एबीएन डेस्क। वैज्ञानिकों ने डायनासोर की एक नई प्रजाति को लेकर बड़ा दावा किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बिना हाथों वाले डायनासोर बेहद खतरनाक शिकारी थे। टायरेनोसौरस रेक्स प्रजाति की तुलना में इनके हाथ काफी छोटे थे। डायनासोर की यह प्रजाति अर्जेंटीना में 7 करोड़ साल पहले पाई जाती थी। डायनासोर की इस नई प्रजाति का नाम गुमेसिया ओचोआइ है। लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के शोधकर्ताओं ने अर्जेंटीना में इस नई प्रजाति के जीवाश्म अवशेष की खोज की है। इस रिसर्च से मिले डेटा के मुताबिक, गुमेसिया ओचोआइ और एबेलिसौर एक ही प्रजाति के थे और इनके सामने वाला अंग छोटा होता था। इस प्रजाति के डायनासोर अपने सिर और मजबूत जबड़े के जरिए शिकार करते थे। इस रिसर्च को करने वाली टीम की मुखिया और सह लेखिका प्रोफेसर अंजलि गोस्वामी का कहना है कि बेहद अनोखे हैं इस प्रजाति के डायनासोर। आइए जानते हैं इन प्रजाति के डायनासोर के बारे में वैज्ञानिकों ने क्या-क्या बताया है... प्रोफेसर अंजलि गोस्वामी ने बताया है कि इस प्रजाति के डायनासोर में कई विशेषताएं थीं। इस नए प्रजाति के डायनासोर से दुनिया के एक क्षेत्र के बारे में अहम जानकारियां मिलती हैं जिनके बारे में हमें बहुद ज्यादा पता नहीं है। पेटागोनिया और गोंडवाना के क्षेत्रों में थेरोपोड डायनासोर मिलते थे। इससे पहले साल 2021 में वैज्ञानिकों ने डायनासोर की एक नई प्रजाति खोजी थी। रिसर्च के मुताबिक, इस प्रजाति के डायनासोर 13 फीट लंबे, पांच फीट ऊंचे थे जबकि वजन 1 टन था। शाकाहारी डायनासोर के करीब दो पूर्ण खोपड़ी जीवाश्म मिले थे। शोधकर्ताओं ने पूर्वी ग्रीनलैंड के जेम्सन लैंड में इनकी खोज की थी। इस डायनासोर को वैज्ञानिकों ने "Issi saaneq" नाम दिया है जिसका मतलब कोल्ड बोन होता है। ट्रियासिक काल के आखिरी में इस प्रकार के डायनासोर धरती पर मिलते थे। 214 मिलियन साल पहले यूरोप से पूर्वी ग्रीनलैंड जुड़ा हुआ था। लंबी गर्दन वाले डायनासोर के ग्रुप से कोल्ड बोन संबंधित है जिसको सॉरोपोडा मोर्फ भी कहा जाता है। इसी समूह से सबसे बड़े डायनासोर का संबंध था।
एबीएन डेस्क। आजाद परिंदों की चहचहाहट में दुनियावी शोर-गुल को भुलाने और उनके खूबसूरत परवाज को घंटों निहारने वाले पक्षी प्रेमियों के लिए चार दिवसीय बर्ड-ए-थॉन की 18 फरवरी से शुरुआत होगी। इस अभियान के तहत देशभर के पक्षी प्रेमी विभिन्न पक्षियों की प्रजातियों को देखेंगे और उसके बारे में जानकारी दर्ज करेंगे। संगठन की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार ग्रेट बैकयार्ड बर्ड काउंट (जीबीबीसी) में दुनियाभर के एक लाख से ज्यादा पक्षी प्रेमी भाग लेते हैं। पिछले साल पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों के बारे देश भर के पक्षी प्रेमियों ने रिकॉर्ड तैयार किया था। भारत को इस अभियान में दुनिया में दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था।स्टेला मैरिस कॉलेज, चेन्नई की प्रोफेसर विद्या स्वामीनाथन ने कहा, मैं हर साल जीबीबीसी और सीबीसी का इंतजार करती हूं। इसके जरिये देशभर के साथ ही दुनियाभर के पक्षी प्रेमी पक्षियों को निहारने और उनके बारे में रियल टाइम चेक लिस्ट तैयार करने में मदद करते हैं। यह हमारे आसपास उनके जीवन में बदलाव लाने के लिए महत्वपूर्ण है। वर्ष 2021 में भारत पक्षियों की प्रजातियों के बारे में सूचना देने में कोलंबिया के बाद दूसरे स्थान पर था। वहीं, चेक लिस्ट अपलोड करने के मामले में अमेरिका और कनाडा के बाद तीसरे नंबर पर था। भारत में तीन जो सबसे ज्यादा पक्षी दिखे, उनमें मैना, बुलबुल और तोता थे। बता दें कि बर्ड काउंट इंडिया विभिन्न पक्षी प्रेमी संगठनों का एक समूह है। यह पक्षियों के बारे में लोगों की जानकारी को बढ़ाने और यह बताने का प्रयास करता है कि कहां किन प्रजातियों के पक्षियों की संख्या अधिक है। यह संगठन पक्षियों की निगरानी के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करता है और इससे जुड़े संगठनों की मदद करता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय रेल ने अपने यात्रियों के लिए नई सुविधा शुरू की है, इसके जरिए अब यात्री क्यूआर कोड और यूपीआई पेमेंट के माध्यम से ट्रेन टिकट खरीद पाएंगे। लेकिन यह सुविधा सिर्फ ऐसे स्टेशन पर होगी जहां ऑटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीन (ATVM) की सुविधा पहले से मौजूद है। ऐसी मशीन एटीएम की तरह होती हैं। पहले इनके उपयोग से यात्री केवल लोकल या प्लेटफॉर्म टिकट निकाल पाते थे, लेकिन अब इनकी मदद से लंबी यात्रा के लिए टिकट भी निकाले जा सकेंगे।
एबीएन सोशल डेस्क। झारखंड में बोकारो जिला के कसमार प्रखंड के मुरूलसुदी पंचायत का चौरा गांव में गेंदा के फूल ना सिर्फ फिजा में खुशबू बिखेर रहे हैं, बल्कि महिला किसानों की जिंदगी भी संवर रही है। लिलू देवी उन महिला किसानों में से एक है, जिसने महज कुछ माह में गेंदा फूल की खेती कर अपने परिवार की जिंदगी बदल दी है। लिलू देवी ने महज कुछ हजार रुपये से गेंदा के फूल की खेती शुरू की। इसके चार माह बाद ही उसने एक लाख रुपये से अधिक का मुनाफा कर लिया। लिलू देवी ने बताया, राज्य सरकार की मदद से उसने गेंदा फूल की खेती का प्रशिक्षण प्राप्त किया। सरकार की मदद से उसने पश्चिम बंगाल से लाकर हाईब्रिड नस्ल के पांच हजार गेंदा के फूल लगाए। इस कार्य में उनका स्नातक उतीर्ण बेटा लगुन किस्कू एवं परिवार के अन्य सदस्य भी हाथ बटा कर अच्छी आमदनी प्राप्त कर रहे हैं। कसमार प्रखंड के अन्य किसानों समेत लिलू देवी को पिछले दो वर्षों से पारंपरिक खेती धान एवं टमाटर की फसल से उम्मीद अनुरूप उत्पादन नहीं होने से काफी निराशा हुई। कई किसानों ने नई फसल लगाने का मन बनाया। इसी दौरान सरकार द्वारा महिलाओं को मल्टी ग्रेन खेती करने के लिए प्रेरित किया गया। लिलू ने भी इसमें रुचि दिखाई और परिवार के सभी सदस्यों ने भी हामी भरी। इसके बाद सरकार से ऋण प्राप्त कर गेंदा फूल की खेती शुरू की। इसके साथ खेत में सरसों और अरहर की भी मिक्स खेती की और यह प्रयोग सफल रहा।
एबीएन डेस्क (संतोष पाण्डेय)। माघ मास की पूर्णिमा तिथि गंगा स्नान के लिए सबसे पवित्र दिन है। माघ पूर्णिमा पर माघ स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। माघ महीने में गंगा स्नान करने, विष्णु पूजा करने और खिचड़ी खाने का विशेष प्रावधान बनाया गया है। इस बार माघ पूर्णिमा 16 फरवरी 2022 को है। माघ माह में चलने वाला यह स्नान पौष मास की पूर्णिमा से आरंभ होकर माघ पूर्णिमा तक होता है। लोग करते हैं कल्पवास तीर्थराज प्रयाग में कल्पवास करके त्रिवेणी स्नान करने का अंतिम दिन माघ पूर्णिमा ही है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माघ स्नान करने वाले मनुष्यों पर भगवान विष्णु प्रसन्न रहते हैं तथा उन्हें सुख-सौभाग्य, धन-संतान और मोक्ष प्रदान करते हैं। मघा नक्षत्र के उदय होने से माघ पूर्णिमा की उत्पत्ति होती है। मघा नक्षत्र को श्रीविष्णु जी का हृदय कहा जाता है। गंगा स्नान की विधि : माघ पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसा करने से व्यक्ति के जीवन में सुख समृद्धि के साथ-साथ उसके सभी रोगों का नाश होता है। माघ पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करें और उन्हें प्रणाम करें। इसके बाद ह्यॐ घृणि सूर्याय नम:ह्ण इस मंत्र का 108 बार जाप करें। माघ पूर्णिमा व्रत का संकल्प लें और काले तिल से अपने पितरों का तर्पण करें और फिर हवन करें। माघ पूर्णिमा व्रत के दौरान किसी से झूठ बोलने, किसी पर क्रोध करने किसी के बारे में अप शब्द बोलने से बचें। माघ मेला और कल्पवास : तीर्थराज प्रयाग (इलाहाबाद) में हर साल माघ मेला लगता है, जिसे कल्पवास कहा जाता है। इसमें देश-विदेश से श्रद्धालु शामिल होते हैं। प्रयाग में कल्पवास की परंपरा सदियों से चली आ रही है। कल्पवास का समापन माघ पूर्णिमा के दिन स्नान के साथ होता है। माघ मास में कल्पवास की बड़ी महिमा है। इस माह तीर्थराज प्रयाग में संगम के तट पर निवास को कल्पवास कहते हैं।
टीम एबीएन, कोडरमा। गुरुद्वारा रोड निवासी सरदार सगल दीप सिंह ने जेनरल कोटे में 2021 के नीट मेडिकल के एग्जाम में झुमरी तिलैया का नाम रौशन किया है। उन्होंने आॅल इंडिया रैंकिंग 5414 स्थान प्राप्त किया। उन्होंने घर पर रहकर ही परीक्षा की तैयारी की थी। सगलदीप को राज्य भर में 45वां स्थान प्राप्त हुआ है। ज्ञात हो कि सगल दीप सिंह स्वर्गीय अशोक सलूजा के छोटे पुत्र और गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा के सचिव यशपाल सिंह गोल्डन के भतीजे हैं। उन्होंने दसवीं की परीक्षा में भी 10 सीजीपीए प्राप्त किया था। 12वीं की परीक्षा में भी प्रथम आया था। सगलदीप की सफलता पर सारे समाज और परिवार मेंं हर्ष एवं खुशी का वातावरण है। सगल दीप सिंह ने दूरभाष पर बताया कि यह उसके गुरुजनों एवं बड़ों का आशीर्वाद है। उनके परिजनों से बातचीत में उन्होंने बताया कि यह उनकी अपनी मेहनत का फल है। वह रात को 3:30 बजे तक पढाई करता था। सगलदीप के डॉ बनाना उनके स्वर्गीय पिताा अशोक सलूजा का सपना था।
एबीएन सोशल डेस्क। आम के दीवाने, इसे खाने के लिए कितनी कीमत चुका सकते हैं, इसका अंदाजा पुणे से सामने आई एक खबर के बाद लगाया जा सकता है। दरअसल, पुणे की एक मंडी में सीजन का पहला हापुस आम खरीदने के लिए जबरदस्त होड़ दिखाई दी। बाकायदा आम की बोली लगाई गई। एक टोकरी खरीदने के लिए जबरदस्त बोली लगी, जिसके बाद आखिर में 31 हजार रुपये में टोकरी नीलाम हो गई। आम विक्रेता का कहना है कि इस तरह के आम के दाम पिछले 50 साल में भी नहीं मिले हैं। दरअसल, देवगढ़ रत्नागिरी से हापुस आम की पहली फसल शुक्रवार को पुणे के एपीएमसी मार्केट पहुंची थी। पांच हजार रुपये रखी गई शुरुआती कीमत : आम की टोकरी जैसे ही बाजार पहुंची, लोग उसे खरीदने के लिए टूट पड़े। मुंहमांगी कीमत भी देने को तैयार थे। ऐसे में आम विक्रेता युवराज काची ने उसे नीलाम करने की योजना बनाई। युवराज ने बताया कि आम की शुरुआती कीमत 5 हजार रुपये लगाई गई। आखिर में हापुस आमों की यह टोकरी 31 हजार रुपये में बिकी। हर बार होती है नीलामी : युवराज काची बताते हैं कि परंपरा के तौर पर हम सीजन के पहले आम की नीलामी आयोजित करते हैं। इस नीलामी के आधार पर अगले दो महीने तक बाजार का रास्ता तय होता है, लेकिन ऐसा पहली बार है जब 31 हजार रुपये में टोकरी बिकी है। उन्होंने बताया कि यह पिछले 50 साल में सबसे महंगी बोली है। इसके अलावा एक टोकरी 21 हजार तो एक और 18 हजार रुपये में नीलाम हुई। वहीं दो टोकरियां 22, 500 रुपये में बिकीं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (स्वामी मुक्तरथ)। बगैर शोर-शराबे के योग-संस्कृति को फैलानेवाले स्वामी निरंजनानंद आत्मप्रचार से हमेशा दूर रहे। आज 14 फरवरी को उनका जन्म दिवस है। स्वामीजी ने अपने गुरु स्वामी सत्यानंद द्वारा स्थापित मुंगेर स्थित बिहार योग विद्यालय को श्रेष्ठ संस्थान बना दिया है। साथ ही रिखिया पीठ को उच्च स्थान पर बनाये रखा है। योग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य के लिए पद्मविभूषण अलंकरण से भी सम्मानित किया जा चुका है। बात 1956 की है। जब स्वामी निरंजनानंद के गुरु स्वामी सत्यानंद ऋषिकेश स्थित स्वामी शिवानंद के आश्रम में रह रहे थे। उन्होंने स्वामी सत्यानंद को अपने पास बुलाया और कहा कि तुम्हारा जाने का समय आ गया है, जाओ। दुनिया में परिव्राजक की तरह घूमो। दुनिया को योग सिखाओ। स्वामी सत्यानंद संसार के लिए निकले। 1963 तक परिव्राजक की तरह भ्रमण करते रहे। स्वामी सत्यानंद को बीस साल मिले और इस अवधि में दुनिया को सत्यानंद के जरिये योग मिला। इन्हीं बीस सालों में मुंगेर में बिहार योग विद्यालय की स्थापना हुई, जहां से निकल कर सत्यानंद पूरी दुनिया में जाते थे और पूरी दुनिया से लोग निकल कर बिहार योग विद्यालय पहुंचते थे। एक से एक प्रामाणिक, वैज्ञानिक योग ग्रंथों का प्रकाशन हुआ। बीसवीं सदी में योग का जो पुनर्जागरण होना था, बिहार योग विद्यालय उसका केंद्र बन गया और स्वामी सत्यानंद सूत्रधार। दुनिया का शायद ही कोई ऐसा महाद्वीप होगा, जहां स्वामी सत्यानंद ने योग का बीज न बोया हो। अरब से लेकर अमेरिका तक अफ्रीका से लेकर आॅस्ट्रेलिया तक स्वामी शिवानंद का परिव्राजक संन्यासी पूरी दुनिया में घूम घूमकर योग बीज बो रहा था, जो आगे चलकर पुष्पित और पल्लवित होनेवाला था। लेकिन, एक तरफ जहां वे वर्तमान की सख्त जमीन पर योग बीज रोपित कर रहे थे। वहीं दूसरी तरफ वे भविष्य में इसके रखरखाव की योजना पर भी काम कर रहे थे, ताकि कोई फूल खिलने से पहले न कुम्हला जाये। यह कोई दस-बीस साल का मामला नहीं था। अब तो यह शताब्दियों का मामला है। एक पवित्र परंपरा के पुनर्जागरण काल में सिर्फ वर्तमान नहीं होता। उसका अपना एक भविष्य होता है और उस भविष्य की अपनी एक दैवीय योजना। चार साल के स्वामी निरंजन इसी दैवीय योजना का हिस्सा होकर बिहार स्कूल आॅफ योगा पहुंचे थे। 1964 बिहार स्कूल आॅफ योगा और स्वामी निरंजन दोनों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण साल है। इसी साल मुंगेर में बिहार योग विद्यालय की स्थापना हुई और इसी साल चार साल के निरंजन योग विद्यालय में प्रविष्ट हुए। छतीसगढ़ के राजनांदगांव में 14 फरवरी, 1960 को जन्मे स्वामी निरंजनानंद की जीवनदिशा उनके गुरु स्वामी सत्यांनद द्वारा निर्देशित रही। यहां उन्हें गुरु ने योगनिद्रा के माध्यम से योग और अध्यात्म का प्रशिक्षण दिया। कम उम्र में ही वे इतने योग्य हो चुके थे कि स्वामी सत्यानंद ने उन्हें दशनामी संन्यास परंपरा में दीक्षित करने के बाद काम पर लगा दिया। उन्हें विदेशों में योग केंद्रों की स्थापना करनी थी। जहां योग केंद्र स्थापित हो चुके थे, उनके संचालन को भी सुनिश्चित करना था। उन्हें न सिर्फ योग समझाना था, बल्कि दुनिया की विविध संस्कृतियों को समझना भी था। सांस्कृतिक एकता के यौगिक सूत्रों की खोज करनी थी। अमेरिका से लेकर आॅस्ट्रेलिया तक। वहां उन्होंने विशेष तौर पर घ्यान और प्राणायाम के क्षेत्र में अनुसंधान का काम अल्फा रिसर्च के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित डॉ जो कामिया के साथ काम किया। सैन फ्रांसिस्को, कैलिफोर्निया के ग्लैडमैन मेमोरियल सेंटर के जापानी डॉ टॉड मिकुरिया ने उन पर ध्यान संबधी शोध किये। जिस समय स्वामी निरंजनानंद विदेश के लिए निकले, तो उस समय स्वामी सत्यानंद के योग आंदोलन के परिणामस्वरूप केवल फ्रांस में 77 हजार पंजीकृत योग शिक्षक थे। उस समय के लिए यह बहुत बड़ी संख्या थी। उन दिनों वे सिर्फ इन योग शिक्षकों को प्रशिक्षित करते थे, ताकि वे अपने स्कूलों मे लौट कर विद्यार्थियों को प्रशिक्षित कर सकें। बाद में यह आंदोलन रिसर्च आॅन योगा इन एड्यूकेशन के नाम से पूरी दुनिया में फैल गया। यूरोप में इस आंदोलन का सूत्रपात पेरिस की स्वामी योग भक्ति, कनाडा में स्वामी अरुंधती ने आरंभ किया गया। इस आंदोलन का नाम योगा एजुकेशन इन स्कूल रखा गया। परिणामस्वरूप यह उत्तर तथा दक्षिण अमेरिका में काफी लोकप्रिय हुआ। इसके परिणामस्वरूप अनेक देशों की शिक्षा पद्धति में योग को शामिल किया गया। निरंजनानंद सरस्वती ने 1983 तक वह सब किया। 23 साल की उम्र तक जब तक कोई नौजवान काम करने के लिए घर से बाहर कदम रखता है, तब तक स्वामी निरंजन अपने हिस्से का एक बड़ा काम पूरा करके वापस लौट आये थे। अब उनके हिस्से आगे की जिम्मेदारियां आनेवाली थीं। भारत लौटने के बाद उन्होंने बिहार योग विद्यालय को विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा तक ले गये, लेकिन साथ ही वे समूचे विश्व में स्वामी सत्यानंद के बीजारोपण की माली की तरह रखवाली भी करते रहे। वर्ष 1993 के विश्व योग सम्मेलन के बाद गंगा दर्शन में बाल योग मित्र मंडल की स्थापना की गयी। इसका आरंभ मुंगेर के सात छोटे बच्चों से किया गया और आज मुंगेर शहर में ही बाल योग मित्र मंडल 5000 से अधिक प्रशिक्षित बच्चे योग शिक्षक हैं। मुंगेर में यह संख्या 35 हजार और पूरे भारत में 1,50000 हैं। इन बच्चों ने तीन आसनों, दो प्रणायामों, शिथिलीकरण एंव धारणा के एक-एक अभ्यास का चयन किया। दरअसल, स्वामी सत्यानंद सरस्वती का स्पष्ट दृष्टिकोण था कि यदि हम बच्चों तक पहुंच पाते हैं और उनके जीवन की गुणवत्ता और प्रतिभा में सुधार ला पाते हैं, तो वे अपनी रचनात्मकता का अधिकतम उपयोग कर अपने भावी जीवन के तनावों और संघर्षों का सामना बेहतर ढंग से कर पायेंगे। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम दो बार मुंगेर बच्चों के कार्यक्रम में आये। उन्होंने मुंगेर को योगनगरी की संज्ञा दी। (लेखक सत्यानंद योग मिशन से जुड़े हैं।)
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