एबीएन सोशल डेस्क। आपने देखा होगा कि व्हिस्की, वोडका या बीयर अलग अलग तरीके की शराब होती है। यहां तक कि इनका रंग भी अलग होता है। जैस वोडका क्रिस्टल कलर की होती है तो व्हिस्की गोल्डन रंग की होती है। तो आज बात करते हैं व्हिस्की की। क्या आप जानते हैं व्हिस्की किस रंग की होती है और व्हिस्की के गोल्डन रंग के होने के बीच क्या कारण है और ये नैचुरल कलर होता है या फिर इसमें कलर मिलाया जाता है। जानते हैं इन सवालों के जवाब... व्हिस्की के गोल्डन कलर होने की एक अहम वजह है वुडन बैरल। यानी लकड़ी का एक ड्रम। जब भी व्हिस्की को बनाया जाता है तो यह पहले क्रिस्टल कलर यानी पानी जैसी होती है। लेकिन, इसे कई सालों तक इस वुडन बैरल में रखा जाता है, जिस वजह से इसका रंग बदल जाता है। इसी वजह से इसका रंग हल्की पीला होने लगता है. ऐसे में यह नैचुरल होता है। दरअसल, होता क्या है कि वुडन बैरल बनाते वक्त इसे हल्का टोस्ट किया जाता है, जिससे यह सॉफ्ट हो जाता है। ऐसे में जब सूरज की रोशनी इस पर पड़ती है तो लिकर इससे बाहर निकलने की कोशिश करती है और यह लकड़ी के अंदर घुस जाती है। इसके बाद रात में यह इससे बाहर निकलती है, जिससे टोस्ट की गई लकड़ी से लिकर का रंग गोल्डन होने लगता है। ऐसे में इसकी ज्यादा एज होती है, उतना ही लिकर का रंग ज्यादा गोल्डन होने लग जाता है। हालांकि, कई बार व्हिस्की के कलर के लिए केरेमल कलर का इस्तेमाल किया जाता है। कलर का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है, क्योंकि यह पूरी शराब के रंग को एक जैसा करने के लिए किया जाता है।
एबीएन सोशल डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य पर ट्राईसिटी में साइकिलिंग कल्चर को प्रोत्साहन में देने जुटे साईकिलगिरी ग्रुप ने रविवार को महिलाओं के लिए फ्लोरल राइड का आयोजन किया। राइड के आयोजक डॉ सुनैना बंसल, अंकिता मदान और अक्षित पासी ने बताया कि इस अनूठी राइड को आयोजित करने का उद्देश्य ट्राईसिटी की महिलाओं को एक प्लेटफार्म पर लाकर न केवल उनके आत्मविश्वास को जागृत करना था। बल्कि उनमें साइकिलिंग के प्रति लगाव बढ़ाकर फिटनैस के लिए भी प्रेरित करना था। मेयर ने भी साइकिलिंग के मौके पर बतौर मुख्य अतिथि पहुंची मेयर सर्वजीत कौर ने आयोजकों के प्रयासों की सराहना की और उन्हें शहर में साइकिलिंग कल्चर को बढ़ावा देने के लिए नगर निगम द्वारा हर संभव सहायता देने का आश्वासन भी दिया। मेयर ने इस अवसर पर अन्य महिला साइकिल सवारों के साथ साइकिलिंग भी की। कार्यक्रम के दौरान जुम्बा डांस और भंगड़ा भी किया गया। चंडीगढ़ पुलिस ने अपनी महिलाकर्मी स्टाफ द्वारा सैल्फ डिफैंस पर एक सत्र का भी आयोजन किया जिसमें महिलाओं में आत्म सुरक्षा के गुर सीखे। अक्षित पासी ने बताया कि इस आयोजन से एकत्रित हुई राशि सोहाना स्थित अपने फाऊंडेशन के अनाथ बच्चों के लिए स्पोर्ट्स किट में खर्च किए जाएंगे।
एबीएन सोशल डेस्क। दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल अपनी खास तरह की खूबसूरती के लिए जाना जाता है। ताजमहल में लगे सफेद पत्थर इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। चांद की रोशनी जब ताजमहल पर पड़ती है तो यह चमक उठता है। इसकी खूबसूरती का दीदार करने के लिए दुनियाभर से लोग आगरा पहुंचते हैं। पर आपने कभी सोचा है कि ताजमहल को बनाने के लिए सफेद मार्बल का ही इस्तेमाल क्यों किया गया है। इसे बनाने के लिए मकराना के सफेद मार्बल का इस्तेमाल किया गया है। इसकी भी एक खास वजह है। ताजमहल में सफेद पत्थरों का इस्तेमाल क्यों किया गया है, इसकी क्या खास वजह है, जानिए, इन सवालों के जवाब… हिस्ट्रीहिट की रिपोर्ट कहती है, ताजमहल में इस्तेमाल हुए सफेद मार्बल का खास महत्व है। इसे जिस दौर में बनाया गया है। उस समय सफेद पत्थरों का इस्तेमाल कुछ चुनिंदा जगहों के लिए ही किया जाता था। मुगल काल में निर्माण होने वाली हर चीज की अपनी खासियत होती थी। मुगल काल में सबसे ज्यादा दो तरह के पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता था- लाल और सफेद। लाल पत्थरों का इस्तेमाल महलों या उस दौर की इमारतों को बनाने में किया जाता था, लेकिन सफेद पत्थर का इस्तेमाल चुनिंदा जगहों के लिए ही किया जाता था। ऐसे मार्बल को पवित्र स्थानों के लिए रिजर्व रखा जाता था। इनका इस्तेमाल मकबरा, कब्र, समाधि जैसी जगहों के लिए किया जाता था। इसलिए ताजमहल के लिए सफेद मार्बल का इस्तेमाल किया गया। सुबह गुलाबी, दिन में सफेद और रात में सुनहरा दिखता है। इस मार्बल एक खासियत और भी है। वो है इनका रंग। सफेद होने के बावजूद ये मार्बल ताजमहल को अलग-अलग रंगों में दिखाता है। जैसे- अलसुबह यह गुलाबी नजर आता है। दिनभर यह सफेद दिखता है और रात में चंद्रमा की रोशनी में यह सुनहरा नजर आता है। शाहजहां ने इसलिए बनवाया ताजमहल : यूं तो शाहजहां का नाम कई महिलाओं के साथ जोड़ा गया, लेकिन वो वास्तव में सबसे ज्यादा प्यार मुमताज महल से ही करते थे। जब तक उनकी पत्नी मुमताज महल जीवित रहीं, वो पूरी तरह से उनके प्रति समर्पित थे, यहां तक कि उनकी दूसरी पत्नियों की उनके निजी जीवन में बहुत कम जगह थी। शाहजहां के दरबारी इतिहासकार इनायत खां ने अपनी किताब में लिखा है कि शाहजहां मुमताज के बगैर नहीं रह सकते थे। ताजमहल बनवाने के पीछे वो सपना था जिसे मुमताज ने देखा था। शाहजहां के गद्दी संभालने के 4 साल के अंदर मुमताज का निधन हो गया था। निधन से पहले अंतिम क्षणों में मुमताज ने बादशाह से कहा था कि उन्होंने सपने में एक ऐसा सुंदर महल और बाग देखा वैसा दुनिया में कहीं नहीं है। मेरी आपसे गुजारिश है कि आप मेरी याद में ऐसा ही एक मकबरा बनवाएं। इसके बाद ही ताजमहल की नींव पड़ी थी।
टीम एबीएन, रांची। इसाई धर्म प्रचारकों द्वारा आदिवासी, सिख व हिंदुओं के बीच अंधविश्वास व अंध श्रद्धा फैलाकर उन्हें धर्म परिवर्तन के कुचक्र में फंसाया जा रहा है। रविवार 27 फरवरी रविवार को जमशेदपुर के गोलमुरी में बिना प्रशासन की अनुमति के आयोजित चंगाई सभा में इसका पर्दाफाश हो भी गया। उक्त जानकारी विहिप के जमशेदपुर महानगर के मंत्री ने दी। उन्होंने कहा कि हम बताना चाहेंगे कि धर्म परिवर्तन के इस कुचक्र का भान स्थानीय लोगों, सामाजिक धार्मिक संगठनों व सिख समाज के कई जागरूक लोगों का था भी। यही कारण रहा कि इनके द्वारा विगत छह माह से इसे लेकर स्थानीय थाना समेत जिले के वरीय प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की जारी रही। उनसे गोलमुरी में चल रहे ईसाई मिशनरियों के कुचक्रों की शिकायत निरंतर की गई। थाना से उचित कार्रनाई की मांग की जा रही थी, लेकिन जिला प्रशासन की ओर से उपरोक्त विषय पर संज्ञान नहीं लिया गया और न ही इस कुचक्र में स्थानीय थाना की कोई कार्रवाई की गई। इसी से धर्म परिवर्तन का कुचक्र रचनेवाले ईसाई धर्म प्रचारकों का मनोबल बढ़ता चला गया और वे लोग पिछले कई वर्षों की भांति कोरोना काल में भी मानसिक तथा शारीरिक रूप से परेशान आदिवासी, सिख व हिदुओं को अंधविश्वास व अंध श्रद्धा की आड़ में फंसाने का तानाबाना बुनते रहे। ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा प्रार्थना करके जटिल से जटिल रोग-व्याधि-समस्याओं के निराकरण करने का झूठा ढोंग किया जाता रहा। जब यह पाखंड का खेल पूरे बस्ती वासियों के लिए समस्या बन गया तब विश्व हिन्दू परिषद ने घटना के एक दिन पूर्व यानी दिनांक 26/02/22 को जिला के वरीय प्रशासनिक अधिकारियों के साथ साथ स्थानीय थाना प्रभारी से भी इसकी शिकायत की तथा ऐसे गैर कानूनी कार्यक्रम (चंगाई सभा) को रूकवाने का आग्रह किया। बताया गया कि आयोजकों के पास चंगाई सभा करने का प्रशासन से जारी अनापत्ति प्रमाण पत्र तथा अनुमति पत्र है ही नहीं। उसके उपरांत भी यह असंवैधानिक चंगाई सभा पूर्व की भांति स्थानीय थाना पुलिस के संरक्षण में दिनांक 27/02/22 को संपन्न करवायी जा रही थी। इसे देखकर व जानकर विश्व हिंदू परिषद जब उक्त स्थान पर पहुंची तो पाया कि अंधश्रद्धा का कार्यक्रम अपने चरम पर है और हजारों ग्रामीण आदिवासी हिन्दू, सिख हिन्दू परिवार जो कई तरह की परेशानियों से पीड़ित है, रोग से पीड़ित हैं, वहां मौजूद हैं। देखा गया कि वहां जुटे लोगों में से किसी को शारीरिक रोग है तो किसी को मानसिक रोग है। ऐसे लोगों को बेहतर स्वास्थ्य-चिकित्सा सुविधा की आवश्यकता है, विशेष डॉक्टर की आवश्यकता है लेकिन इन लोगों को अंध विश्वास में धकेला जा रहा है। बड़ी बात यह भी देखी गई सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से बरगलाकर लाए गए ऐसे हिंदू परिवारों के रोगियों को संकीर्ण जगह में भेड़ बकरियों की तरह ठूंस ठूंस कर रखा गया था और ढोंग का तांडव किया जा रहा था। जब विहिप के लोगों ने रोगी परिवारों से पूछा कि आपलोगो में से कोई ऐसा रोगी है जो ईसाई है तो जवाब मिला नहीं। ऐसा एक भी रोगी परिवार नहीं मिला जो ईसाई था। इसका अर्थ तो यही हुआ न कि दुष्ट आत्माएं ईसाई को नहीं सिर्फ हिंदुओ को सता रही हैं और इनके लिए ही चंगाई सभा का आयोजन किया जाता है। इसके बाद थाना प्रभारी से पुन: इस ईसाई धर्म के प्रचारकों की ओौर से चलाए जा रहे इस असंवैधानिक कार्यक्रम की शिकायत की गई। ऐसे कार्यक्रम को अविलंब रोकने की मांग की गई जो पीड़ित हिन्दू परिवारों के साथ खिलवाड़ करने का कार्य कर रहा है। थाना प्रभारी की उदासीनता से हमें मिलीभगत की बू आ रही थी। रविनार 27 फरवरी की घटना के बाद विश्व हिन्दू परिषद को ऐसा अंदेशा था कि प्रशासन की ओर से हिन्दू संगठन के कार्यकर्ताओं, अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं तथा स्थानीय लोगों पर निराधार आरोप लगा कर अत्याचार किया जाएगा। आशंका सच साबित हुई। बदले की भावना रखते हुए थाना प्रभारी की ओर से अपने स्तर पर बस्ती वासियों पर विहिप संगठन के कार्यकतार्ओं व सिख समाज के प्रबुद्ध लोगों पर झूठा मुकदमा दर्ज किया जा रहा है। किन्तु विश्व हिन्दू परिषद, सिख समाज, बस्ती वसी ऐसी कार्रवाई से नहीं डरेंगे। प्रशासन यदि इस तरह की असंवैधानिक चंगाई सभा को हिन्दू विरोधी राज्य सरकार के आदेश पर संरक्षण देने का कार्य करेगी तो समाज व संगठन के लोग ऐसी असंवैधानिक सभा को रोकने के लिए आंदोलन करेंगे। भविष्य में विश्व हिंदू परिषद अपनी शिकायत प्रशासन से नहीं न्यायालय में करेगी, ताकि ऐसे कार्यक्रमों के होने पर अंधश्रद्धा उन्मूलन कानून के तहत सभी आयोजकों पर कार्रवाई हो सके।
एबीएन डेस्क। जब भी सब्जी या कोई अन्य डिश बनाई जाती है तो अक्सर उसमें हींग का इस्तेमाल किया जाता है। हींग के इस्तेमाल से आपने खाने का स्वाद बढ़ जाता है और इसकी खुशबू लोगों को काफी पसंद आती है। आपको घरों में पाए जाने वाला हींग मिट्टी की तरह होता है, ऐसा लगता है कि जैसे किसी पत्थर को पीस कर पाउडर बनाया गया हो। वैसे कई घरों में पत्थर के टुकड़ों वाला हींग भी मिलता है, जिसमें काफी ज्यादा खुशबू होती है और हल्का सा हींग ही काफी होता है। हो सकता है आपको भी हर सब्जी में हींग पसंद हो, लेकिन कभी आपने सोचा है आपके खाने की वैल्यू बढ़ाने वाले हींग आखिर ये बनता कैसे है? ये कोई पौधे पर लगता है या पहाड़ों में मिलता है या फिर ये फैक्ट्री में तैयार होता है। अगर आपको इस सवाल का पता नहीं है तो आज हम आपको इस सवाल का जवाब देने वाले हैं कि आखिर हींग कैसे बनाया जाता है और आखिर ये इतना महंगा क्यों होता है। कैसे बनता है हींग : दरअसल, सब्जी में डलने वाला हींग एक पौधे के जरिए बनता है। जी हां, हींग का पौधा होता है और हींग के पौधे से पाउडर वाला हींग बनता है। दरअसल, हींग का पौधा सौंफ वाले पौधों की श्रेणी में आता है, जो करीब एक मीटर तक होता है। इसमें पीले रंग के फूल होते हैं, जो दूर से दिखने में सरसों के पौधे की तरह लगता है। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये बनता कैसे है। बता दें कि हींग पौधे पर लगता नहीं है और ना ही इसके कोई फूल होते हैं। खाने वाला हींग इस पौधे की जड़ से बनता है, इसलिए कई लोग इसे गाजर, मूली के पौधे की श्रेणी में भी रखते हैं, क्योंकि यह जड़ से तैयार होता है। वैसे इस पौधे की जड़ हींग नहीं होती है। अब प्रोसेस के जरिए इस जड़ के माध्यम से खाने वाला हींग तैयार किया जाता है। पूरी दुनिया में हींग की करीब 130 किस्में हैं। बीज बोने के बाद चार से पांच साल बाद वास्तविक उपज होती है और एक पौधे से करीब आधा किलो हींग निकलता है और इसमें करीब चार साल लगते हैं। हींग इस पौधे के जड़ से निकाले गए रस से तैयार किया जाता है। एक बार जब जड़ों से रस निकाल लिया जाता है तब हींग बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। खाने लायक गोंद और स्टार्च को मिलाकर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में तैयार किया जाता है। इस तरह हींग बनता है। बता दें कि हींग दो तरह का होता है, काबुली सफेद और हींग लाल। सफेद हींग पानी में घुल जाता है जबकि लाल या काला हींग तेल में घुलता है। सफेद व पीला पानी में घुलनशील होता है जबकि गहरे व काले रंग वाला तेल में ही घुलता है, स्टार्च व गोंद मिला कर ईंट के रूप में बेचा जाता है। कहां पैदा होता है हींग : आपको ये जानकर हैरान होगी कि भारत के हर घर में इस्तेमाल होने वाले हींग की खेती भारत में ना के बराबर होती है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह हींग भारत के बाहर से ही मंगाया जाता है और भारत में इस्तेमाल होने वाला हींग ईरान, अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से मंगाया जाता है। अफगानिस्तान से काफी मात्रा में हींग आता है। भारत में भी अब हींग की खेती होने लगी है और यह खेती हिमाचल के कुछ पहाडी इलाकों में की जा रही है। क्यों होता है महंगा : हींग भारत में इसलिए महंगा होता है, क्योंकि एक तो इस भारत में पैदावार नहीं है और इसे विदेश से निर्यात करना पड़ता है। इसके अलावा इसे बनाने का प्रोसेस काफी लंबा है, क्योंकि 4 साल तक पौधे को उगाने के बाद इसकी जड़ से हींग प्राप्त होने लगता है। इस वजह से यह काफी महंगा होता है, लेकिन भारत में इसकी डिमांड काफी ज्यादा है।
एबीएन डेस्क (सन्तोष पांडेय)। होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। होली हिंदुओं का दो दिवसीय त्योहार है और होली की पूर्व संध्या को लोकप्रिय रूप से "होलिका दहन" कहा जाता है। रंग वाली होली 18 मार्च, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यानी 17 मार्च, गुरुवार को होली दहन किया जाएगा। इस दिन को बुराई पर अच्छाई के जीत के रूप में मनाया जाता है। होली उन त्योहारों में से एक है जो सभी धार्मिक भेदभावों को भूलकर खेला जाता है। यह त्योहार भाईचारे और समानता के संदेश को बढ़ावा देता है। होलिका दहन का बहुत ही विशेष महत्व है। होलिका दहन के दिन लोग विधि- विधान से पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा- पाठ करने से भगवान कृष्ण प्रसन्न होते हैं। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन के दिन अर्चना करने से घर में माता लक्ष्मी निवास करती हैं। वैसे तो होलिका दहन पर लोग अलग-अलग उपाय करते हैं परंतु इस खास दिन पर कुछ विशेष काम भूलकर भी नहीं करना चाहिए। आइए जानते हैं क्या हैं वो कार्य- होलिका दहन पर न करें ये कार्य : • होलिका दहन के दिन सफेद रंग के वस्त्र नहीं धारण करने चाहिए। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार माना जाता है कि होलिका दहन के दिन नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव ज्यादा रहता है इसलिए सफेद रंग के वस्त्र धारण नहीं करने चाहिए और न ही किसी भी सफेद रंग के खाद्य पदार्थ का सेवन करना चाहिए। • होलिका दहन के दिन किसी को पैसा उधार देने से परहेज करें। यदि आप होलिका दहन वाले दिन किसी को उधर देंगे तो आपको आर्थिक रूप से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। • होलिका दहन के दिन पूजा करते समय भूलकर भी सिर खुला न रखें। फिर वह चाहे पुरुष हो या स्त्री। इस दिन सिर ढककर पूजा करने से लाभ मिलता है। • नए विवाहित जोड़ों को होलिका दहन की पूजा भूलकर भी नहीं देखनी चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है तो इसका असर उनके दाम्पत्य जीवन पर पड़ता है। इसके अलावा इस दिन कोई भी शुभ कार्य नहीं होना चाहिए। • होलिका दहन के दिन रास्ते पर किसी भी प्रकार की वस्तु को हाथ नहीं लगाना चाहिए। यह किसी भी प्रकार का टोटका हो सकता है जो आपके छूते ही नकारात्मक प्रभाव लाएगा।
एबीएन सोशल डेस्क। चने खाना सेहत के लिए कई तरह से विशेष लाभदायक माना जाता है। चने में प्रोटीन और फाइबर की पर्याप्त मात्रा होती है, जिसका सेवन करना आपकी सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। पर क्या आप जानते हैं कि भुने हुए चने खाना, सेहत के लिए और भी कई तरह के लाभ दे सकता है? आहार विशेषज्ञों की मानें तो भुने चने पेट की समस्याओं को कम करने से लेकर ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने तक के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। वहीं अगर आप वजन कम करने की कोशिश में लगे हुए तो भी इसका नियमित सेवन आपको लाभ दे सकता है। आयुर्वेद विशेषज्ञ बताते हैं, भुने चने का सेवन गुड़ के साथ करना और भी स्वास्थ्यवर्धक हो सकता है। जिन लोगों को शरीर में आयरन की कमी रहती है, ऐसे लोगों को गुण के साथ भुने चने खाने से फायदा मिलता है। पोषक तत्वों से भरपूर चने शरीर को कई सारी अन्य समस्याओं से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आइए आगे की स्लाइडों में इस बारे में विस्तार से जानते हैं। शरीर की शक्ति बढ़ाने के लिए खाएं चने : चने में प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है, ऐसे में इसका सेवन करना मांसपेशियों के निर्माण को बढ़ावा देने में फायदेमंद हो सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि शारीरिक क्षमता के विकास में भुने हुए चने का सेवन आपको आश्चर्यजनक लाभ दे सकता है। गुड़ के साथ भुने हुए चने खाने से शरीर में खून की कमी दूर होती, साथ ही प्रोटीन का अच्छा स्रोत होने के कारण यह आपके फिटनेस में भी फायदेमंद माना जाता है। ब्लड शुगर को रखता है कंट्रोल : डायबिटीज रोगियों के लिए अक्सर संतुलित आहार का चयन करना कठिन होता है, ऐसे लोगों के लिए भुने हुए चने खाना अच्छा विकल्प हो सकता है। यह कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला आहार है, ऐसे में इसके सेवन से रक्त शर्करा का स्तर बढ़ता नहीं है। इसके अलावा चूंकि चने में फाइबर की भी अच्छी मात्रा पाई जाती है, ऐसे में यह पेट को ठीक रखने के साथ डायबिटीज से संबंधित अन्य जटिलताओं को कम करने में भी आपके लिए फायदेमंद हो सकता है। पाचन को रखता है दुरुस्त : अगर आप भी पाचन की समस्याओं से परेशान रहते हैं तो आहार में भुने हुए चने को शामिल करके लाभ पा सकते हैं। यह आपको लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस करता है साथ ही इसमें मौजूद फाइबर की मात्रा शौच को आसान बनाती है, जिससे कब्ज और पेट के फूलने जैसी दिक्कतों से छुटकारा पाया जा सकता है। भुने हुए चने पाचन शक्ति को बढ़ाने और शरीर को आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति करने में फायदेमंद हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। रूस और यूक्रेन के बीच भीषण युद्ध का असर दिखने लगा है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि की है। कामर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में 105 रुपये का इजाफा हुआ है। वहीं, पांच किलो के रसोई गैस सिलेंडर छोटू के दाम भी 27 रुपये बढ़ गए। ऐसे में माना जा रहा है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद घरेलू गैस सिलेंडर के साथ पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ सकते हैं। बता दें आखिरी चरण का चुनाव 7 मार्च को है। एक मार्च से हुई बढ़ोतरी के बाद राजधानी दिल्ली में कामर्शियल सिलेंडर की कीमत 1907 से बढ़कर 2012 रुपये प्रति सिलेंडर हो गई है। वहीं, पांच किलो के छोटे गैस सिलेंडर के दाम 27 रुपये बढ़कर 569.5 रुपये हो गई है। कंपनियों ने घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं है। घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत छह अक्तूबर 2021 के बाद स्थिर हैं। ऐसे में चुनाव के बाद दाम बढ़ सकते हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमत भी पिछले कई माह से स्थिर हैं। केंद्र सरकार ने तीन नवंबर 2021 को उत्पाद शुल्क में पेट्रोल पर पांच और डीजल पर दस रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। इसके बाद कई राज्य सरकारों ने भी अपना टैक्स कम किया था। उस वक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम औसतन 82 डॉलर प्रति बैरल थे। रूस और यूक्रेन की लड़ाई में कच्चे तेल 104 डॉलर के पार पहुंच गया है। कच्चे तेल की कीमतों में जल्द कमी के आसार नहीं है। इसका कारण यह है कि अमेरिका के आग्रह के बावजूद सबसे बड़े उत्पादक सऊदी अरब ने अपना उत्पादन नहीं बढ़ाया है। ऐसे में कच्चे तेल के दाम में फिल्हाल कमी की संभावना कम है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी के एक अधिकारी के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से कंपनियां दबाव में हैं। ऐसे में जल्द पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं।
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