टीम एबीएन, कोडरमा। चार्टर्ड एकाउंटेंट की फाइनल परीक्षा में सफलता प्राप्त करने पर झुमरी तिलैया पानी टंकी रोड निवासी रिया जैन को निवर्तमान पार्षद पिंकी जैन ने उनके घर पर जाकर उनको पुष्पगुच्छ देकर बधाई दी और उनके उज्जवल भविष्य की कामना की। जैन समाज के मंत्री ललित जैन सेठी सहित पदाधिकारियों के द्वारा बधाई दी गई उनके पिता सुरेश जैन कासलीवाल और माता रितु जैन मध्यम वर्गीय परिवार से आते हैं। बेटी की सफलता पर उन्होंने बहुत खुशी का इजहार किया। उनके पुत्र शुभम जैन भी सीए हैं। बधाई देने वालों में जैन समाज के कोषाध्यक्ष सुरेंद्र जैन काला, सह मंत्री राज, छाबड़ा, उपाध्यक्ष कमल जैन सेठी, प्रदीप जैन पांड्या, सुरेश झाझंरी, नरेंद्र झाझंरी, सुनील जैन शेट्टी,सुशील जैन छाबड़ा, जैन स्कूल के डायरेक्टर किशोर जैन पांड्या, सुनील जैन छाबड़ा, जयकुमार कुमार गंगवाल, नीलम सेठी, आशा गंगवाल , विनोद अजमेरा सुरेश शेट्टी, महावीर कासलीवाल, महेंद्र कासलीवाल मनीष सेठी, संदीप सेठी, एवं समाज के मीडिया प्रभारी नवीन जैन, राजकुमार जैन शामिल थे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सरकार ने बुधवार को कहा कि 2018 से 2020 के बीच 16,000 से अधिक लोगों ने दिवालिया होने या कर्ज में डूबे होने के कारण आत्महत्या कर ली जबकि 9,140 लोगों ने बेरोजगारी के चलते अपनी जान दे दी। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि 2020 में 5,213 लोगों ने दिवालियापन या कर्ज में डूबे होने के कारण आत्महत्या की जबकि 2019 में यह संख्या 5,908 और 2018 में 4,970 थी। उन्होंने कहा कि 2020 में 3,548 लोगों ने जबकि 2019 में 2,851 और 2018 में 2,741 लोगों ने बेरोजगारी के चलते आत्महत्या की।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। टेलीविजन पर मशहूर पौराणिक धारावाहिक महाभारत में भीम के किरदार को जीवंत करने वाले कलाकार प्रवीण कुमार का सोमवार रात निधन हो गया। वह 74 वर्ष के थे और लंबे समय से बीमार थे। उन्होंने कल देर रात दिल्ली में अशोक विहार स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके परिवार में पत्नी, पुत्री, दो भाई और एक बहन है। प्रख्यात फिल्म निर्देशक बी आर चोपड़ा के निर्देशन में महाभारत में भीम के किरदार से प्रवीण को काफी लोकप्रियता मिली थी। बाद में उन्होंने कई फिल्मों में भी काम किया। महाभारत में उनके साथी कलाकार रहे गजेंद्र चौहान ने ट्वीट कर उनके निधन की जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि एक और दु:खद समाचार मिला। मेरा महाभारत का भाई प्रवीण कुमार जी हम सबको छोड़कर अनंत यात्रा पर चला गया। विश्वास नहीं हो रहा। पा जी, आप हमेशा हमारी यादों में रहेंगे। ओम शांति. ओम शांति.. ओम शांति...
टीम एबीएन, सिमडेगा। झारखंड में सिमडेगा स्थित केलाघाघ, दनगद्दी, केतुंगाधाम जैसे पर्यटक स्थलों को दिया गया नया स्वरूप ना सिर्फ पर्यटकों को अपनी ओर बरबस आकर्षित कर रहा है, बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका भी सशक्त हो रही है। यहां की मनोरम प्रकृति छटा पर्यटकों का मन मोह रही है। यही नहीं, इन पर्यटन स्थलों को पर्यटकों के लिए मूलभूत सुविधाओं से आच्छादित किया गया है, जिससे पर्यटकों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है। सिमडेगा के उपायुक्त सुशांत गौरव ने सोमवार को बताया कि वर्षों से उपेक्षित सिमडेगा के पर्यटन स्थलों को संवारने का कार्य पिछले एक वर्ष से किया जा रहा है। जिला पर्यटन संर्वधन समिति के माध्यम से जिले के वैसे पर्यटक स्थल, जहां पर्यटकों का आना लगा रहता है, उसे चिह्नित करते हुए विकास के कार्य हो रहे हैं। इस कार्य में स्थानीय लोगों की भूमिका तय की गई, जिसे यहां के लोगों ने सहर्ष स्वीकार भी किया है। इससे जिला प्रशासन को सहूलियत हुई और पर्यटन स्थलों का सौंदर्यीकरण एवं लोगों के लिए अप्रत्यक्ष रोजगार सुनिश्चित हुआ। सिमडेगा में कई ऐसे पर्यटन स्थल हैं, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। इनमें से एक है। भंवर पहाड़, जो पौराणिक विरासत का प्रतीक है। कहते हैं कि कालांतर में युद्ध के दौरान शत्रुओं को मार गिराने में भंवर पहाड़ का अहम योगदान रहा है। जिला प्रशासन द्वारा भंवर पहाड़ की विरासत तथा पहाड़़ को पर्यटक स्थल के रूप में पहचान दिलाने के लिए चिह्नित किया। भंवर पहाड़़ के मनोरम द्दश्य को देखने एवं पहाड़़ की खासियत से जन-जन को अवगत कराने के उदेश्य से उसे सँवारने का कार्य धरातल पर उतारा गया है। जल्द भंवर पहाड़़ के सौंदर्यीकरण के कार्य को पूर्ण करते हुए पर्यटकों को सुपुर्द कर दिया जायेगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शुभांगी उपाध्याय)। भारतवर्ष पर सैकड़ों वर्षों से ही अनगिनत आक्रमण होते आए हैं। परंतु इसकी अखंडता को अक्षुण्ण रखने हेतु अनेक वीर, महात्मा, संत, कवि आदि ने इस भूमि पर जन्म लिया और हर प्रकार से इसकी रक्षा की। ऐसा ही एक दौर था आज से लगभग हजार वर्ष पूर्व, जब भारत की अस्मिता पर आंच आई थी। विदेशी आक्रांताओं के अत्याचार, लूटपाट और भय से मनुष्य का मन निराशा से भर उठा था। ऐसे में दक्षिण भारत के तमिल नाडु राज्य के श्रीपेरुमबुदुर नामक ग्राम में सन 1017 ई में एक ब्राह्मण परिवार में बालक का जन्म होता है। माता कांतिमती तथा पिता केशव उसे लक्ष्मण कहकर पुकारते थे। वह बालक भक्ति का ऐसा बीज बोता है जिससे जनमानस में सांस्कृतिक क्रांति, चेतना और जागृति हो जाती है। छोटी उम्र में पिता को खोने के बाद बालक परिवार सहित कांची जाकर यादव प्रकाश से वेदांत की शिक्षा ग्रहण करता है। अपने गुरु की वेद चर्चा और तर्क से असंतुष्ट और असहमत बालक आगे चलकर आलवर संत श्रीपाद यमुनाचार्य जी महाराज की शरण में चला जाता है और उनका प्रधान शिष्य भी बन जाता है। समाज कल्याण के संकल्प हेतु जीवन समर्पित : संत यमुनाचार्य जी के वैकुंठ गमन के पश्चात एक अभूतपूर्व घटना घटी, जिससे एक साधारण बालक के असाधारण बनने की प्रक्रिया आरंभ हुई। बालक ने देखा की शरीर त्यागने के पश्चात भी गुरू जी की 3 उंगलियां मुड़ी हुई थी, सभी इस भेद को जानने के लिए उत्सुक थे। उदासीन बालक यह भांप गया की गुरुवर के तीन इच्छा बाकी थी। अकस्मात ही वह बोल पड़ा, मैं ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखूंगा और इतना कहते ही गुरु यमुनाचार्य की एक उंगली खुल गई। उसने और ऊंचे स्वर तथा दृढ़ निश्चय के साथ दो और प्रण किए की वह श्रीविष्णु सहस्रनाम और दिव्य प्रबंधम पर भी टीका लिख अपने गुरू की इच्छा और साथ ही समस्त मानव जाति का कल्याण करेंगे। इसके पश्चात ही बाकी दो उंगलियां भी खुल गई। कार्य अत्यंत ही दुष्कर था परन्तु दृढ़ संकल्प, विराट इच्छाशक्ति, आत्म विश्वास और गुरु के आशीर्वाद से यह कार्य पूर्ण हुआ और लक्ष्मण से श्रीपाद स्वामी रामानुजाचार्य तक का सफर भी तय हुआ। समानता की दृष्टि : आचार्य रामानुज का कम उम्र में ही थंगाम्मा नामक युवती से विवाह संपन्न हुआ था। कुलीन कन्या होने के कारण उनके मन में तथाकथित निम्न जाति-वर्ग के लोगों के प्रति द्वेष था साथ ही वह उनसे अनुचित व्यवहार भी करती थी। भगवान वरदराज के प्रियभक्त श्री कांचीपूर्ण जी (जो निम्न वर्ग से आते थे) को आचार्य अपना गुरु मानते थे। एक दिन मध्यान भोजन हेतु उन्होंने उन्हें अपने निवास पर आमंत्रित किया। उनके भोजन करके चले जाने के पश्चात थंगाम्मा ने बचे हुए भोजन को बांट दिया, घर को गोबर से लीपा, पुन: स्नान किया और पति के लिए दुबारा भोजन पकाने लग गईं। उनके इस कृत्य से आचार्य जी को बहुत कष्ट हुआ, मन द्रवित हो उठा। उनकी दृष्टि में केवल मनुष्य ही नहीं अपितु प्रत्येक प्राणिमात्र भी ईश्वर के समतुल्य ही था। इस घटना के पश्चात ही उन्होंने गृहस्थाश्रम का त्याग कर सन्यास ग्रहण कर लिया। आगे चलकर उनकी इसी सम दृष्टि से तथाकथित निम्न जाति का उद्धार हुआ, उन्हें मंदिरों में प्रवेश, समाज में सम्मान और प्रभु भक्ति के योग्य भी बनाया। गुरु भी शिष्य बन गए : मैसूर से कुछ दूर स्थित श्रीरंगम नगरी के श्रीरंगनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में आचार्य जी ने कई वर्षों तक प्रभु की सेवा की। तत्कालीन समय के महान संत श्रीपाद गोष्ठिपूर्ण जी महाराज से महामंत्र सीखने के लिए आचार्य 17 बार मिलते हैं जिसमें से 17 बार निराशा ही हाथ लगती है। अठारहवीं बार की भेंट में गोष्ठिपूर्ण जी महामंत्र ॐ नमो नारायणाय बता देते हैं परन्तु साथ ही दो शर्त भी रखते हैं, पहला यह की मंत्र की गोपनीयता बनाए रखनी होगी और दूसरा, भविष्य में किसी सुपात्र को ही महामंत्र सिखाने का वचन। यह जानने के पश्चात की इस मंत्र के श्रवण मात्र से ही ईश्वर प्राप्ति हो जाती है, आचार्य स्वयं को रोक न सके। उनका संवेदशील हृदय आह्लादित हो उठा और इस चराचर जगत के कल्याण हेतु वे मंदिर की सबसे ऊंची दीवार पर खड़े होकर जोर-जोर से मंत्रोच्चारण करने लगे। जिसने भी इस मंत्र को धारण किया, उन सबका उद्धार हो गया। इस बात पर गोष्ठिपूर्ण अत्यंत क्रोधित होकर अपने शिष्य से कहते हैं, गुरुद्रोही ! तुझे नरक मिलेगा। आचार्य भाव-विभोर हो कह उठते हैं, ह्लयदि एक मेरे नरक चले जाने से समस्त संसार का कल्याण होता है तो मुझे अपने किए पर तनिक भी खेद नहीं।ह्व इस महान विचार, त्याग की भावना और करुणामयी हृदय के आगे गोष्ठिपूर्ण नतमस्तक हो जाते हैं, ग्लानि से भर उठते हैं और रामानुजाचार्य को अपना गुरु स्वीकार कर लेते हैं। ध्येय के प्रति पूर्ण निष्ठा और विद्या की देवी माता सरस्वती का आशीर्वाद : ब्रह्म सूत्र पर भाष्य लिखने के अपने पहले संकल्प की पूर्ति हेतु आचार्य को ऋषि बोधायन द्वारा रचित बोधायन वृत्ति के अध्ययन की आवश्यकता थी। आज के आधुनिक दौर में तो हम एक क्लिक में ही दुनिया भर की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं परन्तु एक हजार वर्ष पूर्व ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। उस पुस्तक का पता लगाने हेतु आचार्य ने बड़ा ही संघर्ष किया और पाया कि उस कृति की केवल एक ही प्रति उपलब्ध है, वह भी सुदूर कश्मीर की घाटियों में बने श्री शारदापीठम में। अपने मेधावी तथा प्रिय शिष्य कुरेज को साथ लेकर वे कश्मीर पहुंच गए और वहां उन्हें निराशा ही हाथ लगी क्योंकि पंडितों ने वह प्रति देने से मना कर दिया। मान्यता है की उस मंदिर में माता सरस्वती स्वयं प्रगट होकर पुस्तक की प्रति आचार्य को सौंप देती हैं। वे जब दक्षिण भारत के लिए प्रस्थान करते हैं तब जंगल में ही पुजारीगण उनपे हमला करके किताब छीन लेते हैं परन्तु उनके शिष्य गुरेज के पास अद्भुत स्मरणशक्ति थी जिससे वह एक नजर में ही पूरी पुस्तक याद कर लेते हैं। उन्हीं की सहायता से आचार्य श्री भाष्यम की रचना करते हैं और उनकी इसी महान रचना के कारण उन्हें श्री संप्रदाय शिरोमणि भी कहा जाता है। हरि को भजे, सो हरि का होय : कावेरी नदी के किनारे बसा पर्वतीय क्षेत्र मेलुकोटे बहुत ही सुंदर क्षेत्र है। अपने जीवनकाल में आचार्य ने लगभग 12वर्ष तक इस स्थान को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और श्री चेलुव नारायण मंदिर में प्रभु की सेवा की। विभत्स आक्रांताओं ने भारत के अनेकों मंदिर तोड़े, बहुमूल्य रत्न लूटे और साथ ही हमारे अराध्य देवी-देवताओं के विग्रह भी चुरा कर साथ ले गए। इसी में से एक सुंदर विग्रह राम प्रिया भी थी, जो इस मंदिर की उत्सव मूर्ति थी और उत्सवों अथवा जात्रा के दौरान इस विग्रह की झांकी निकलती थी। यह वही दिव्य मूर्ति थी जिसकी पूजा त्रेता युग में प्रभु राम और उनके वंशजों ने की और द्वापर में श्री कृष्ण ने भी की। आचार्य को जब यह ज्ञात हुआ की वह मूर्ति दिल्ली के मुगल दरबार में है तो बिना विलंब वे अपने प्रभु को लेने पहुंच गए। उन्होंने आग्रहपूर्वक जब अपने प्रभु को ले जाने की मांग की तब मुगल शासक ने उन्हें मूर्ति लौटा दी। यह देखकर शहजादी अत्यंत द्रवित हो उठी और दीवानों की तरह आचार्य और उनके काफिले का पीछा करते हुए मेलुकोटे शहर जा पहुंची। मुस्लिम कन्या होने के कारण उसका मंदिर में प्रवेश वर्जित था, वह बाहर ही अपने आराध्य श्री हरि विष्णु के ध्यान में लीन हो गई। जब आचार्य को यह ज्ञात हुआ तब उन्होंने उसे मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी और वह महान भक्त प्रभु में ही समा गईं। तत्पश्चात आचार्य ने स्वयं बीबी नाचियार की मूर्ति को मंदिर में स्थापित करवाया। वह मूर्ति आज भी मंदिर परिसर में स्थापित है और भक्तगण प्रभु की अनन्य प्रेमिका को भी पूजते हैं। निष्कर्षत: हम कह सकते हैं की संत रामानुजाचार्य का जीवन अत्यंत ही प्रेरणादायी है। भारतीय संत परंपरा में आदिगुरु शंकराचार्य जी के पश्चात श्रीपाद रामानुजाचार्य जी का ही नाम लिया जाता है। आचार्य शंकर के अद्वैतवाद से भिन्न इन्होंने विशिष्टाद्वैत की रचना की। वैष्णव धर्म के प्रचार प्रसार हेतु इन्होंने पूरे भारतवर्ष की यात्रा की और जन जागृति का कार्य किया। अपने जीवनकाल में इन्होंने बहुत सारी रचनाएं की, भाष्य लिखे परन्तु सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं श्री भाष्यम और वेदान्त संग्रहम को माना जाता है। वेदांत के अलावा सातवीं-दसवीं शताब्दी के रहस्यवादी एवं भक्तिमार्गी आलवार सन्तों के भक्ति-दर्शन तथा दक्षिण के पंचरात्र परंपरा को इन्होंने अपने विचारों का आधार बनाया। संत रामानुजाचार्यजी की शिष्य परम्परा में ही रामानंद हुए जिनके शिष्य कबीर, रैदास और सूरदास थे। सन् 1137 ई० में जब यतिराज रामानुजाचार्य 120 वर्ष की अवस्था में पहुंचते हैं तब वह ब्रह्मलीन हो जाते हैं। ऐसे तेजस्वी, समदर्शी दिव्यात्मा की सहस्राब्दी में सम्मान स्वरूप विश्व की दूसरी सबसे बड़ी बैठी हुई मूर्ति, स्टैच्यू आॅफ इक्विलिटी का अनावरण कर प्रधानमंत्री सहित समस्त भारतवर्ष ही नहीं अपितु समस्त संसार के भक्तजन उनके प्रति अपना आभार व्यक्त कर रहे हैं। यह भारतीय सांस्कृतिक क्रांति और चेतना का आगाज है। ( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं।)
एबीएन सेंट्रल डेस्क। इंदौर के सिख मोहल्ले की जिस गली में 28 सितंबर, 1929 को स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का जन्म हुआ था, उसे उनके प्रशंसकों की बरसों पुरानी मांग के बावजूद उनका नाम नहीं मिल सका। 92 साल की उम्र में मंगेशकर का रविवार को निधन हो गया, जिसके बाद शहर के संगीतप्रेमियों ने इस गली के नये नामकरण की मांग पूरी न होने के चलते अपने गम और गुस्से का इजहार किया और ‘‘सुरों की मलिका' को श्रद्धांजलि देने के लिए इस गली में उनके प्रशंसकों का तांता लग गया। स्थानीय लोगों ने बताया कि सिख मोहल्ले में मंगेशकर जन्मस्थली वाली गली जिला न्यायालय परिसर से सटी होने के कारण "कोर्ट वाली गली" और चाट-पकौड़ी की कतारबद्ध दुकानों के चलते "चाट वाली गली" के रूप में मशहूर है। उन्होंने बताया कि इस गली की दुकानों के साइन बोर्ड पर पते के रूप में "कोर्ट वाली गली" और "चाट वाली गली" ही लिखा नजर आता है। संगीत और संस्कृति के स्थानीय जानकार संजय पटेल ने बताया, हम स्थानीय प्रशासन से पिछले कई बरसों से मांग कर रहे हैं कि सिख मोहल्ले की इस गली का नाम मंगेशकर के नाम पर कर दिया जाए, लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे अथक प्रयासों के बावजूद अब तक ऐसा नहीं हो सका है। उन्होंने बताया कि सरकारी दस्तावेजों में इस गली का नाम मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति शंकर माधव संवत्सर के नाम पर पहले से दर्ज है। पटेल ने भावुक लहजे में कहा, मंगेशकर के निधन के बाद अब उनके नाम पर स्थानों और संस्थानों का नाम रखने की देशभर में होड़ मच जाएगी, लेकिन हमें यह पीड़ा हमेशा भीतर ही भीतर सालती रहेगी कि उनकी जन्मस्थली वाली गली का नाम उनके जीते जी उनके नाम पर नहीं रखा जा सका। इस बीच, इंदौर के लोकसभा सांसद शंकर लालवानी ने मंगेशकर के निधन पर शोक जताते हुए कहा कि वह शहर में उनकी याद को चिरस्थायी बनाने के लिए स्थानीय प्रशासन से चर्चा कर जल्द ही कोई घोषणा करेंगे। लालवानी ने कहा, यह सच है कि इंदौर की जिस गली में मंगेशकर का जन्म हुआ था। उस गली का नामकरण उनके नाम पर नहीं हो सका है, लेकिन इस गली के नुक्कड़ पर हमने पिछले साल 28 सितंबर को उनके जन्मदिन पर उनकी तस्वीर के रूप में प्रतीक चिह्न लगाकर उन्हें सम्मान दिया था। चश्मदीदों के मुताबिक राज्य के संस्कृति निदेशालय और इंदौर नगर निगम की लगाई यह तस्वीर मंगेशकर जन्मस्थली से चंद कदमों की दूरी पर है और इस पर लिखा है-"हमें गर्व है कि सृष्टि के दिव्य स्वर लता मंगेशकर की जन्मस्थली है हमारी नगरी इंदौर।" "सुरों की मलिका" के रूप में मशहूर मंगेशकर 28 सितंबर, 1929 को इंदौर के एक गुरुद्वारे से सटे सिख मोहल्ले में जन्मी थीं। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर नाटक मंडली चलाते थे और यह मंडली शहर-दर-शहर घूमते हुए इंदौर पहुंची थी। लता के जन्म के कुछ समय बाद उनके परिवार ने इंदौर छोड़ दिया था। हालांकि, वक्त की करवटों के साथ सिख मोहल्ले में अब उस घर का वजूद मिट चुका है, जहां लता मंगेशकर का जन्म हुआ था। वर्तमान में इस जगह पर कपड़ों की एक दुकान है जिसके भीतर मंगेशकर के सम्मान में उनकी छवि की भित्तिचित्र कलाकृति लगी है। मंगेशकर के निधन के बाद इस दुकान के सामने उनके गमगीन प्रशंसकों की भीड़ उमड़ पड़ी और वे "सुरों की मलिका" को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देते नजर आए।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत रत्न स्वर कोकिला लता मंगेशकर का रविवार को मुंबई में निधन हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लता मंगेशकर के निधन पर शोक व्यक्त किया है। पीएम मोदी ने सिलसिलेवार कई ट्वीट किए और लिखा कि मैं शब्दों से परे पीड़ा में हूं। दयालु और देखभाल करने वाली लता दीदी हमें छोड़कर चली गई हैं। वे हमारे देश में एक खालीपन छोड़ गई है, जिसे भरा नहीं जा सकता। आने वाली पीढ़ियां उन्हें भारतीय संस्कृति के एक दिग्गज के रूप में याद रखेंगी। बता दें कि 92 साल की लता मंगेशकर कोरोना वायरस से संक्रमित हो गई थीं। वह पिछले 29 दिनों से अस्पताल में भर्ती थीं और 6 फरवरी को वे जिंदगी की जंग हार गईं। लता दीदी की 8 जनवरी को कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लता जी के अस्पताल में भर्ती होने की खबर भी दो दिन बाद 10 जनवरी को सामने आई थीं। वह कोविड-19 और निमोनिया दोनों से ग्रसित थीं और मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष (ICU) में भर्ती थीं। लंबे समय से लता दीदी का इलाज कर रहे डॉ प्रतीत समधानी की देखरेख में ही डॉक्टर्स की टीम उनका इलाज कर रही थी। इलाज के दौरान उनकी हेल्थ में सुधार भी देखा जा रहा था और उनकी सेहत की लगातार निगरानी की जा रही थी। करीब पांच दिन पहले उनकी सेहत में सुधार होने पर ऑक्सीजन सपोर्ट हटा लिया गया था, लेकिन ICU में ही रखा गया था। स्वर कोकिला लता दीदी के निधन से पूरे देश में शोक की लहर है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को 11वीं सदी के वैष्णव संत श्री रामानुजाचार्य की स्मृति में यहां 216 फुट ऊंची स्टैच्यू आॅफ इक्वैलिटी प्रतिमा का अनावरण कर इसे राष्ट्र को समर्पित किया। इससे पहले, प्रधानमंत्री ने श्रीरामनगर स्थित रामानुजाचार्य के मंदिर परिसर स्थित एक यज्ञशाला में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा अर्चना की। मंदिर की परिक्रमा भी की : उन्होंने परिसर में बने 108 दिव्य देशम (सजावटी रूप से नक्काशीदार मंदिर) की परिक्रमा भी की। यह दिव्य देशम स्टैच्यू आॅफ इक्वैलिटी के चारों ओर बने हुए हैं। स्टैच्यू आॅफ इक्वैलिटी का उद्घाटन, रामानुजाचार्य की वर्तमान में जारी 1000वीं जयंती समारोह यानी 12 दिवसीय श्री रामानुज सहस्राब्दि समारोह का हिस्सा है। कार्यक्रम के दौरान संत रामानुजाचार्य की जीवन यात्रा और शिक्षा पर थ्रीडी प्रजेंटेशन मैपिंग का भी प्रदर्शन किया गया। पंचधातु से बनी है प्रतिमा : यह प्रतिमा पंचधातु से बनी है जिसमें सोना, चांदी, तांबा, पीतल और जस्ता का एक संयोजन है और यह दुनिया में बैठी अवस्था में सबसे ऊंची धातु की प्रतिमाओं में से एक है। यह 54-फुट ऊंचे आधार भवन पर स्थापित है, जिसका नाम भद्रवेदी है। इस परिसर में वैदिक डिजिटल पुस्तकालय और अनुसंधान केंद्र, प्राचीन भारतीय ग्रंथ, एक थिएटर, एक शैक्षिक दीर्घा हैं, जो संत रामानुजाचार्य के कई कार्यों की याद दिलाते हैं। श्री रामानुजाचार्य ने राष्ट्रीयता, लिंग, नस्ल, जाति या पंथ की परवाह किए बिना हर इंसान की भावना के साथ लोगों के उत्थान के लिए अथक प्रयास किया था।
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