरे उन्होंने पूरा ऋण चुका दिया और आज यह दुकान उनकी स्थिर आय का प्रमुख स्रोत है। सब्जी व्यवसाय से उन्हें प्रतिमाह लगभग 12,000 रुपये की आय होती है।
लाली देवी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जेएसएलपीएस और भूमि संरक्षण विभाग के सहयोग से उन्हें अनुदान पर एक मिनी ट्रैक्टर प्राप्त हुआ। सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि लाली ने न केवल ट्रैक्टर खरीदा, बल्कि इसे स्वयं चलाना भी सीख लिया। वे अपने खेतों की जुताई करने के साथ-साथ अन्य किसानों के खेतों में भी ट्रैक्टर सेवा प्रदान करती हैं। इस सेवा से उन्हें सीजन के दौरान हर महीने लगभग 15,000 रुपये की अतिरिक्त आय होती है। इस दौरान उनके पति सब्जी की दुकान संभालते हैं, जिससे परिवार की आय और मजबूत होती है।
लाली देवी की मेहनत, आत्मनिर्भरता और नवाचार ने उन्हें क्षेत्र की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना दिया है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सही मार्गदर्शन के साथ कोई भी अपने सपनों को हकीकत में बदल सकता है। लाली कहती हैं, मैं चाहती हूं कि मेरी तरह अन्य महिलाएं भी अपने हौसले से नई ऊंचाइयां छुएं।
लाली देवी की इस सफलता ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया, बल्कि कोलेबिरा और सिमडेगा के अन्य गांवों की महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित किया है। जेएसएलपीएस के अधिकारियों ने लाली की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा, वे एक जीवंत उदाहरण हैं कि कैसे स्व-सहायता समूह और सरकारी योजनाएं महिलाओं को सशक्त बना सकती हैं। लाली देवी की यह कहानी हर उस महिला के लिए एक प्रेरणा है, जो अपने हौसलों से नई राह तलाशना चाहती है। उनकी लालिमा न केवल उनके नाम को सार्थक करती है, बल्कि पूरे झारखंड के लिए गर्व का विषय है।
एबीएन सोशल डेस्क। अखिल विश्व गायत्री शान्तिकुञ्ज तत्वावधान व मार्गदर्शन में आयी टोली के सानिध्य में रांची उपजोन समन्वय के पांच जिला व उनके प्रखंडों और स्थानीय शहर रांची व जिलांतर्गत अनेक प्रखंडों के सक्रिय उत्साही, कर्मठ, सेवाभावी कार्यकर्ता एवं परिजनों का प्रशिक्षण शिविर आयोजन सात दिवसीय है, जो आठ अगस्त से आरम्भ है।
इस कार्यक्रम में गायत्री परिवार मिशन की योजनाओं, विचारों और गतिविधियों को प्रखंड के निष्ठावान, सेवाभावी प्रशिक्षुओं के माध्यम से अन्य परिजनों को अवगत कराने तथा ग्रामे ग्रामे, जन-जन तक गुरुवर श्रीपूज्यवर का संदेश, विचार पहुंचाये जाने के लिए यह प्रशिक्षण शिविर धूर्वा मुख्य गायत्री शक्तिपीठ सेक्टर टू परिसर में आयोजित है। इसमें दो प्रशिक्षक हैं।
इनके सानिध्य में जिलों व प्रखंडों के प्रज्ञा मंडल, महिला मंडल, स्वाध्याय मंडल, दीया मंडल आदि के प्रतिनिधि एवं परिजन लाभान्वित हो रहें हैं। यह कार्यक्रम प्रात:काल साढ़े चार बजे से सायंकाल साढ़े आठ बजे तक प्रतिदिन संचालन है। इसमें योगासन, प्राणायम, यज्ञीय कर्मकांड, संस्कार, अनुष्ठान, बौद्धिक व व्यक्तित्व विकास, संभाषण, युग संगीत, प्रज्ञा गीत, ढपली वादन, मंदिर प्रबंधन आदि अनेक आध्यात्मिक विषय हैं। कल सायंकालीन दीपयज्ञ कार्यक्रम आयोजित किया जाना है। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के जय नारायण प्रसाद ने दी।
टीम एबीएन, रामगढ़/ रांची। झारखंड में पारंपरिक जीवनशैली और संस्कृति की झलक एक बार फिर देखने को मिली। स्वर्गीय शिबू सोरेन के श्राद्ध कर्म के दौरान उनकी बहू और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी, कल्पना सोरेन ने ढेंकी से चावल कूटकर परंपरा को जीवित रखने का संदेश दिया।
ढेंकी, जो कभी गांव-गांव में अनाज कूटने का अहम साधन हुआ करता था, आज आधुनिक मशीनों के दौर में लगभग विलुप्त हो गया है। लेकिन कल्पना सोरेन ने इसे इस्तेमाल कर न सिर्फ पूर्वजों की याद ताजा की, बल्कि यह भी बताया कि पारंपरिक विधान और रीति-रिवाज हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। यह दृश्य देखकर गांव की महिलाओं ने भी खुशी जताई और कहा कि यह हमारी पुरानी पहचान को संजोने की मिसाल है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क (लखनऊ)। विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के अंतरराष्ट्रीय संगठन महामंत्री मिलिंद परांडे ने सोमवार को लखनऊ में कहा कि युवाओं में बढ़ रही नशाखोरी को रोकने के लिए विहिप नशा मुक्ति अभियान चलायेगी। नशाखोरी पर चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि युवा वर्ग नशे की दिशा में बढ़ता जा रहा है। इसमें विशेष रूप से समाज को जागृत होकर युवाओं को नशा मुक्ति के लिए प्रेरित करना होगा। मिलिंद परांडे ने लखनऊ के एक होटल में बौद्ध, सिख, जैन एवं समाज के विभिन्न वर्गों के साथ बैठक कर सीधा संवाद किया।
उन्होंने अपने संवाद में कहा कि आज परिवारों का विघटन होता जा रहा है। नई पीढ़ी के परिवारों में पारिवारिक कलह बढ़ती जा रही है। यह बहुत ही चिंता का विषय है। इसको लेकर समाज में आ रही कमियों को लेकर परिवार के बीच समन्वय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि 2023 में देश की 13 लाख महिलाएं लापता हुईं। इनमें से एक बड़ा वर्ग लव जिहाद का शिकार हुआ है। केरल की हजारों लड़कियां लव जिहाद का शिकार हुई।
इस असंतुलन के पीछे कई अराजक तत्व योजनाबद्ध तरीके से कार्य कर रहे हैं, जिनमें विशेष रूप से धार्मिक मतांतरण, लव जिहाद, बांग्लादेश और म्यांमार से हो रही मुस्लिम घुसपैठ और हिन्दू समाज में घटती जन्मदर शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सुनियोजित रूप से आर्थिक प्रलोभन, छल कपट या दबाव के माध्यम से मुसलमानों एवं इसाई मिशनरियों के धर्मांतरण ने कई क्षेत्रों में स्थानीय हिन्दू जनसंख्या को कम किया है।
विहिप के अंतरराष्ट्रीय संगठन महामंत्री परांडे ने कहा कि एक सुनियोजित रणनीति के तहत मुस्लिमों के एक वर्ग द्वारा हिन्दू युवतियों को फंसाकर उनका मतांतरण कराया जा रहा है, जो केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सांस्कृतिक हमला है। सीमावर्ती राज्यों जैसे असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और अब दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा और आर्थिक दृष्टिकोण से जागरूक हिन्दू समाज में परिवार सीमित रखने की प्रवृत्ति है परंतु बाकी वर्गों में इसपर कोई नियंत्रण नहीं है, जिससे असंतुलन और तेज होता जा रहा है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट ने भारत में जनसंख्या वितरण की गहराई से समीक्षा प्रस्तुत की है।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ वर्गों में जन्मदर जहां स्थिर या बढ़ती हुई है, वहीं हिन्दू समाज में यह दर घट रही है। भारत के स्थायित्व, संस्कृति और एकता की रक्षा की आवश्यकता है। सभी राष्ट्रप्रेमी नागरिकों, संतों, सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों से अपील है कि वे इन विषयों पर जनजागरण में सहभागी बनें।
कार्यक्रम में क्षेत्र संगठन मंत्री गजेंद्र सिंह, प्रांत संगठन मंत्री विजय प्रताप, प्रान्त मंत्री देवेन्द्र, प्रांत समरसता प्रमुख धर्मेन्द्र कुशवाहा और प्रान्त प्रचार प्रमुख नृपेंद्र विक्रम सिंह समेत विहिप एवं बजरंग दल लखनऊ विभाग एवं जिले के प्रमुख कार्यकर्ता मौजूद रहे।
टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट व विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 16 अगस्त शनिवार को मनाई जायेगी। पंचांग के अनुसार, यह पर्व भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। तिथि प्रारंभ होगी 15 अगस्त की रात्रि 11:48 बजे और समाप्त होगी 16 अगस्त की रात्रि 10:15 बजे तक। अत: 16 अगस्त की मध्यरात्रि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाना अधिक शास्त्रसम्मत माना गया है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। द्वापर युग में जब पृथ्वी पर अधर्म, अत्याचार, पाप और अन्याय चरम पर था, तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। उनका जन्म कंस के कारागार में, रात्रि के अंधकार में हुआ, जो यह दशार्ता है कि जब-जब अंधकार (अन्याय) बढ़ेगा, ईश्वर स्वयं धरती पर अवतरित होंगे श्रीकृष्ण का जीवन मात्र लीलामय न था, अपितु संपूर्ण मानवता के लिए एक मार्गदर्शक ग्रंथ भी था।
बाल्यकाल में माखनचोरी, ग्वाल-बालों के संग लीला, कंस-वध, रासलीला, अर्जुन को गीता का उपदेश-ये सभी घटनाएं आज भी धर्म, प्रेम, कर्म और ज्ञान के प्रतीक हैं। जन्माष्टमी के दिन भक्त व्रत रखते हैं और दिनभर उपवास करते हैं। घरों, मंदिरों एवं कृष्ण मंदिरों को आकर्षक रूप से सजाया जाता है। झांकियां, झूले, रासलीला का आयोजन किया जाता है। मध्य रात्रि को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का प्रतीकात्मक रूप से अभिषेक, श्रृंगार और आरती की जाती है।
भोग में माखन, मिश्री, फल, पंचामृत और 56 प्रकार के व्यंजन चढ़ाए जाते हैं। भक्त हरे कृष्णा महामंत्र, भजन और कीर्तन करते हैं। कई स्थानों पर दही-हांडी प्रतियोगिताएं भी होती हैं जो श्रीकृष्ण के बालरूप की झलक प्रस्तुत करती हैं। भारत में ही नहीं, विदेशों में भी जन्माष्टमी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। वृंदावन, मथुरा, द्वारका, और इस्कॉन मंदिरों में लाखों भक्त एकत्र होकर भक्ति का अनुपम दृश्य प्रस्तुत करते हैं।
यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक एकता और सामाजिक उत्सव का भी प्रतीक है। श्रीकृष्ण का गीता उपदेश-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन-आज भी मानव जाति के लिए पथ-प्रदर्शक बना हुआ है। श्रीकृष्ण केवल एक देवता नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण शैली हैं। उनकी लीलाएं हमें सिखाती हैं कि कैसे धर्म, प्रेम, मित्रता, राजनीति, युद्ध और जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखा जाये।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का पर्व है। इस दिन हम यह संकल्प लें कि जीवन में सत्य, प्रेम, न्याय और कर्म को अपनाकर हम श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को आत्मसात करें।
टीम एबीएन, रांची। श्रीकृष्ण हमारे मान्य पूर्वज थे। उन्होंने गीता ज्ञान तथा सहज राजयोग के अभ्यास द्वारा ही श्रेष्ठ देवता–पद को प्राप्त किया। वह योगीराज थे। श्रीकृष्ण का आवाहन करने के लिए मनुष्य के आचार–विचार व्यवहार के शुद्धिकरण की आवश्यकता है। ये उद्गार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय चौधरी बगान, हरमू रोड में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव समारोह के पूर्व सप्ताह में आयोजित कार्यक्रम में जय सिंह यादव अध्यक्ष श्री महावीर मंडल, राँची ने अभिव्यक्त किये।
कार्यक्रम में झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री सह श्रीकृष्ण प्रणामी सेवाधाम ट्रस्ट के प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा कि श्रीकृष्ण जन्म से ही महान थे इसलिए अवश्य ही पूर्व जन्म में उन्होंने कोई महान पुण्यार्जन किया होगा। निकट भविष्य में शीघ्र ही भारत में श्रीकृष्ण जन्म लेंगे और भुलोक स्वर्ग बन जायेगा। वह होगी सोने की द्वारिका तथा बैकुंठ का क्षीर सागर।
उस मन–मोहक झांकी को देखने के योग्य बनने के लिए हमें स्वयं के ज्ञान योग के चंदन से तिलक देना चाहिए। उन्होंने कहा कि श्री कृष्ण का जीवन केवल रासलीला नहीं, बल्कि नीति, रणनीति और समर्पित सेवा का प्रतीक है। विनीता सिंघानियां मारवाड़ी युवा मंच समर्पण शाखा ने अपने संबोधन में कहा कि श्रीकृष्ण प्रशासनिक क्षमता से सम्पन्न राज्य सत्ता तथा धर्म सत्ता दोनों के मालिक थे। अभी जरूरत इस बात की है कि हम अपनी इन्द्रियों पर शासन करें।
इन्द्रिय जीत बनने से ही हम लोगों के दिलों को जीत उनके दिल पर राज्य कर सकेंगे। कार्यक्रम में उपस्थित शिव नारायण साहू कृषक एवं व्यवसायी ओरमांझी ने कहा आन्तर के नेत्र खोलकर यथार्थ का अनुभव करने की जरूरत है। श्रीकृष्ण केवल तन से ही देवता न थे उनके मन में में देवत्व था। ऐसी पवित्र आत्मा जिनके स्मरण से ही विकारी भावनाएँ समाप्त हो जाती है, मिथ्या कलंक लगाना उचित नहीं है।
सम्पूर्ण अहिंसक योगेश्वर श्रीकृष्ण की दुनिया में कोई भी कामी क्रोधी अथवा भ्रष्टाचारी व्यक्ति हो ही नहीं सकता। सच्चा गीता ज्ञान सुनकर राजयोग अभ्यास करने वाली आत्माएँ ब्रह्मावत्स शीघ्र आने वाले स्वर्गीय स्वराज्य में श्रीकृष्ण के साथ देवी–देवताओं के रूप में प्रत्यक्ष होंगी। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सत्य नारायण तिवारी, समाजसेवी ने कहा कि कृष्ण ने धर्म स्थापना और सत्य की रक्षा के लिए कई कार्य किये।
जन्माष्टमी हमें सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है। कार्यक्रम में उपस्थित मारवाड़ी युवा मंच, समर्पण शाखा की शुभा अग्रवाल ने कहा कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार हमें उनके गुणों और शिक्षाओं को आत्मसात करने और अपने जीवन को दिव्य बनाने की प्रेरणा देता है। दुर्गा साहू समाजसेवी ने कहा कि श्रीकृष्ण का जन्म कारावास में हुआ था जो अज्ञानता और बंधनों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है।
कृष्ण का जीवन प्रेम, आनंद और सकारात्मकता से भरा था। हमें भी अपने जीवन में सकारात्मकता एवं प्रेम को प्रसारित करना चाहिए। केंद्र संचालिका ब्रह्माकुमारी निर्मला ने कहा कि श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में न होकर सतयुगी सुख की दुनियां में हुआ था। कलियुगी सृष्टि के इस अंत समय में पतित सृष्टि समाप्त होकर सुखमय स्वर्ग आता है। जहां श्रीकृष्ण सर्वगुण संपन्न देवता के रूप में अवतरित होते हैं।
यमुना के कंठे पर फिर उनकी रासलीला होती है। जो आत्माएं वर्तमान समय गीताज्ञान एवं राजयोग के द्वारा विकारों का त्याग कर पवित्र और योगी बनेगी वे ही स्वर्ग की दुनिया में श्रीकृष्ण के साथ पदार्पण करेगी। ब्रह्मा के रूप में पाँच विकारों का त्याग करनेवाला इस सृष्टि का महानायक ही सतयुग में श्रीकृष्ण बना जिसकी यादगार में कृष्ण को पाँच विकारों के प्रतीक पाँच फन वाले कालिदह का मर्दन करते दिखाया गया है।
वर्तमान में सृष्टि पर भ्रष्टाचार, पापाचार, हिंसा व आतंक का पहाड़ बढ़ता जा रहा है। जिसके बोझ से मानवता को बचाने के लिए सच्चा ज्ञान परमात्मा शिव मानव आत्माओं को दे रहे हैं। पूर्व जन्म में ब्रह्मा के ज्ञान योग बल से पापाचार का बोझ उठाया था इसलिए श्रीकृष्ण गिरधर कहलाये। भव्य समारोह में स्वर्णिम विश्व का आहवान स्वर्णिम दिव्य गीतों व राजयोग अभ्यास से किया गया।
कृष्ण राधे की चेतन्य झांकियों के समक्ष भावपूर्ण अभिनय, नृत्य व रास किया गया - गोप-गोपी नाचे गाये - आनंद खूब मनायें, आज जन्म हुआ है मनमोहन का जिसकी रचना इतनी सुंदर, वह खुद कितना सुंदर होगा आदि गीतों पर भाव नृत्य व रास किया गया। सभी ने श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की बधाई स्वरूप भोग स्वीकार किया। चौधरी बगान, हरमू रोड स्थित ब्रह्माकुमारी संस्थान में हर्ष व उमंग उत्साह का माहौल छाया रहा। उक्त कार्यकम में अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।
*प्रेस विज्ञप्ति*
*श्रावण पूर्णिमा पर श्री राधा कृष्ण मंदिर पुंदाग में भक्ति का अनुपम संगम*
श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट द्वारा संचालित श्री राधा कृष्ण मंदिर, पुंदाग में श्रावण पूर्णिमा का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मंदिर प्रांगण भक्ति और श्रद्धा से ओतप्रोत वातावरण में गूंज उठा, जहां भक्तों की बड़ी संख्या ने भाग लेकर धार्मिक उल्लास में सहभागिता निभाई। मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना, श्रृंगार, भजन-कीर्तन तथा प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया। प्रातः काल से ही भक्तों का मंदिर में आगमन शुरू हो गया था। पुजारी अरविंद पांडे जी द्वारा विधिवत वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भगवान श्री राधा कृष्ण की पूजा संपन्न कराई गई। इसके पश्चात भव्य श्रृंगार कर भगवान का अलौकिक रूप दर्शनार्थ प्रस्तुत किया गया, जिसे देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। ट्रस्ट के प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ ने श्रावण पूर्णिमा के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह तिथि न केवल भगवान शिव को समर्पित होती है, अपितु यह रक्षाबंधन एवं वेदों के ज्ञान की संवाहक भी है। इसी दिन ऋषि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था, जिन्होंने वेदों का विभाजन कर मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। साथ ही, रक्षाबंधन जैसे पावन पर्व के माध्यम से भाई-बहन के स्नेह की परंपरा को सामाजिक रूप मिला। श्रावण पूर्णिमा का यह अवसर भक्तों के लिए आत्मिक शांति और प्रभु भक्ति में लीन होने का माध्यम बना। भजन-कीर्तन की मधुर ध्वनि से संपूर्ण वातावरण भक्तिमय बना रहा। अंत में सामूहिक आरती तथा सभी श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद एवं भोग का वितरण किया गया। ट्रस्ट के उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल ने कहा कि ट्रस्ट द्वारा ऐसे आयोजनों का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि समाज में सद्भाव, सेवा और अध्यात्म का संदेश फैलाना है। तथा भविष्य में भी इस प्रकार के आयोजन होते रहेंगे, जिससे युवा पीढ़ी धर्म और संस्कृति से जुड़ सके। श्रावण पूर्णिमा के इस पावन अवसर ने सभी श्रद्धालुओं के हृदय में भक्ति और प्रेम की नई ऊर्जा का संचार किया।
मौके पर डूंगरमल अग्रवाल, निर्मल जालान, राजेंद्र अग्रवाल, मनोज चौधरी, सज्जन पाड़िया, पूरणमल सर्राफ, संजय सर्राफ, शिव भगवान अग्रवाल, विष्णु सोनी, मधु जाजोदिया, विशाल जालान, सुनील पोद्दार, नंदकिशोर चौधरी, सुरेश अग्रवाल, मनीष सोनी, अरविंद अग्रवाल, पवन पोद्दार, सहित बड़ी संख्या में भक्तगण उपस्थित थे।
प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी संजय सर्राफ
श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम के
एबीएन सोशल डेस्क। आचार्य चाणक्य ब्राह्मण जाति के थे। उनके पिता का नाम चणक था इसीलिए चाणक्य कहलाए। उनका वास्तविक नाम विष्णुगुप्त था। देश कल्याण और जन कल्याण की प्राप्ति के लिए कूटनीति का प्रयोग अथवा कुटिलता के कारण उन्हें "कौटिल्य" कहा गया। चाणक्य के आदर्श महाभारत के अर्जुन के सारथी भगवान श्रीकृष्ण थे।
तक्षशिला विश्वविद्यालय से उन्होंने शिक्षा ग्रहण की बाद में वहीं पर अध्यापक नियुक्त हुए। सिकंदर के भारत प्रवेश पर वह चिंतित हुए और तत्कालीन भारतीय राजनीति में उन्हें आगे आना पड़ा। अपने कुटिल प्रयास से उन्होंने चंद्रगुप्त को मगध का सम्राट बनाया और भारतीय सीमाओं को सुरक्षित किया।
अर्थशास्त्र उनका प्रिय विषय था। लेकिन जब राष्ट्र के ऊपर आने वाले संकट का उन्हें अनुमान हुआ तो उन्होंने राजनीति का कठिन और वक्र मार्ग का चुनाव किया और सत्ता परिवर्तन के सूत्रधार बने।
राजा, राजमहल और राजदरबार के प्रतिदिन के उठा-पटक से वह स्वयं को यथासंभव दूर ही रखते थे। राज्य कार्यों से बचे समय वे किताबों की रचना किया करते थे। उनकी प्रमुख रचना चाणक्य नीति दर्पणम तथा अर्थशास्त्र के रूप में आज भी एक बहुमूल्य धरोहर है।
चाणक्य विद्वान, ज्ञानी और दूरदर्शी थे इसीलिए उन्होंने राजगद्दी से स्वयं को दूर ही रखा लेकिन राज सत्ता पर आवश्यक नियंत्रण बनाए रखा; जबकि नंद वंश के अंतिम राजा धनानंद के पतन के बाद उसके महामंत्री (अमात्य) राक्षस को चंद्रगुप्त के प्रति निष्ठावान बनाकर राजकाज का संचालन करवाया क्योंकि अमात्य राक्षस का देश के प्रति निष्ठा असंदिग्ध थी।
एक शिक्षक और विद्वान शांति की जीवन जीने वाला को भी राष्ट्रीयसंकट के समय देश भक्ति का संकल्प लेकर समाज-हित में कठिन मार्ग में चलने का पुरुषार्थ करना पड़ता है; आचार्य चाणक्य की जीवनी यही प्रेरणा देती है।
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