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Published / 2025-08-24 18:16:25
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ने जुटाये कई यूनिट रक्त

ब्रह्माकुमारी निर्मला

टीम एबीएन, रांची। आज प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के स्थानीय सेवाकेन्द्र चौधरी बगान, हरमू रोड में ब्रह्माकुमारीजी संस्थान की पूर्व मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि जी की 18वीं पुण्यतिथि (25 अगस्त 2025) जिसे विश्व बंधुत्व दिवस के रूप में मनाया जाता है, के पूर्व संध्या में एक भव्य रक्त दान शिविर का आयोजन किया गया। 

इस अवसर पर अभय अम्बष्ट (भा०प्र०से०) संयुक्त सचिव तथा दिव्यांग आयुक्त झारखंड ने स्वयं रक्त दान कर अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि दादी जी के स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में संस्थान द्वारा भारत एवं नेपाल में एक विशाल रक्त दान अभियान चलाया जा रहा है जो कि एक बहुत ही सराहनीय कार्य है। इस आयोजन का उद्देश्य रक्त की आवश्यकता की पूर्ति करना है।

इस महाअभियान का राष्ट्रीय शुभारंभ 17 अगस्त को नई दिल्ली में केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री जे०पी० नड्डा द्वारा किया गया। राष्ट्रीय शुभारंभ के उपरांत भारत और नेपाल में रक्त शिविरों की शुरुआत की गई। जिसके अन्तर्गत 22 से 25 अगस्त 2025 तक पूरे देश में 1500 से अधिक ब्रह्माकुमारीज सेवाकेन्द्रों पर एक साथ विशाल रक्त दान शिविर आयोजित किए गए।

इस अभियान का लक्ष्य एक लाख यूनिट रक्त एकत्रित करना है। इतने कम समय में यह लक्ष्य हासिल करना भारत के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड होगा। यह अभियान ब्रह्माकुमारीजी संस्थान की पूर्व मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि जी की 18वीं पुण्यतिथि को समर्पित है। यह महाअभियान ब्रह्माकुमारीजी संस्थान द्वारा भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय एवं अन्य स्थानीय संस्थाओं के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। 

इसी श्रृंखला में आज ब्रह्माकुमारी चौधरी बगान, हरमू रोड रक्त दान शिविर का आयोजन किया गया। यह आयोजन दादी जी के स्नेह, एकता, त्याग, तपस्या एवं सेवा की भावना को समाज में पुनः जागृत करने का माध्यम बनेगा। रक्त दान शिविर में उपस्थित रमेश कुमार श्रीवास्तव पूर्व निदेशक रिस्म ने कहा कि आज के पवित्र अवसर पर ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में उपस्थित हुए हैं एक नया संदेश लेकर मानवता की सेवा मानवता के द्वारा।

 वैसे बहुत विश्व विद्यालय हैं जो जीवन जीने का साधन उपलब्ध करते हैं परंतु प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में हमें जीवन जीने की कला सिखाई जाती है, और आपको बताया जाता है कि किस लिए इस धरा पर आपका जन्म हुआ है उसका आप यहां आकर समझ सकते हैं। आज के कार्यक्रम के संबंध में मुझे यह कहना है कि यह ऐसा प्रयास है जिसको गीता में सुकर्म बताया है। 

यह सात्विक दान है अर्थात निस्वार्थ दान है। इसमें कोई इच्छा नहीं है कि इससे आपको क्या मिलेगा लेकिन जिसे यह प्राप्त होता है उसे पता नहीं होता कि किसने मेरे लिए यह सौगात भेजा है। किसने मुझे जीवन दान दिया है। यह एक प्रयास है उन लोगों को नया जीवन देने का जिनको रक्त की आवश्यकता होती है। 

रक्त दान से होने वाले लाभ के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि रक्त दान करने से हमें नुकसान नहीं बल्कि फायदा होता है। रक्त दान करने से बहुत सारी बीमारियों से बचा जा सकता है। सभा में उपस्थित पुनीत पोद्दार प्रेमसंस मोटर्स के सी०ई०ओ० एवं समाजसेवी ने कहा कि मैं इस आयोजन के लिए ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन के प्रयास की सराहना करता हूँ एवं बधाई देता हूँ।

सभा में उपस्थित संजय सर्राफ प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन संयुक्त महामंत्री ने कहा कि दादी प्रकाशमणि शक्तियों गुणों से भरपूर थी उन्होंने पूरा जीवन सबको दिया और देने की प्रेरणा हम सब में जगाया। दान और पुण्य में अंतर है कि दान में हम कोई वस्तु किसी दूसरे व्यक्ति को देते हैं जबकि पुण्य में हम दूसरों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उनके अनुसार उन्हें सहयोग देते हैं। 

पुण्य दूसरों के बारे में सोच कर किया जाता है। सुनील कुमार गुप्ता पूर्व ईजीएम स्टेट बैंक ने कहा कि रक्त का दान करने के लिए सर्व प्रथम अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना आवश्यक है। कहा जाता है कि जो रक्त दान करते हैं उनका रक्त जमीन में नहीं गिरता है इसका अर्थ है उनका रक्त कभी बेकार नहीं जाता है। यह एक बहुत ही पुनीत कार्य है।
अनुरंजन झा कार्यपालक दंडाधिकारी ने कहा कि रक्त दान के लिए जागरूकता की आवश्यकता है। 

प्रकृति में दो ऊर्जा सदैव विद्यमान रहती हैं एक सकारात्मक और एक नकारात्मक । अगर सकारात्मक ऊर्जा काम नहीं करती है तो नकारात्मक ऊर्जा जरूर काम करती है। तो समाज में रक्त दान के बारे में जब तक सकारात्मक बातें नहीं होंगी तब तक नकारात्मक बातें होती रहेंगी। यह संस्था बहुत ही धन्यवाद की पात्र है बधाई की पात्र है कि जो समाज के लिए एक महान कार्य में योगदान दे रही है।

केन्द्र संचालिका ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने कहा कि रक्त का दान करूणा का दान है। यह हमें नहीं पता कि हमारा रक्त किनको मिलेगा। यह गुप्त दान महादान है निःस्वार्थ दान है। दादी जी स्वयं भी प्रकाश से भरी हुई थीं और देने की प्रेरणा उन्होंने समाज को दी। राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि जी की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए ब्र०कु० निर्मला बहन ने आगे कहा दादी जी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की दूसरी मुख्य प्रशासिका रही हैं। 

जगदम्बा सरस्वती के बाद साकार में यज्ञ की प्रमुख दादी प्रकाशमणि रहीं। वे 1969 से 2007 तक संस्था की मुख्य प्रशासिका रहीं। इसी समय दादी जी के नेतृत्व में अनेक राजयोग केन्द्र खुले हैं। ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के बाद से दीदी मनमोहिनी जी के साथ दादी प्रकाशमणि जी माउन्ट आबू से ही यज्ञ की संभाल करने लगी। ब्रह्मा बाबा ने अव्यक्त होने से पहले दादी जी को अपनी समस्त जिम्मेवारी सौंप दी थी। 

दादी जी के समर्थ नेतृत्व में संस्था वृद्धि को पाया और कई देशों में सहज रीती से राजयोग सेवाकेन्द्र खुले। 2007 में 25 अगस्त को सुबह 10 बजे दादी जी ने अपना नश्वर देह का त्याग किया। दादी जी की याद में मधुवन में प्रकाश स्तम्भ बनाया गया है जिस पर दादी जी की शिक्षाएं अंकित की गई है। दादी जी का स्वभाव बहुत ही मधुर, सहनशील और सहकारी था। 

दादी अपना समय ईश्वरीय सेवाओं में व्यतीत करती और आध्यात्मिक संगोष्ठियों में भाग लेने, व्याख्यान देने, राजयोग सेवाकेन्द्र खोलने और यहां तक कि मधुवन में आने वालों के लिए भोजन तैयार करने में मदद करने जैसी यज्ञ की सभी सेवा करती थीं। सभी को एक माँ, एक मार्गदर्शक और एक प्रिय मित्र के रूप में दादी से प्यार रहता था। दादी जी सारे ब्रह्माण परिवार को अपना परिवार मानकर उनकी पालना करती थी। 

वह हमेशा कहतीं थीं कोई भी अजनबी नहीं है हम सभी एक पिता की बच्चे हैं। केवल एक शक्तिशाली आत्मा ही प्रेम दे सकती है। केवल एक शक्तिशाली आत्मा ही विनम्र होने का बल रखती है। अगर हम कमजोर हैं तो स्वार्थी हो जाते हैं। अगर हम खाली हैं तो लेते हैं, लेकिन अगर हम भरे हुए हैं तो हम स्वचालित रूप से सभी को देते हैं। यही हम शिव बाबा के बच्चों ब्राह्मणों की प्रकृति है। 

अगर आप मानते हो कि आप सभी के हैं और एक ट्रस्टी के रूप में हर किसी की देखभाल करते हैं तो आप श्रेष्ठ ईश्वरीय कार्यों को करने में सक्षम हैं। लगाव होने के बजाय निस्वार्थ प्रेम होना चाहिए। डा० सुषमा कुमारी रिम्स ब्लड बैंक की मेडिकल ऑफिसर ने कहा कि आज दादी प्रकाशमणि जी के स्मृति दिवस में ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में रक्त दान शिविर का आयोजन किया गया है इसके लिए में ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन को धन्यवाद देती हूं। 

इस आयोजन में भाग लेने वाले सभी रक्त दाताओं का आभार प्रकट करती हूं। क्योंकि इसके बजह से मैं रिम्स में भर्ती मरीजों की मदद कर पाऊंगी। रक्त दान से कई प्रकार का स्वास्थ्य लाभ होता है। यह मोटापा कम करने में सहायक है।

कार्यक्रम में गाईडेड मेडिटेशन कराया गया। सभा में कविता देवघरिया एवं उमेश कुमार सिंह रिम्स ब्लड बैंक के कार्यकर्ता भी उपस्थित थे। दिन भर रक्त दान शिविर में रक्त दाताओं का ताता लगा रहा। आननद पसारी प्रसिद्ध अधिवक्ता एवं समाजसेवी ने भी शिविर में उपस्थित होकर 140 वां बार रक्त दान किया। 

रिम्स के डॉक्टर, नर्स एवं अन्य मेडिकल स्टॉफ ने शिविर में अपना योगदान दिया। शिविर में 100 यूनिट के लगभग रक्त का दान किया गया। सभी रक्त दाताओं को पोषण सामग्री, रक्तदान संबंधी प्रमाण-पत्र रिम्स एवं ब्रह्माकुमारी संस्थान दोनों के द्वारा दिया गया।

मानवता की सेवा में

(ब्रह्माकुमारी निर्मला)
केन्द्र संचालिका

Published / 2025-08-24 17:57:07
श्री सर्वेश्वरी समूह - शाखा रांची ने किया 350 पौधौं का वितरण

टीम एबीएन, रांची। रविवार को श्री सर्वेश्वरी समूह - शाखा रांची के द्वारा सर्वेश्वरी वृक्षारोपण अभियान वर्ष- 2025 के पाँचवें चरण का आयोजन  ग्राम - दुबलिया, प्रखण्ड - कांके, जिला - राँची में किया गया। कार्यक्रम में आम, अमरूद, मोहगनी, आँवला, जामुन इत्यादि के 350 पौधों का वितरण किया गया।

कार्यक्रम की शुरुवात में स्थानीय शिव मन्दिर में आरती-पूजन कर दीप दान किया गया। उसके उपरान्त ग्रामीण बंधुओं के बीच एक लघु गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें श्री सर्वेश्वरी समूह का संक्षिप्त परिचय देते हुए समूह द्वारा किये जा रहे जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के बारे में भी ग्रामीण बंधुओं को अवगत कराया गया। साथ ही वृक्षों के कमी से हो रहे दुष्परिणामों के बारे में अवगत करते हुए वृक्षों के बचाव के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया गया। गोष्ठी के बाद ग्रामीण बंधुओं के बीच लगभग 350 पौधों का वितरण किया गया।

ज्ञात हो श्री सर्वेश्वरी समूह एक विश्व स्तरीय सामाजिक एवं धार्मिक संस्था है जो अनेक जनकल्याण के कार्यक्रम लगातार करती रहती है। जनसेवा के लिए श्री सर्वेश्वरी समूह का नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड एवं लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है।

सर्वेश्वरी वृक्षारोपण अभियान वर्ष - 2025 के अन्तर्गत आज के शिविर से पूर्व ग्राम - जुरकेला (जिला सिमडेगा), ग्राम - दौलेचा (जिला - राँची), ग्राम - कोइन्जारा (जिला - गुमला) एवं ग्राम - तारूप (जिला - राँची) में भी समूह शाखा द्वारा लगभग 1510 पौधों का रोपण एवं वितरण किया जा चुका है।

कार्यक्रम के कुशल आयोजन में श्री आशुतोष नाथ शाहदेव का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ। ग्राम दुबलिया से श्री विमल पहान और श्री अजय कच्छप कार्यक्रम में शामिल हुए।

श्री सर्वेश्वरी समूह - शाखा राँची से श्री अरुण सिंह, श्री नवल किशोर सिंह, श्री राधा मोहन मिश्रा, श्री गंगाधर नाथ शाहदेव, श्री विक्रांत सिंह, श्री प्रताप आदित्य नाथ शाहदेव, श्री पवन कुमार, श्री सौरभ राज के साथ लगभग 20 श्रद्धालु-सदस्यगण शामिल हुए।

Published / 2025-08-23 20:48:14
सहनशीलता की शक्ति वाले ही करते हैं मौन धारण : हर्षिल-जिनांग धीरेन

टीम एबीएन, रांची। श्री जैन श्वेतांबर संघ के पर्युषण पर्व के आज चौथे दिन जैन मंदिर डोरंडा एवं दिगम्बर जैन भवन में प्रवचन, धर्म-आराधना गतिमान हैं। श्री जैन मंदिर डोरंडा मे सुबह प्रक्षाल पूजा हुई एवं स्नात्र पूजा हुई। साथ ही कल्पसूत्र जो कि आगम ग्रंथ का एक अंश है उसकी पांच पूजा मति ज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधिज्ञान, मन: पर्यव ज्ञान एवं ज्ञानों में ज्ञान केवल्य ज्ञान की पूजा की गयी, लाभार्थियों ने धूमधाम से पूजा की। 

तत्पश्चात स्वाध्यायी हर्षिल सुरेश साह एवं जिनांग धीरेन साह के द्वारा भगवान महावीर वाणी कल्पसूत्र का वाचन हुआ। बताया कि कल्पसूत्र ग्रंथ में आचार बताये गये हैं, कहा गया है कि अगर आपका आचार अच्छा होगा तो आपका विचार अच्छा होगा, अगर विचार अच्छे होंगे तो क्रिया अच्छी होंगी तथा क्रिया से जीवन अच्छा होगा।  अगर व्यक्ति अपने जीवन में अनुसरण करें तो मोक्ष के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। 

जैसे तीर्थों में शत्रुँजय, मंत्रो में नवकार, फूल में कमल, पुरुषों में राम वैसे ही ग्रंथों में कल्पसूत्र की महिमा बताई गयी हैं। सभी श्रावकों को अपने आचरण में उतारने के लिए 18 सूत्र बताये गये। आज मंदिर मे सम्पत लाल रामपुरिया, पूनम चंद भंसाली, प्रमोद बोथरा, प्रकाश पारख,  नवीन रामपुरिया, अनिल कोठरी, राकेश कोठरी, शांतिबाई भंसाली, पुष्पा सेठिया, आदि मौजूद थे। श्री दिगंबर जैन भवन मे उपासिका संतोष श्रीमाल एवं सीमा डूंगरवाल का प्रवचन सुबह 8:30 बजे से हुआ।  

वाणी संयम के साथ मितभाषिता भी सफल जीवन के लिए जरूरी : डुंगरवाल 

पर्युषण पर्व का तीसरा दिन वाणी संयम दिवस के रूप में मनाया गया। वाणी संयम दिवस अर्थात मौन साधना के लिए समर्पित दिन के रूप में मनाया गया। उपासिका संतोष श्रीमाल एवं सीमा डुंगरवाल ने वाणी पर व्याख्यान दिया और बताया कि आप अपने विचारों को दूसरों के सामने किस तरह रखते है , इससे बहुत फर्क पड़ता है। 

वाणी मनुष्य को दी गई वह शक्ति है जिसके द्वारा वह अपने विचारों,भावनाओं और मनोभावों को व्यक्त कर सकता है। व्यक्ति को प्रभावी ढंग से बोलना सीखना चाहिए। धर्म सभा को संबोधित करते हुए डुंगरवाल जी ने बताया कि मनुष्य को मधुर व मीठी वाणी बोलनी चाहिए। वाणी के कारण दूसरे को अपना व पराया बनाया जा सकता है। 

व्यक्ति को कला पूर्ण व कम बोलने का प्रयास करना चाहिए। अधिक से अधिक मौन रहने का प्रयास करना चाहिए। एक शब्द से बहुत कुछ बताया जा सकता है। भगवान महावीर ने भाषा के चार प्रकार बताए है सत्य, असत्य, मिश्र ओर व्यवहार।  हमेशा सत्य बोलने का प्रयास करना चाहिए। जिन लोगों में सहनशीलता की शक्ति होती है वे मौन धारण कर सकते हैं। 

मौन झगड़ों को नियंत्रित करता है और लोगों के बीच समन्वय को बढ़ाता है। जो व्यक्ति बदले की भावना को सौहार्दपूर्ण संबंधों में बदलने की क्षमता रखता है, वह मौन धारण कर सकता है। कोई व्यक्ति मौन रह सकता है। प्रवचन मेें घेवर चंद नाहटा, संजय सिंघी, विनोद बेगानी, रंजन भटेरा, भास्कर पींचा, माणिक चंद बोथरा, उत्तम चौरडिया के अलावा भारी संख्या में श्रावक एवं श्राविकाएं मौजूद थे।

Published / 2025-08-23 18:08:50
हरतालिका तीज पर्व 26 अगस्त को

भगवान शिव-पार्वती एवं गणेश जी की पूजा का विशेष महत्व 

हरतालिका तीज नारी शक्ति, श्रद्धा, तपस्या और प्रेम का प्रतीक : संजय सर्राफ 

एबीएन सोशल डेस्क। विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता सह झारखंड प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन के संयुक्त महामंत्री संजय सर्राफ ने कहा है कि हरतालिका तीज भारत के प्रमुख हिंदू त्योहारों में से एक है, जो विशेष रूप से महिलाओं द्वारा श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 26 अगस्त दिन मंगलवार को मनाया जायेगा? 

इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए हरतालिका तीज का निर्जला व्रत रखती हैं। हरतालिका तीज का व्रत सुहागिने और कुंवारी कन्याएं भी रहती हैं। हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का बड़ा महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हरतालिका तीज व्रत रखने से ही मां पार्वती को भगवान शिव पति के रूप में मिले थे। 

हरतालिका तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने से सुहागिनों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कन्याओं के विवाह में आ रही परेशानियां दूर होती हैं। इसके साथ ही इस व्रत के प्रभाव से अच्छा वर भी मिलता है। हरतालिका तीज व्रत की शुरुआत करने के बाद जीवनभर इस व्रत को रखा जाता है। हालांकि,अगर व्रत रख पाना संभव ना हो, तो हरतालिका तीज व्रत का उद्यापन जरूर करना चाहिए। 

हरतालिका तीज का नाम दो शब्दों हरित (हरण करना) और आलिका (सखी) से मिलकर बना है। इस दिन माता पार्वती द्वारा भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए किए गए कठिन तप और संकल्प को स्मरण किया जाता है। मान्यता है कि पार्वती जी को जब उनके पिता ने भगवान विष्णु से विवाह के लिए बाध्य किया, तो उनकी सखियां उन्हें वन में ले गयी, जहां पार्वती जी ने कठोर तपस्या की। 

अंतत: भगवान शिव ने उनका तप स्वीकार किया और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकारा। तभी से यह दिन सुहागिनों और कुंवारी कन्याओं के लिए विशेष माना गया। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, यानी जल तक ग्रहण नहीं करतीं। वे पूरे दिन उपवास रखकर रात्रि में शिव-पार्वती की पूजा करती हैं। पूजा में शुद्ध मिट्टी या रेत से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की मूर्तियां बनाई जाती हैं। 

महिलाएं पारंपरिक वस्त्रों, विशेष रूप से हरे रंग की साड़ी,चूड़ियां पहनकर और मेंहदी लगाकर सजती हैं, गीत गाती हैं और झूला झूलती हैं। हरतालिका तीज व्रत का आध्यात्मिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टियों से अत्यधिक महत्व है। यह व्रत पति की दीघार्यु, पारिवारिक सुख-शांति और सुयोग्य वर प्राप्ति के लिए किया जाता है। 

इसके साथ ही यह पर्व महिलाओं को सामाजिक रूप से जोड़ता है और संस्कृति से जुड़ाव को भी बढ़ावा देता है। हरतालिका तीज नारी शक्ति, श्रद्धा, तपस्या और प्रेम का प्रतीक है। यह पर्व भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान, उसकी आस्था और उसकी शक्ति को एक सुंदर रूप में अभिव्यक्त करता है। यही कारण है कि यह पर्व आज भी पूरी भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

Published / 2025-08-23 10:57:30
सब सिखन को हुकम है...

इंद्रजीत सिंह डिंपल

सब सिखन को हुकम है

गुरु मान्यौ ग्रंथ

गुरु गोबिंद सिंह जी

बाणी गुरु, गुरु है बानी।

विच बणी अमृत सरे।।

टीम एबीएन, रांची। आदिग्रन्थ सिख समुदाय का प्रमुख धर्मग्रन्थ है। इन्हें गुरु ग्रंथ साहिब भी कहते हैं। इनका संपादन सिख समुदाय के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने किया। गुरु ग्रन्थ साहिब जी का पहला प्रकाश 30 अगस्त 1604 को हरिमंदिर साहिब अमृतसर में हुआ। 1705 में दमदमा साहिब में दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरु तेगबहादुर जी के 116 शब्द जोड़कर इसको पूर्ण किया, इनमे कुल 1430 पृष्ठ है।

गुरुग्रन्थ साहिब जी में मात्र सिख गुरुओं के ही उपदेश नहीं है, वरन् 30 अन्य सन्तो और अलंग धर्म के मुस्लिम भक्तों की वाणी भी सम्मिलित है। इसमे जहां जयदेवजी और परमानंदजी जैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी है, वहीं जाति-पांति के आत्महंता भेदभाव से ग्रस्त तत्कालीन हिंदु समाज में हेय समझे जाने वाली जातियों के प्रतिनिधि दिव्य आत्माओं जैसे कबीर, रविदास, नामदेव, सैण जी, सघना जी, छीवाजी, धन्ना की वाणी भी सम्मिलित है। 

पांचों वक्त नमाज पढ़ने में विश्वास रखने वाले शेख फरीद के श्लोक भी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। अपनी भाषायी अभिव्यक्ति, दार्शनिकता, संदेश की दृष्टि से गुरु ग्रन्थ साहिब अद्वितीय हैं। इनकी भाषा की सरलता, सुबोधता, सटीकता जहां जनमानस को आकर्षित करती है। वहीं संगीत के सुरों व 31 रागों के प्रयोग ने आत्मविषयक गूढ़ आध्यात्मिक उपदेशों को भी मधुर व सारग्राही बना दिया है।

गुरु ग्रन्थ साहिब में उल्लेखित दार्शनिकता कर्मवाद को मान्यता देती है। गुरुवाणी के अनुसार व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार ही महत्व पाता है। समाज की मुख्य धारा से कटकर संन्यास में ईश्वर प्राप्ति का साधन ढूंढ रहे साधकों को गुरुग्रन्थ साहिब सबक देता है। हालांकि गुरु ग्रन्थ साहिब में आत्मनिरीक्षण, ध्यान का महत्व स्वीकारा गया है, मगर साधना के नाम पर परित्याग, अकर्मण्यता, निश्चेष्टता का गुरुवाणी विरोध करती है।

गुरुवाणी के अनुसार ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख होकर जंगलों में भटकने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर हमारे हृदय में ही है, उसे अपने आन्तरिक हृदय में ही खोजने व अनुभव करने की आवश्यकता है। गुरुवाणी परमात्मा से उपजी आत्मिक शक्ति को लोककल्याण के लिए प्रयोग करने की प्रेरणा देती है। मधुर व्यवहार और विनम्र शब्दों के प्रयोग द्वारा हर हृदय को जीतने की सीख दी गई है। 

गुरु पंथ का दास
इंद्रजीत सिंह डिंपल

Published / 2025-08-23 10:27:27
सेवानिवृत्ति के बाद जीने का ढंग अत्यंत महत्वपूर्ण है

राजीव थेपड़ा 

टीम एबीएन, रांची। द्वितीय विश्व युद्ध से पहले अधिकांश अमेरिकी अपनी मृत्यु तक कार्य किया करते थे। 1940 तक 65 वर्ष और उससे अधिक आयु के पुरुषों की श्रमिक वर्ग में भागीदारी 50% से भी अधिक थी। 1940 के पश्चात सेवानिवृत्ति की अवधारणा का सूत्रपात हुआ। जब ईडा में फ़ुलर ने अपना पहला सामाजिक सुरक्षा चेक कैश कराया। जिसका कुल मूल्य लगभग साढे बाइस डॉलर था और उसके पश्चात अमेरिकियों के जीवन में बढ़ती हुई महंगाई और मुद्रास्फीति के समतुल्य सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना का आकार बढ़ता चला गया। जो विभिन्न व्यक्तियों की विभिन्न आय वर्ग के अनुसार समायोजित हुआ करता था। 

यूं देखा जाए तो सेवानिवृत्ति का विचार अपने आप में भयावह प्रतीत होता है! सुबह से शाम तक किसी फैक्ट्री में, किसी कार्यालय में अथवा किसी भी अन्य स्थान पर कार्य करने वाला व्यक्ति सेवानिवृत्ति के पश्चात अपने जीवन को बहुत तर्कसंगत ढंग से अथवा बहुत रचनात्मक ढंग से नहीं देख पाता। भय की सबसे बड़ी बात यह है कि सेवानिवृत्ति के पश्चात उसकी आय का साधन हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। इसलिए सेवानिवृत्ति तक हर व्यक्ति कम-से-कम इतना धन इकट्ठा कर लेना चाहता है कि सेवानिवृत्ति के पश्चात उसका शेष जीवन अच्छे से चलाया जाता रहे और यह भी अलग-अलग लोगों के की अलग-अलग आय वर्ग के अनुसार हुआ करता है।

यद्यपि भारत के संदर्भ में सेवानिवृत्ति को देखें। तो यहां  इसे बिल्कुल अलग और बेहद रचनात्मक तरीके से देखा गया है। भारत की परंपरागत अवधारणा जीवन को चार भागों में बाँटकर देखने की रही है। जिसमें प्रथम बाल्यावस्था, द्वितीय किशोरावस्था, तृतीय युवावस्था एवं चतुर्थ वृद्धावस्था । प्राय: वृद्धावस्था को वानप्रस्थ नाम दिया गया है। हिंदू धर्म के चार आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) मैं तीसरा स्थान या तीसरा चरण वानप्रस्थ कहलाता है। जिसका शाब्दिक अर्थ ही है वन की और प्रस्थान। 

यह वह अवस्था है, जब व्यक्ति अपनी गृहस्थी के समस्त दायित्व अपनी संतानों को सौंप देता है। अपने सांसारिक मोह कम करता है और आध्यात्मिक मुक्ति यानी मोक्ष की ओर बढ़ने के लिए धीरे-धीरे समाज और भौतिक सुख-सुविधाओं से अलगाव अपनाता है। वस्तुतः यह सन्यास आश्रम में प्रवेश करने से पहले एक संक्रमण-कालीन चरण है, जहां व्यक्ति आध्यात्मिक साधना और एकांतिक जीवन की ओर उन्मुख होता है।

सामान्यतः वानप्रस्थ गृहस्थ आश्रम के पश्चात आता है, जब व्यक्ति की आयु 50 वर्ष के आसपास होती है। लेकिन यह विचार उस काल का है, जब जीवन को 25-25 वर्षों के चार भागों में विभक्त किया गया था। आज के अनुसार यह आयु थोड़ी अधिक भी हो सकती है। एक वानप्रस्थी अपने परिवार और सांसारिक जिम्मेवारियों को अपनी अगली पीढ़ी को सौंप देता है और अपनी भौतिक इच्छाओं को त्याग कर समाज और सुविधाओं से दूर प्रकृति के साथ एकांत में रहने लगता है। 

इस अवस्था का उद्देश्य सन्यास आश्रम में प्रवेश करने से पूर्व मन को आध्यात्मिक रूप से तैयार करना है। यह बहुधा पति-पत्नी दोनों के द्वारा मिलकर अपनाई जाती है, जहां वे अपनी संतानों से अलग रहकर जीवन बिताते हैं। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि वानप्रस्थ एक ऐसा जीवन है, जो भौतिकता से दूर होकर आध्यात्मिक चिंतन-साधना और प्रकृति के साथ एकरूप होकर एकाग्रचित जीवन जीने पर केंद्रित होता है। ताकि व्यक्ति संन्यास के लिए स्वयं को पूरी तरह से तैयार कर सके। 

इस प्रकार हम पाते हैं कि वृद्धावस्था भारत में किसी भी तरह की भयावह अवधारणा नहीं, अपितु एक वह रचनात्मक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति अपने द्वारा दिए गए जीवन के अनुभवों के अनुसार अपना शेष जीवन अपने स्वयं के मोक्ष के लिए अथवा समाज के लिए भांति-भांति के रचनात्मक कार्यों में व्यतीत कर सकता है और यह उसकी रुचि के अनुसार होता है। विभिन्न व्यक्ति, विभिन्न विषयों में पारंगत होते हैं और उन्हें अपनी उन अभिरुचियों और पारंगतता के अनुसार समाज के होनहारों, किशोरों, बालकों और युवाओं के साथ मिलकर कुछ ऐसे कार्य करने चाहिए, जिसमें उन सभी लोगों को उस वृद्ध  किंतु विभिन्न  जीवन-अनुभवों से समृद्ध व्यक्ति के अनुपम अनुभवों का व्यापक लाभ प्राप्त हो सके।

किंतु आमतौर पर हमारा जीवन इस प्रकार गुजरता है कि वृद्धावस्था में हम अपने ही घर में या समाज में जीते हुए अपने से प्रत्येक छोटों  यानी अनुभवहीनों और वर्तमान परिस्थितियों की लगातार आलोचना करते हुए एक विषमय वातावरण तैयार करने लगते हैं और ऐसे में हमारे आसपास के वे लोग भी हमसे छिटक जाते हैं, जो वास्तव में हमारे स्वयं के सगे संबंधी या हमारे पास पड़ोस के लोग भी होते हैं। समाज का कटु सत्य यह भी है कि जब तक परिवार का कोई भी व्यक्ति कमाने वाला होता है, तब तक परिवार में उसकी महत्ता दूसरे ही प्रकार की होती है। लेकिन जब वह वृद्धावस्था में पहुंचकर अपने काम-धंधों से निवृत हो जाता है, तब वह अपने परिवार के लिए धन कमाने की इकाई के रूप में अनुपयोगी हो जाता है। किंतु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि वह सभी तरीकों से परिवार के लिए अनुपयोगी हो और इसके लिए परिवार और उस व्यक्ति-विशेष दोनों को आपस में तारतम्य बनाने की कला आनी चाहिए।

प्राय: अधिकतर लोग यह समझते हैं कि वृद्धावस्था का अर्थ प्रत्येक काम छोड़ देना या अपनी समुचित जिम्मेवारी से ही निवृत हो जाना है। किंतु संसार में ऐसा बिल्कुल नहीं है। आप जब तक जीते हैं, आपकी आखरी सांस तक के चलने तक आपको जहां तक हो सके रचनात्मक बने रहना होता है। क्योंकि मनुष्य का जीवन तरह-तरह के सृजन कार्यों में लगकर ही प्रसन्नता पूर्वक जिया जा सकता है। जैसा कि कहा जाता है।

खाली दिमाग शैतान का घर! यह बिल्कुल सच है कि जब आप बिल्कुल खाली रहते हैं, तो आपका मन जिस प्रकार की उड़ान भरता है, उसमें वास्तविकता कम, फंतासी ज्यादा होती है! किंतु वास्तविक जीवन में फंतासी का कोई अर्थ नहीं होता है! भले ही आप अपनी कल्पना में कितने ही घोड़े क्यों नहीं दौड़ा लें। लेकिन आपके वास्तविक जीवन में यदि कछुआ भी नहीं है, तो आप फंतासी और वास्तविकता के बीच में पिसकर रह जाएंगे और कभी अपना वास्तविक जीवन नहीं जी पाएंगे।

हमेशा अधिकतर लोगों के साथ में ऐसा ही होता है कि वे अपने-अपने दिनचर्या के कार्यों से इतना ऊबे हुए होते हैं कि अपने मन में अपने लिए, अपने जीवन के लिए एक विशेष प्रकार की फैंटसी भी गढ़ते रहते हैं और यह फैंटसी और वास्तविकता का घर्षण निरंतर उनके मनो-मस्तिष्क में चलता रहता है और इसी से सारा दु:ख हैं। फंतासी का मन में होना बुरी बात नहीं है। लेकिन उसका वास्तविक जीवन पर हावी हो जाना, यह सबसे बुरी बात है। आप अपने कामों को करते हुए भी आनंदित रह सकते हैं। आपका हर कार्य आपको आनंद से परिपूर्ण कर सकता है। यदि आप उस कार्य में डूब जाएँ। यह भी सच है कि हर किसी को उसके मन के अनुकूल कार्य नहीं मिलता। 

संसार में ऐसे करोड़ों लोग भरे पड़े हैं, जो किसी-ना-किसी तरह की रचनात्मकता रखते हैं, लेकिन उन्हें वह अवसर नहीं मिलते। और उन्हें किसी और ही तरह का जीवन जीना पड़ता है। लेकिन यदि वे अपने उन रचनात्मक आवेगों के कारण अपने द्वारा दिए जा रहे वास्तविक जीवन को स्वीकार न कर पाएं, तो इससे बड़ा दुख भला और क्या होगा? और इसी दुख से हम में से अधिकांश लोग भरे हुए रहते हैं! जिसका कि कोई कारण ही नहीं। 

बात हो रही थी वृद्धावस्था की। जिसे हमारे यहां वानप्रस्थ की संज्ञा भी दी गई है  इस वानप्रस्थ का एक रचनात्मक मर्म है और यदि हम अपनी उस परंपरा को याद करें और उसके द्वारा बताए गए उन सूत्रों का अपने जीवन में अनुसरण करें। तो हमारी सेवानिवृत्ति के बाद का जिया जा रहा जीवन उतना ही आनंदपूर्ण और रचनात्मक आवेग से परिपूर्ण हो सकता है, जितने कि हम कल्पना किया करते थे! आवश्यक नहीं कि हमारी हर कल्पना सच हो! लेकिन यह सच है कि हम अपनी कल्पनाओं के बहुत सारे अंशों को अपने वास्तविक जीवन में उतार सकते हैं और जितना ज्यादा जितना अधिक हम उसे अपने वास्तविक जीवन में उतारते जाएंगे, उतना ही अधिक न केवल हमारे स्वयं का जीवन समृद्ध होता जायेगा, बल्कि हमारी उस व्यक्तिगत  समृद्धता से हमारे आसपास का समूचा वातावरण भी समृद्ध होगा। हमारे बच्चे, हमारे युवा, हमारे परिवार के सभी सदस्य, हमारे आस-पड़ोस के सभी लोग! यहां तक कि हम जहां उठते-बैठते हैं, आते-जाते हैं, वहाँ के सभी लोग इससे समृद्ध होंगे। लाभान्वित होंगे। हमें केवल इतना भर सोचना है कि हमें क्या करना है और कैसे करना है। (लेखक रांची, झारखंड के प्रसिद्ध विचारक हैं 7004782990)।

Published / 2025-08-22 20:39:37
श्री जैन श्वेतांबर संघ के पर्युषण पर्व में धर्म प्रवचन जारी

टीम एबीएन, रांची। श्री जैन श्वेतांबर संघ के पर्युषण पर्व के आज तीसरे दिन जैन मंदिर डोरंडा एवं दिगंबर जैन भवन में प्रवचन एवं धर्म आराधना जारी है। श्री दिगंबर जैन भवन में उपासिका संतोष श्रीमाल एवं सीमा डूंगरवाल का प्रवचन हुआ। 

पर्युषण पर्व का आज तीसरा दिन सामायिक दिवस के रूप में मनाया गया, उपासिका संतोष श्रीमाल ने 48 मिनट की अभिनव सामायिक करवायी, जिसमें परमेष्ठी वंदना, त्रिपादी वंदना, जप ध्यान व स्वाध्याय करवाया तथा जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभ भगवान के जीवनी पर प्रकाश डाला। उपसिका सीमा डूंगरवाल ने पुनिया श्रावक की सामायिक का उल्लेख करते हुए सामायिक दिवस का महत्व बताया। 

पर्युषण के दौरान कर्मों कि निर्जरा हेतु तपस्या भी जारी है आज विशाल दस्सानी के 23 उपवास, विकाश नाहटा के 4 उपवास तथा रश्मि सिंघि, खुशबू दस्सानी एवं श्रेयांश बोथरा के आज 3 उपवास की तपस्या चल रही है। कमलेश संचेती, खुशबु दस्सानी ने तपस्वीयों के लिए गीतिका प्रस्तुत की एवं सभा के मंत्री घेवर चंद नाहटा ने अपने विचार रखें। 

प्रवचन में आज जानकी दास बोहरा, बसंत दस्सानी, मोहन लाल नाहटा, राकेश बच्छावत, जय प्रकाश बांठिया, सुमन बरमेचा आदि के अलावा भारी संख्या में श्रावक एवं श्राविकाएं मौजूद थे। श्री जैन मंदिर डोरंडा में सुबह 7 बजे नमिनाथ भगवान की प्रक्षाल पूजा हुई एवं स्नात्र पूजा हुई। तत्पश्चात 9 बजे से मुंबई से पधारें स्वाध्यायी हर्षिल सुरेश साह एवं  जिनांग धीरेन साह का प्रवचन हुआ। 

आज के प्रवचन में वर्ष भर करने योग्य 11 कर्तव्यों के बारे में बताया गया। इन 11 कर्तव्यों के पालन करने से हमारे जीवन में आनंद की वृद्धि होती हैं तथा जीवन में उत्तरोतर विकास करते हुए मोक्ष मार्ग का पथिक बन सकता हैं। सामान्य जीवन में कैसे नियमपूर्वक जीना है। उत्तरोतर वृद्धि करना आदि का विश्लेषण किया गया। 

कल्पसूत्र को घर ले जाकर भक्ति भावना करने की बोली बसंत लाल रामपुरिया, राजकुमार रामपुरिया, नवीन रामपुरिया के परिवार ने ली। श्री नमीनाथ भगवान की अंगी (श्रृंगार) श्रुति सेठिया, कृतिका रामपुरिया, पूनम बोथरा, खुशी कोठारी, काव्य कोचर आदि के द्वारा किया गया। कल से कल्पसूत्र में निहित भगवान महावीर की वाणी का वांचन होगा। आज मंदिर मे शांति लाल रामपुरिया, सुभाष बोथरा, अजय कोठरी, संजय कोठरी, बालबीर जैन, ज्योति रामपुरिया, संतोष बैंगानी आदि मौजूद थे। उक्त जानकारी मीडिया प्रभारी सुरेश जैन ने दी।

Published / 2025-08-22 20:38:32
लड्डू गोपाल की छठी पर झूम उठा श्री श्याम मंदिर

टीम एबीएन, रांची। श्री श्याम मंडल, रांची ने अग्रसेन पथ स्थित श्री श्याम मंदिर में आज दिनांक 22 अगस्त को प्रात: 11:30 बजे लड्डू गोपाल जी को उनके छठी के अवसर पर भोग अर्पित किया गया। आज के भोग के मुख्य यजमान आचार्य श्री श्याम सुंदर भारद्वाज ने अपने पूरे परिवार के साथ जिनमें राधे श्याम भारद्वाज, नटवर लाल भारद्वाज एवं राज कुमार भारद्वाज ने लड्डू गोपाल जी को भोग अर्पित किये। आज के भोग में पुरी सब्जी, पुड़ा, बड़ा एवं विभिन्न प्रकार के मिष्ठान लड्डू गोपाल जी को अर्पित किया गया। 

सर्वप्रथम मंडल के अध्यक्ष चंद्रप्रकाश बागला , मंत्री धीरज बंका एवं भारद्वाज परिवार द्वार गणेश पूजन कर मन्दिर में विराजे वीर बजरंगबली एवं शिव परिवार का भी पूजन कर विभिन्न प्रकार के फल एवं मिष्ठान अर्पित कर लड्डू गोपाल जी को  भोग अर्पित किया। भोग अर्पित कर पठ बंद होने तक तथा पुन: संध्या 4 बजे पठ खुलने पर भक्तों के बीच वितरण किया गया। 

इस अवसर पर पूरा मंदिर परिसर जय-जयकार से गूंज उठा, साथ ही श्री श्याम मण्डल के कार्यकर्ता आए हुए भक्तजनों को शुद्ध पेयजल का वितरण कर रहे थे तथा उनके चरण पादुका को रखने की उत्तम व्यवस्था बना हुआ था। आज के छठी का भोग श्री श्याम मन्दिर में ही निर्मित किया गया तथा 350 से ज्यादा भक्तजनों प्रसाद प्राप्त किया।  

आज के इस कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रमोद बगड़िया, महेश सारस्वत, अभिषेक डालमिया, नितेश लखोटिया, विकास पाड़िया, अमित जलान का सहयोग रहा। उक्त जानकारी श्री श्याम मंडल के श्री श्याम मंदिर, अग्रसेन मार्ग रांची के मीडिया प्रभारी सुमित पोद्दार (9835331112) ने दी।

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